03 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

03 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)

जलवा हो तो ऐसा...

महाकाल मंदिर के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है

"जलवा हो तो ऐसा!"

इशारा उसी "पिस्तौल कांड" के नायक की ओर है, जिनका पिछले महीने धरती पकड़ दिवस खूब चर्चा में रहा। उन्होंने ठान लिया कि बाबा महाकाल के गर्भगृह में जाकर आशीर्वाद लेना है। अब उन्हें रोकना मतलब पुरानी कहावत।

"आ बैल, मुझे मार"—को चरितार्थ करना था। इसलिए सबने मौन साध लिया। आखिर, "समरथ को नहीं दोष गुसाईं।"

यहाँ तक तो बात समझ में आती है। लेकिन हर बड़े नेता की तरह उनके साथ भी कुछ ऐसे परम भक्त थे, जिन्हें अवसर पहचानने की अद्भुत कला आती है। जैसे ही रास्ता खुला, वे भी गर्भगृह में पहुँच गए और बाबा का आशीर्वाद लेकर बाहर आ गए। नियम शायद उस समय श्रद्धा के आगे थोड़ा संकोच कर गया।

"अब अगर कोई पूछे कि इसका प्रमाण क्या है, तो जवाब भी उतना ही रोचक है। मंदिर के गलियारों में चर्चा है कि गर्भगृह की गतिविधियाँ दिखाने वाला सीसीटीवी कैमरा ठीक उसी दौरान कुछ मिनट के लिए विश्राम पर चला जाता है। कहते हैं, यह व्यवस्था नई नहीं है; फर्क सिर्फ इतना है कि श्रावण मास में उसका "आराम" कुछ अधिक चर्चा में रहता है।"

यह सच है, अर्धसत्य है या सिर्फ़ गलियारों की गूँज—इसका फैसला हम नहीं करेंगे। फैसला आप अपने विवेक से कीजिए।

तब तक... हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

हाइनेस की अंतहीन पीड़ा..

इन दिनों अपने हाइनेस ऐसी पीड़ा से गुजर रहे हैं, जिसका अंदाज़ा हर कोई नहीं लगा सकता। यह दर्द वही समझ सकता है, जिसने राजनीति का काँटों भरा ताज पहन रखा हो।

ताज़ा किस्सा अभी-अभी समाप्त हुए मानसून सत्र का है। हाइनेस ने पूरे मनोयोग से एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लगाया था। उम्मीद थी कि मौका मिलेगा, सरकार से सवाल पूछेंगे, अपनी बात दमदार ढंग से रखेंगे और सुर्खियाँ भी बटोरेंगे।

दो दिन तक सूची पर नज़रें टिकी रहीं। हर बार लगा—"अब नाम आएगा... अब बुलावा आएगा..." लेकिन राजनीति भी कभी-कभी बड़ी निर्मोही होती है।

सूत्र बताते हैं कि जिस मुद्दे पर बोलने की पूरी तैयारी थी, उस पर नंबर ही नहीं आया। उलटे जिस विषय से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था, उसी पर सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेदारी निभानी पड़ गई। यानी भाषण तैयार था एक विषय पर, और परीक्षा हो गई दूसरे विषय की।

राजधानी के गलियारों में इस प्रसंग पर खूब मुस्कुराहटें बिखर रही हैं। कोई इसे संसदीय संयोग बता रहा है, तो कोई राजनीतिक विडंबना।

सच क्या है, यह तो हाइनेस ही जानें... और राजधानी के सूत्र।

हमारा काम तो बस इतना है कि सुनी-सुनाई बातों को सुना दें। फैसला आप करें और हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहे।

66 का चक्कर...

कहावत तो बरसों से "99 के चक्कर" वाली चली आ रही है। लेकिन राजधानी के गलियारों में इन दिनों नई कहावत जन्म ले रही है—"66 का चक्कर।"

बताने वाले बताते हैं कि यही 66 ऐसा अंक निकला, जिसने एक साहब को सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी से कुछ कदम पहले ही रोक दिया। वरना आज वे ही टॉप बॉस की कुर्सी पर विराजमान होते और दूसरे लोग फाइलें लेकर उनके दरबार में हाजिरी लगा रहे होते।

अब यह 66 आखिर है क्या? अंक है, फाइल है, संदेश है, कोई घटना है या फिर राजनीति का कोई ऐसा फार्मूला, जिसे केवल राजधानी के पांचवें गलियारे वाले ही समझते हैं? इस पर सब मुस्कुराते हैं, लेकिन खुलकर कोई बोलता नहीं।

चर्चा तो यहाँ तक है कि उस घटनाक्रम के बाद रायता समेटने वाले साहब इतने व्यथित हो गए कि इस्तीफा तक लिख डाला। फिर शुभचिंतकों ने समझाया—"साहब, नोकरशाही में इस्तीफे कम और इंतजार ज्यादा काम आते हैं।" तब जाकर मामला शांत हुआ।

अब सच कितना है और कल्पना कितनी, यह तो दिल्ली और राजधानी के गलियारों की दीवारें ही जानती हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक नया मुहावरा जरूर चल निकला है—

99 के फेर में लोग फँसते थे... अब 66 भी कम खतरनाक नहीं निकला।

बाकी... 66 का राज भी रहेगा, और हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

वजनदार की डिमांड और नियम...

अपने वजनदार जी का यह दूसरा कार्यकाल चल रहा है। हर साल की तरह इस बार भी उन्होंने महाकाल मंदिर की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल की तैनाती की मांग उठा दी। सर्वोच्च सदन में आवाज़ बुलंद हुई, छोटा भाई के साथ तस्वीरें भी खिंचीं और मीडिया में सुर्खियाँ भी मिल गईं।

अब सवाल यह नहीं कि मांग गलत है या सही। सवाल यह है कि क्या मांग करने वालों ने नियम भी पढ़े हैं?

चुप की नज़र में तो वजनदार जी से ज़्यादा दोष उनके उन सलाहकारों का है, जो हर साल वही पुरानी स्क्रिप्ट पकड़ा देते हैं। चापलूसी के जोश में शायद उन्होंने कभी यह जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि जिस केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती की बात हो रही है, उसके अपने नियम भी हैं।

जानकार बताते हैं कि ऐसे बलों की तैनाती केवल मंजूरी से नहीं होती। यदि विशेष श्रेणी में सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है, तो वेतन, आवास, अधोसंरचना और रखरखाव जैसे खर्च संबंधित राज्य सरकार या संबंधित संस्थान को वहन करने पड़ सकते हैं। यानी मांग के साथ आर्थिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या केवल मांग करने से काम चल जाएगा, या फिर उसके नियम, शर्तें और वित्तीय पहलू भी समझने होंगे?बाकी, गूगल बाबा आज भी सब जानते हैं। जिज्ञासा हो तो नियम पढ़ लीजिए, फिर तय कीजिए कि भारी कौन है—नियम या वजनदार की डिमांड?

तब तक... हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

मीठा आदमी कौन...?

इन दिनों चक्रम के गलियारों में एक चर्चा बड़ी मीठी चल रही है। आवाज़ें धीमी हैं, मुस्कानें चौड़ी हैं और इशारे इतने स्पष्ट कि नाम लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

अब पाठक यह मत समझिए कि बात उस मशहूर जुमले की हो रही है—"भोजन के बाद कुछ मीठा हो जाए।" नहीं जनाब, यहाँ मिठाई की नहीं, "मीठे इंसान" की चर्चा है। और इस मीठे शब्द का असली राजनीतिक अर्थ तो अपने कमलप्रेमी बखूबी समझते हैं।

कहते हैं कि जिनसे इनका मीठा याराना है, उनका ठिकाना भी ज़्यादा दूर नहीं। बस, निवास से कोई सौ मीटर की दूरी पर स्थित एक हॉस्टल। अब पड़ोस इतना नज़दीक हो तो टहलने के बहाने मुलाकातें भी हो ही जाती हैं। देखने वालों का दावा है कि शाम की सैर का रास्ता अक्सर वहीं जाकर पूरा होता है।

अब यह केवल संयोग है, मित्रता है, राजनीतिक संवाद है या फिर "मीठे" रिश्तों की मिठास—इस पर चक्रम से लेकर चौराहे तक अपने-अपने निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं।

हम तो सिर्फ़ गलियारों में उड़ती फुसफुसाहट आपके कानों तक पहुँचा रहे हैं। सच-झूठ का फैसला आप करें।

तब तक...अपनी आदत के अनुसार हम चुप रहेंगे।

धक्के पर माननीय की मुस्कान...

गुरुपूर्णिमा पर अपने विकासपुरुष आए। शहर को कई सौगातें देकर गए, इसके लिए साधुवाद।

लोकार्पण का शुभ मुहूर्त था। लाल पर्दा हटाने की तैयारी चल रही थी। विकासपुरुष के हाथ में डोरी थी। बगल में हाइनेस, मंडल के मास्साब और दालवाले नेताजी कैमरे की ओर मुखातिब होकर मुस्कुराने की मुद्रा में खड़े थे। तभी अचानक दृश्य बदल गया।

पीछे से विकासभवन के मुखिया का तेज़ी से प्रवेश हुआ। आते ही उन्होंने मंडल के मास्साब को ऐसा धक्का दिया कि फोटो का फ्रेम ही हिल गया। धक्के की लहर दालवाले नेताजी तक भी पहुँच गई। बताया जाता है कि इस दौरान कुछ तीखे शब्द भी हवा में तैर गए।

यह पूरा घटनाक्रम विकासपुरुष की नज़रों से छिपा नहीं रहा। उन्होंने एक पल देखा... फिर मुस्कुरा दिए। हाथ के हल्के इशारे से माहौल शांत कराया और लोकार्पण की रस्म पूरी हो गई। मंच पर शांति लौट आई, लेकिन गलियारों में चर्चा शुरू हो गई।

किसी शायर ने शायद ऐसे ही मौकों के लिए कहा होगा—

भीड़ में भला तुम्हें कोई रास्ता क्यों देगा।मुझे गिरा के अगर चल सको तो चलो।

अब यह धक्का प्रोटोकॉल का था, फोटो फ्रेम का था या फिर राजनीतिक संदेश का—इसका फैसला पाठक स्वयं करें।

हम तो बस इतना कहेंगे कि मुस्कान माननीय की थी... लेकिन चर्चा धक्के की हो गई।

बाकी... अपनी आदत के अनुसार हम चुप रहेंगे।

आरती से उठाया... फिर माफ़ी मांगी

महाकाल मंदिर के गलियारों में इन दिनों एक पुराना किस्सा फिर नई चमक के साथ सुनाया जा रहा है। बात करीब पंद्रह दिन पहले की बताई जाती है।

शाम की आरती से पहले एक माननीय मैडम दर्शन के लिए पहुँचीं। प्रोटोकॉल भी था और साथ में सहायक प्रशासक भी मौजूद थे। दर्शन पूरे हुए तो मैडम बाहर निकलने ही वाली थीं कि तभी आरती शुरू हो गई। आस्था जागी, कदम रुक गए और उन्होंने आरती में शामिल होने की इच्छा जताई।

लेकिन नियम शायद घड़ी देखकर चलते हैं। सहायक प्रशासक ने उन्हें बाहर की ओर बढ़ा दिया। बात यहीं खत्म हो जाती... अगर राजनीति में 'एक फोन' नाम का अध्याय न होता।

कहते हैं, अगले ही पल पिस्तौल कांड के नायक का फोन घनघना उठा। फिर क्या था... माहौल ही बदल गया। जो कुछ क्षण पहले बाहर का रास्ता दिखा रहे थे, वही हाथ जोड़कर क्षमा याचना करते दिखाई दिए। मैडम वापस लौटीं और इत्मीनान से आरती में शामिल हुईं।

अब इस पूरे प्रसंग में जीत नियमों की हुई, प्रोटोकॉल की हुई या एक फोन की—इस पर मंदिर के गलियारों में अलग-अलग व्याख्याएँ चल रही हैं।

देखने वालों का तो यहाँ तक कहना है कि महाकाल मंदिर में कभी-कभी आरती से ज़्यादा असर घंटियों का नहीं, घंटी बजाने वाले फोन का होता है।

सच क्या है, इसका फैसला हम नहीं करेंगे। फैसला आप अपने विवेक से कीजिए।

तब तक... अपनी आदत के अनुसार हम चुप रहेंगे।

45 या 55 पेटी की चर्चा..

इन दिनों दाल-बिस्किट वाली तहसील में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि जमीन किसकी थी, बल्कि यह है कि चर्चा में उड़ रही पेटियों की संख्या आखिर 45 थी या 55?

चाय की दुकानों से लेकर सरकारी गलियारों तक अलग-अलग गणित चल रही है। कोई 45 पर अड़ा है, तो कोई 55 से नीचे उतरने को तैयार नहीं। सच क्या है, यह तो जांच बताएगी, लेकिन चर्चा ने पूरे इलाके का तापमान बढ़ा रखा है।

कहते हैं।

पुराने जमीन प्रकरण में कुछ किरदारों ने ऐसा तालमेल बिठाया कि फाइलें भी मुस्कुरा उठीं। चर्चा यह भी है कि जांच के दौरान कागजों से ज्यादा हल्के हरे रंग के कागजों की अहमियत बढ़ गई।

उधर, जिस फैसले पर सवाल उठे, उसी फैसले के रिव्यू की गुहार भी लगा दी गई है। अब निगाहें उज्ज्वल जी पर टिकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि वे पुराने आदेश को बरकरार रखते हैं या नया अध्याय लिखते हैं।

अब यह चर्चा सच है, अफवाह है या राजनीतिक मसाला—इसका फैसला जांच करेगी। फिलहाल तो तहसील में लोग मुस्कुराते हुए बस एक ही सवाल पूछ रहे हैं—"आखिर पेटियां 45 थीं या 55?"

बाकी... लोगों की जुबान पर पहरा लगाना हमारे बस की बात नहीं।

इसलिए, अपनी आदत के अनुसार... हम चुप रहेंगे।

सोमरस की खुली बिक्री... और विभाग की गहरी नींद

अपने विकासपुरुष ने शहर की सीमा में सोमरस की बिक्री पर ऐसी पाबंदी लगा रखी है कि कागज पढ़कर लगता है मानो शहर पूरी तरह नशामुक्त हो चुका हो। उधर सोमरस विभाग भी समय-समय पर अंगड़ाई लेता है। दो-चार होटल, ढाबों पर दबिश देता है, कैमरों के सामने बोतलें सजती हैं, फोटो खिंचते हैं, प्रेस नोट जारी होता है और फिर विभाग दोबारा योगनिद्रा में चला जाता है।

मगर चुप की नज़र एक ऐसे ठिकाने पर अटक गई है, जहाँ शायद विभाग का गूगल मैप काम नहीं करता।

चर्चा है कि शिवाजी भवन की सरकारी जमीन पर बनी एक झोपड़ी में हर शाम देशी सोमरस का ऐसा "मिनी मॉल" सजता है कि मजदूर वर्ग लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतजार करता है। न पर्दा, न परदा-दारी... सब कुछ खुलेआम। देखने वालों का कहना है कि यहाँ ग्राहक से ज्यादा नियमित तो लाइन होती है।

हैरानी की बात यह है कि इस ठिकाने का पता रिक्शेवाले से लेकर राहगीर तक बता देते हैं। मगर जिनकी सरकारी गाड़ी पर विभाग का नाम लिखा है, उन्हें शायद यह रास्ता आज तक नहीं मिला। या फिर... मिला भी हो तो ब्रेक लगाने का मन नहीं हुआ।

अब सवाल यह है कि कार्रवाई केवल वहीं होती है, जहाँ कैमरे पहले पहुँच जाएँ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि विभाग का नया सिद्धांत है

जो दिखाई दे, उस पर छापा मारो... और जो सबको दिखाई दे, उसे अनदेखा कर दो।

अब यह चर्चा है या सच्चाई, इसका फैसला संबंधित विभाग करे। क्योंकि जनता तो रोज़ शाम वही नज़ारा देख रही है।

बाकी... हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

गुरुवार-शुक्रवार का महोत्सव...

कहते हैं, हर विभाग का अपना-अपना वर्किंग डे होता है। लेकिन अन्नदाताओं के कल्याण वाले विभाग ने शायद एक कदम आगे बढ़कर "कलेक्शन डे" भी तय कर लिया हैं। राजधानी से लेकर तहसीलों तक चर्चा है कि गुरुवार और शुक्रवार अब सरकारी कैलेंडर में अलग ही महत्व रखते हैं।

चर्चा यह भी है कि इन दो दिनों में साहब की गाड़ी जितनी धूल फाँकती है, उतनी पूरे सप्ताह नहीं। फाइलों से ज्यादा मुलाकातें होती हैं और निरीक्षण से ज्यादा "समझाइश"।

गलियारों में तो लोग मजाक में कहते हैं कि अब विभाग का नया नारा होना चाहिए—

अन्नदाताओं का कल्याण बाद में, साप्ताहिक लक्ष्य पहले।

कहीं पाँच हजारी की मिठास, कहीं दस हजारी की गर्माहट और कहीं बीस हजारी की आत्मीयता... सुनने वालों की मानें तो "रेवड़ियाँ" बाँटने का मौसम नहीं, समेटने का मौसम चल रहा है।

मजेदार बात यह है कि चर्चा अब टारगेट की हो रही है। लोग पूछते हैं

इस सप्ताह पचास पूरे हुए या नहीं?" मानो कोई सरकारी योजना नहीं, आईपीएल का स्कोर चल रहा हो।

इधर एक और फुसफुसाहट है कि विभागीय दफ्तर में मनाए गए

कथित जश्न की खबर भी ऊपर तक पहुँच गई है। अब जश्न है तो जाम पर जाम -साप्ताहिक उगरानी के नाम की चर्चा भी जमकर सुनाई दे रही है। जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

बच्चे हमारे अहद के चालक...

ज़रा अपना बचपन याद कीजिए। गली में अगर एक वर्दीधारी साइकिल से भी निकल जाए, तो आधा मोहल्ला घरों में दुबक जाता था। बच्चे दूर से ही सलाम ठोक देते थे और बड़े धीरे से फुसफुसाते—"चुप... पुलिस जा रही है।"

मगर यह डिजिटल युग है जनाब। अब बच्चे पुलिस से डरते नहीं, रील बनाकर पुलिस कप्तान को बुला लेते हैं।

कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक नन्हे बालक ने अपने पिता से इच्छा जताई कि उसे पुलिस कप्तान से मिलना है। पिता ने भी सीधा रास्ता नहीं बताया। बोले—कुछ ऐसा करो कि कप्तान खुद मिलने को तैयार हो जाएँ।

बस... बच्चे ने इस सलाह को चुनौती नहीं, मिशन बना लिया। एक वीडियो बनाया। वीडियो एक अधिवक्ता के माध्यम से कप्तान तक पहुँचा। और फिर वही हुआ, जो शायद वर्षों पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कप्तान साहब खुद बच्चे के घर पहुँचे, उससे मिले, बातें कीं और उसके सपनों को सलाम किया।

यही तो समय का बदलाव है। पहले जनता अफसरों के दरवाज़े पर जाती थी, अब संवेदनशील अफसर जनता के घर पहुँच रहे हैं।

 ऐसे में किसी शायर का शेर याद आता है—

जुगनू को रोशनी में परखने की ज़िद करें। बच्चे हमारे अहद के चालक हो गए हैं।

सचमुच, आज के बच्चे मोबाइल नहीं चला रहे... समय चला रहे हैं। वे जानते हैं कि अपनी बात किस तरह दुनिया तक पहुँचानी है।

और जहाँ एक बच्चे की मासूम इच्छा को एक पुलिस कप्तान अपना समय देकर सम्मान दे, वहाँ यह केवल मुलाकात नहीं, बल्कि वर्दी और समाज के बीच विश्वास का पुल बन जाता है।

ऐसी संवेदनशीलता के लिए कप्तान साहब साधुवाद के पात्र हैं।

बाकी... अपनी आदत के अनुसार हम चुप रहेंगे।

तीन तिगाड़ा... अब काम बिगाड़ा नहीं, काम सुधारा!

एक समय था जब "तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा" हर घर की मशहूर कहावत थी। बचपन में यह इतनी बार सुनी कि सच लगने लगी। अगर किसी काम में तीन लोग लग जाएँ, तो लोग पहले ही मान लेते थे कि अब कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होगी। हम जैसे 1960 के बाद वाली पीढ़ी, जिसे रिटायर्ड आईएएस आनंद शर्मा बेबी बूमर्स कहते हैं, इसी सोच के साथ बड़े हुए।

लेकिन वक्त बदल गया। पीढ़ी बदली तो सोच भी बदल गई। अब लगता है कि कहावत का नया संस्करण लिखना पड़ेगा।

तीन तिगाड़ा, काम सुधारा।

गुरुपूर्णिमा के अगले दिन रवाना होने से पहले विकासपुरुष ने उज्ज्वल जी और कप्तान जी को बुलाया। करीब आधे घंटे तक तीनों के बीच अकेले में चर्चा हुई। महाकाल की सवारी से लेकर शहर के कई मुद्दों पर सवाल-जवाब हुए और जरूरी निर्देश भी दिए गए।

अब कमलप्रेमी कह रहे हैं कि जब तीनों एक साथ बैठकर काम की बात कर रहे हैं, तो पुरानी कहावत भूल जाइए।

यह तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ने नहीं, सुधारने वाला है।

वैसे उज्ज्वल जी और कप्तान जी जेन-जी की पीढ़ी के हैं। उन्हें पुरानी कहावतों से ज्यादा नए नतीजों पर भरोसा है। इसलिए वे कुछ बोल भी नहीं रहे।

शायद उनका मानना है कि जवाब शब्द नहीं, काम देगा।

अब नई पीढ़ी ने कहावत बदल दी है या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा। फिलहाल हम तो अपनी आदत निभाते हुए ही

चुप रहेंगे।

तुम भी शिकायत करो...

महाकाल की सवारी की तैयारियों के बीच इस बार सबसे बड़ा बदलाव ट्रैफिक, बैरिकेडिंग या सुरक्षा में नहीं, बल्कि "शिकायत व्यवस्था" में दिखाई दिया।

रविवार शाम त्रिनेत्र में बैठक हुई। उज्ज्वल जी आए, 15 मिनट में जरूरी निर्देश दिए और निकल गए। फिर फटाफट जी ने मोर्चा संभाला। नियम-कायदों की पूरी किताब खोलने के बाद उन्होंने ऐसा ज्ञान दिया, जो शायद वर्षों से दबा हुआ था।

बोले—"वर्दी वालों को जरा-सी परेशानी होती है तो सीधे कलेक्टर तक शिकायत पहुंच जाती है। राजस्व वाले बेचारे तकलीफ सहते रहते हैं। अब यह त्याग की मूर्ति बनने की जरूरत नहीं। जहां दिक्कत हो, वहीं से फोन उठाइए और एडिशनल एसपी को शिकायत दर्ज कराइए।

मतलब साफ है। अब तक मुकाबला व्यवस्था संभालने का होता था, इस बार शिकायत दर्ज कराने का भी रहेगा।

सूत्र बताते हैं कि सवारी में राजस्व और वर्दी के बीच समन्वय का रिश्ता वैसा ही रहता है, जैसा बरसात में बिजली विभाग और उपभोक्ता का।

दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार मानते हैं।

इस बार ऊपर से आदेश है, इसलिए खेल बराबरी का रहेगा। अब केवल वर्दी ही नहीं बोलेगी, राजस्व भी बोलेगा। यानी अगर किसी ने आंख दिखाई, तो जवाब फाइल से नहीं, फोन से मिलेगा।

अब सबसे दिलचस्प सवाल यह नहीं कि पहली सवारी कितने बजे निकली, बल्कि यह होगा कि पहली शिकायत किसने दर्ज कराई।

वर्दी ने या मजिस्ट्रेट ने?

कहीं ऐसा न हो कि बाबा की सवारी के बाद कंट्रोल रूम में "शिकायत यात्रा" निकालनी पड़ जाए।बाकी... हम तो यही प्रार्थना करेंगे कि सवारी श्रद्धा से निकले, व्यवस्था समन्वय से चले और शिकायत करने की नौबत ही न आए।बाकी हमकों कुछ नहीं कहना है। बस आदत के अनुसार चुप रहना है।

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