10 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

10 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)

तीन बोतलों के साथ पकड़े गए...!
बाबा काल भैरव के दरबार की बात है। शनिवार शाम छह बजे के बाद की। एक शख्स मंदिर से झोला लेकर बाहर निकला।जिस पर  नजर राजस्व मुखिया और वर्दीधारी मुखिया की पड़ी तो रोक लिया गया | चेकिंग हुई तो झोले से तीन बोतल सोमरस बरामद हुईं। सवाल हुआ—कहां मिली। जवाब आया कि- हाइनेस के निज सचिव के कहने पर मंदिर से मिली हैं। मुफ्त में। पहले भी ले जाते रहे हैं। अब मामला थोड़ा गरम हुआ। राजस्व मुखिया ने फोन पर पुजारी जी की ऐसी क्लास ली कि शायद अगली बार बोतल देने से पहले पुजारी जी को अपना अधिकार-पत्र भी तलाशना पड़े! सवाल सीधा था—किस अधिकार से बोतल दी जाती है? इसी बीच निज सचिव भी पहुंच गए। बोतलें वापस करवाई गईं और मामला फिलहाल वहीं शांत हो गया। लेकिन असली मजा तो इसके आगे है।बताया जा रहा है कि हाइनेस को इसकी खबर तक नहीं! यानी उनके नाम का इस्तेमाल कर उनके निज सहायक चुपचाप बोतल और शुल्क वाले दर्शन का अपना इंतजाम चला रहे हैं तो सवाल यह है कि दोष किसका?हाइनेस का  नाम लेकर सुविधा लेना आसान है, मगर नाम की इज्जत बचाना भी किसी की जिम्मेदारी है।अब फैसला हाइनेस खुद करें कि उनके नाम पर चल रही इस “बोतल सेवा” में कौन सेवा कर रहा है और किसकी सेवा हो रही है। हम तो बस इतना कहेंगे—बोतल वापस हो गई, लेकिन सवाल अभी भी झोले में पड़ा है।और नाम उनका बदनाम हो रहा है...। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

चौकड़ी को भी पकड़िए साहब...!
तीन बोतल सोमरस पकड़ी गईं। राजस्व और वर्दी ने मिलकर शनिवार शाम अचानक कार्रवाई की। अच्छा काम है। कम से कम यह तो पता चला कि मंदिर से झोला लेकर निकलने वालों पर नजर रखी जा सकती है। मगर साहब... तीन बोतल ही क्यों?मंदिर में एक और खेल चलने की चर्चा है। प्रोटोकॉल बंद है। भीड़ इतनी कि दर्शन में तीन घंटे से ज्यादा लग रहे हैं। ऐसे में एक चौकड़ी खुद को खबरची बताकर भक्तों को जल्दी दर्शन करवाने का दावा करती है। और रेट? चर्चा में तीन से पांच हजार रुपये प्रति भक्त! दिलचस्प यह भी है कि इस खेल में सिर्फ बाहर के चेहरे नहीं, मंदिर व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों की भूमिका की चर्चा भी होती रहती है। आखिर अंदर का रास्ता बिना अंदर वाले के कैसे खुलता है? तीन बोतल पकड़ना अच्छी कार्रवाई है। लेकिन असली वाहवाही तब होगी, जब दर्शन के नाम पर चल रही कथित चौकड़ी की दुकान भी बंद होगी।अब देखना यह है कि शनिवार की कार्रवाई सिर्फ तीन बोतलों तक सीमित रहती है या फिर तीन से पांच हजार वाली बोतल भी खुलती है। क्योंकि सवाल सोमरस की तीन बोतलों का नहीं है साहब... सवाल उस व्यवस्था का है, जहां भक्त घंटों लाइन में खड़ा है और कुछ लोग खबरची बनकर शॉर्टकट बेच रहे हैं। देखना यह है कि चौकड़ी पर अंकुश लगता है या नही। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मीठे का प्यार... राजधानी तक साथ-साथ!
पिछले सप्ताह हमने एक मीठे का जिक्र किया था। मीठा ऐसा कि चक्रम में ऊंचे पद पर विराजमान है। खबर छपी तो चक्रम की तरफ से कई पाठकों ने बधाइयां भेजीं। अब जब बधाइयां आई हैं तो खबर की मिठास भी बढ़ना तय है। इसी बीच एक पाठक ने मीठे को लेकर ऐसी जानकारी दी कि हमारी चुप्पी भी मुस्कुराने लगी। पाठक का कहना है कि जब भी ये राजधानी की ओर कूच करते हैं, अपने एक युवा साथी को साथ ले जाना नहीं भूलते। आखिर साथी भी ऐसा, जिसके साथ मीठा याराना होने की चर्चा है। पिछले सप्ताह भी दोनों साथ-साथ राजधानी गए। सफर साथ हुआ और बताया गया कि रात भी एक ही कमरे में गुजरी। अब इसे क्या नाम दिया जाए, यह तो मीठे और उनके युवा साथी ही बेहतर जानते होंगें। लेकिन जब से मीठे का नाम चर्चा में आया है, लगता है चक्रम में हर किसी की नजर अब इसी मिठास पर टिक गई है। रोज कोई न कोई नई सूचना हमारे पास पहुंच रही है। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन खबरों की मिठास इतनी बढ़ जाए कि हमें मजबूर होकर— “चुप रहेंगे” का मीठा विशेषांक निकालना पड़े! हां, इतना जरूर है कि मीठे की मिठास अब चक्रम से निकलकर राजधानी तक पहुंच गई है। जिसमें हम क्या कर सकते है।बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

फटाफट जी के आदेश, न्यायदेवता की एंट्री और फिर मंदिर में फेरबदल की ‘कहानी’
मंदिर में प्रथम सवारी निकलते ही अचानक कर्मचारियों के इधर-उधर किए जाने का आदेश जारी हो गया। किसे कहां भेजना है, किसे कहां लगाना है—यह फटाफट जी का अधिकार है। इसमें हम न पड़ेंगे, न किसी के प्रशासनिक अधिकार पर सवाल उठाएंगे। हमारा वास्ता तो उस कहानी से है, जो इन दिनों मंदिर के गलियारों में दबी जुबान से घूम रही है। बताया जा रहा है कि रविवार और सोमवार की अलसुबह फटाफट जी नंदी हॉल में मौजूद थे। उसी दौरान एक न्यायदेवता परिवार के साथ दर्शन के लिए पहुंचे। चर्चा है कि फटाफट जी ने संबंधित प्रभारी को उन्हें अंदर जाने से रोकने के लिए कहा। प्रभारी ने आदेश का पालन करते हुए न्यायदेवता के ड्राइवर तक संदेश पहुंचा दिया—“फटाफट साहब ने कहा है...”ड्राइवर ने संदेश अपने साहब तक पहुंचा दिया। इसके बाद कहानी में अचानक ट्विस्ट आया। न्यायदेवता ने ड्राइवर से कहा उन्हें बुलाकर लाओ। बस फिर क्या था! दूर से आते न्यायदेवता के दूत को देखकर फटाफट जी वहां से ऐसे घिसके कि मानो नंदी हॉल में  अचानक दर्शन की बजाय दौड़ प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। इसके बाद प्रभारी की बुलाहट हुई और कथित तौर पर सवाल हुआ “तुमने उन्हें रोका क्यों नहीं? मेरा नाम क्यों लिया?” प्रभारी का जवाब भी कम दिलचस्प नहीं बताया जा रहा— साहब, इतने बड़े साहब को आप नहीं रोक रहे और मुझसे उम्मीद कर रहे हैं कि मैं रोक दूं? मुझे कटघरे में खड़ा नहीं होना। इतना कहकर कर्मचारी ने उसी वक्त ड्यूटी छोड़ दी। अब इसके बाद क्या हुआ, यह कहानी का अगला अध्याय है। उसके बाद मंदिर में कर्मचारियों के इधर-उधर फेरबदल का आदेश निकल गया। लेकिन मंदिर के गलियारों में सवाल जरूर घूम रहा है— अगर कहानी में कुछ नहीं था, तो प्रथम सवारी के तुरंत बाद इतना बड़ा बदलाव क्यों? और अगर बदलाव पहले से तय था, तो फिर उसी समय क्यों? यह सवाल मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रहा है। मगर हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।

हेडमास्टर नहीं बनना मुझे...!
नौकरशाही की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने वाले हर बड़े साहब की अपनी शैली होती है। कोई दबदबे से प्रशासन चलाता है तो कोई भरोसे से। पिछले बड़े साहब का रौब-दाब तो जगजाहिर था। राजधानी रवाना होने से पहले उनकी आखिरी वीसी शायद ही कोई अफसर भूलेगा। फोन को लेकर ऐसी फटकार लगी कि लगा अगली बैठक में अफसर मोबाइल नहीं, हाजिरी की स्लेट लेकर बैठेंगे! फोन पर प्रतिबंध का आदेश भी निकला, मगर अमल की नौबत आती, उससे पहले बड़े साहब की रवानगी हो गई।अब नए बड़े साहब हैं। कुर्सी वही है, कमरा वही और सामने वही आईएएस लॉबी... मगर माहौल बदला-बदला सा है।शनिवार की वीसी में बड़े साहब ने सहजता से कहा—“मुझे हेडमास्टर नहीं बनना है। बस, फिर क्या था! कई चेहरों पर वह मुस्कान लौट आई, जो पिछले कुछ समय से गायब थी। उन्होंने यह भी कहा कि सभी आईएएस अधिकारी अच्छा काम कर रहे हैं और हर जिले की परिस्थितियां अलग हैं। बात सामान्य थी, लेकिन संदेश साफ अफसरों पर भरोसा रखिए। आखिर आदेश देना आसान है, भरोसा करना मुश्किल। पुराने साहब का अनुशासन अपनी जगह था, नए साहब की सहजता अपनी जगह। मगर प्रशासन डर से नहीं, भरोसे से भी बेहतर चलता है। फिलहाल मोबाइल वाली चिंता गई और काम करने का नंबर आया है। बाकी हमको तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

जब न्यायदेवता लड़खड़ा गए...
शुक्रवार को विकासपुरुष का आगमन हुआ था। मौका था न्यायदेवताओं के नए ठिकाने के भूमिपूजन का। मुख्य न्यायदेवता भी पधारे थे। पहले विधिवत पूजन हुआ और फिर कुदाली चलाने की बारी आई। कुदाली चलाने के लिए मुख्य न्यायदेवता को उठना पड़ा। बस, इसी दौरान वे हल्का सा लड़खड़ा गए। एक तरफ से विकासपुरुष ने हाथ बढ़ाया और दूसरी तरफ से पुजारी जी ने संभाल लिया। पल भर का दृश्य था, लेकिन वहां मौजूद लोगों की नजर से बच नहीं पाया। न्यायदेवता को तो दो हाथों ने संभाल लिया.. मगर उसी कार्यक्रम में प्रोटोकॉल ने कुछ माननीयों को संभलने का मौका नहीं दिया। सख्त प्रोटोकॉल के चलते वजनदार जी, दालवाले नेताजी और विकास भवन के मुखिया नाराज दिखाई दिए। वजनदार जी को जब बुलाया गया तो उन्होंने सम्मान न मिलने की आपत्ति भी जता दी। ऐसा हमारा नहीं, वहां मौजूद लोगों का कहना है। अब प्रोटोकॉल भी बड़ी चीज है साहब। किसे कहां खड़ा करना है, किसे कब बुलाना है और किसे कितना सम्मान देना है—इसका हिसाब-किताब इतना बारीक है कि कभी-कभी न्यायदेवता से ज्यादा प्रोटोकॉल का पलड़ा भारी पड़ जाता है। खैर, मुख्य न्यायदेवता को तो समय रहते दो हाथों ने संभाल लिया। अब देखना यह है कि माननीयों की नाराजगी को कौन संभालता है? क्योंकि कुदाली से तो जमीन खोदी जा सकती है... प्रोटोकॉल की गांठ खोलना थोड़ा मुश्किल काम है। बाकी वहां क्या हुआ, किसे कितना सम्मान मिला और कौन कितना नाराज हुआ... यह सब हमसे मत पूछिए।क्योंकि हमारी तो आदत है चुप रहना।

विकासपुरुष से शिकायत...!
घटना हेलीपेड की है। विकासपुरुष वापसी के लिए उड़नखटोले पर सवार होने वाले थे। तभी अचानक दालवाले नेताजी ने उन्हें अलग ले लिया। बाकी नेताओं और अफसरों से थोड़ा दूर। इतनी दूरी कि बात भी हो जाए और सुनने वालों के कान भी तरस जाएं। अब वहां मौजूद हमारे सूत्र का दावा है कि दालवाले नेताजी के पास कमलप्रेमी नेताजी की शिकायतों की पोटली थी। शिकायत भी ऐसी कि दर्द पुराना लगता है। बताया जा रहा है कि अपने दालवाले कमलप्रेमी नेताजी इन दिनों अपने घटते प्रभाव से परेशान हैं। जमाना वह भी था जब वे किसी को कुछ भी कह दें, सामने वाला चुपचाप सुनकर निकल जाता था। आखिर नेताजी का रुतबा था! लेकिन अब कहानी थोड़ी बदल गई है। विकास भवन के मुखिया पुराने हिसाब-किताब से चलने वालों में से नहीं हैं। बात गलत हो तो जवाब भी मिलता है और भाषा गलत हो तो उसका भी जवाब मिलता है। बस यहीं से दालवाले नेताजी की परेशानी शुरू होने की चर्चा है। कहा जा रहा है कि नेताजी ने अपना यह दर्द विकासपुरुष के सामने रख दिया। अब हेलीपेड पर क्या कहा गया, कितना कहा गया और किस अंदाज में कहा गया—यह तो विकासपुरुष और दालवाले नेताजी ही जानें। हमारे सूत्र तो सिर्फ इतना बता रहे हैं कि उड़नखटोले के उड़ने से पहले शिकायत जमीन पर उतर चुकी थी। अब शिकायत सही है या राजनीतिक दर्द की एक्स-रे रिपोर्ट, यह फैसला कमलप्रेमी खुद करें।क्योंकि हमकों तो आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

शीतयुद्ध बदला महाभारत में...
लंबे समय से चल रहा तहसीलदार और एसडीएम के बीच का शीतयुद्ध अब खुलकर महाभारत बन गया है। जूनियर ने सीनियर को जांच से हटाने के लिए खुलकर पत्र लिख दिया है। अपने अट्टू जी को। मगर आश्चर्य की बात यह है। दाल-बिस्किट वाली तहसील में एक ही चर्चा है। दोनो ही  महा-लालची है। जो जांच कर रहे हैं। वह खुद जब दाल बिस्किट की तहसील में तहसीलदार थे। तब उन्होंने एक पार्टी के पक्ष में फैसला दिया था। फिर जब दूसरी दफ़ा उच्च पद पर  उसी जगह पहुँचे। तो उन्होंने बड़ा खेला कर दिया। अपने ही फैसले  को बदल कर दूसरी पार्टी के पक्ष मे कर दिया था। यह मामला भी भूमि से जुड़ा था। जिसमें खेल 4 से 5 खोखे का हुआ था। इस मामले में उच्च अधिकारी के  न्यायालय ने सख्त टिप्पणी आदेश में लिखी थी। जिसके बाद लालची मैडम का खेल उजागर हुआ । जिसमें 45 बनाम 55 पेटी का लेन -देन की चर्चा है। इस चक्कर मे विकासपुरुष की छवि पर दाग लग रहा है। बेहतर यही होगा कि दोनों लालची अधिकारियों को प्राथमिकता से हटाया जाए।  ताकि विकासपुरुष के जिले से प्रदेश में संदेश जाएं। जनविश्वास अभियान दिखावा नही है, बल्कि जनता का विश्वास जीतने का अभियान है। फैसला विकासपुरुष को लेना है और हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।

रस जरूरी या प्रसादी...?
मंदिर का अन्नक्षेत्र देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी पहचान रखता है। श्रावण में तो यहां रोज हजारों भक्त प्रसादी की आस लेकर पहुंच रहे हैं। ऊपर से दक्षिण भारतीय व्यंजन भी शुरू हुए हैं। इसके लिए फटाफट जी बधाई के पात्र हैं। मगर सवाल बधाई से आगे का है। पहली सवारी के दो दिन पहले खबरचियों को बुलाया गया। संग्रहालय में सवारी की तैयारियों और व्यवस्था पर बातचीत हुई। यहां तक सब ठीक था। लेकिन जब प्रसादी का समय आया तो खबरचियों को मंदिर के प्रसिद्ध अन्नक्षेत्र की जगह एक निजी ‘रस’ रेस्टोरेंट में ले जाया गया। अब सवाल यह नहीं कि खाना अच्छा था या नहीं। सवाल यह है कि जब मंदिर का अपना अन्नक्षेत्र है, जो श्रद्धालुओं के लिए प्रसादी का प्रतीक है, तब निजी रेस्टोरेंट को प्राथमिकता देने की जरूरत क्यों पड़ी?फटाफट जी की कार्यशैली में यह बदलाव क्यों आया? मंदिर की व्यवस्था बताने के लिए बुलाए गए खबरचियों को मंदिर की प्रसादी के बजाय निजी रसास्वादन करवाना क्या उचित प्रशासनिक परंपरा है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल...उस रस का भुगतान किसने किया? मंदिर के गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। चर्चा सच है या सिर्फ चर्चा, इसका जवाब तो फटाफट जी या मंदिर प्रबंधन ही बेहतर दे सकते हैं। फिलहाल पाठक अपने विवेक से तय करें कि मंदिर की प्रसादी बड़ी थी या निजी रेस्टोरेंट का रस। जिसमें हम क्या कर सकते हैं?
बस सवाल रख सकते हैं... और अपनी आदत के मुताबिक चुप रह सकते हैं।

विकासपुरुष का सवाल... ज्ञान बांटने वालों की बोलती बंद!
विकासपुरुष जब विक्रम उद्योगपुरी पहुंचे तो उनके साथ हाइनेस, पिस्तौल कांड नायक, दालवाले नेताजी, उज्ज्वल जी और कप्तान जी जैसे तमाम जानकार भी मौजूद थे। माहौल में विकास की खुशबू थी और साथ में ज्ञान की भी कोई कमी नहीं थी। इसी बीच विकासपुरुष ने बड़ा सीधा-सादा सवाल पूछ दिया— एक बेहतर ग्राम पंचायत में क्या-क्या सुविधाएं होनी चाहिए? बस फिर क्या था! जिसे जो सूझा, उसने वही बता दिया। किसी ने सड़क गिना दी, किसी ने पानी। किसी ने स्कूल बताया तो किसी ने नाली। यानी ग्राम पंचायत का पूरा बजट ही जुबान पर उतर आया।विकासपुरुष सबकी बातें सुनते रहे। लेकिन शायद उनके चेहरे पर वह संतुष्टि नहीं आई, जिसकी सबको उम्मीद थी। आखिर उन्होंने खुद जवाब दिया बेहतर ग्राम पंचायत वह है, जिसमें उद्योग के साथ एयरपोर्ट भी हो।” अब जिन लोगों ने अभी-अभी अपना-अपना ज्ञान परोसा था, वे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। क्योंकि विकासपुरुष ने उदाहरण भी सामने रख दिया। नरवर एक ऐसी ग्राम पंचायत जहां उद्योग आ चुका है और एयरपोर्ट भी आने की दिशा में है। यानी सवाल ग्राम पंचायत की सामान्य सुविधाओं का था, लेकिन जवाब भविष्य के विकास का मॉडल निकला। और यही वह क्षण था जब तमाम विशेषज्ञों का ज्ञान अचानक साइलेंट मोड पर चला गया। सबक उन लोगों के लिए जो बिना जाने बोलते हैं सवाल छोटा हो तो यह जरूरी नहीं कि जवाब भी अनुमान से दे दिया जाए। कभी-कभी सामने वाला व्यक्ति आपसे ज्यादा जानता है और सवाल ही इसलिए पूछता है कि आपकी जानकारी जांच सके। यह विकासपुरुष की पुरानी आदत है। इसलिए हर सवाल पर तुरंत ज्ञान देना जरूरी नहीं। कभी-कभी मुझे नहीं मालूम  कहना, गलत जानकारी देने से ज्यादा सम्मानजनक होता है। विकासपुरुष ने जवाब दिया तो ज्ञान बांटने वालों की बोलती बंद हो गई।अब हम क्या बोलें? जहां जानकारी खत्म हो जाए, वहां हमारी पुरानी आदत शुरू हो जाती है... हम तो बस चुप रहेंगे!

मेरी पसंद
मरहूम शायर डॉ सागर आजमी की एक ग़ज़ल के  अशआर पढ़कर मजा  लीजिए।
जब हाथ मे कलम था तो अल्फाज ही न थे।
अब लफ्ज़ मिल गए तो मेरे हाथ कट गए।
सागर किसी को देखकर हँसना पढ़ा मुझे।
दुनियां समझ रही है मेरे दिन पलट गए ।