पीली नहीं लाल बत्ती के लायक हो...

विकासपुरुष एवं मा मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जी को जन्मदिन की अनेको शुभकामनयें

पीली नहीं लाल बत्ती के लायक हो...

लगभग दो या ढाई दशक पुरानी बात है। जब मोहन जी को बड़नगर का टिकट मिला था। मुख्यमंत्री उमाभारती की कृपा से। उन्होंने पार्टी हित को देखते हुए वापस कर दिया। तब साध्वी उमा जी ने उनको उज्जैन विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिया। इत्तफाक से अग्निपथ अखबार में रिपोर्टर होने के नाते मेरे पास उविप्रा-वन-पंचायत बीट थी। तभी मोहन जी की कार्यशैली को परखा।
हालांकि इस दौरान उनकी कार्यशैली पर लगभग हर रोज एक चटपटी खबर लिखी। उविप्रा दोपहर 1 से 5 तक अपना ठिया था। जनसहयोग कक्ष में अश्विन नातू, लव मेहता, प्रशांत साठे आदि के साथ बैठकर गप्पे लड़ाते थे। इस दौरान मोहन जी आते-जाते हमको देखते रहते थे। कभी-कभार रुक कर हालचाल पूछ लेते। मगर कभी भी किसी भी खबर को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई। जबकि हर रोज उविप्रा पर लिखी खबर पढ़ते थे। कभी-कभार कोई ज्यादा मसालेदार खबर लग जाए तो जरूर देखकर मुस्कुरा देते थे।
आज के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव से पहली मुलाकात आरक्षण आंदोलन में हुई थी। गोपाल मंदिर पर उनका धरना आंदोलन चल रहा था। तभी पहली दफा उनको देखा था। हम दोस्त स्कूल में थे। तब उन्होंने खुद हम सब को बुलाकर बात की थी। तब बिलकुल अंदाजा नहीं था कि जिनसे बात हो रही है। वह सूबे के मुखिया बनेंगे और मैं कलमकार। जिनको लेकर हर रोज़ खबरें भी लिखूंगा।
मगर पहली बातचीत के बाद नियम बन गया था। स्कूल से हॉफ टाइम में तड़ी मारकर गोपाल मंदिर जाना। उस वक्त ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर भी उनके साथ किसी फोटोग्राफर ने ली थी। जब मोहन जी उच्च शिक्षा मंत्री थे। तब उन्होंने फोन पर आरक्षण आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा था। अगर कोई तस्वीर हो तो देना उन दिनों की। मतलब यह कि याददाश्त उनकी तेज है और भूलते कुछ नहीं है।
इत्तफाकन डॉ. सुशील शर्मा के पड़ोसी होने के नाते मुझे पत्रकारिता का कीड़ा लग गया और इधर मोहन जी उविप्रा के मुखिया हो गए। फिर तो रोज़ उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाने पर मुझे मजा आता और वह पढ़कर केवल मुस्कुराते । इसी दौरान एक दिन अचानक उन्होंने कहा। कल तैयार रहना। दोपहर बाद कहीं चलेंगे। तब मेरी कुछ समझ नहीं आया। यही लगा कि आज जो खबर छपी है। उसको लेकर शायद नाराजगी होगी। रात में अग्निपथ कार्यालय में बैठकर सुबह 4 बजे तक उनकी बात दिमाग मे गूंजती रही। आखिर कहाँ लेकर जाएंगे? अगले दिन सोचा कि तड़ी मार लेते है। मगर पत्रकारिता का ज़मीर जाग गया और हमेशा की तरह 1 बजे करीब उविप्रा पहुँच गया।

हर रोज की तरह गप्पे चल रही थीं।
तभी मोहन जी ऑफिस आए और सीधे निकल गए। तब मुझे लगा कि भूल गए हैं। थोड़ी देर बाद मोहन जी भी वापस किसी कार्यक्रम के लिए निकल गए। मुझे भी सुखद लगा और मान लिया कि -एक दिन पहले जो तय हुआ था। वह केवल मजाक था। मुझे टेंशन दिया था। लेकिन यह गलतफहमी 4 बजे दूर हो गई। वापस आए-देखकर बोले। 10 मिनिट बाद चलते हैं। तब तक कुछ  पता नहीं था। कहाँ जाना है।दस मिनिट बाद ऑफिस से निकले और अपने साथ 5151 मे बैठा लिया। जिस पर पीली बत्ती लगी थी। यह अपना पहला मौका था। बत्ती वाली कार में बैठने का। तो दिल तो खुश था, मगर दिमाग में टेंशन । कारण- नेता (मोहन जी) के गुस्से की कई कहानियां सुन रखी थीं। गाड़ी सीधे फ्रीगंज ब्रिज से होती हुई आगर रोड पर दौड़ रही थी। तब मैंने सवाल हिम्मत करके कर ही लिया। कहाँ चल रहे है-जवाब मिला डोंगला वेधशाला देखने। उसी वक्त यह ख्याल आया, अपना समय खराब होना है।

लेकिन जैसे ही उन्होंने डोंगला वेधशाला की जानकारी देना शुरु की। महत्व बताया-फायदा बताया। कालगणना को समझाया। उत्सुकता बढ़ने लगी। पूरे रास्ते उन्होंने ऐसी रोचक जानकारी से मुझे अवगत कराया कि मैं अचंभित हो गया। तब जाकर पहली दफा अहसास हुआ कि गजब का विजन है और दूरदृष्टि सोच - भविष्य में राजनीति कैसी होगी-कैसे चलेगी। सब कुछ मुँह जुबानी मोहन जी को याद था। तब तक डोंगला पहुँच गए। जहां निर्माण कार्य दिखाया। जब शुरुआत ही हुई थी। मगर उस स्थान पर मोहन जी की आंखों में एक अनोखी चमक दिखाई दी थी। तब ऐसा अहसास हुआ था कि इस वेधशाला के पूर्ण होने पर जरूर कुछ तो ऐसा होगा। जो नेता की किस्मत में मील का पत्थर साबित होगा।

30 से 45 मिनिट की विजिट के बाद वापस वाहन में सवार हुए । अब मंजिल थी उविप्रा। मगर समय करीब 90 मिनिट था। कुछ तो बात होनी ही थी। वजह तब चुप का जन्म नहीं हुआ था। तभी नेता ने फिर मुझे धीरे से कहाँ। PhD कर रहा हूँ। उन्होंने अपना लैपटॉप खोल लिया। इधर मैंने सवाल दाग दिया। आपको इतनी फुर्सत है? जो PhD के लिए समय निकाल पाओगे। आपका जलवा है। कोई लिख देगा-आप डॉक्टर हो जाओगे। सवाल सुनकर एक पल उन्होंने मुझे देखा और साफ कहा। पूरे आत्मविश्वास के साथ। पढ़ाई खुद करो तभी ज्ञान मिलता है। विषय भी बताया। जिस पर मैंने यही कहा। फिर तो पार्टी के अंदर भविष्य उज्ज्वल है आपका। इसके बाद उन्होंने उज्जैन का विकास कैसा होना चाहिये? इसको लेकर अपने दिमाग में रसी-बसी परिकल्पना का मास्टर प्लान खोल कर रख दिया। उन्होंने उस वक्त जो -जो विकास की कल्पना मुझे सुनाई थी। आज वह धीरे धीरे शहर में मूर्तरूप लेती नजर आ रही है। भले उस वक्त मुझे उनकी अधिकांश बातें असंभव लगी थीं। मगर फिर भी जब 5151 गाड़ी उविप्रा के पोर्च में रुकी। तब गाड़ी से उतर कर अनायास मेरे मुंह से यह शब्द जरूर निकले थे।आप पीली नहीं लालबत्ती के लायक हैं। जिसे सुनकर नेता  पहले मुस्कुराए और फिर जोरदार ठहाका लगाया था। आज डॉ मोहन यादव उस लालबत्ती वाले पद पर अपने विजन और काबिलियत के दम पर विराजमान हैं, फिर भले लालबत्ती नही है तो क्या हुआ? आज उनका जन्मदिन है। तो पुरानी यादें ताज़ा हो गई है। चुप की तरफ से उनको अंनत शुभकामनाएं। बाकी अब हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

यह तस्वीर कौन से वर्ष की है।याद नहीं। मगर पिछले इतने सालों में यही एक तस्वीर है।जिसमें विकासपुरुष और बाकी पत्रकार मिलकर मंदिर की टूट चुकी धर्मशाला के बाहर ठहाका लगा रहे है