07 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का

07 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)

सवा तीन पेटी का वादा… दानदाता ने बदली चाल, अब किसकी बजेगी ताल?
कमलप्रेमियों की मंडली में इन दिनों एक किस्सा खूब तैर रहा है। मामला उड़ान वाली मैडम से जुड़ा बताया जा रहा है और केंद्र में है। सवा तीन पेटी का हिसाब। चर्चा है कि रक्षा बंधन से जुड़े एक कार्यक्रम के खर्च की जिम्मेदारी लेने का वादा किया गया था। रकम भी ऐसी-वैसी नहीं, करीब सवा तीन पेटी। वादा हुआ तो व्यवस्था की उड़ान भी भर गई और एक दानदाता से सहयोग की उम्मीद भी जगा दी गई। लेकिन कहानी ने तब करवट ली, जब दानदाता को कथित तौर पर पता चला कि उसकी संभावित सहयोग राशि दान के बदले रक्षा पर्व से जुड़े कार्यक्रम में इस्तेमाल होनी है। जानकारी मिलते ही उसने सहयोग से किनारा कर लिया। अब असली सवाल रकम से ज्यादा वायदे का है। जब खर्च की घोषणा पहले हो जाए और इंतजाम बाद में खोजा जाए, तो गणित अक्सर ऐसी ही उलझती है।कमलप्रेमी अब इसे अपने-अपने अंदाज में सुना रहे हैं। कोई इसे ‘उड़ान से पहले रनवे की तलाश’ बता रहा है, तो कोई कह रहा है कि सवा तीन पेटी ने अच्छे-अच्छों की कैलकुलेटर की बैटरी बैठा दी।बाकी, हम न दानदाता की जेब देखे हैं, न किसी के खाते की रसीद। हम तो सिर्फ इतनी बात जानते हैं।चर्चा उड़ रही है, और उड़ान वाली कहानी में इस बार रनवे थोड़ा छोटा पड़ता दिख रहा है।

वर्दी का रौब इतना कि प्रथमसेवक भी ‘आम आदमी’ हो गए!
वर्दी के साथ हमदर्दी भी… यह स्लोगन अब सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने के लिए भी मजबूर करता है। पिछले सोमवार मंदिर में जो हुआ, उसने वर्दी की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। घटना का शिकार कोई आम श्रद्धालु नहीं, बल्कि शहर के प्रथमसेवक थे। सवारी में शामिल होने पहुंचे प्रथमसेवक को शंख द्वार पर तैनात वर्दीधारी ने रोक दिया। निजसचिव और अंगरक्षक ने परिचय भी दिया, लेकिन शायद वर्दी के सामने परिचय की कोई कीमत नहीं थी। ताला बंद रहा और प्रथमसेवक को हाथ जोड़कर वहीं से लौटना पड़ा।वाह रे व्यवस्था! जिसे जनता ने अपना प्रथमसेवक चुना, वह भी मंदिर के दरवाजे पर प्रवेश की अनुमति का मोहताज हो जाए। नियम जरूरी हैं, लेकिन नियमों के साथ विवेक और व्यवहार भी तो किसी किताब में लिखा होगा?अगर वर्दी नियमों की इतनी पक्की प्रहरी है तो फिर सवाल यह है कि नियम सबके लिए हैं या सिर्फ मौके देखकर लागू होते हैं?प्रथमसेवक के साथ ऐसा व्यवहार हुआ तो आम श्रद्धालु की कौन सुनेगा?यह अनुशासन नहीं, संवेदनहीनता का अहंकार लगता है।मंदिर का ताला आखिर खुला नहीं। लेकिन इस घटना ने व्यवस्था की सोच पर सवालों का ऐसा ताला जरूर लगा दिया है। जिसकी चाबी शायद किसी के पास नहीं।तभी तो घटना के गवाह बोल रहे है कि अब स्लोगन बदल देना चाहिए। वर्दी है-हमदर्दी नहीं।जिसमें हम क्या कर सकते है।बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

फाइल मैडम के पास थी… हाइनेस को ‘उगरानी’ का ज्ञान था!
सरकारी दफ्तरों में फाइलें भी इंसानों की तरह किस्मत लेकर पैदा होती हैं। किसी की किस्मत में तेज रफ्तार होती है, किसी की में लंबा इंतजार और किसी की किस्मत में सीधे हाइनेस का फोन।जमीन के मालिकाना हक वाले महकमे की एक फाइल इन दिनों चर्चा में है। बताते हैं कि फाइल हाइनेस के निजसचिव की थी और मामला मैडम जी के पास अटका हुआ था। निजसचिव महोदय फाइल की पैरवी लेकर पहुंचे, लेकिन मैडम जी ने शायद उस दिन ‘प्राथमिकता’ की सूची में उन्हें जगह नहीं दी।लौटकर सचिव जी ने हाइनेस को जो कहानी सुनाई, उसमें फाइल की हालत कुछ ज्यादा ही गंभीर बता दी गई।कहा गया कि फाइल फेंक दी गई।अब हाइनेस ने फोन लगाया। बातचीत में कथित तौर पर उगरानी के ज्ञान का भी इशारा हुआ।किससे कितनी उगरानी होती है, इसका हिसाब-किताब उन्हें मालूम है।बस फिर क्या था… बात गरम हुई, फिर सरकारी अंदाज में ठंडी भी हुई और आखिर में वही विनम्र आग्रह।निजसचिव की फाइल देख लेना।अब सच क्या है, यह फोन के दोनों सिरों वाले ही जानें। हम तो इतना जानते हैं कि सरकारी व्यवस्था में फाइल का वजन कभी-कभी उसके कागजों से नहीं, उसे पूछने वाले की हैसियत से तय होता है।और उगरानी?उसका ज्ञान किसके पास कितना है, यह तो जांच का विषय हो सकता है।मगर इतना तय है—जहां फाइल को चलाने के लिए फोन जरूरी हो जाए। वहां नियम किताब में और व्यवस्था… रिसीवर के दूसरी तरफ बैठी होती है। बाकी हम आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

संकुल में कुर्सियां थीं… कर्मचारी नहीं! उज्ज्वल जी पहुंचे तो खुला ‘ऑफिस टाइम’ का राज
सिंहस्थ के कामों में उज्ज्वल जी इन दिनों ऐसे उलझे हैं कि सुबह से रात तक मैदान ही मैदान। ऐसे में कौन उम्मीद करता कि वे ऑफिस टाइम में दफ्तरों का भी हाल देखने पहुंच जाएंगे। मगर बुधवार को उज्ज्वल जी ने यह भ्रम भी तोड़ दिया।संकुल के पहले माले पर पहुंचते ही सबसे पहले अपनी जिज्जी के ऑफिस का रुख किया। कमरा था, कुर्सियां थीं, टेबल थी… बस जिनके लिए यह सब था, वही नजर नहीं आए।फिर चंदा पार्टी मैडम का ऑफिस देखा। वहां भी नजारा कमोबेश वैसा ही।दफ्तर अपनी जगह, मगर दफ्तर वाले नदारद।इसके बाद आंकड़ों वाले कार्यालय की बारी आई। यहां भी सीटें खाली मिलीं। यानी सरकारी कामकाज की तस्वीर में कर्मचारी ‘ऑन ड्यूटी’ थे या ‘ऑफ लाइन’, यह सवाल अपनी जगह खड़ा हो गया।सूत्रों की मानें तो उज्ज्वल जी ने इस पूरे नजारे का वीडियो भी बनाया और बिना कोई घोषणा किए चुपचाप वहां से निकल गए।अब वीडियो कहां गया, किसकी बारी आई और कार्रवाई हुई भी या नहीं।यह राज अभी संकुल की दीवारों के बीच घूम रहा है।मगर एक बात तय है उज्ज्वल जी अगर निरीक्षण पर निकल पड़े हैं, तो खाली कुर्सियों को भी हाजिरी देने का वक्त आ गया है और हम? हमारा क्या है। हम हमेशा की तरह चुप हैं।

रास्ता विकासपुरुष भूल गए थे… या व्यवस्था?
बाबा की सवारी में आम आदमी को धक्का लग जाए तो कोई खबर नहीं। भीड़ है, रास्ता संकरा है, व्यवस्था की अपनी मजबूरियां हैं।और जनता भी आखिर जनता है। लेकिन जब व्यवस्था किसी खास मेहमान को लेकर चल रही हो, तब रास्ता भूलने की गुंजाइश शायद थोड़ी कम होनी चाहिए। पिछली सवारी में नदी पार कर विकासपुरुष को पूजा स्थल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी वर्दी की थी। नदी पार हो गई, मगर उसके बाद गेट और रास्ते का गणित बिगड़ गया। काफिला गलत दिशा में चला गया। फिर घुमाया गया, रास्ता तलाशा गया और अंततः विकासपुरुष पूजा स्थल तक पहुंच पाए। मजेदार बात यह कि इस पूरे ‘दर्शन मार्ग’ में विकासपुरुष को कितने धक्के खाने पड़े, इसका हिसाब शायद किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं होगा। उन्होंने भी उफ्फ नहीं की। लेकिन असली सवाल धक्कों का नहीं है। सवाल यह है कि जिस रास्ते से सूबे के मुखिया को ले जाना था, उसका रूट पहले से तय था या मौके पर तय होना था? और अगर वर्दी की जिम्मेदारी सिर्फ भीड़ को रोकना और रास्ता खाली कराना है, तो सही रास्ता कौन बताएगा? क्योंकि आम आदमी तो रोज व्यवस्था के गलत मोड़ पर पहुंचता है। लेकिन जिस दिन व्यवस्था ही विकासपुरुष  को गलत रास्ते पर ले जाए।* उस दिन जिम्मेदार कौन है?वर्दी से सवाल सिर्फ इतना है।अगर VIP के लिए भी रास्ता मौके पर तलाशना पड़े, तो फिर आम आदमी से व्यवस्था पर भरोसा रखने की उम्मीद आखिर किस आधार पर की जाए?इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

इन्दौरीलाल के घी में अब हिस्सेदार बढ़ गए!
पिछले दो साल से अपने इन्दौरीलाल पर एक कहावत बड़ी सटीक बैठती थी।पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में। ऊपर से तुर्रा यह कि घी का हिसाब-किताब पूछने वाला भी कोई खास दिखाई नहीं देता था। सो इन्दौरीलाल की दुनिया आराम से चल रही थी।मगर वक्त हमेशा एक जैसा कहां रहता है?अब विकास भवन में राजनीति ने बाकायदा डेरा डाल लिया है। और राजनीति भी ऐसी, जिसमें कुछ खिलाड़ी पुराने खेल के नए नियम बड़ी जल्दी समझ जाते हैं। बताते हैं,।इशारों-इशारों में इन्दौरीलाल को समझा दिया गया है कि पुराने घी का हिसाब भी होगा और आगे की कढ़ाई में हमारा हिस्सा भी।यानी अब तक जो कंबल ओढ़कर घी पीने की सुविधा थी, उसमें सेंध लग गई है। अकेले आनंद लेने के दिन शायद अब पुराने कैलेंडर में तलाशने पड़ेंगे।विकास भवन के गलियारों में चर्चा है कि इन्दौरीलाल पर अचानक यह जो पहाड़ टूटा है। उसकी वजह मौसम नहीं, हिस्सेदारी का बदलता गणित है।
अब बेचारे इन्दौरीलाल करें तो करें क्या? घी सामने है, कढ़ाई वही है, बस चम्मचों की संख्या बढ़ गई है। हमसे पूछिए तो मामला बहुत गंभीर है। पहाड़ घी पर नहीं टूटा साहब… पहाड़ तो उस कंबल पर टूटा है, जिसके नीचे अब अकेले बैठने की जगह नहीं बची!बाकी हिसाब-किताब कौन करेगा, कौन देगा और किसका हिस्सा कितना होगा।यह तो विकास भवन जाने। हमारी तो आदत है… सब समझकर भी चुप रहने की।

उत्तम से सर्वोत्तम… नाम का भी प्रमोशन!
शायद पाठकगण को याद होगा।जब अपने मामा जी सूबे के मुखिया थे, तब अपने उत्तम जी बाबा की नगरी के मुखिया हुआ करते थे। संकुल के दूसरे माले से उनका हुक्म निकलता था और नीचे तक उसकी गूंज सुनाई देती थी।फिर वक्त बदला। विकासपुरुष मुखिया बने और अपने उत्तम जी पर्दे के पीछे चले गए। पर्दे के पीछे जाना भी कोई साधारण उपलब्धि नहीं होती खासकर तब, जब अगली पारी का इंतजार हो।उत्तम जी ने इंतजार किया। बिल्कुल धैर्यपूर्वक। और अब लगता है कि धैर्य का फल सिर्फ मीठा ही नहीं, नाम बदलने वाला भी होता है।
हालिया फेरबदल सूची में अपने उत्तम जी’ अब ‘सर्वोत्तम’ हो गए हैं। यानी तरक्की सिर्फ पद में नहीं हुई, नाम की हैसियत भी बढ़ा दी गई! कल तक जो उत्तम थे, आज सर्वोत्तम हैं। कल को क्या होगा, यह तो अगली सूची ही बताएगी।आखिर  नाम की सीढ़ी भी पद की सीढ़ी से कम दिलचस्प नहीं होती।वैसे ‘उत्तम’ से ‘सर्वोत्तम’ होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। अब देखना यह है कि सर्वोत्तम का काम भी सर्वोत्तम निकलता है या सिर्फ नाम ही काफी है। फिलहाल हमारी ओर से उत्तम जी को सर्वोत्तम बनने की हार्दिक बधाई।नाम का प्रमोशन हो चुका है, बाकी प्रमोशन का असर वक्त बताएगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं

कुर्सी का ‘पांच प्रतिशत’ नहीं, पूरा हिसाब बिगड़ गया!
बड़े बेआबरू होकर… फेरबदल में निकले हम! अशआर पुराना है, लेकिन स्मार्ट भवन के गलियारों में इन दिनों इसका नया संस्करण सुनाई दे रहा है। फेरबदल की सूची आई तो अपने निखट्टू जी भी उसमें विराजमान मिले। श्रीमंत के इलाके में रवानगी हो गई। सवाल यह नहीं कि तबादला क्यों हुआ… सवाल यह है कि.... फुलपैंटधारी की मजबूत छतरी के बावजूद आखिर कुर्सी खिसकी कैसे? अब इसके पीछे की चर्चा भी कम दिलचस्प नहीं है। पिछले महीने राजधानी से एक ठेकेदार साहब निखट्टू जी के दरबार में पहुंचे। सज्जन इतने कि कथित तौर पर पांच प्रतिशत की मांग तक मानने को तैयार थे। लेकिन दरबार का प्रोटोकॉल शायद कुछ और था। बाहर करीब दो घंटे इंतजार, और अंदर पहुंचने के बाद बैठने की इजाजत तक नहीं! ठेकेदार साहब लौटे तो जेब में भुगतान नहीं, बेइज्जती का बिल था। चर्चा है कि ....उन्होंने अपना दुखडा राजधानी पहुँचकर अपने पड़ोसी एसीएस को सुनाया। जो बाबा की नगरी में तब पदस्थ थे। जब एक ही रात में बारिश ने कोहराम मचा दिया था।इतनी बारिश हुई थी कि पूरे शहर में संकट छा गया था।  इसके बाद क्या हुआ, यह किसी फाइल में दर्ज हो या न हो, लेकिन महीना बदलते ही निखट्टू जी की रवानगी जरूर हो गई। अब सवाल यह है। ठेकेदार नाराज था या सिस्टम? और अगर यह महज संयोग है तो संयोग भी बड़ा कमाल का निकला! हम तो बस इतना जानते हैं।कुर्सी पर बैठकर आदमी बड़ा नहीं होता, कभी-कभी कुर्सी छोड़ने के बाद पता चलता है कि आदमी कितना बड़ा था। बाकी रवानी की सूची प्रमाण है। बाकी सच क्या है, झूठ क्या है—फैसला पाठक करें। क्योंकि हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।

बासी कढ़ी में उबाल...
कहावत तो सुनी ही होगी। बासी कढ़ी में उबाल आना।राजधानी के एक वीआईपी निवास से इन दिनों उठ रही चर्चाओं को देखकर लगता है कि यह कहावत यूं ही नहीं बनी होगी।कहानी के केंद्र में हैं, मामा जी के कार्यकाल में सुर्खियां बटोर चुकीं एक कमलप्रेमी नेत्री। तब सत्ता के गलियारों में उनका जलवा था, पहुंच थी और चर्चाओं में नाम भी। वक्त बदला तो अब वे सरकारी सेवा में हैं। लिहाजा कमलप्रेमी संगठन के मंच पर पहले जैसी सक्रियता दिखाई नहीं देती। लेकिन राजनीति और प्रभाव की राहें भी बड़ी अजीब होती हैं। एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुल जाता है। राजधानी के एक वीआईपी बंगले पर इन दिनों उनकी आवाजाही की चर्चाएं हैं।इस  बंगले के मुखिया हवलदार जी है।जिनका नाम कमलप्रेमी गलियारों में दबी जुबान से अलग-अलग अंदाज में लिया जाता है।शायद इस बासी कढ़ी के उबाल को समझने की कोशिश कर रहे हैं।बताया जाता है कि नेत्री जी का अपना NGO भी है और अपना अंदाज भी। अब उनकी मौजूदगी का मकसद क्या है, मुलाकातें किस सिलसिले में हैं और किसकी कढ़ी में कितना उबाल है ।यह तो वही जानें।लेकिन बाबा की नगरी के कमलप्रेमी कढ़ी में उबाल की चर्चा जमकर कर रहे हैं।मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार बस चुप रहना है।

मेरी पसंद....
कमीना,कमजर्फ,बेहयां, लालची ,फरेबी में था ,मैं हूँ।
शरीफजादो ,बताओ सच-सच,तुम आज सच यूँ कहोगे क्या