27 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

27 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)

खोदा कुआँ... निकले नकली गहने! वर्दी को याद आ गई दृश्यम..
"खोदा पहाड़, निकली चुहिया" वाली कहावत तो आपने खूब सुनी होगी। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अपडेट हो गई। पहाड़ नहीं, पूरा कुआँ खाली करवाया गया... और निकले नकली गहने! किस्सा चोरी का है। फरियादी ने दावा किया कि करीब 40 पेटी कीमत के गहने चोरी हो गए। वर्दी हरकत में आई। मेहनत रंग लाई। चोर पकड़ लिए गए। पूछताछ में उन्होंने बड़े इत्मीनान से बताया—"साहब, माल तो पुराने थाने के कुएँ में छुपा रखा है।" बस फिर क्या था... कुएँ की सफाई शुरू हो गई। पानी निकला, कीचड़ निकला, उम्मीदें निकलीं... और आखिरकार एक पोटली भी निकल आई। वर्दी ने राहत की साँस ली कि चलो, मेहनत सफल हुई। लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। जाँच हुई तो पता चला कि बरामद गहने असली नहीं, नकली हैं! अब बेचारे वर्दी वाले भी सोच में हैं—झूठ कौन बोल रहा है? फरियादी... जिसने महँगे गहने चोरी होने का दावा किया? या फिर चोर... जिन्होंने नकली माल कुएँ में डालकर नई कहानी लिख दी? यहीं पर अचानक दृश्यम फिल्म का वह मशहूर दृश्य याद आ जाता है, जब पुलिस पूरी ताकत से खुदाई करवाती है और आखिर में इंसानी कंकाल नहीं, कुत्ते का शव निकलता है। मेहनत पूरी... लेकिन नतीजा कहानी से भी ज्यादा उलझा हुआ। फिलहाल वर्दी के सामने सवालों का कुआँ पहले से भी ज्यादा गहरा हो गया है। असली गहने कहाँ हैं? नकली कुएँ में कैसे पहुँचे? और सबसे बड़ा सवाल—सच आखिर किसके पास है? बाकी... हम क्या कर सकते हैं? बस अपनी आदत के मुताबिक चुप रह सकते हैं।..

किस्मत हो तो चुगलखोर जी जैसी...!
कहते हैं कि मेहनत, ईमानदारी और अच्छी कार्यशैली इंसान को आगे बढ़ाती है। लेकिन सरकारी गलियारों में कभी-कभी किस्मत भी ऐसा कमाल दिखा देती है कि पुराने किस्से फाइलों में दबे रह जाते हैं और पदोन्नति का परचम लहरा उठता है।अपने चुगलखोर जी इसका ताजा उदाहरण बन गए हैं। पदोन्नति मिली तो सीधे एक अनुभाग के मुखिया बन बैठे। जबकि उनके पुराने कारनामों की चर्चा आज भी सरकारी गलियारों में फुसफुसाहट बनकर घूमती है।कहते हैं कि एक बार राशि लेने के लिए  एक ग्राम देवता पर इतना दबाव बनाया गया कि बेबस होकर उसने उनके सामने अपने कपड़े तक उतार दिए। मामला इतना तूल पकड़ गया था कि बदबू वाले शहर में ग्राम देवताओं ने आंदोलन तक कर दिया था। लेकिन वक्त बड़ा बलवान होता है। पुराने विवाद धूल खाते रहे और साहब की किस्मत चमकती रही। उज्जैन की शायद ही कोई तहसील बची हो, जहाँ चुगलखोर जी ने अपनी कार्यशैली की छाप न छोड़ी हो। चर्चा तो यह भी है कि काम शुरू होने से पहले ही रेट तय हो जाते हैं, और फिर उस तय रकम से एक चवन्नी भी कम मंजूर नहीं होती।अब वह चरणलाल जी के इलाके में मुखिया बनकर विराजमान हो गए हैं। ऐसे में ग्राम देवताओं के बीच चर्चा कामकाज की कम और किस्मत की ज्यादा है। लोग हैरान हैं कि इतने किस्सों के बाद भी तरक्की का रास्ता आखिर इतना साफ कैसे रहा? अब निगाहें इस बात पर हैं कि नई कुर्सी पर नई कार्यशैली दिखाई देगी या फिर पुराने किस्सों में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। बाकी... हम तो अपनी पुरानी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

फिटनेस काम आई... एक सेल्यूट तो बनता है!
अक्सर देखा और सुना जाता है कि वर्दी पर तीन स्टार लगते ही कुछ अफसरों की दौड़ फाइलों तक सिमट जाती है। फिटनेस पीछे छूट जाती है और कुर्सी आगे निकल जाती है। मैदान की जगह मीटिंग रूम और दौड़ की जगह आंकड़ों की गिनती ज्यादा होने लगती है। इसलिए जब कभी मौके पर दौड़ने की नौबत आती है, तो कई बार कदम जवाब दे जाते हैं। लेकिन शुक्रवार दोपहर हुए गोलीकांड में वीआईपी थाने के एक वर्दीधारी ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। घटना के दौरान उन्होंने जिस तेजी से करीब 100 मीटर की दौड़ लगाई और आरोपी को दबोच लिया, उसे देखकर मौजूद लोग भी हैरान रह गए। यह महज दौड़ नहीं थी, बल्कि फुर्ती, फिटनेस और मौके पर सही निर्णय लेने का उदाहरण थी। यह सही है कि आरोपी को पकड़ना उनका कर्तव्य था और उन्होंने वही किया। लेकिन उनकी सक्रियता का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यदि आरोपी को कुछ और समय मिल जाता, तो आशंका थी कि वह तीन और लोगों को गोली मारकर घायल कर सकता था। ऐसे में उनकी त्वरित कार्रवाई ने संभावित बड़े नुकसान को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह घटना याद दिलाती है कि वर्दी की असली ताकत सिर्फ कंधे पर लगे स्टार नहीं, बल्कि मौके पर दिखाई गई सक्रियता, फिटनेस और साहस भी है। इसीलिए इस बार आलोचना नहीं, बल्कि एक सेल्यूट बनता है। बाकी... हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।

दुःखी सबसे ज्यादा कौन?
महाकाल मंदिर के गलियारों में इन दिनों एक चर्चा खूब तैर रही है। चर्चा यह कि प्रदेश के नए बड़े साहब की कार्यशैली और प्राथमिकताओं में आए बदलाव से सबसे ज्यादा बेचैनी आखिर किसे है? फुसफुसाहटों में इशारा "फटाफट जी" की ओर किया जा रहा है। लंबे समय से यह धारणा बनी हुई थी कि राजधानी तक उनकी मजबूत पकड़ है और पुराने बड़े साहब का विशेष स्नेह भी उन्हें प्राप्त था। लेकिन हालिया घटनाक्रम के बाद मंदिर परिसर में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि अब समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। चर्चा तो यहां तक है कि उनके कुछ मातहत भी दबी जुबान में यह कहते सुने जा रहे हैं कि साहब इन दिनों कुछ परेशान और खामोश हैं। यह भी संभव है कि यह केवल अफवाहों का बाजार हो, क्योंकि सत्ता और प्रशासन में बदलाव के साथ इस तरह की चर्चाएं अक्सर जन्म लेती हैं। इसलिए इन बातों को तथ्य नहीं, बल्कि मंदिर परिसर में चल रही चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सच क्या है, यह वही लोग जानते हैं जो इन चर्चाओं के केंद्र में हैं। तब तक, चर्चा अपनी जगह है और तथ्य अपनी जगह। बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

तोता-मैना की कहानी...!
संकुल के गलियारों में इन दिनों किसी सरकारी योजना से ज्यादा चर्चा तोता-मैना की जोड़ी की है। दोनों की ऐसी जुगलबंदी है कि अगर एक अकेला दिखाई दे जाए तो देखने वाला तुरंत पूछ बैठता है। दूसरे कहाँ हैं? गलियारे वालों ने इस जोड़ी का नाम भी रख छोड़ा है। 602 वाली जोड़ी। कहते हैं, इनका काम जनता की समस्या हल करना कम और जेब का वजन हल्का करवाना ज्यादा है। पहले आमजन को नियमों की भूलभुलैया में उलझाओ, फिर समाधान का शॉर्टकट बताओ। शॉर्टकट की कीमत अलग से तय होती है। सबसे ज्यादा दर्द उस अधिकारी का बताया जाता है जो पूरी ईमानदारी से फाइलों में मेहनत करके प्रकरण तैयार करता है। लेकिन जैसे ही फाइल तोता जी के दरबार में पहुँचती है, उसमें ऐसे-ऐसे कानूनी पेंच फँसाए जाते हैं कि पूरी मेहनत का गुब्बारा फुस्स हो जाता है। फिर शुरू होता है तौल-मोल का खेल, जिसमें फाइल भी मुस्कुराती है और कुछ जेबें भी। कहते हैं, इस खेल में अंतिम निर्णय देने वाले वरिष्ठ अधिकारी का भी हिस्सा कहीं न कहीं सुरक्षित रहता है। इसलिए उनकी चुप्पी भी उतनी ही रहस्यमयी है, जितनी इस जोड़ी की सक्रियता। संकुल के जानकार बताते हैं कि इस चर्चित जोड़ी का ठिकाना उज्ज्वल जी के कार्यालय के सामने, अंतिम छोर वाले कमरे में है। अब इस बात में कितनी सच्चाई है, यह वही जानें जो रोज़ उस गलियारे की परिक्रमा करते हैं।अब संकुल वालों की जुबान तो हम पकड़ नहीं सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

कोई जाए ज़रा ढूंढ के लाए...
हेडिंग पढ़ते ही पुराना फिल्मी गीत याद आ जाता है। मुझे नींद न आए, मुझे चैन न आए, कोई जाकर ढूंढ के लाए…। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां किसी दिल की तलाश नहीं, बल्कि शिवाजी भवन के उस लगभग 25 पेटी कीमत के सीवर सफाई रोबोट की चर्चा है।जिसे मई 2023 में बड़े दावों के साथ खरीदा गया था। रोबोट का उद्देश्य साफ था।सीवर सफाई के दौरान सफाईकर्मियों को जान जोखिम में डालने की नौबत न आए। लेकिन अब शिवाजी भवन के गलियारों में चर्चा इस बात की है कि वह रोबोट आखिर है कहां? बताया जाता है कि एक बार प्रथम सेवक और मंत्रिमंडल के निरीक्षण के दौरान उसे कबाड़खाने में देखा गया था। उसके बाद से वह सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आया। चर्चाओं का बाजार गर्म है। कोई कहता है कि रखरखाव के अभाव में रोबोट पूरी तरह अनुपयोगी हो गया।  कुछ लोग तो व्यंग्य में यह तक कह रहे हैं कि उसका "अंतिम संस्कार" कर दिया गया और कबाड़ में बेच दिया गया। तथ्य यह है कि यदि रोबोट मौजूद है तो उसकी वर्तमान स्थिति और उपयोगिता सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि खराब है तो उसकी मरम्मत क्यों नहीं हुई? और यदि कबाड़ घोषित किया गया है तो उसका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। फिलहाल सवाल कई हैं, जवाब किसी के पास नहीं। रोबोट मिल जाए तो तस्वीर साफ हो जाए। तब तक शिवाजी भवन के गलियारों में चर्चाएं जारी हैं... और हमें तो अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।

गुहार... सुन लो सरकार!
यह गुहार सरकार से नहीं, बल्कि महाकाल मंदिर के मुखिया उज्ज्वल जी और शहर की सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कप्तान जी से है। फटाफट जी से भी कह सकते थे।लेकिन जब बड़े-बड़ों की नहीं सुनते, तो हमारी आवाज़ शायद उनके कानों तक भी न पहुंचे। पिछले सप्ताह श्रावण शुरू होने से पहले ही मंदिर में ड्यूटी कर रहे एक कर्मचारी की हार्ट अटैक से मौत हो गई। साथी कर्मचारी उन्हें एम्बुलेंस तक ले गए, अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यह घटना सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है।
श्रावण में लाखों श्रद्धालु और हजारों कर्मचारी दिन-रात ड्यूटी पर रहेंगे। ऐसे में मंदिर परिसर में 24 घंटे संचालित एक इमरजेंसी मेडिकल यूनिट, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, आवश्यक जीवनरक्षक उपकरण और कम से कम दो उपचार कक्ष होना समय की मांग है। साथ ही ऐसा ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित किया जाए, जहां से एम्बुलेंस बिना किसी बाधा के सीधे मरीज तक पहुंच सके और अस्पताल रवाना हो सके। इसकी जिम्मेदारी पुलिस और मंदिर प्रबंधन दोनों की होनी चाहिए। किसी की जान बच जाए, इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं। उम्मीद है कि श्रावण की भीड़ शुरू होने से पहले इस गुहार को गंभीरता से सुना जाएगा।बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।

बधाई... आखिर बन गए मुखिया!
कुछ महीने पहले हेलीपेड पर हुए चर्चित घटनाक्रम को लोग आज भी याद करते हैं।जब विकासपुरुष के उड़नखटोले के रवाना होने से पहले साहब को सबके सामने खरी-खरी सुननी पड़ी थी। अपने पिस्तौल कांड के नायक से।वक्त बदला, हालात बदले और अब वही अधिकारी जिले की कमान संभालने जा रहे हैं। इधर संकुल के तीसरे माले पर एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। कहा जा रहा है कि धारा-5 के एक प्रकरण में पहले स्थगन मिला और बाद में आदेश ही निरस्त हो गया। यह आदेश अपनी जिज्जी ने किया था।संकुल में इसे 10 पेटी से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन असली सवाल किसी चर्चा का नहीं, कार्यशैली का है। यदि फैसले पूरी पारदर्शिता और नियमों के अनुरूप लिए गए थे, तो फिर हर महत्वपूर्ण आदेश के बाद ऐसी चर्चाएं जन्म क्यों लेती हैं? आखिर ऐसी कौन-सी कार्यप्रणाली है, जो भरोसा बढ़ाने के बजाय संदेह पैदा कर देती है? अब नई कुर्सी के साथ नई जिम्मेदारी भी आती है। उम्मीद यही रहेगी कि अब फैसले ऐसे हों, जिन पर सवाल कम उठें और विश्वास ज्यादा बने। बाकी... हमकों अपनी  आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

तनाव मुक्त कार्यशाला... और तनावदाता कौन?
अपने एंग्रीमैन साहब ने वाकई सराहनीय पहल की। रोज़ाना फाइलों, बैठकों, डेडलाइन और जवाबदेही के दबाव में काम करने वाले मातहतों के लिए "तनाव से दूर रहें" विषय पर कार्यशाला आयोजित करवा दी। पहल अच्छी है, इसलिए तारीफ बनती है। हमारी तरफ से साहब बधाई स्वीकार करें। लेकिन... कार्यशाला खत्म होते-होते एक सवाल भी कुर्सियों के बीच टहलता नजर आया। तनाव आखिर देता कौन है? जवाब भी किसी मनोवैज्ञानिक किताब में नहीं, सरकारी व्यवस्था में ही मिल जाता है। यहां तनाव की धारा ऊपर से नीचे बहती है। आदेश ऊपर से आते हैं, जवाब नीचे से मांगा जाता है। डांट भी ऊपर से नीचे आती है। बस एक चीज है जो कई बार उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है... उसकी चर्चा फिर कभी। यानी जिनके लिए तनाव दूर करने की कार्यशाला रखी गई, उनका दर्द भी शायद उसी इमारत की दीवारों में गूंजता रहा होगा। ऐसे माहौल में शिवाजी भवन की फिज़ा में शायर शकूर राणा का यह शेर तैरता हुआ महसूस होता है। कुछ तरह उसने किया ज़ख्मों का मेरे इलाज। मरहम भी गर लगाया तो काँटे की नोंक से। मातहतों का कहना है कि योग, ध्यान और सकारात्मक सोच अपनी जगह ठीक है, लेकिन अगर तनाव का स्रोत ही कम हो जाए तो शायद अलग से कार्यशाला की जरूरत भी न पड़े। बाकी... उनकी बात में दम है। मगर चुप रहना हमारा कर्म है।

तुम 2 दो... मैं 3 दूंगा!
ग्रामदेवताओं के दरबार में इन दिनों एक संवाद खूब गूंज रहा है। चर्चा एक ऐसे तहसीलदार साहब की है जिन पर बंधक जमीन से जुड़े मामलों में 10 हजारी की डिमांड करने की आदत से उनके अधीन काम करने वाले ग्रामदेवता परेशान हो गए। कहते हैं कि ग्रामदेवताओ की परेशानी इतनी बढ़ी कि कुछ ग्रामदेवताओ ने चंदा इकट्ठा कर 2 पेटी का इंतजाम कर लिया। ताकि साहब का तबादला हो जाए। मगर साहब भी पुराने खिलाड़ी निकले। बताते हैं कि उन्होंने मुस्कुराते हुए फरमाया। तुम 2 पेटी दोगे हटवाने की, मैं 3 पेटी देकर यहीं रुक जाऊंगा। यह किस्सा सुनते ही चुप को 2005 का ऐसा ही किस्सा याद आ गया। तब भी एक तहसीलदार साहब की बैठक चल रही थी। एक गिरदावर पूरे आत्मविश्वास से खड़ा हुआ और बोला। सर, यह आपकी आखिरी बैठक है। 50 हजारी जमा कर लिए हैं, आपको हटवाने के लिए। सरदार जी ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया था। जहां तू 50 हजारी देगा, वहां मैं 1 पेटी पहले ही भिजवा चुका हूं। बैठ जा... अगली बैठक भी मैं ही लूंगा। अब कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। बस किरदार बदले हैं।संवाद वही हैं और मंच है चरणलाल जी का इलाका। फिलहाल गांव की चौपाल से लेकर तहसील के गलियारों तक यही संवाद तैर रहा है।तुम 2 दो... मैं 3 दूंगा!अब देखना यह है कि आगे क्या होता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

पदोन्नति की नहीं... एसआईआर की थी पार्टी!
पिछले सप्ताह इसी कॉलम में "चंदा पार्टी" शीर्षक से एक चर्चा प्रकाशित हुई थी। उसके बाद संबंधित मैडम का फोन आया। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से सफाई दी वह भी दो बार कि.... पार्टी पदोन्नति की नहीं, एसआईआर पूरी होने की थी।अब बात आई थी, तो हमने भी ग्रामदेवताओं की अदालत में दस्तक दे दी। आखिर वही तो इस पार्टी के "चंदादाता" बताए जा रहे थे। चंदा वाले तो बहुत लोग थे।मगर हमनें एक-एक हजारी देने वाले दस लोगों से पूछा।  क्या सचमुच यह एसआईआर की पार्टी थी? जवाब सुनकर हम भी मुस्कुरा दिए। दस में से नौ ग्रामदेवताओं ने ठहाका लगाते हुए कहा।भाई साहब, एसआईआर खत्म हुए इतने महीने हो गए। अगर उसी की पार्टी करनी होती तो उसी समय कर लेते। अब अचानक जश्न किस बात का? चर्चाओं में तो यह भी दावा किया गया कि पार्टी पदोन्नति की खुशी में थी। इतना ही नहीं, कुछ उत्साही सूत्रों ने तो पार्टी का वीडियो भी भेज दिया। साथ में यह "विश्लेषण" भी कर दिया कि महफिल में सबसे ज्यादा रंग किस पर चढ़ा था। अब जब एक तरफ ग्रामदेवताओ की चर्चा है और दूसरी तरफ मैडम का दावा।तो फैसला करने वाले हम कौन होते हैं? सरकारी सेवा में बयान भी सरकारी रिकॉर्ड की तरह सम्मान के पात्र होते हैं।इसलिए हम पूरी श्रद्धा के साथ मान लेते हैं कि पार्टी पदोन्नति की नहीं, एसआईआर की ही थी। अगर किसी को समय का गणित समझ नहीं आ रहा, तो वह अपनी बुद्धि पर पुनर्विचार करे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मुसीबत में याद भगवान की...
कहते हैं, इंसान जब तक सब कुछ ठीक चलता है, तब तक अपनी काबिलियत का बखान करता है। लेकिन जैसे ही जांच की आहट सुनाई देती है।सबसे पहले भगवान याद आते हैं। इन दिनों बदबू वाले शहर के कमलप्रेमियों के बीच कुछ ऐसी ही चर्चा तैर रही है। निशाने पर हैं अपनी 8 हजारी मैडम। चर्चा है कि आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली एजेंसी का पत्र पहुंचा ही था कि संकुल की पहली मंजिल पर विराजमान अपर कलेक्टर का पत्र भी आ गया। दोनों पत्रों में वाटिका के सीमांकन और दस्तावेजों को लेकर सवाल पूछे गए हैं। बस फिर क्या था।चर्चा हैं कि मैडम जी का धार्मिक कार्यक्रम अचानक तेज हो गया। अब हर मंदिर में मत्था, हर देवी-देवता के दर्शन और हर जगह प्रार्थना।इधर.…. अपने कमलप्रेमी पूछ रहे हैं।अगर काम नियमों के अनुसार हुआ था, तो फिर जांच से डर कैसा? और अगर डर है, तो क्या उसका इलाज मंदिरों में मिलेगा या दस्तावेजों में? आस्था हर व्यक्ति का निजी विषय है और भगवान के दरबार में जाना भी श्रद्धा का प्रतीक है। लेकिन सरकारी फैसलों का हिसाब आखिरकार पूजा की थाली से नहीं, फाइलों, सीमांकन और रिकॉर्ड से तय होता है।अब भगवान क्या फैसला करते हैं, यह बाद की बात है। फिलहाल सबकी नजर जांच पर है... और हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

डेढ़ माह बाद भी विदाई नहीं, अब 'वसूली अभियान' की चर्चा

अन्नदाताओं से जुड़े एक विभाग के अधिकारी इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि 15 जून को तबादला होने और न्यायालय से राहत नहीं मिलने के बावजूद साहब अब तक अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। इस बीच पिछले एक सप्ताह में कथित तौर पर 50 हजारी से अधिक की वसूली होने की चर्चाएं जोरों पर हैं। बताया जा रहा है कि दाल-बिस्किट के लिए मशहूर तहसील के एक गांव में तीन दुकानदारों पर कार्रवाई का दबाव बनाया गया। जिनमें से एक से कथित रूप से 10 हजारी की वसूली हुई। इसके बाद उज्जैन मंडी में एक खाद व्यापारी को बिना ई-टोकन हाइब्रिड खाद बेचने की कथित राहत देकर 15 हजारी लिए जाने की चर्चा है। वहीं एक बीज कंपनी का सैंपल फेल होने के मामले में 50 हजारी की मांग और 15 हजारी लेकर मामला शांत करने की बातें भी विभाग में तैर रही हैं।चर्चा तो यहां तक है कि यही जमे रहने के लिए राजधानी में एक अफसर को दी गई  10 पेटी की भरपाई के लिए साहब को दो माह का समय मिला है। इसलिए विदाई टल रही है। फिलहाल विभाग में चर्चा यही है कि तबादले से ज्यादा सुर्खियां वसूली की कहानियां बटोर रही हैं। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस चुप रह सकते हैं।

मेरी पसंद
उसकी ख़ुशबू मेरी ग़ज़लों में सिमट आई है,
नाम का नाम है, रुसवाई की रुसवाई है।
दिल है एक और दो आलम का तमन्नाई है,
दोस्त का दोस्त है, हरजाई का हरजाई है।
कौन-से नाम से ताबीर करूँ इस रुत को,
फूल मुरझाए हैं, ज़ख़्मों की बहार आई है।
कैसी तरतीब से काग़ज़ पे गिरे हैं आँसू,
एक भूली हुई तस्वीर उभर आई है।
इक़बाल अशहर