31 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
घंटी मंदिर की बजेगी… या किसी की राजनीति की?
मंदिर हटेगा तो क्या होगा? बस यही सवाल उन धर्मरक्षकों से है, जो विकास की राह में मंदिर को लेकर ऐसे डट गए हैं, जैसे सड़क नहीं बन रही हो। उनकी राजनीतिक दुकान की नींव खोदी जा रही हो। मामला आस्था का है या अवसर का। यह तो विरोध करने वाले ही बेहतर जानते होंगे। मगर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि पिछले तीन साल से जिनके प्रमुख को सत्ता के गलियारों में अपेक्षित “तवज्जो” नहीं मिल रही थी। उन्हें मंदिर के बहाने फिर से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर मिल गया। उन्होंने अपने बंदों को एक्टिव कर दिया। जो मैदान में उतर गए। बिना कुछ सोच विचार के। ये भी कम दिलचस्प नहीं है। मैदान में उतरे हमारे सूत्रों की मानें तो शायद नजरें ऊपर हैं और कान किसी फोन की घंटी के इंतजार में। फोन आए, बात बने, फिर भविष्य में उसी एहसान की रसीद निकालकर 2028 की राजनीति में जमा कर दी जाए। आखिर राजनीति में कुछ भी मुफ्त थोड़े ही होता है! हालांकि यह पूरा खेल है या महज संयोग, इसका फैसला हम नहीं करेंगे। हमारे भरोसेमंद सूत्र ने जो कान में कहा, वह हमने पाठकों के कान में डाल दिया। अब इसमें कितना धर्म है, कितना विकास और कितना “भविष्य का निवेश”—फैसला आप करें। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।
प्रथमसेवक की चतुराई… कुर्सी खाली, विभाग अपना!
हेडिंग पढ़कर कृपया यह मत समझिए कि अपने प्रथमसेवक ने कोई चतुराई का पुरस्कार जीत लिया है। यहां तो मामला देवी अहिल्या नगरी की राजनीति और कुर्सी की केमिस्ट्री का है। डेढ़ साल तक प्रथमसेवक की केबिनेट का एक पद खाली रहा। पद खाली था, मगर विभाग खाली नहीं था। उसकी चाबी प्रथमसेवक के पास थी। वजह भी ऐसी कि कोई दूसरा ताला खोलने की स्थिति में ही नहीं था। नगरसेवक पर प्रकरण और फिर पार्टी का निलंबन था। अब राजनीति में रास्ते बंद हमेशा के लिए थोड़े होते हैं। दो नम्बरी नेताजी ने रास्ता साफ कराया और जैसे ही रास्ता खुला, प्रथमसेवक ने भी कुर्सी पर नया चेहरा बिठाने में एक पल नहीं लगाया। वाह प्रथमसेवक जी! डेढ़ साल तक विभाग अपने पास रखने का धैर्य और रास्ता खुलते ही नियुक्ति करने की फुर्ती। दोनों कमाल की चतुराई है। अहिल्या नगरी में कानाफूसी है कि इस डेढ़ साल में विभाग ने खूब ‘मक्खन’ देखा। अब मक्खन किसने लगाया और किसने खाया, यह तो फाइलें ही जानें। शायर भी शायद ऐसे ही मौकों के लिए कह गया है.. कुर्सी मिली तो अपने हुए हिसाब आया तो सपने हुए! अब हम तो ठहरे कलम वाले। चर्चा सुनते हैं, मुस्कुराते हैं और फिर अपनी पुरानी आदत के मुताबिक चुप हो जाते हैं। क्योंकि अहिल्या नगरी में कभी-कभी चुप्पी ही सबसे चतुर टिप्पणी होती है!
मेघदूत का ‘प्ले’… पर कहानी कालिदास वाली नहीं!
कालिदास ने बहुत कुछ लिखा। अपने को तो बस मेघदूत याद है, पढ़ा कभी नहीं। मगर देवीआहिल्या नगरी जाते वक्त रास्ते मे एक मेघदूत ऐसा है कि यहां से गुजरने वाला कोई न कोई ‘दृश्य’ देख ही लेता है। क्योकि जस्ट सामने वाली पट्टी पर प्ले है जहाँ ठहरने का इंतजाम भी है। कुछ दिन पहले एक मैडम जी का आगमन हुआ। चर्चा हैं कि अपने निखट्टू जी ने मैडम के ठहरने का पूरा इंतजाम किया। ऐसा कमलप्रेमियों का दावा है। अब मैडम जी मस्तमौला जिंदगी जीती हैं, यह उनकी सोशल मीडिया पोस्ट देखकर समझ आता है। कभी बाबा के दरबार में, तो कभी रोशनी वाले बार में। लेकिन असली कौतूहल तो इसके बाद पैदा हुआ। मैडम जी से मिलने एक के बाद एक कई कमलप्रेमी नेताजी पहुंचते रहे। ऐसा लगा जैसे प्ले में कोई बैठक चल रही हो और निमंत्रण सिर्फ चुनिंदा लोगों को मिला हो। अगले दिन मैडम जी झीलों की नगरी रवाना हो गईं। मगर पीछे छोड़ गईं कमलप्रेमियों के बीच एक सवाल? आखिर मैडम जी का जलवा क्या है? जब मैडम जी के नाम और पद को लेकर खोजबीन की तो कमलप्रेमियों चार दिन पहले मनाए गए त्यौहार के पहले शब्द की ओर इशारा किया औऱ चुप हो गए। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
दरियादिली भी दिखाई… औऱ दिल जीत लिया!
अक्सर हमारे सहित मंदिर में यह धारणा बनी हुई थी कि अपने फटाफट जी शायद थोड़े कठोर हृदय हैं। मगर धारणा भी आखिर धारणा ही होती है, कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता। अब मंदिर परिसर में एक नई चर्चा सुनाई दे रही है। चर्चा के पीछे वही घटना है, जिसका उल्लेख चुप ने पिछले सप्ताह किया था। सरल-सौम्य स्वभाव वाले जय महाकाल को दर्शन से रोकने की बात सामने आई थी। मामला सामने आने के बाद फटाफट जी ने जिस तरह इस पर खेद व्यक्त किया। उसने निश्चित रूप से उनकी एक अलग तस्वीर सामने रखी है। गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करना और उस पर खेद व्यक्त करना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए बड़ा दिल चाहिए। फटाफट जी ने इस मामले में अपनी दरियादिली दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह पहल निश्चित ही सराहनीय है। हम उनके इस बड़प्पन को दिल से सैल्यूट करते हैं। सुधार की शुरुआत स्वीकार से होती है।बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
‘योर हाइनेस’… और याद आ गया अपना ‘चुप’!
पिछले सप्ताह अपने मेट्रो गली के नेताजी ने पदभार ग्रहण कर लिया। नई नियुक्ति थी, लिहाजा कार्यक्रम भी खास था। अपने विकासपुरुष वीसी के माध्यम से कार्यक्रम में शामिल हुए और मंच पर मौजूद अतिथियों का नाम लेकर सम्मान भी किया। मगर अचानक नजर उत्तर के माननीय पर पड़ी और विकासपुरुष के मुंह से निकला—“योर हाइनेस!” बस फिर क्या था! यह दो शब्द कानों तक पहुंचे और वहां मौजूद कई कमलप्रेमियों के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। वजह भी बड़ी सीधी थी। अपना चुप में तो ‘हाइनेस’ नाम लंबे समय से छपता चला आ रहा है। कई कमलप्रेमियों ने बाद में फोन और संदेश के जरिए अपनी बधाई भी पहुंचाई। हमने भी उनकी बधाई सिर-माथे लगाई और मुस्कुराकर स्वीकार कर ली। मगर इस पूरे प्रसंग में हमारा आभार सबसे पहले विकासपुरुष वीसी के प्रति है, जिन्होंने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति से आयोजन की गरिमा बढ़ाई। उनके इस स्नेह और सहयोग को दिल से साधुवाद। बाकी ‘योर हाइनेस’ सुनकर जो याद आया उसे लिखने की जरूरत नहीं। इसलिए आदत के मुताबिक हम चुप हो जाते हैं।
मैडम का सोमरस मॉडल : बोतल जमीन पर, सच्चाई कागजों में!
विकासपुरुष ने नगरीय सीमा में सोमरस पर रोक लगाई तो लगा था कि अब ढाबों पर सिर्फ चाय उबलेगी और होटलों में सिर्फ शरबत छलकेगा। मगर मैडम के विभाग की कागजी दुनिया इससे भी ज्यादा पवित्र है।यहां सोमरस बिकता ही नहीं! कभी-कभार किसी ढाबे पर दबिश, दो-चार फोटो, फिर प्रेसनोट… और दावा ऐसा कि मानो सोमरस ने उज्जैन से संन्यास ले लिया हो। फिर एक ढाबे पर दो कत्ल हो जाते हैं। आरोप-चर्चाओं में वहां सोमरस की बिक्री की बात भी सामने आती है। अब सवाल यह नहीं कि बोतल किसने बेची… सवाल यह है कि मैडम की निगरानी में वह वहां तक पहुंची कैसे? मैडम को हकीकत पता होने की बातें उनके मातहतों को भी पता है। लेकिन कागजों में सब चकाचक! किसी शायर ने कहा है— झूठ बोले तो लहजा बड़ा सलीकेदार रखिए, सच सामने आ जाए तो बहाने तैयार रखिए। मैडम अगर अपने दावे पर कायम हैं तो हम भी उनके आत्मविश्वास को सलाम करते हैं। क्योंकि इस शहर में सोमरस शायद नहीं बिकता… बस उसके बिकने की खबरें ही बहुत बिकती हैं! और हम? हम फिर चुप हैं।कहीं हमारी आवाज से मैडम का दावा न टूट जाए।
विकासपुरुष के सवाल… और अफसरों की पढ़ाई!
बाबा की नगरी में पदस्थ आलाधिकारियों के लिए अब केवल प्रशासनिक अनुभव काफी नहीं लगता। धर्म, पर्व-त्योहार, विज्ञान और राजनीति का सामान्य ज्ञान भी साथ रखना पड़ेगा। कारण साफ है। विकासपुरुष कब, किस विषय पर सवाल दाग दें, इसका कोई टाइम-टेबल नहीं है! खाचरौद हेलीपेड पर रक्षा पर्व की बधाई मिली तो सवाल आया। यह पर्व क्यों मनाते हैं? सबने अपने-अपने ज्ञान के पन्ने खोले। कप्तान ने भी जवाब दिया। विकासपुरुष ने मुस्कुराकर कहा। मुझे पढ़कर बाद में बता देना। फिर कम्युनिटी सेंटर में आग पर सवाल हुआ। “आग के लिए जरूरी क्या है?” कप्तान ने तुरंत कहा। “ऑक्सीजन।” इस जवाब पर मानो पूरे नंबर मिल गए। कालभैरव पर फिर सवाल आया और बात ऋतुओं तक पहुंच गई। ठंड, गर्मी और बारिश आखिर क्यों पड़ती है? कप्तान ने फिर मोर्चा संभाल लिया। अब आलाधिकारियों के लिए संदेश सरल है। फाइलों के साथ किताबें भी खोल लीजिए। धर्म-ज्ञान-विज्ञान-राजनीति, कुछ भी पढ़िए… क्योंकि विकासपुरुष के सवालों का विषय कभी तय नहीं होता। बाकी हम अपनी आदत के मुताबिक चुप रहेंगे!
हेलीपेड पर रुकी घड़ी… वो पाँच मिनट, तीन चेहरे और एक अनकहा राज!
रक्षा पर्व की रस्में पूरी हो चुकी थीं। विकासपुरुष अगले दिन लौटने के लिए तैयार थे। हेलीपेड पर सब कुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था। तभी अचानक कहानी में एक छोटा-सा ‘पाँच मिनट का ठहराव’ आ गया। विकासपुरुष ने उज्ज्वल जी और कप्तान जी को अपने पास बुलाया। बाकी सब अपनी जगह थे, मगर ये तीनों कुछ दूर जाकर खड़े हो गए। बातचीत हुई। चेहरे गंभीर थे। हाथों के इशारे भी हुए। करीब पाँच मिनट बाद बातचीत खत्म हुई और जैसे कुछ हुआ ही नहीं, सब अपनी-अपनी जगह लौट आए। लेकिन हेलीपेड पर मौजूद उम्मीद जी, अल्फा जी, डेल्टा जी, एंग्रीमैन, फटाफट जी और दालवाले नेताजी की निगाहें शायद इस पाँच मिनट के रहस्य को पढ़ने में लगी थीं। आखिर बात क्या थी? कोई निर्देश? कोई सवाल? कोई आने वाली चुनौती? या फिर विकासपुरुष ने ऐसा कुछ पूछ लिया, जिसका जवाब सार्वजनिक नहीं होना था? सच तो उज्ज्वल जी और कप्तान जी ही जानते हैं। मगर दोनों की खामोशी देखकर लगता है कि पाँच मिनट की बातचीत को पाँच शब्दों में बताना भी आसान नहीं होगा। हमने भी तस्वीर देखी… चेहरे पढ़े… कुछ कयास लगाए। फिर सोचा—जहाँ दो जिम्मेदार लोग चुप हों, वहाँ तीसरे को बोलने की क्या जरूरत? इसलिए हम भी चुप है। फिलहाल हेलीपेड से विमान उड़ चुका है… मगर वो पाँच मिनट वाला रहस्य अभी जमीन पर ही खड़ा है!
15 पेटी का रहस्य… हाथी चला गया, सवाल वहीं खड़ा है!
पिछले सप्ताह अगर किसी घटना ने विभागीय गलियारों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, तो वह थी। हाथी की सवारी! लेकिन असली कहानी हाथी की पीठ पर नहीं, उसके नीचे दबे सवालों में छिपी है। विभाग में इन दिनों एक चर्चा बड़ी तेजी से दौड़ रही है। 15 पेटी किसने ली? अब यह सवाल सच है या सिर्फ गलियारों की गपशप, इसकी पुष्टि हम नहीं कर सकते। मगर यदि यह महज अफवाह है तो विभाग को जांच रिपोर्ट के टेबल पर आने के बाद कार्रवाई करना चाहिए। और यदि इसके पीछे जरा भी सच्चाई है, तो जांच उससे भी तेज होनी चाहिए जितनी तेजी से यह कहानी कर्मचारियों के बीच फैल रही है। क्योंकि सवाल किसी एक अधिकारी का नहीं है। सवाल उस जांच व्यवस्था का है। जिसमें दोष सिद्ध होने के बावजूद कार्रवाई रुक जाती है, या फिर कार्रवाई की फाइल ऊपर जाने से पहले ही रास्ता बदल लेती है। कर्मचारी पूछ रहे हैं। जिन्हें अब तक निलंबन का सामना करना चाहिए था, वे कुर्सी पर क्यों हैं? किसने उन्हें संरक्षण दिया? जांच रिपोर्ट आगे बढ़ाने में अड़चन कहां आई? और सबसे बड़ा सवाल। अगर 15 पेटियों की कहानी झूठ है, तो सच क्या है? हाथी पर बैठना कोई अपराध नहीं। लेकिन हाथी की ऊंचाई इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि जवाबदेही नीचे दिखाई ही न दे। अब विभाग को तय करना है—वह हाथी की सवारी का जश्न मनाएगा या 15 पेटी के रहस्य की निष्पक्ष जांच कराएगा? करंट वाले विभाग की विकासपुरुष से गुहार हैं कि वह सख्त एक्शन लें। बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
विकासपुरुष की झलक, लाखों की धड़कन… आज व्यवस्था का इम्तिहान!
बाबा महाकाल की सवारी तो अपनी परंपरा और आस्था के लिए जानी जाती है, लेकिन आज की सवारी में एक और रोमांच जुड़ गया है।विकासपुरुष का आगमन। सूत्रों के अनुसार कमलप्रेमियों में उत्साह है और प्रशासन के माथे पर जिम्मेदारी की लकीरें कुछ और गहरी। कारण साफ है। जहां विकासपुरुष होंगे, वहां कमलप्रेमियों लोगों का पहुंचना भी तय है। कोई दर्शन चाहता है, कोई हाथ मिलाना, कोई फोटो और कोई बस यह साबित करना चाहता है कि वह भी वहीं था। सोशल मीडिया के दौर में पांच सेकंड की झलक भी कभी-कभी पांच सौ दावों के बराबर होती है। मगर आज असली तस्वीर कैमरे में नहीं, व्यवस्था में दिखाई देगी। भीड़ बढ़ेगी, उत्साह बढ़ेगा, प्रोटोकॉल होगा और उसके बीच आम श्रद्धालु भी अपनी आस्था लेकर खड़ा होगा। ऐसे में सुरक्षा घेरे को मजबूत रखते हुए सवारी की सहजता बनाए रखना पुलिस और प्रशासन के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं। आज देखना यह नहीं कि विकासपुरुष को कितनी तालियां मिलती हैं… देखना यह है कि उन तालियों के बीच व्यवस्था की पकड़ कितनी मजबूत रहती है। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।
14 लाख 71 हजार भक्त… फिर भी व्यवस्था बेदाग!
हेडिंग देखकर मोबाइल की जप्ती या वर्दी की कोई बड़ी कार्रवाई मत तलाशिए। 14 लाख 71 हजार उस दिन बाबा की नगरी में मौजूद श्रद्धालुओं का आंकड़ा है। जिस दिन साल में एक दफा खुलने वाले मंदिर के दर्शन करने भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यानी एक दिन में इतनी बड़ी भीड़, लगातार आवाजाही और आस्था का महासैलाब। अब जरा कल्पना कीजिए। इतनी भीड़ के बीच व्यवस्था संभालना कितना बड़ा इम्तिहान रहा होगा। लेकिन सुखद बात यह है कि कोई ऐसा हादसा नहीं हुआ, जिससे उज्जैन की व्यवस्था या बाबा की नगरी की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा होता। यह उपलब्धि केवल इंतजाम नहीं, बेहतरीन मैनेजमेंट का परिणाम है। प्रशासन ने योजना संभाली तो वर्दी ने मैदान। हर मोर्चे पर निगरानी, हर रास्ते पर मुस्तैदी और हर चुनौती के सामने संयम दिखाई दिया। अपने उज्ज्वल जी, कप्तान जी और उनकी पूरी टीम को साधुवाद। 24 घंटे में 14 लाख 71 हजार लोगों को संभालना कोई छोटी परीक्षा नहीं थी। आज तारीफ में चुप के शब्द भी कम पड़ गए हैं… इसलिए इस बार चुप रहना भी तारीफ ही समझिए।
मेरी पसंद...
माना ये दिन अंतिम दिन है माना सब मिट जाएगा।
मुझकों थोड़ी और पिलाओ आग लगे इस दुनिया मैं।
विष्णु विराट