गुस्सा असली था... या कैमरों के लिए था?
सांध्य प्रकाश विशेष
उज्जैन।दिशा की बैठक में बुधवार को जो हुआ, वह लोकतंत्र का स्वस्थ संवाद कम और राजनीतिक पटकथा ज्यादा लगा। पहले गुस्सा, फिर बहिष्कार, फिर कैमरों के सामने नाराजगी, फिर कलेक्टर के कमरे में 15 मिनट की चर्चा... और उसके बाद वही बैठक दोबारा शुरू।तो सवाल पूछना जनता का अधिकार है। अगर बैठक इतनी बेकार थी कि उसे छोड़ना जरूरी था, तो 15 मिनट बाद वही बैठक बेहतर कैसे हो गई? और अगर 15 मिनट की बातचीत में समाधान निकल सकता था, तो शुरुआत वहीं से क्यों नहीं हुई?
यही तो राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय है।पहले सुर्खियां,फिर सुलह।
किसी समझदार जनप्रतिनिधि से जनता यह उम्मीद नहीं करती कि हर असहमति का पहला जवाब कैमरों के सामने गुस्सा हो। लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ा हथियार है। कलेक्टर वहीं मौजूद थे। सांसद अनिल फिरोजिया और विधायक डॉ तेजबहादुर चौहान।जो गुस्से में बैठक छोड़कर ही चले गए, चाहते तो कहते।
बैठक दस मिनट रोकिए, पहले अलग से बात करते हैं। उसके बाद बैठक चलती और संदेश भी चला जाता कि जनप्रतिनिधि गंभीर हैं, केवल नाराज नहीं।लेकिन फिर अखबार की पहली हेडलाइन कौन बनता?
राजनीति में एक पुराना सिद्धांत है।जो बात बंद कमरे में हो सकती है, उसे खुले मंच पर तभी किया जाता है, जब संदेश किसी और तक पहुंचाना हो। यानी तीर प्रशासन की तरफ छोड़ा गया, लेकिन निशाना शायद कहीं और था।
क्योंकि सच यह भी है कि कलेक्टर न सिंहस्थ के स्थायी मालिक हैं, न विकास योजनाओं के अंतिम निर्णायक। वे तो व्यवस्था का हिस्सा हैं। यदि उद्देश्य शासन को संदेश देना था, तो वह संदेश भी बिना तमाशे के दिया जा सकता था।
सबसे रोचक दृश्य तो आखिर में रहा।पहले बैठक छोड़ दी गई। फिर कलेक्टर ने समझाया। फिर वही लोग वापस आए। फिर वही एजेंडा, वही कुर्सियां और वही बैठक।तो जनता पूछ रही है।
अगर लौटना ही था, तो निकलना क्यों था?
कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले मीडिया को मसालेदार दृश्य देना बैठक का छुपा हुआ एजेंडा था। और बाद में प्रशासन के समझाने पर यह साबित करना कि हम सब शासन-प्रशासन के साथ है।
कलेक्टर रौशन सिंह ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने संवाद से रास्ता निकाला। लेकिन जो तस्वीर अखबारों और सोशल मीडिया पर गई, उसमें संदेश यह नहीं गया कि "समस्या हल हो गई।" संदेश यह गया कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि अपने ही प्रशासन से सार्वजनिक टकराव में हैं।यह संदेश विपक्ष के लिए ऑक्सीजन और सत्ता के लिए असहजता पैदा करता है।
आज का मतदाता पहले जैसा नहीं रहा। वह केवल गुस्से की तस्वीर नहीं देखता, उसका अर्थ भी निकालता है। उसे समझ में आता है कि कब नाराजगी वास्तविक है और कब उसका मंचन किया जा रहा है।सुर्खियां एक दिन की होती हैं, लेकिन परिपक्व नेतृत्व की पहचान वर्षों तक रहती है।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक शायद यही है।संवाद से निकला समाधान हमेशा सम्मान बढ़ाता है, जबकि कैमरों के सामने दिखाया गया गुस्सा अक्सर तालियां तो बटोर लेता है, लेकिन सवाल भी छोड़ जाता है। जनता अब नेताओं की हर चाल पढ़ना सीख चुकी है। इसलिए अगली बार शायद वह गुस्से से ज्यादा यह पूछेगी
समाधान पहले से संभव था, तो तमाशा किसके लिए था?