01 सितम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
मुझे वापस बुला लो ...
अपर कलेक्टर स्तर के एक अधिकारी अभी-अभी आये है। मुहावरे की भाषा में बोला जा सकता है। जुम्मा-जुम्मा 8 दिन। आते ही उनको अपने फटाफट जी के पद पर विराजमान कर दिया गया। अपने उज्ज्वल जी ने कार्य विभाजन करके। वह अपनी मर्जी से आये थे या जबरदस्ती। हमको पता नहीं है। मगर यह पता है। पदभार संभालने के चंद दिनों बाद ही घबरा गये। तो अवकाश लेकर गये थे। उस वक्त, जब श्रीमंत जी गुना दौरे पर थे। अधिकारी ने श्रीमंत से मुलाकात की। अपनी पीडा सुनाई। गुहार लगाई है। मुझे वापस बुलवा लीजिए? ऐसी चर्चा संकुल के गलियारों में सुनाई दे रही है। जिसमें कितना सच है-कितना झूठ? हमको पता नहीं है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
गोपनीय रायशुमारी ...
हमने इसी कॉलम में लिखा था। (18 अगस्त के अंक में) रायशुमारी बनाम नौटंकी शीर्षक से। तो अब सीधे मुद्दे पर आते है। एक बार फिर रायशुमारी हुई है। इस दफा एक होटल में हुई। जो कि नगरीय सीमा से लगा हुआ है। इस होटल में सोमरस पर प्रतिबंध नहीं है। बाहर से आये पर्यवेक्षक सहित 8 जिलों के कमलप्रेमी मुखिया मौजूद थे। सभी को एक प्रोफार्मा दिया गया। यह अंतिम अवसर था। किसको- किस पद पर नियुक्त करना है। उसके लिए। अंदरखाने की खबर है। 6 जिलों के मुखिया ने तत्काल अपने-अपने नाम प्रोफार्मा में भरकर दे दिए। मगर अपने दालवाले नेताजी और बदबू वाले शहर के कमलप्रेमी मुखिया पीछे हट गये। दोनों ने अपने विकासपुरूष के नाम का सहारा लिया। जिसके बाद हम नहीं, बल्कि अपने कमलप्रेमी यह सवाल उठा रहे है। असली रायशुमारी कौनसी थी। संगठन मुख्यालय वाली या होटल वाली? जिसका जवाब हमारे पास नहीं है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
बुलंद आवाज का जलवा ...
अपने दालवाले नेताजी की बुलंद आवाज का जलवा बुधवार को देखा। वह भी हेलीपेड पर। संगठन को एक आवाज में अनुशासित कर देना। सफेद लाइन के पीछे रहें-आँख से आँख मिलेगी- चेहरे से चेहरा। ऐसा आजतक नहीं देखा। क्योंकि कमलप्रेमी किसी की सुनते ही नहीं है। अपनी मर्जी के अनुसार काम करते है। खासकर उस वक्त, जब विकासपुरूष के स्वागत करने की होड हो। तब कमलप्रेमी आजाद हो जाते है। बुधवार को यही नजारा था। हेलीपेड पर कमलप्रेमियों की जमकर भीड थी। जो कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन था। लेकिन जैसे ही उडनखटोला उतरा। अपने दालवाले नेताजी की बुलंद आवाज गुंजी। सफेद लाइन की हिदायत के साथ। नतीजा सभी कमलप्रेमी लाइन के पीछे खडे हो गये। यह नजारा देखकर हर कोई अचंभित था। संगठन ऐसे ही चलता है। जिसके लिए दालवाले नेताजी को बधाई देकर,हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
गोपनीय सूचना...
हमारे पाठकगण यह नहीं सोंचे शीर्षक पढकऱ। हम कोई गोपनीय सूचना लिखने वाले है। ऐसा कुछ भी नहीं है। हम तो अपने उज्ज्वल जी की चिंता लिखकर बता रहे है। जो कि एक बैठक में उन्होंने जाहिर की है। गुरूवार की शाम को। जब वह राजस्व अधिकारियों से बतिया रहे थे। तब उन्होंने खुलकर कहां। आजकल अंदर की गोपनीय सूचनाएं खूब बाहर जा रही है। अपने उज्ज्वल जी ने यह भी कहा। उनको पता है। गोपनीय सूचनाएं कैसे लीकेज हो रही है। इतना कहकर वह चुप हो गये। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
कुंडली दिखवा लीजिए ....
संकुल के गलियारों में चर्चा है। कुंडली दिखवा लीजिए -कुंडली दिखवा लीजिए। इशारा एक फरियादी की तरफ है। जो कि बदबू वाले शहर के रहवासी है। इनकी आदत है। जब-जब वह अपनी मुसीबत लेकर हाजिर हुए है। जब तक वह हल नहीं हो जाये, तब तक पीछा नहीं छोडते है। मामाजी की सरकार में पदस्थ रहे कई आईएएस, इनको देखकर चुपचाप निकल जाते थे। कईयों को तो यह फरियादी ही सपने में नजर आने लगा था। यह फरियादी अब ... जमीन पर अतिक्रमण मामले को लेकर पिछली जनसुनवाई में नजर आये थे। इसके बाद शुक्रवार को अपने उज्ज्वल जी से फिर मिले। मंगलवार के बाद शुक्रवार को। मतलब 3 दिन में ही दूसरी मुलाकात। तो सोचिए ऐसे फरियादी से पिंड छुडाना कितना मुश्किल होगा। जब तक उसकी समस्या हल ना हो। यहां यह लिखना भी जरूरी है। मामा जी के कार्यकाल में बदबू वाले शहर में अगर आमसभा है। अपने मामाजी की। तो इस फरियादी की तलाश सबसे पहले होती थी। फिर वर्दी उसे अंजान जगह ले जाती थी। तभी तो संकुल में बैठने वाले फरियादी को देखकर बोल रहे है। कुंडली दिखवा लीजिए? अब देखना यह है कि फरियादी की समस्या का निराकरण करके, अपने उज्ज्वल जी कुंडली दिखाने से बचते है या नहीं ? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
पावती का खेल ...
250 खोखे का विशेष पैकेज। विकासपुरूष की तरफ से। ताकि अन्नदाता खुश रहे। उनको पितृ-देव और भूमि ऋण का श्राप ना लगे। 2012 में जब जमीन ली गई थी। तब 70 हजारी रेट मिला था। अपने अन्नदाताओं को। अब 13 साल बाद रेट 35 से 40 पेटी बीघा है। यह सब इसलिए है कि ... उद्योग आयेंगे- तभी विकास होगा। उस पर भी अन्नदाता की केवल 10 प्रतिशत जमीन ली जा रही है। किन्तु भोले अन्नदाताओं को ज्यादा का लालच देकर बरगलाया जा रहा है। वह भी झूठी जानकारी देकर। तभी तो प्रति पावती 15 से 20 हजारी का खेल शुरू हो गया है। अन्नदाता भी बहकावे में आ गये है। झूठी बात को सच मान रहे है। पैकेज 250 का नहीं, बल्कि 500 खोखे का है। जिसे अपने काले-अंग्रेज बीच में दबा गये है। अन्नदाताओं की नेतागिरी करने वाले यह तक दावा करते है। वह 24 घंटे में देश के सेवक नमो से मुलाकात करवा सकते है। फिर सरकार का गिरना पक्का है। अन्नदाताओं के असली किसान नेता उनके हुक्म में है। विक्रम नगरी के 7 गांव में तो यही चर्चा है। अवार्ड पारित होने के बाद। नतीजा कुछ समझदार अन्नदाता यह कहने में नहीं चूक रहे है। कबीरा इस संसार में सबसे सुखी ... ... / जीत गये तो मोटी फीस वरना फिर ...........। अपने अन्नदाताओं की बात में दम है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
चौका या छक्का ....
हम क्रिकेट की बात नहीं कर रहे है। शीर्षक पढकऱ पाठकगण शायद यही सोचे। मगर हमारा इशारा पिपली राजकुमार के चौराहे की तरफ है। जो कि सिक्स लेन होना था। इस खबर ने खूब विवाद खड़ा किया। धरना हुआ- रैली निकली-ज्ञापन दिया। अपने हाइनेस का वीडियों भी वायरल हुआ था। वह भी संघ के पदाधिकारी की आईडी से। चुनाव से पहले का। मगर अंदरखाने का सच इसके उलट है। दरअसल रास्ता फोरलेन ही होना था। बैठकों में अपने इंदौरीलाल जी ने हमेशा यही बोला था। सिक्स लेन किया तो कई घर बर्बाद होंगे। फोरलेन ही उचित रहेगा। ऐसा हम नहीं, बल्कि अपने इंदौरीलाल के करीबियों का कहना है। अब यह सच है या झूठ? हमको बाबा की कसम। नहीं पता। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
दु:ख का कारण दया ...
इंसान के दु:ख का मूल कारण दया ही है। अगर डिप्टी कलेक्टर नहीं दिखाते दया। तो उनको धमकी भरा फोन ही नहीं आता। सभी को पता है। अभी-अभी दाल-बिस्किट वाले शहर के डिप्टी कलेक्टर को धमकी मिली है। अज्ञात व्यक्ति द्वारा। जिसमें प्रकरण भी दर्ज हुआ है। इस पूरे मामले में एक मैडम की भूमिका पर सवाल उठ रहे है। यह वही मैडम जी है। जिनको नौकरी से हटाने के निर्देश, जिले के पिछले मुखिया ने दिए थे। तब अपने फटाफट जी ने भी सलाह दी थी। दया ही दु:ख का कारण बनता है। मगर उन्होंने सलाह नहीं मानी। तो मैडम जी के भाव सातवें आसमान पर चढ गये। तभी तो शांति समिति की बैठक में थाना प्रभारी को पलटकर जवाब दे दिया। खुद ही बेरिकेड्स लगवा लेना। नतीजा एसडीएम ने अपने उज्ज्वल जी को प्रतिवेदन भेज दिया। जिसका परिणाम जगजाहिर है। फोन पर धमकी दिलवा दी गई। अब देखना यह है कि आरोपी कब हिरासत में आता है? वह किसकी तरफ उंगली उठाता है? उस वक्त मैडम जी क्या सफाई देती हैं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
देर आए-दुरूस्त आए.....
हालांकि यह कदम बहुत पहले उठाना चाहिये था। अपने कप्तान जी को। फिर भी आखिरकार उनकी नजरें इनायत हुई। कैसे हुई-क्यों हुई। हमको नहीं पता। मगर उनका दिल से आभार। फ्रीगंज की यातायात व्यवस्था बद से बद्तर हो चुकी है। कोई नियम कायदा लागू नहीं है। शाम के समय फ्रीगंज की किसी भी गली निकल जाओ। बेतरतीब वाहन खड़े नजर आते है और चलाने वालो का तो महाकाल ही मालिक है। यह देखकर आम इंसान ना चाहते हुए भी वर्दी को कोसता था। अभी भी कोस रहा है। इधर वर्दी की अपनी मजबूरी है। जिसको भी पकडों। वह कमलप्रेमी या अपने विकासपुरूष की धौंस देता है। कई तो अपने विकासपुरूष से बात करवाने के लिए फोन तक निकाल लेते है। बेचारी वर्दी हाथ जोड लेती है। कौन विवाद करे। अब वर्दी ने ठाना है। अव्यवस्था मिटाना है। तो यह शुभकामनाएं। अभियान रूके नहीं-वर्दी झुके नहीं, देकर ... हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
धोती पर निगरानी ...
मंदिर के गलियारो में तारीफ हो रही है। अपने फटाफट जी और उनकी कार्यशैली की। जिन्होंने अब सख्ती बरतना शुरू कर दिया है। उन कर्मचारियों पर, जो लापरवाही करते है। लेकिन अपने जेब गर्म करते रहते है। फिलहाल निशाने पर अपने वैदिक धोती है। शोध-संस्थान वाली। इस वैदिक धोती ने निजी मांगों को लेकर वाद दायर कर रखा है। मगर काम करने से बचते है। तभी तो कैमरा लगवा दिया गया है। वैदिक धोती के कार्यालय में। अपने फटाफट जी ने। मतलब अब निगरानी में है। उस पर एक नोटिस भी थमा दिया है। काशन- मनी के मामले में। मंदिर वाले तो यही बोल रहे है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
सदमे में प्रशासन ....
पहले कोठी और अब संकुल । कवरेज करते-करते लगभग 2 दशक से ज्यादा का समय हो चुका है। कोठी से संकुल तक, प्रशासन की विफलता और सफलता के कई आयाम देखे है। मगर प्रशासन को सदमे में कभी नहीं देखा। वह भी इस कदर कि सदमें के कारण संवादहीनता ही आ जाए। यह दौर ऐसा ही है। खासकर शामे-अवध और इंद्रप्रस्थ शहर की यात्रा से लौटने के बाद। दोनों शहर से वापसी होने के बाद, मायूसी और सदमे का माहौल संकुल के गलियारों में दिखाई दे रहा है। कोई बात करने को तैयार नहीं है। जो कि सभी महसूस कर रहे है। जिसे देखकर हम तो बस अपनी आदत के अनुसार चुप ही रह सकते है।
दमदमा की भविष्यवाणी ...
दमदमा के गलियारों में चर्चा है। अब जल्दी ही प्रशासनिक सर्जरी होगी। क्योंकि बड़े साहब का कार्यकाल पूरे 1 साल के लिए बढ गया है। जिसके बाद अपनी चटक मैडम जी का किसी जिले में मुखिया बनना पक्का माना जा रहा है। उनकी जगह राजधानी जाते वक्त आने वाले जिले की ग्रामीण विकास विभाग की मुखिया का आगमन होगा। यह जिला कुबरेश्वरधाम मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। उसी जिले की ग्रामीण मुखिया दमदमा पर दस्तक दे सकती है। हमें पता नहीं, अब आगे क्या होगा। इसलिए हम तो अपने विकासपुरूष को ‘अदालत’ में सही- सटीक और उनकी हाजिर जवाबी की बधाई देते हुए, आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
कमजोर कड़ी ...
पिछले दिनों स्थानांतरित होकर आये एक संयुक्त कलेक्टर इन दिनों कमजोर कडी की तलाश में है। उनको फिलहाल 5 साल में एक बार सुर्खियों में रहने वाले विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। मगर यहां उनका मन नहीं लग रहा है। तो वह किसी तहसील में एसडीएम बनने की जुगाड में है। संकुल के गलियारों में तो यही चर्चा है। हमारी तरफ से बाबा महाकाल उनकी मनोकामना पूरी करे। यह लिखकर हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
मेरी पसंद ...
किसी के इश्क में मां-बाप को आंखे दिखाते हो/ अगर यह इश्क है तो बदतमीजी किसको कहते है...!