24 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
48 घंटे में ‘कमल’ मुरझाया!
राजनीति में 48 घंटे बहुत होते हैं साहब! इतने कम समय में नियुक्ति हो सकती है, विरोध खड़ा हो सकता है और फिर नियुक्ति का नाम भी इतिहास बन सकता है। मामला कमलप्रेमी संगठन के पिछड़े वर्ग से जुड़े एक पद का है। बाबा की नगरी में जैसे ही नए मुखिया के नाम का पत्र निकला, वैसे ही विरोध के सुर भी निकल पड़े। कमलप्रेमियों की चर्चा पर भरोसा करें तो पहला स्वर अपने हाइनेस का था। फिर दालवाले नेताजी ने भी सुर में सुर मिला दिया। मतलब मामला ‘एकला चलो’ से ‘साथ-साथ चलो’ तक पहुंच गया। नतीजा ऊपर से संदेश आया—“हाइनेस को मनाओ।” जिनकी नियुक्ति हुई थी, वे भी उम्मीदों का गुलदस्ता लेकर हाइनेस के दरबार पहुंचे। मगर किस्मत देखिए, मुलाकात का समय ही नहीं मिला। गुलदस्ता वापस, उम्मीदें वापस और कहानी राजधानी की तरफ रवाना! फिर हुआ वही, जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी। नियुक्ति पत्र जारी होने के महज 48 घंटे बाद राजधानी से नई सूची आ गई। नई सूची में सब कुछ था, बस वह नाम नहीं था, जिस पर आपत्ति बताई जा रही थी। अब कमलप्रेमियों में दबी जुबान से चर्चा है कि इस ‘नाम परिवर्तन अभियान’ के लिए हाइनेस और दालवाले नेताजी का आभार जताया जाए। हालांकि राजनीति में आभार भी बड़ा खतरनाक शब्द है। आज आभार, कल वही बात किस्सा बन जाए—कह नहीं सकते। हमसे पूछिए तो भला हम क्या कर सकते हैं? न नियुक्ति हमारी, न विरोध हमारा, न सूची बदलने में हमारा हाथ। बाकी बाबा की नगरी है साहब… यहां दरबार भी बड़ा है और दरबार की राजनीति भी। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगें।
हिम्मतगढ़ की पहाड़ी पर ‘माल’ का मिलन समारोह
अपनी नमकीन सेव, गोल्ड और तेल में डूबी कचौरी के लिए चर्चित शहर में पिछले सप्ताह करीब साढ़े पांच खोखे की लूट हुई। वर्दी ने मेहनत की, हिम्मतगढ़ की पहाड़ी तक पहुंची और आरोपियों को माल सहित पकड़ लिया। इसके लिए बधाई तो बनती है। लेकिन वर्दी ही दबी जुबान से सवाल कर रही है। क्या लुटेरे लूट करने में जितने माहिर थे, भागने में उतने ही कच्चे निकले? लूट के करीब 48 घंटे बाद पूरा कुनबा एक ही जगह, एक ही पहाड़ी पर और ऊपर से लूट के माल सहित मौजूद! यानी पुलिस को उन्हें तलाशने के लिए ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी। जैसे अपराधियों ने खुद ही लोकेशन शेयर कर रखी हो—“साहब, बंटवारा यहीं करेंगे, आप चाहें तो समय से आ जाइए।” आमतौर पर लूट के बाद रास्ते अलग होते हैं, चेहरे अलग होते हैं और ठिकाने भी अलग। लेकिन यहां तो कहानी कुछ ऐसी बनी कि लूट के बाद लुटेरे ही एक जगह ‘कलेक्शन सेंटर’ खोलकर बैठ गए। चर्चा तो यह भी है कि वर्दी के कुछ जानकार खुद दबी जुबान में इस गिरफ्तारी की कहानी पर सवाल कर रहे हैं। आखिर 48 घंटे में इतनी समझदारी तो अपराधियों से भी अपेक्षित होती है कि माल लेकर एक जगह इकट्ठा न बैठें। अब इसमें हम क्या कर सकते हैं? बस वर्दी की कहानी पर आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
जय महाकाल को रोका… फटाफट जी, इतिहास भी पढ़ लेते!
नागपंचमी की रात शिवाजी भवन में पदस्थ अपने जय-महाकाल जी के साथ जो हुआ, उसकी चर्चा अब मंदिर से शिवाजी भवन के गलियारों तक पहुंच गई है। चर्चा करने वाले भी कम नहीं कह रहे। जिसने बाबा के भक्त को बाबा के दरबार तक पहुंचने से रोका है, उसका हिसाब तो महाकाल जरूर करेंगे! निशाने पर हैं अपने फटाफट जी। आरोप है कि उन्होंने वह कर दिखाया, जो शायद कोई बाबा के भक्त के साथ करने की कल्पना भी न करे। जय-महाकाल को ही जय महाकाल के दरबार में जाने से रोक दिया! इतिहास में सिकंदर और पौरुष का प्रसंग याद आता है। हार के बाद जब पौरुष को सिकंदर के सामने लाया गया और पूछा गया—“तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए?” तो जवाब था—“वही, जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।” कहते हैं सिकंदर इस जवाब से प्रभावित हुआ था। मगर लगता है फटाफट जी ने इतिहास की यह कक्षा शायद बंक कर दी थी। वरना इतना तो समझते कि बाबा के दरबार में जाने वाले को रोकना कोई प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आस्था के सामने अपनी बुद्धि का प्रदर्शन है। मगर अपने फटाफट जी को यह बात समझाए कौन? शायद यह पढ़कर समझ आ जाए। अगर बाबा की कृपादृष्टि हो जाए। बाकी हमकों तो चुप ही रहना है।
लालची मैडम की कुर्सी और 15 हजार का रेट कार्ड
सरकारी कुर्सी पर बैठकर अगर फाइलों का भी रेट कार्ड बनने लगे, तो समझिए दफ्तर में काम नहीं, कारोबार चल रहा है। एक शिकायत ने नामांतरण की एक ऐसी कहानी सामने रखी है। जिसमें आरोप है कि जमीन के नामांतरण के बदले प्रति बीघा 15 हजार रुपए मांगे गए। रकम नहीं मिली तो आवेदन निरस्त! अब यह आरोप है, फैसला नहीं। जांच होगी, सच सामने आएगा। इसलिए हम किसी को दोषी घोषित नहीं करेंगे। लेकिन सवाल पूछने में टैक्स तो नहीं लगता! लालची मैडम जी, अगर आरोप झूठा है तो जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन अगर शिकायत में जरा भी दम निकला तो सवाल सिर्फ 15 हजार का नहीं होगा। सवाल उस मानसिकता का होगा, जो सरकारी सेवा को सुविधा शुल्क की दुकान समझ बैठती है। किसान जमीन का नामांतरण कराने दफ्तर जाता है, अपनी जमीन बेचने नहीं। उसकी जेब पर नजर डालकर फाइल चलाने की कोशिश हो तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार का आरोप नहीं, उस किसान की मजबूरी पर हमला है। और सबसे मजेदार बात। फाइल निरस्त करने की ताकत भी कुर्सी के पास और शिकायत का सामना करने की नौबत भी उसी कुर्सी के पास! अब देखना है जांच में किसकी कलम भारी पड़ती है। लालची मैडम की या हाथ लाल करवाने वाले विभाग की। तब तक मैडम जी को निजी सलाह है। कुर्सी सरकारी है मैडम, रेट कार्ड भी सरकारी ही रखिए… निजी दुकान मत समझिए। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।
परसों हाथ-पाँव फूल गए थे… और आज कुर्सी?
बुधवार को विकासपुरुष आए थे। एलिवेटेड ब्रिज की सौगात लेकर। मंच से विकास की गाथा चल रही थी, तभी अचानक एक ऐसा वाक्य निकला कि विकास के साथ राजनीति का भी पुल बन गया। जब विकासपुरुष ने कहा “परसों हाथ-पाँव फूल गए थे।” बात मंदिर दर्शन की थी, लेकिन जिनके हाथ-पाँव उस दिन फूलने की चर्चा है, उनके चेहरे बुधवार को मंच के पीछे जरूर सिकुड़ते दिखाई दिए। पहली बार पीछे खड़े अपने फटाफट जी शायद यह सोच रहे होंगे कि भाषण में पुल बनने वाला है या पद के नीचे से जमीन खिसकने वाली है! हालांकि विकासपुरुष ने तत्काल तारीफ का मरहम भी लगा दिया। लेकिन सियासत में एक बात बड़ी पुरानी है। तारीफ मंच पर होती है और हिसाब बंद कमरे में। अब कमलप्रेमी और मंदिर वाले अपने-अपने कैलकुलेटर लेकर बैठे हैं। कोई कह रहा है कि फटाफट जी की रवानगी तय है, तो कोई कह रहा है कि अभी खेल बाकी है। हम बस इतना जानते हैं कि बाबा की नगरी में कुर्सी भी स्थायी नहीं और चर्चा भी नहीं। इसलिए फटाफट जी रहेंगे या जाएंगे। यह फैसला हम बाबा महाकाल पर छोड़ते हैं और अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
हिम्मत है तो रोककर दिखाओ… अब कार्यकर्ता को साथ लेकर चलकर दिखाओ!
कमल मुरझाया नहीं है साहब… कहानी तो अब खिलने की शुरू हुई है। युवा कमलप्रेमी संगठन में अभी-अभी नियुक्ति हुई है। ग्रामीण इलाके की कमान नव नियुक्त मुखिया के हाथों में सौंपी गई है। नाम सामने आते ही विरोध भी हुआ, सवाल भी उठे और पिछले दो महीनों से संगठन के भीतर फुसफुसाहट भी खूब चली। लेकिन युवा नेता ने भी जवाब ऐसा दिया कि बात सीधे चुनौती तक पहुंच गई। हिम्मत है तो मेरी नियुक्ति रोककर दिखाओ। अब इसे संयोग कहें या संकल्प… नियुक्ति हो गई। यानी चुनौती देने वालों को जवाब भी मिल गया और पद भी हासिल हो गया। कमलप्रेमियों की पुरानी कहावत फिर याद आ गई जहां चाह, वहां राह… और जहां राह बंद हो, वहां जुगाड़! वैसे यह वही युवा चेहरा है, जो कभी अपने 10 नम्बरी नेताजी को बड़ी गाड़ी दिलाने के अभियान में नजर आया था। तब भी चुप ने इशारा किया था कि मामला सिर्फ गाड़ी का नहीं, आगे की सवारी का भी हो सकता है। अब लगता है गाड़ी से शुरू हुआ सफर आखिरकार पद की सीट तक पहुंच ही गया। मगर कहानी का असली सवाल अब शुरू होता है। पद हासिल करना एक बात है और अंतिम पंक्ति के कार्यकर्ता को अपने साथ लेकर चलना दूसरी। जो लोग दो महीने तक नियुक्ति पर सवाल उठाते रहे, उनमें से कुछ अब कह रहे हैं। हमने संगठन में चुप रहकर दौड़ लगाई और पद किसी और ने चुनौती और जुगड से हासिल कर लिया। बदबूदार शहर के कमलप्रेमियों की इस बात में वाकई दम है। संगठन में कार्यकर्ता सिर्फ तालियां बजाने और पोस्टर लगाने के लिए नहीं होता। उसे साथ लेकर चलना पड़ता है, उसकी बात सुननी पड़ती है और कभी-कभी उसकी नाराजगी भी सहनी पड़ती है। अब देखना यह है कि चुनौती और जुगाड़ से पद हासिल करने वाले मुखिया। उसी चुनौती वाले तेवर के साथ कार्यकर्ताओं का भरोसा भी हासिल कर पाते हैं या नहीं। क्योंकि नियुक्ति रोकना मुश्किल था… लेकिन नाराज कार्यकर्ताओं को रोककर साथ चलाना उससे कहीं मुश्किल होगा। ऐसा हम नहीं अपने बदबूदार शहर के कमलप्रेमी बोल रहे है। मगर हमकों आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
वजनदार जी का गुस्सा… सूचना के तराजू पर तौला गया वजन
वजनदार जी का वजन तो पहले से ही भारी है, लेकिन गुरुवार को गुस्से का वजन कुछ ज्यादा ही निकल आया।वीआईपी गेस्ट हाउस में पहले हाइनेस पर शब्दों का वजन डाला और फिर दालवाले नेताजी भी इसकी चपेट में आ गए। मामला दरअसल इतना भर था कि विकासपुरुष के कार्यक्रम की खबर वजनदार जी तक नहीं पहुंची। बस फिर क्या था। मन में जमा नाराजगी ने जुबान का रास्ता पकड़ लिया। मजे की बात यह कि हाइनेस ने ही फोन करके वजनदार जी को बुलाया था। यानी बुलाने वाले भी वही और खरी-खोटी सुनने वाले भी वही! वजनदार जी ने अपने दालवाले नेताजी पर शब्दों का प्रहार किया। इसके बाद वजनदार जी को अपने उज्ज्वल जी नजर आ गए। उन्होंने उसी टोन में उज्ज्वल जी से बात की, जिस टोन में हाइनेस और दालवाले नेताजी से की थी। बस फिर क्या था। अपने उज्ज्वल जी ने साफ कह दिया। “मुझसे इस टाइप से बात मत कीजिए।” यह सुनते ही अपने वजनदार का चेहरा देखने लायक था। बाद में करीब 30 मिनट की बैठक हुई। अधिकारीगण, विकास-मुखिया, हाइनेस, दालवाले नेताजी और विकासपुरुष। सब मौजूद थे। वजनदार जी ने बैठक में भी वही दर्द दोहरा दिया। “हमें बताया क्यों नहीं?” तब विकासपुरुष ने बड़ी सादगी से राज खोल दिया। कोई कार्यक्रम पहले से तय ही नहीं था। दौरा तो मैंने अचानक तय किया था। बस… इतना सुनना था कि वजनदार जी के गुस्से का तापमान अचानक सामान्य हो गया। ऐसी चर्चा वीआईपी गेस्ट हाउस से निकलकर सामने आई है। जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
कान में फुसफुसाए इंद्र जी... उम्मीद जी बोले—तुमको भी नोटिस दूं क्या?
उम्मीद जी इन दिनों प्रशासन की पिच पर ऐसे बल्लेबाजी कर रहे हैं, जैसे मैच की आखिरी गेंद हो और स्कोर बोर्ड पर लिखा हो। सिक्स नहीं तो सब बेकार! एक्शन में आए तो एक को निलंबित कर दिया, दूसरे की विभागीय जांच बैठा दी। माहौल थोड़ा गंभीर था। तभी सिंहस्थ-28 के इंद्र जी अपनी कुर्सी छोड़कर उम्मीद जी के पास पहुंचे। कान के पास जाकर कुछ फुसफुसाया। आखिर इंद्र हैं, बादलों में नहीं तो बैठकों में ही सही! अब गलियारों की चर्चा पर भरोसा करें तो शायद कान में कोई सिफारिशी मंत्र पढ़ा गया था। मगर इस बार सामने उम्मीद जी थे। मंत्र का असर होने के बजाय उल्टा असर हो गया। देखने वालों का कहना है। उम्मीद जी ने पलटकर ऐसा सवाल दागा कि फुसफुसाहट की आवाज भी बंद हो गई। “तुमको भी नोटिस जारी कर दूं क्या?” बस फिर क्या था। इंद्र जी वापस अपनी सीट पर। न बहस, न बहाना, न दूसरी फुसफुसाहट। अब यह संवाद अक्षरशः हुआ या संकुल के गलियारों ने अपनी तरफ से थोड़ा तड़का लगाया। हम नहीं जानते। लेकिन चर्चा जरूर है। और चर्चा भी ऐसी कि फाइलों से ज्यादा तेज चल रही है। उम्मीद जी की तारीफ इसलिए बनती है कि अगर कुर्सी पर बैठकर कार्रवाई करने का साहस है, तो सामने बैठे प्रभावशाली व्यक्ति के कान की फुसफुसाहट से कलम रुकनी नहीं चाहिए। क्योंकि प्रशासन में सबसे खतरनाक चीज गलती नहीं होती। गलती पर सिफारिश का साहस होता है। और अगर उम्मीद जी सचमुच उसी लास्ट बॉल वाले मूड में हैं, तो इंद्र जी हों या कोई और—नोटिस की कलम सबके लिए बराबर चलनी चाहिए। बाकी हम तो वही करेंगे जो बरसों से करते आए हैं। अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे। मगर इस बार चुप्पी के पीछे मुस्कान जरूर है। क्योंकि फुसफुसाहट के सामने पहली बार नोटिस की धमकी सुनाई दी है।
साहब की रवानगी हुई, मगर साया अभी मंदिर में तैनात है!
पहली सवारी में जो पूर्व वर्दीधारी खुद को बाबा के बाद सबसे बड़ा समझकर घूम रहे थे। अब दूसरी-तीसरी सवारी में उनका अता-पता नहीं है। लगता है रवानगी इस बार सच में स्थायी है। ई-कार्ट के चक्कर में भरतपुरी के विकास-मुखिया से भिड़ना भारी पड़ा और आखिरकार बोरिया-बिस्तर बंध ही गया। लेकिन साहब की कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उनके अंगरक्षक जी अभी मंदिर में जमे हैं। साहब बाहर हो गए, मगर उनका आदमी अंदर! यही तो असली सवाल है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि साहब भले मंदिर से दूर हो गए हों। लेकिन अंगरक्षक जी के जरिए उनका “पॉइंट” आज भी दर्शन कर रहा है। यानी कुर्सी गई, पहुंच नहीं गई! अगर पूर्व वर्दीधारी की मंदिर से विदाई हो चुकी है तो उनके अंगरक्षक को अब तक यहां किस हैसियत से रखा गया है? क्या वह बाबा की सुरक्षा में है या पुराने साहब की बची-खुची व्यवस्था संभालने में? कप्तान जी को यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन मंदिर के गलियारों में इसे लेकर सवाल बड़े हैं। रवानगी एक की हुई है तो उसके साथ जुड़ी व्यवस्थाओं की भी रवानगी होनी चाहिए। साहब को अगर बोरिया-बिस्तर बांधकर भेजा गया है। तो अंगरक्षक जी को भी बटालियन वापस भेजने में आखिर कौन-सी बाधा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि साहब चले गए, मगर उनका साया अभी भी मंदिर में ड्यूटी कर रहा है! अब कप्तान जी तय करें। ड्यूटी बाबा की है या पुराने बॉस की? क्योंकि मंदिर में सबकी नजर बाबा पर होनी चाहिए। किसी पूर्व वर्दीधारी के “पॉइंट” पर नहीं। बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
सिर झुका तो बात समझ आई... कमल के खेत में कहावतों की फसल
गुरुवार की सुबह वीआईपी गेस्ट हाउस में जो सूचना युद्ध शुरू हुआ था। वह बैठक में विकासपुरुष की मौजूदगी में भले ही शांत करा दिया गया। लेकिन कमलप्रेमियों की नाराजगी इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं थी। गुस्सा गेस्ट हाउस में रह गया और तंज हेलीपेड तक पहुंच गया। हेलीपेड पर दालवाले नेताजी ने ऐसा मुहावरा छोड़ा कि सीधे जाकर लगा। सिर बड़ा सरदार का, पैर बड़ा गंवार का। हाइनेस ने भी जवाब देने के बजाय तत्काल सिर झुका दिया। शायद सोचा होगा कि जब बात मुहावरे में हो रही है तो गर्दन भी मुहावरे के हिसाब से ही चलनी चाहिए। माहौल में हंसी थी, तभी किसी ने एक और तीर छोड़ दिया— इसके अंदर तो बहुत कुछ भरा हुआ है। अब मजाक का निशाना कौन है। यह बताने की जरूरत नहीं पड़ी। हाइनेस और दालवाले नेताजी की निगाहें एक साथ वजनदार जी पर जाकर टिक गईं। वजनदार जी भी पुराने खिलाड़ी निकले। मुस्कुराहट के बजाय सीधा पलटवार। मेरा अवलोकन करने से पहले खुद का आत्म-अवलोकन करिए। बस... इसके बाद जो खामोशी हुई, उसमें कई जवाब दफन हो गए। मजेदार बात यह कि सूचना का विवाद खत्म करने के लिए बैठक हुई थी। लेकिन विवाद का पोस्टमार्टम हेलीपेड पर भी जारी रहा। और जब मामला इतना लंबा हो गया तो विकासपुरुष ने शायद सोचा होगा। बहस से बेहतर है सबको सिंहस्थ क्षेत्र घुमा दिया जाए। कम से कम चलते-चलते सिर, पैर और वजन तीनों अपनी-अपनी जगह दिखाई तो देंगे। अब कमलप्रेमियों के इस आंतरिक मुकाबले में सवाल यह नहीं कि कौन सही है। सवाल यह है कि कौन किसे गलत साबित करने में ज्यादा वजनदार है। क्योंकि गुरुवार ने एक बात तो साफ कर दी। कमल खिल रहा हो या न खिल रहा हो, कमलप्रेमियों के बीच कहावतें खूब खिल रही हैं। अब आगे कौन किसके सिर का नाप लेता है, कौन अपने पैर की तरफ देखता है और किसका वजन फिर चर्चा में आता है—यह देखने के लिए हम फिलहाल चुप हैं। क्योंकि यहां चुप रहना ही सबसे सुरक्षित आत्म-अवलोकन है।
उज्ज्वल जी की दूरदर्शिता...
किसी पद पर बैठना अलग बात है और पद की जिम्मेदारी को दूर तक देख पाना बिल्कुल अलग। अपने उज्ज्वल जी भले ही कुर्सी पर बैठकर भी आम आदमी जैसे सहज दिखाई देते हों। लेकिन उनकी सोच को आम समझ लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। जब पूरा शहर नागपंचमी और बाबा की सवारी की व्यवस्थाओं में व्यस्त था, तब उज्ज्वल जी की नजर उस दरबार पर थी, जहां भीड़ का दबाव किसी भी वक्त व्यवस्था की परीक्षा ले सकता था— बाबा भैरव का दरबार। आजादी पर्व के पहले वहां जो अव्यवस्था सामने आई थी, वह एक संकेत था। उज्ज्वल जी ने उस संकेत को पढ़ लिया। खबर पहुंची और इंतजार नहीं हुआ। आदेश हुआ। व्यवस्था पहले, परेशानी बाद में नहीं। फिर क्या था... रात जागी और व्यवस्था आकार लेने लगी। करीब 300 बेरिकेड्स रातों-रात लगाए गए। काम की रफ्तार ऐसी कि सुबह पांच बजे तक अमला जुटा रहा। मतलब श्रद्धालुओं के पहुंचने से पहले रास्तों ने अपनी जिम्मेदारी संभाल ली। सुबह बाबा भैरव के दरबार में भीड़ उमड़ी। आस्था का सैलाब आया। लेकिन इस बार खबरों में अव्यवस्था का शोर सुनाई नहीं दिया। और प्रशासन के लिए इससे बेहतर रिपोर्ट कार्ड क्या होगा? कई बार प्रशासनिक सफलता वह नहीं होती, जिसकी तस्वीर छपे। सफलता तो वह है, जिसकी वजह से कोई अप्रिय तस्वीर बनने ही न पाए। उज्ज्वल जी ने कम से कम इस मोर्चे पर यही किया। नागपंचमी की भीड़ के बीच बाबा भैरव को नजरअंदाज नहीं किया। समस्या का इंतजार करने के बजाय पहले ही इंतजाम कर दिया। इसे केवल बेरिकेड्स लगाना कहेंगे तो बात छोटी हो जाएगी। असल बात है— भीड़ दिखाई देने से पहले भीड़ की दिशा को देख लेना। ऐसी सोच के लिए उज्ज्वल जी को साधुवाद। व्यवस्था अच्छी हो तो उसका श्रेय देना भी हमारी जिम्मेदारी है। बाकी, दूरदर्शिता पर ज्यादा कुछ कहना नहीं है और हमकों आदत के अनुसार चुप रहना हैं।
सड़क चौड़ी हो और दिल भी!
सिंहस्थ की बस में सफर तो सभी कर रहे थे। मगर अपने उम्मीद जी रास्ते से थोड़ा आगे निकल गए। जहां बाकी लोग सड़क, पुल और निर्माण देख रहे थे, वहां उम्मीद जी को कुछ और ही दिखाई दे गया। रिश्तों की संभावित चौड़ाई। कहावत है। प्रेम गली अति साँकरी। मगर राजनीति में कभी-कभी यही गली चौड़ी कराने के लिए सरकारी काम का सहारा लेना पड़ता है। अपने हाइनेस ने पहले पत्र लिखकर तीन सड़कों के चौड़ीकरण की मांग की। फिर मंच से विकासपुरुष के सामने भी वही बात दोहरा दी। अब उम्मीद जी ने इसमें भी एक शानदार संभावना खोज निकाली। उनका कहना था। “क्यों न इन तीनों सड़कों का काम हाउसिंग वाले माटसाब को ही दे दिया जाए?” सड़क का काम उनके पास जाएगा तो शायद हाइनेस और माटसाब के बीच जो राजनीतिक दूरी है, वह भी धीरे-धीरे कम हो जाएगी। मतलब योजना एकदम साफ। सड़क चौड़ी होगी, रास्ता खुलेगा और शायद रिश्तों की आवाजाही भी बढ़ेगी! वैसे उम्मीद जी की सोच में दोष निकालना मुश्किल है। आखिर वे तो विकास के काम में भी सामाजिक समरसता तलाश रहे हैं। अब सरकारी टेंडर अगर दो लोगों के बीच दूरियां कम करने लगे, तो इससे बेहतर ‘साइड इफेक्ट’ और क्या होगा? लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब फाइल चलेगी। क्योंकि राजनीति में मंच पर मुस्कान मुफ्त होती है, मगर फाइल पर हस्ताक्षर की स्याही बड़ी कीमती होती है। अब देखना यह है कि उम्मीद जी का यह फार्मूला जमीन पर उतरता है या बस बस के सफर तक ही सीमित रहता है। अगर काम मिल गया तो समझिए। सिंहस्थ में सड़कें ही नहीं, रिश्ते भी चौड़े हो रहे हैं। बाकी, उम्मीद जी की उम्मीद पर पानी न पड़े, इसी उम्मीद के साथ उनको सेल्यूट करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद..
जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी
दरवाज़े के बाहर तक भी मुंह में लुक़्मा होता था
❗अज़हर फ़राग़❗