14 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का
देख रहे हो बिनोद… चाचा की पेशी, भतीजे की मनमानी!
पाठकगण पहले स्पष्ट कर लें— यह ‘बिनोद’ कोई नया सरकारी पद नहीं है। यह पंचायत सीरीज का वही मशहूर संवाद है, जिसमें विनोद को प्यार से ‘बिनोद’ कहा जाता है। अब इसका नगर की एक कहानी से संयोग बैठ गया है। नगर में एक वर्दीधारी पदस्थ हैं। उनके भतीजे ने मंदिर आंदोलन की कमान थाम रखी है। भतीजे को समझाने-बुझाने की कोशिशें हुईं, लेकिन बात जब नहीं बनी तो चाचा जी की पेशी कप्तान साहब के दरबार तक हो गई। चाचा जी ने हाथ जोड़कर शायद यही कह दिया। साहब, हम तो समझा चुके… भतीजा किसी की नहीं सुनता। वाह रे लोकतंत्र! यहां चाचा वर्दी में हैं, कप्तान कुर्सी पर हैं और भतीजा आंदोलन की कमान में—लेकिन सुनता कोई किसी की नहीं! अब चाचा जी की मजबूरी भी समझिए। भतीजे को समझाएं तो रिश्तेदारी आड़े आती है, न समझाएं तो वर्दी सवाल पूछती है। सो बेहतर है कि इन दिनों मौके-बेमौके पंचायत का संवाद सुना दिया जाए। देख रहे हो बिनोद… शायद इस एक वाक्य में पूरी कहानी समा जाती है। कहानी में वर्दी है, आंदोलन है, कप्तान है, चाचा हैं और भतीजा भी… बस नियंत्रण नाम की चीज कहीं दिखाई नहीं देती। जिसमें हम क्या कर सकते हैं? अपनी आदत के मुताबिक चुप रह सकते हैं… और तमाशा देख सकते हैं।
दो दुनी चार’ नहीं साहब… यहां दो की चली तो चार की चूलें हिल गईं! एक बटा दो, दो बटा चार… छोटी-छोटी बातों में बंट गया संसार।
यह पुराना गीत इन दिनों देवी अहिल्या नगरी की राजनीति पर जैसे फिट बैठ रहा है। मामला महज एक नगरसेवक का नहीं, बल्कि 2 और 4 नम्बर के माननीयों की ईगो की लड़ाई का दिखाई दे रहा है। मुद्दा है प्रथमसेवक के मंत्रिमंडल में जगह का और दांव पर है दोनों खेमों की राजनीतिक प्रतिष्ठा। प्रथमसेवक भारत की धरती से उड़ान भरने से पहले ऐसा राजनीतिक विस्फोट कर गए कि 2 नम्बर के खास नगरसेवक को मंत्रिमंडल में जगह मिल गई। बस फिर क्या था। 4 नम्बर के माननीय के समर्थक धरने पर बैठ गए। हालांकि 4 की माननीय ने फिलहाल धरना उठवा दिया है। लेकिन जो संदेश ऊपर देना था, पहुंच गया है। गुस्सा उस वापसी को लेकर है, जिसे कभी घर में घुसकर दादागिरी, वायरल वीडियो और संगठन की किरकिरी के बाद बाहर का रास्ता दिखाया गया था। अब वही वापसी 2 नम्बर के माननीय की खामोश पैरवी से हो गई। सवाल यह नहीं कि वापसी हुई क्यों; सवाल यह है कि संगठन की पुरानी कार्रवाई इतनी जल्दी किसके इशारे पर बेमानी हो गई? 4 नम्बर के लिए यह सिर्फ नाराजगी नहीं, राजनीतिक पराजय का खुला संकेत है। और 2 नम्बर के लिए चुप रहकर बाजी मारने का जश्न। तभी तो देवी अहिल्या नगरी में कमलप्रेमी फिलहाल गीत गा रहे हैं। एक बटा दो, दो बटा चार… तो हम भी सुर मिलाते हैं… क्योंकि यहां राजनीति समझने से ज्यादा, गुनगुनाने लायक हो गई है। बाकी हमकों चुप रहना है।
मंदमुस्कान का कमाल: जूनियर आया और मलाईदार विभाग उसके नाम!
देवी अहिल्या नगरी की अफसरशाही में इन दिनों वरिष्ठता नहीं, साहब की पसंद ज्यादा मायने रखती नजर आ रही है। ताजा किस्सा अपने मंदमुस्कान जी के कार्यविभाजन का है। बिरादरी के जूनियर ने ज्वाइन किया और साहब ने शायद स्वागत में मिठाई का डिब्बा खोलने से पहले ही कालोनी-ड्रेनेज-स्टोर जैसे मलाईदार विभाग उसकी थाली में सजा दिए। अब स्मार्ट पंडित का क्या? वरिष्ठ होने के बावजूद विभाग हाथ से निकल गया। मजेदार यह कि जब अहिल्या नगरी में ड्रेनेज को लेकर बवाल मचा था, तब मोर्चा संभालने वाले भी यही स्मार्ट पंडित थे। यानी मुश्किल में सीनियर याद, मलाई बंटे तो जूनियर आबाद। और प्रशासनिक संयोग भी देखिए—जिनसे विभाग लिया गया और जिनको दिया गया, दोनों के नाम एक समान हैं। शायद मंदमुस्कान जी ने सोचा हो। नाम में समानता है तो विभाग में भी समानता क्यों न हो! फिलहाल स्मार्ट पंडित अवकाश पर हैं। लौटकर क्या मिलता है, यह देखने वाली बात होगी। बाकी आगे की पटकथा खजराना के गणपति लिखेंगे या राजधानी के इशारा जी—यह तो वक्त बताएगा। तब तक हम भी अपनी परंपरागत मुद्रा में अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
दूसरा घर: गिलास में सूरज ढलता था, अब ताले में शाम होती!
वर्दीधारी आपस में बतिया रहे हैं। विषय है। दूसरा घर। अंग्रेजी में इसका मतलब निकालने बैठेंगे तो बात कहीं और निकल जाएगी, इसलिए पहले ही साफ कर दें—यहां घर का मतलब ठहरने की व्यवस्था कतई नहीं है। यह तो वह ठिकाना है, जहां भोजन के अलावा बकौल मरहूम राहत इन्दौरी “सूरज नदी में डूबा और हम गिलास में” वाला इंतजाम भी मिल जाता था। कहा जाता है, दुकान अच्छी चल रही थी। ग्राहक खुश, व्यवस्था मस्त और गिलास अपनी रफ्तार से भरते थे। किसी को कोई खास तकलीफ भी नहीं थी। फिर आया 30 मौत का कांड और अचानक पेय तरल की इस दुकान पर सख्ती का मौसम आ गया। ताला पड़ गया। अब वर्दीधारी ही चर्चा कर रहे हैं कि जहां कल तक रौनक थी, वहां आज सन्नाटा क्यों है? कार्रवाई हुई, सख्ती हुई या सिर्फ माहौल बदला—यह सवाल हम नहीं पूछेंगे। क्योंकि पूछ लिया तो सवाल के साथ जवाब भी देना पड़ सकता है। वैसे दूसरा घर बंद है तो वर्दीधारियों की बातचीत जरूर चल रही है। गिलास खाली है, दुकान बंद है और कहानी अभी बाकी है। जिसे हमेशा की तरह… हम सुनते हैं, समझते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।
आनंद में दुःख: एंग्रीमैन ने संदेश क्या डाला, आश्रम में हिसाब-किताब शुरू हो गया!
बाबा की नगरी में इन दिनों एंग्रीमैन की नजर से बचना आसान नहीं। सांदीपनि मंदिर वाले रोड पर एक आश्रम है। आश्रम भी और साथ में व्यवसाय भी। बस, एंग्रीमैन की नजर पड़ी और ग्रुप पर एक संदेश तैर गया। जांच करें, सही निकले तो वसूली करें। आदेश गया तो अमल भी हुआ। नोटिस थमा दिया गया। अब नोटिस क्या गया, आश्रम के आनंद में जैसे दुःख का प्रवेश हो गया। नाम के अंत में ‘आनंद’ लगाने वाले स्वघोषित गेरुआ वस्त्रधारी अब इस वसूली से बचने के लिए इधर-उधर से फोन लगवाने की जुगत में बताए जा रहे हैं। फिलहाल फोन की घंटियां तो बज रही हैं, लेकिन राहत की घंटी सुनाई नहीं दी। वैसे एंग्रीमैन की यही खासियत है। आदेश देकर भूल जाने वालों में से नहीं हैं। मामला सही है तो वसूली होगी और गलत है तो कागज खुद अपना सच बता देंगे। यही वजह है कि शिवाजी भवन वाले भी इन दिनों थोड़ा चौकन्ने नजर आ रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि आश्रम का आनंद भारी पड़ता है या एंग्रीमैन का आदेश। हम तो बस तमाशा देख रहे हैं। और अपनी आदत के मुताबिक… चुप हो जाते हैं।
फटकार तो फटाफट, कार्रवाई पर ब्रेक!
मंदिर के गलियारों में इन दिनों एक नया सवाल घूम रहा है। फटकार मिल गई साहब, अब कार्रवाई कब मिलेगी? मामला उस वैदिक धोती का है, जिस पर फटाफट जी ने पिछले सप्ताह खुलकर नाराजगी जताई। धर्म की शिक्षा देने वाली जगह का दौरा हुआ, बातें हुईं, तेवर दिखे और वैदिक धोती को सबके सामने ऐसी फटकार मिली कि कैमरे ने भी पूरा दृश्य संभाल लिया। फटाफट जी की यह तेजी देखकर लगा था कि अब मामला सिर्फ फटकार तक सीमित नहीं रहेगा। लेकिन लगता है सरकारी फाइलों में फटाफट जी की फटकार की गति और कार्रवाई की गति अलग-अलग विभागों में चलती है। वैदिक धोती पहले भी काशन मनी कांड को लेकर चर्चा में रह चुके है। लिहाजा सवाल और बड़ा है। इतने संकेतों, इतनी नाराजगी और इतने सार्वजनिक सवालों के बाद भी यदि कार्रवाई नहीं होती तो फिर फटकार का मतलब क्या रह जाता है? फटाफट जी की एक बात की तारीफ करनी होगी। उन्होंने कम से कम देखकर बोलने की हिम्मत दिखाई। अब उम्मीद इतनी है कि जिस तेजी से धोती फटकारी गई थी, उसी तेजी से जिम्मेदारी भी तय हो। क्योंकि मंदिर प्रशासन में फटकार अगर कैमरे पर और कार्रवाई अगर फाइल में ही रहे, तो गलियारों में सवाल तो उठेंगे ही। बाकी हम क्या कहें… बस डॉ नवाज देवबंदी का शे'र याद आ रहा है। आजकल न जाने किस कश्मकश में है मुंसिफ। बहस रोज सुनते हैं, फैसला नहीं देते। अब फैसला देने का काम फटाफट जी का है। जो कि चुप है तो फिर हमारी तो आदत ही है चुप रहना।
देवता ड्यूटी पर थे, वर्दी किस ड्यूटी पर थी?
संकुल की फिजा में इन दिनों तीन पन्नों की एक चुप्पी घूम रही है। चुप्पी इसलिए कि कागज बोल रहा है और ग्रामदेवता इंतजार में हैं कि अब जवाब कौन देगा? कहानी राजसी सवारी की है। सरकारी आदेश आया, ग्रामदेवता ड्यूटी पर पहुंचे। उम्मीद थी कि व्यवस्था में लगी वर्दी रास्ता आसान करेगी। मगर शिकायत के मुताबिक सहयोग की जगह अभद्रता का प्रसाद मिला। ग्रामदेवताओं ने भी इस बार बात हवा में नहीं छोड़ी। तीन पन्नों का बाकायदा ज्ञापन दिया। साफ लिखा कि वे किसी निजी काम से नहीं, सरकारी आदेश का पालन करने पहुंचे थे। संबंधित वर्दीधारी की तस्वीर की प्रति भी साथ लगा दी। ऊपर से कई ग्रामदेवताओं के हस्ताक्षर। अर्थात मामला एक व्यक्ति की नाराजगी का नहीं, सामूहिक पीड़ा का दस्तावेज बन गया। अब असली परीक्षा कागज की नहीं, व्यवस्था की है। वर्दी का मतलब अधिकार जरूर है, मगर अधिकार के साथ व्यवहार की जिम्मेदारी भी आती है। यदि ड्यूटी निभाने पहुंचे लोगों को ही अपमान महसूस हो, तो सवाल सिर्फ व्यवहार का नहीं, वर्दी की कार्यशैली का है। अब देखना यह है कि ज्ञापन कार्रवाई की मेज तक पहुंचता है या फिर फाइलों की तीर्थयात्रा करता रहता है। तब तक जैसे ग्रामदेवतागण चुप रहकर न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वैसे ही हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रसूख की फैक्ट्री में कानून का छापा—माल मिला, मगर ‘सेटिंग’ नहीं!
सोमरस के गलियारों में इन दिनों एक कहानी बड़ी चाव से सुनाई जा रही है। कहानी में फैक्ट्री है, चर्चित उद्योगपति हैं, एक विवादित रसायन है और दो वर्दीधारी भी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वर्दी दरवाजे तक पहुंची ही नहीं, भीतर भी चली गई। नामी-गिरामी उद्योगपति की फैक्ट्री में पहुंचना अपने आप में वर्दी के लिए कोई छोटा रोमांच नहीं। खासकर तब, जब उद्योगपति की पहुंच सत्ता के गलियारों तक बताई जाती हो। मगर दो वर्दीधारी रसायन की तलाश में पहुंच गए। रसायन मिला तो प्रबंधन ने अपनी तरफ से सफाई दी। आवेदन विधिवत किया जा चुका है। कागज भी सामने रख दिए गए। बस, यहीं कहानी ने नया मोड़ ले लिया। जहां शायद किसी को ‘समझाइश’ के बाद कहानी खत्म होने की उम्मीद रही होगी, वहां कागजों ने साथ नहीं दिया तो प्रकरण दर्ज हुआ और वर्दी लौट आई। अब खुशी की वजह कार्रवाई से ज्यादा यह है कि शेर के मुंह में हाथ गया और शेर ने काटा नहीं। सवाल रसायन का जितना नहीं, उससे कहीं बड़ा वर्दी के हौसले का है। क्या कानून की वर्दी सच में रसूख की देहरी पर भी उतनी ही सीधी खड़ी रह सकती है? फिलहाल सोमरस में खुशी है… वर्दी ने शेर को छुआ है। और हमको अपनी आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
सत्ता के आईने में दो मिसरे… चेहरा किसका है?
इन दिनों संकुल से लेकर वर्दीधारी मुख्यालय तक एक शे'र खूब तैर रहा है। शे'र की खासियत यह नहीं कि वह नया है, बल्कि यह है कि जिसे सुनाया जा रहा है, वह खामोश है और जो सुन रहे हैं, वे अर्थ तलाश रहे हैं। ऊंची कुर्सियों तक इसकी गूंज पहुंचने की चर्चा है। हमने भी जिज्ञासा दिखाई तो जवाब में वही दो मिसरे सामने आ गए। तूने लड़ते हुए गाली का सहारा लिया था सुलह इंसान से करता हूँ, बेअदब से नहीं। अब सत्ता के आईने में देखिए तो मामला थोड़ा दिलचस्प हो जाता है। दफ्तर में कुर्सियां अपनी जगह हैं, वर्दियां अपनी जगह और अधिकार भी अपनी जगह… मगर शब्दों का तापमान अचानक बढ़ गया है। सवाल यह नहीं कि शे'र किसने कहा। सवाल यह है कि सत्ता के गलियारे में इसे सुनकर किसने अपना आईना साफ करना शुरू कर दिया? सरकारी दफ्तरों में फाइलें आमतौर पर नोटशीट पर बोलती हैं, आदेशों में जवाब देती हैं और कार्रवाई में अपना अर्थ समझाती हैं। मगर यहां मामला उलटा है। फाइलें खामोश हैं और शे'र बोल रहा है। शायद यही सत्ता का नया व्याकरण है। बात सीधे कहने का साहस न हो तो दो मिसरे काफी हैं। मामला क्या है, किसकी तरफ इशारा है। हम नहीं जानते। आईना सामने है… चेहरा जो चाहे पहचान ले। क्योंकि हम तो अपनी आदत के मुताबिक चुप रहेंगे।
हाइनेस का फरमान: शपथ लो, सवाल मत पूछो!
हाइनेस ने मंच संभाला तो लगा जैसे शहर की सड़कों का नक्शा नहीं, व्यापारियों की तकदीर पढ़ी जा रही हो। माइक हाथ में आया और फरमान निकला। सड़क चौड़ी होगी और व्यापारी सहयोग की शपथ लेंगे। आखिर प्रस्ताव हाइनेस ने शासन को दिया है, इसलिए शायद अगला चरण यही बचा था कि जिनकी दुकानें हैं, उन्हीं से उसकी मंजूरी की शपथ भी ले ली जाए। मगर व्यापारी भी इस बार स्क्रिप्ट पढ़कर नहीं आए थे। शपथ के लिए उठने वाले हाथ सवाल पूछने लगे। हाइनेस के बयान में जितना आत्मविश्वास था, व्यापारियों के सवालों में उससे कहीं ज्यादा वजन निकला। फिर जो होना था, वह हुआ। सड़क चौड़ी होने से पहले ही मंच खाली हो गया। हाइनेस निकल लिए और एंग्रीमैन भी प्रोटोकॉल की मर्यादा निभाते हुए साथ हो लिए। पीछे रह गए व्यापारी, उनके सवाल और एक ऐसा बयान, जिसकी गूंज अब पूरे व्यापार जगत में सुनाई दे रही है। शायर फैज़ जौनपुरी का शेर मानो इसी मौके के लिए लिखा गया हो बस्ती में तुम खूब सियासत करते हो, बस्ती की आवाज़ उठाओ तो जाने। हुजूर! सियासत में बयान देना आसान है, मगर उसी बयान पर जनता से सवाल सुनना। असल इम्तिहान है। और जब जनता सवाल पूछने लगे, तो मंच नहीं छोड़ना चाहिए… मंच पर ठहरकर जवाब देना चाहिए। बाकी हम क्या कह सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद...
रहता है सुकरात कोई मेरे अंदर।
जहर को भी सौगात समझ लेता हूँ मैं।
वरुण आनंद