17 अगस्त 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
वर्दी का भी अपना प्रसाद...!
बाबा कालभैरव के दरबार में सोमरस चढ़ता है, यह आस्था है। मगर सोमरस चढ़ने के बाद बोतल का आगे का सफर क्या है, यह सवाल अब आस्था से ज्यादा व्यवस्था से जुड़ गया है। बिक्री पर रोक लगी तो श्रद्धालु बाहर से बोतल लाने लगे। जो चढ़ता है, उसमें से कितना बाबा के चरणों में रहता है और कितना किसी के ‘चरणों’ तक पहुंचता है, इसका हिसाब शायद बाबा ही जानते हैं।पिछले सप्ताह चुप ने एक माननीय के निज सचिव के तीन बोतल वाले किस्से को सामने रखा था। बोतलें वापस हो गईं, मामला शांत हो गया। लेकिन सूत्र अब एक और कहानी सुना रहे हैं—इस खेल में वर्दी भी पीछे नहीं है। कहते हैं, रोज वर्दीधारी भी बोतल लेकर जाते हैं। अब वर्दी देखकर कौन पूछे कि बोतल किसके लिए है? आखिर वर्दी की अपनी ‘इज्जत’ होती है... और बाबा कालभैरव के दरबार में तो हर कोई भक्त है! फर्क बस इतना है कि आम भक्त प्रसाद चढ़ाकर लौटता है और कुछ खास भक्त शायद प्रसाद झोले में लेकर लौटते हैं अब सवाल यह नहीं कि बोतल कौन ला रहा है। सवाल यह है कि बाबा के नाम पर आने वाले प्रसाद का हिसाब कौन रख रहा है।अब हम ठहरे अदने कलमकार।अगर हम वर्दी से सवाल करेंगे तो शायद कानून-व्यवस्था बिगड़ जाए, और चुप रहेंगे तो सोमरस की व्यवस्था बनी रहेगी! तो हमारा चुप रहना ही हमारे हित में होगा।
उपनिरीक्षक की डिमांड...!
शीर्षक पढ़कर पहली नजर में लगेगा कि कोई वर्दीधारी उपनिरीक्षक किसी से हल्के हरे रंग की डिमांड कर रहा है। लेकिन ठहरिए... मामला उलटा है। दरअसल बाबा कालभैरव मंदिर में चल रहे दर्शन और सोमरस के कथित खेल पर अंकुश लगाने के लिए एक उपनिरीक्षक की डिमांड हो रही है। ऐसी डिमांड, जो मंदिर के कर्मचारियों की तरफ से बताई जा रही है। कहा जाता है कि साहब का मंदिर में आगमन होते ही दलालों की दुकानदारी सिमट जाती है। वजह साफ है—साहब बाबा के भक्त हैं और मंदिर की व्यवस्था को लेकर खासे गंभीर। कोई दलाल हत्थे चढ़ गया तो फिर उसकी ‘काउंसलिंग’ कुछ ऐसी होती है कि वह उठते-बैठते वर्दी को याद करता है। यही वजह है कि साहब के आने की खबर मिलते ही दर्शन की दलाली करने वाले ऐसे गायब होते हैं, जैसे बाबा ने खुद अदृश्य होने का आशीर्वाद दे दिया हो। मंदिर कर्मचारियों की मांग है कि विकासपुरुष और कप्तान जी इस उपनिरीक्षक को मंदिर के प्रोटोकॉल में तैनात करें। अगर ऐसा हो गया तो मुफ्त के सोमरस के शौकीनों और दर्शन की दलाली करने वालों। दोनों को शायद अपनी-अपनी दुकान समेटनी पड़े। अब फैसला विकासपुरुष और कप्तान जी को करना है...ओर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।
पांच मिनट का देशभक्ति वाला प्यासा पल...!
15 अगस्त। झंडावंदन हो चुका था। मंच पर प्रभारी बाऊ जी, कप्तान और उज्ज्वल जी विराजमान थे। सामने देशभक्ति का माहौल था और पीछे व्यवस्था की असली तस्वीर अपना परिचय दे रही थी। अचानक उज्ज्वल जी मंच के पीछे पहुंचे और पानी मांगा। बस... यहीं से व्यवस्था की परीक्षा शुरू हो गई। पानी की बोतल तो शायद मंच के पीछे कहीं थी, मगर उसे खोजने के लिए ऐसी मुहिम चली कि लगा जल जीवन मिशन का कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू हो गया हो। कोई इधर दौड़ा, कोई उधर। पानी तलाशने वालों की सक्रियता देखते ही बनती थी और उज्ज्वल जी? वे बिल्कुल शांत। शायद सोच रहे होंगे—आजादी तो 79 साल पहले मिल गई थी, पानी की आजादी कब मिलेगी? करीब पांच मिनट बाद आखिरकार पानी हाजिर हुआ। गला तर हुआ और व्यवस्था ने राहत की सांस ली। अब सवाल यह नहीं कि पानी पांच मिनट देर से क्यों मिला। सवाल यह है कि जिस मंच पर जिले के बड़े अफसर मौजूद हों, वहां एक बोतल पानी भी ‘खोज अभियान’ के बाद मिले तो इसे व्यवस्था कहें या व्यवस्था की रिहर्सल? खैर, 15 अगस्त था। देश आजाद है... पानी भी आखिरकार आजाद होकर उज्ज्वल जी तक पहुंच ही गया।और जिन्होंने यह नजारा देखा उन्होंने हमकों सुना दिया ओर हमने अपनी आदत के अनुसार चुप रहकर किस्सा आपको सुना दिया।आपने भी पढ़ लिया। तो थोड़ा मुस्कुराते हुए हमारी तरह चुप हो जाइए।
शीतयुद्ध में अचानक ‘सीजफायर’...!
दाल-बिस्किट वाली तहसील में काफी दिनों से चल रही मैडम बनाम एसडीएम की अंदरूनी जंग अब शायद सीजफायर के दौर में पहुंच गई है। गोली चली या नहीं। लेकिन खबरें जरूर चल रही थीं। आखिरकार अपने उज्ज्वल जी को भी लगा होगा कि यह मुकाबला अब विभागीय फाइलों से निकलकर सार्वजनिक मनोरंजन का विषय बनता जा रहा है। पिछले सप्ताह दोनों को दोपहर बाद संकुल में बुलाया गया। गलियारों में कानाफूसी शुरू हुई और बाहर निकलते-निकलते चर्चा ने पूरा घटनाक्रम भी तैयार कर लिया। मानें तो जमीन कांड में उलझी लालची मैडम और एसडीएम को साफ-साफ समझा दिया गया—एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना बंद करो। मीडिया में खबरें बंद होनी चाहिए। अंदर कितनी गर्मी थी, इसका अंदाजा बाहर निकले चेहरों से लगाया गया। दोनों के चेहरे बता रहे थे कि कमरे में मौसम विभाग की जरूरत नहीं पड़ी होगी! लेकिन कहानी में एक और दिलचस्प दृश्य पहले ही आ चुका था। कुछ दिन पहले लालची मैडम न्यायदेवता के दरबार में अपने समकक्ष दो अधिकारियों के साथ बेहतर वकील की तलाश में घूमती दिखाई दी थीं। मतलब मामला केवल कार्यालय की नाराजगी तक सीमित है या आगे अदालत की चौखट तक जाएगा।तभी तो मैडम जी इसकी तैयारी में लग गई हैं । अब असली परीक्षा है ‘सीजफायर’ की उम्र कितनी है। क्या दोनों पक्ष सच में शांति समझौते पर अमल करेंगे? क्या मीडिया को मिलने वाला मसाला बंद हो जाएगा? या फिर कुछ दिनों की खामोशी के बाद तहसील में फिर वही पुराना ‘शीतयुद्ध—भाग दो’ शुरू होगा? फिलहाल तो उज्ज्वल जी ने घंटी बजा दी है। दोनों पक्ष शांत हैं। लेकिन राजनीति और प्रशासन की दुनिया में खामोशी हमेशा शांति की निशानी हो—यह जरूरी नहीं। तब तक हम भी अपनी पुरानी परंपरा निभाते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
काफिला वही, एक गाड़ी गायब...!
विकासपुरुष के आने की खबर हो और सड़क पर गाड़ियों की कतार न दिखे—ऐसा कैसे हो सकता है? स्वागत से लेकर रवानगी तक काफिला पूरा अनुशासन निभाता है। सरकारी वाहन अपनी जगह, निजी वाहन अपनी जगह और साहब के पीछे चलने वाली गाड़ियों का अपना रुतबा। लेकिन इस काफिले में एक गाड़ी की गैरमौजूदगी अब चर्चा का विषय है। यह कोई आम गाड़ी नहीं, बल्कि वर्दी वाले उस विभाग की गाड़ी है, जिसे बड़े अधिकारियों और महत्वपूर्ण दौरों में सुरक्षा व्यवस्था की आंख-कान माना जाता है। आम आदमी इसे भले ही ‘सरकारी जासूसी विभाग’ कह दे, लेकिन इसकी मौजूदगी का मतलब ही है—जो नजर सामने नहीं आ रही, उस पर भी नजर रहे। मगर मुख्यालय के गलियारों में कहानी कुछ और ही सुनाई दे रही है। कहते हैं, गाड़ी दौड़ाने से पेट्रोल खर्च होता है। इसलिए शायद ‘मितव्ययिता अभियान’ के तहत उसे काफिले से ही बाहर कर दिया गया! अब इसे दूरदर्शी बचत कहें या सुरक्षा व्यवस्था का नया गणित—समझना पाठकों का काम है। वैसे हिसाब बड़ा आसान है। एक दौरा... एक गाड़ी... इतने किलोमीटर... इतना पेट्रोल... और साल में इतने दौरे... बस जोड़ते जाइए। अगर हिसाब कहीं बहुत बड़ा निकल आए तो हमें भी बताइएगा। आखिर बचत का मॉडल सफल हुआ या सुरक्षा का बजट बचाया गया, यह जानने का हक तो जनता को भी है। और हां, अगर कभी काफिले में वह गायब गाड़ी अचानक दिखाई दे जाए तो समझ लीजिएगा—या तो पेट्रोल महंगा हो गया है, या फिर सुरक्षा की कीमत बचत से ज्यादा समझ में आ गई है! फिलहाल सवाल हमारे पास है, हिसाब पाठकों के पास। आप जोड़ते रहिए... तब तक हम अपनी आदत के मुताबिक चुप हो जाते हैं।
लड्डू मीठे थे, मगर कमलप्रेमियों को कड़वे लगे...
आजादी दिवस पर स्कूली बच्चों के साथ भोजन की परंपरा निभाई जा रही थी। बाऊजी, उज्ज्वल जी, कप्तान जी, फटाफट जी, जंगल के मुखिया और अपने हाइनेस सहित तमाम अफसर भोजन पर विराजमान थे। थालियां लग चुकी थीं और देशभक्ति के बीच भोजन का दौर चल रहा था। तभी अपने दालवाले नेताजी की एंट्री हुई। नेताजी सीधे अपने खासमखास विकास उपाध्यक्ष की थाली में जा बैठे। दो-चार निवाले लिए और करीब पांच मिनट बाद उठ खड़े हुए। लगा कि नेताजी का भोजन पूरा हो गया। लेकिन असली कार्यक्रम तो अभी बाकी था। नेताजी ने एक-एक कर मौजूद अफसरों को अपने हाथों से लड्डू खिलाए। लड्डू खाए गए, मुस्कुराहटें बंटी और नेताजी भी तत्काल वहां से निकल लिए। बस फिर क्या था... कुछ कमलप्रेमियों की भौंहें तन गईं और संगठन की फुसफुसाहटों में अचानक फिल्म आंखें का गीत सुनाई देने लगा— गैरों पे करम... अपनों पे सितम... अब सवाल यह नहीं कि नेताजी ने अफसरों को लड्डू क्यों खिलाए। सवाल यह है कि जिन लड्डुओं में मिठास थी, वही कुछ कमलप्रेमियों को इतने कड़वे क्यों लगे? क्या उन्हें नेताजी का अफसरों के प्रति उमड़ा प्रेम पसंद नहीं आया? या फिर शिकायत यह है कि लड्डू की मिठास कुछ खास लोगों तक ही क्यों पहुंची? इसका जवाब कमलप्रेमियों के पास जरूर होगा। मगर वे बोलेंगे नहीं। आखिर संगठन की राजनीति में कई बार चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। और फिर हमारा क्या... जो दिखा, वही लिखा। जो समझ आया, उतना ही लिखा। बाकी... हम अपनी पुरानी आदत के मुताबिक चुप रहेंगे।
तीसरे माले पर बजी ‘आजादी की घंटी’!
संकुल की तीसरी मंजिल इन दिनों कुछ ज्यादा ही गुलजार है। चेहरे खिले हैं, बातचीत में मिठास है और कमरों के भीतर माहौल ऐसा है, जैसे कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। वजह पूछिए तो जवाब मिलेगा। उम्मीद जी ने कोई इनाम नहीं बांटा है, बल्कि 6 फुटिया रिटायर हो गया है। 6 फुटिये के सेवाकाल की अपनी ही कहानी थी। काम से ज्यादा चर्चा, चर्चा से ज्यादा चुगली और चुगली से ज्यादा दूसरों के खिलाफ शिकायतें। अफसरों के कानों तक मंतर पहुंचाना उसकी विशेष योग्यता मानी जाती थी। कौन किससे मिला, किसने क्या कहा और किसका क्या बिगाड़ा जा सकता है। इन सबका हिसाब मानो उसके पास चलता-फिरता रजिस्टर था। तीसरे माले के कर्मचारियों में तो एक कहावत चल पड़ी थी। जिस दिन तीन-चार कर्मचारियों का बुरा नहीं हुआ, समझो 6 फुटिये का दिन अधूरा रह गया। मगर उसकी सबसे बड़ी शिकायत शायद यही रही कि जिस उम्मीद जी के कानों तक वह अपनी बातें सबसे ज्यादा पहुंचाना चाहता था, उन्होंने उन बातों को उतनी गंभीरता से लिया ही नहीं। लिहाजा 6 फुटिया अपनी सेवा पूरी करता रहा और तीसरे माले के लोग उसकी विदाई की तारीख गिनते रहे। फिर पिछले महीने वह शुभ मुहूर्त भी आ गया। सरकारी सेवा खत्म हुई और तीसरे माले पर मानो अनौपचारिक ‘राहत दिवस’ मन गया। न कोई बैंड बजा, न कोई आतिशबाजी हुई... लेकिन चेहरों की चमक ने सब कुछ कह दिया। अब सवाल यह नहीं कि 6 फुटिया चला गया। सवाल यह है कि उसके जाने के बाद तीसरे माले पर इतनी शांति क्यों है? इस सवाल का जवाब हम जानते हैं...। मगर जवाब देने की अपनी कोई मजबूरी नहीं। खुशी आपकी, राज आपका... और हमारी आदत बस हम चुप रहेंगे।
किताब वजनदार, लेखक उससे भी वजनदार!
कमलप्रेमियों की महफिल में इन दिनों एक सवाल धीरे-धीरे आकार ले रहा है। किताब तो आ गई, मगर लिखी किसने है? किताब के कवर पर नाम अपने वजनदार जी का है। विषय है चाणक्य नीति और संदर्भ हैं आज के राजनीतिक चाणक्य यानी मोटा भाई। अब इससे ज्यादा राजनीतिक वजन किसी किताब में और क्या होगा! मगर असली कहानी किताब से ज्यादा उसके लेखक को लेकर है। कमलप्रेमी खुलकर कुछ कह नहीं रहे, बस दबी जुबान में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। वजनदार जी और लेखक... कनेक्शन कुछ समझ आया? कुछ पुराने परिचित तो नाम देखकर ऐसे चौंके, जैसे वजनदार जी ने अचानक कलम उठाकर राजनीति छोड़ साहित्य साधना शुरू कर दी हो। सवाल यह भी है कि चाणक्य नीति पर किताब लिखने के लिए चाणक्य को पढ़ना जरूरी है या सिर्फ राजनीति को करीब से देखना काफी है? हालांकि किताब छप गई है, नाम छप गया है और अब लेखक भी मानना ही पड़ेगा। आखिर छपी हुई किताब से बड़ा प्रमाण भी क्या होगा! वैसे कमलप्रेमियों की जिज्ञासा अपनी जगह है और वजनदार जी की उपलब्धि अपनी जगह। लेखक कौन है, कलम किसकी चली और विचार किसके हैं—इसका खुलासा शायद किताब के अगले संस्करण में हो जाए! तब तक हम भी ज्यादा खोजबीन के फेर में नहीं पड़ेंगे। तब तक वजनदार जी को साहित्यिक अवतार की बधाई... और सवालों को फिलहाल सवाल ही रहने देते हैं। और अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
छुट्टी में भी हाजिरी... मंद-मुस्कान का कमाल!
देवी अहिल्या की नगरी में इन दिनों एक अनोखी प्रशासनिक व्यवस्था चल रही है। यहां छुट्टी का मतलब छुट्टी नहीं, बल्कि स्थान बदलकर ड्यूटी करना हो गया है। और इस नई परंपरा के सूत्रधार हैं अपने मंद-मुस्कान जी। नगरीय क्षेत्र के प्रमुख पद पर बैठे मंद-मुस्कान जी से मातहत वैसे तो काम को लेकर कोई बड़ी शिकायत नहीं करते। असली परेशानी है उनके फोन प्रेम से। मातहत ने छुट्टी ली नहीं कि साहब का फोन शुरू। शादी में गए हैं—फोन। सगाई में हैं—फोन। पिता की तबीयत खराब है और घर पहुंचे हैं—फोन। यानी छुट्टी चाहे किसी भी कारण से हो, साहब की नजर में मातहत की उपलब्धता अनिवार्य है। मातहत बेचारा सोचता है कि कम से कम छुट्टी के दिन तो मोबाइल शांत रहेगा। लेकिन मोबाइल की घंटी शायद साहब के कार्यालय से ज्यादा तेज बजती है। हर घंटे फोन... हर घंटे पूछताछ... और छुट्टी का पूरा आनंद ‘सरकारी कॉल’ के साथ! अब मातहतों के बीच एक नई कहावत चल पड़ी है— “छुट्टी हमारी, चिंता साहब की और नींद मोबाइल की उड़ती है।” मजेदार बात यह कि जब मंद-मुस्कान जी खुद छुट्टी पर जाते हैं तो सरकारी फोन बंद! यानी साहब की छुट्टी में नेटवर्क भी विश्राम करता है और मातहत की छुट्टी में नेटवर्क ही सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। मातहतों की शिकायत जायज है या नहीं, यह तो बड़े साहब जानें। मगर इतना जरूर है कि इस व्यवस्था ने छुट्टी और ड्यूटी के बीच की सीमा जरूर मिटा दी है। अब हम क्या कहें? साहब की मुस्कान बनी रहे, मातहतों का मोबाइल बजता रहे... और हम अपनी आदत के मुताबिक चुप रहें।
प्रोटोकॉल भी छुट्टी पर था क्या...?
आजादी पर्व पर तिरंगा तो शान से लहराया, लेकिन संकुल के गलियारों में एक दूसरा सवाल भी हवा में तैरता रहा। इस बार प्रोटोकॉल का झंडा आखिर किसने उतार दिया? सालों से परम्परा रही है। जिले के मुखिया पहले अपने निवास पर तिरंगा फहराते हैं, फिर संकुल पहुंचते हैं। बंगले से संकुल तक सम्मान के साथ लाने की जिम्मेदारी नगर एसडीएम की होती है। संकुल में भी अपर कलेक्टर स्तर के अधिकारी द्वारा अगवानी की परम्परा रही है। यानी व्यवस्था पहले से तय है, चेहरे भी तय हैं और जिम्मेदारी भी। मगर इस बार उज्ज्वल जी संकुल पहुंचे तो न अट्टू जी दिखे, न श्वेत केशधारी अपर कलेक्टर। संकुल में मौजूद लोगों के बीच यही चर्चा थी कि आखिर प्रोटोकॉल की इस अहम कड़ी को किसने हल्के में लिया? दिलचस्प बात यह रही कि जिनके लिए प्रोटोकॉल का पालन होना था, उन्होंने खुद प्रोटोकॉल निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उज्ज्वल जी परम्परा के मुताबिक उम्मीद जी को भी उस स्थान तक लेकर गए, जहां तिरंगा फहराया जाना था। यानी जिसे प्रोटोकॉल निभाना था, वह गायब... और जिसे प्रोटोकॉल मिलना था, वही प्रोटोकॉल निभाता नजर आया! संकुल के गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कोई इसे महज संयोग बता रहा है तो कोई जिम्मेदार अधिकारियों की गंभीर चूक। सवाल यह भी है कि अगर आजादी पर्व जैसे महत्वपूर्ण सरकारी आयोजन में प्रोटोकॉल की व्यवस्था ही ढीली पड़ जाए, तो बाकी मौकों पर व्यवस्था का भरोसा कैसे किया जाए? परम्पराएं सिर्फ इसलिए नहीं बनतीं कि उन्हें हर साल दोहराया जाए। वे इसलिए बनती हैं कि व्यवस्था की गरिमा बनी रहे। अब सवाल सीधा है— परम्परा टूटी या प्रोटोकॉल तोड़ा गया? जिम्मेदारी से दूरी बनी या जिम्मेदार ही दूर रहे? संकुल चर्चा कर रहा है... हम सिर्फ इतना कहेंगे। तिरंगा तो ऊंचा लहरा रहा था, मगर प्रोटोकॉल की लाज इस बार कुछ झुकी-झुकी सी नजर आई। बाकी फैसला पाठकगण करें। तब तक हम अपनी आदत के मुताबिक चुप ही रहेंगे।
वंदेमातरम्... तीन पदों की देशभक्ति!
15 अगस्त का मंच सजा था। तिरंगा शान से लहरा रहा था। माहौल देशभक्ति का था और फिर शुरू हुआ—वंदेमातरम्। पहले पद पर होंठ चले, दूसरे पर जोश कायम रहा और तीसरे तक आते-आते कमलप्रेमियों से लेकर अफसरों तक अधिकांश की आवाजें लगभग ‘ऑफलाइन’ हो गईं। चौथा पद आया तो मंच पर एक ही व्यक्ति के होंठ हिलते दिखे।अपने प्रभारी बाऊजी के।बाऊजी गाते रहे और बाकी चेहरे शायद मन ही मन सोचते रहे—आगे के बोल थे क्या? वैसे इसमें ‘चुप’ भी शामिल है। तीन पद तक हमारी देशभक्ति भी पूरी तरह सक्रिय थी, उसके बाद हमने भी ईमानदारी से श्रोता बनना बेहतर समझा। कहते हैं, वंदेमातरम् गुलामी के दौर में आजादी का तराना था। अंग्रेजों के जमाने में इसे गाना तक अपराध माना जाता था। आजादी के 80 वर्षों बाद स्थिति यह है कि गीत पूरा मौजूद है, मगर याद आधा ही है।हां, शाखा जाने वालों को पूरा गीत याद है। इसका प्रमाण मंच पर भी मिल गया। यानी जिन्हें नियमित अभ्यास की आदत है, उनकी याददाश्त ने देशभक्ति को तीन पदों पर नहीं रोका।इस बार शासन के निर्देश पर पहली बार 15 अगस्त के कार्यक्रम में वंदेमातरम् शुरुआत में और बाद में जन-गण-मन गाया गया।कार्यक्रम खत्म होने से पहले।और कार्यक्रम खत्म होने पर भी यही हुआ।ऐसा 80 साल में पहली दफा हुआ है।जिसके बाद चर्चा है कि अगली बार शायद 26 जनवरी तक अधिकारियों और कमलप्रेमियों को भी पूरा वंदेमातरम् याद हो जाए।जिसके लिए 'चुप’ की ओर से अग्रिम शुभकामनाएं।बाकी, अगली बार चौथा पद शुरू होते ही कितने होंठ चलते है।‘चुप’ की नजर वहीं रहेगी। तब तक हम भी वंदेमातरम को याद कर लेंगे। बाकी हम आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।
मेरी पसंद
इस कदर बुनी है रंगे जिस्म की।
एक नस
टस से मस…
और बस।
अम्मार इकबाल की ये पंक्तियां पढ़कर लगता है, जैसे किसी ने जिंदगी की पूरी हकीकत चंद शब्दों में लिख दी हो। हम उम्रभर न जाने कितनी चीजों के पीछे भागते रहते है। कल के सपने, आने वाले दिन की योजनाएं, जमा की हुई खुशियां… और भूल जाते हैं कि जिस सांस के भरोसे कल की तैयारी कर रहे हैं, उस सांस की कोई गारंटी नहीं। शरीर के भीतर दौड़ती एक छोटी-सी नस।जरा-सी हलचल। और इंसान की सारी व्यस्तताएं, सारे शिकवे, सारे अहंकार वहीं थम सकते हैं। इसलिए जिंदगी को कल पर मत छोड़िए। अपनों से प्यार है तो कह दीजिए |किसी से नाराज हैं तो माफ कर दीजिए। किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं तो आज ही ला दीजिए। क्योंकि वक्त लौट सकता है, इंसान लौट सकता है। लेकिन बीती हुई सांस कभी वापस नहीं आती। आखिर में सब कुछ उसी के हाथ में है, जिसने हमें यह सांस दी है। बाबा भोलेनाथ सब पर कृपा करें। हर घर में सुख रखें, हर दिल को सुकून दें और हमारी आखिरी सांस तक अपनों का साथ बनाए रखें। क्योंकि जिंदगी लंबी मिले, यह हमारे हाथ में नहीं… मगर जितनी मिले, वह प्रेम से भरी हो। यह जरूर हमारे हाथ में है। हर हर महादेव। बाकी तो हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।