06 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
हाइनेस की आवाज...
काफी अरसे बाद अपने हाइनेस की आवाज फिर सुर्खियों में है। जनता को भी बरबस करीब चार दशक पुरानी फिल्म मेरी आवाज सुनो याद आ गई। फर्क सिर्फ इतना है कि उस फिल्म में देशभक्ति और अपराध के खिलाफ लड़ाई थी, जबकि यहां लड़ाई करप्शन के खिलाफ बताई जा रही है।हाइनेस ने सार्वजनिक मंच से भ्रष्टाचार पर जमकर स्वर बुलंद किए। भाषण में तेवर भी थे, शब्दों में तल्खी भी और संदेश भी साफ था। लेकिन असली दिलचस्पी भाषण में नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू हुई फुसफुसाहट में है। हैरानी की बात यह है कि सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही कमलप्रेमी उठा रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि यह आवाज आखिर कितनी दूर जाएगी? कहीं यह भी पिछली बार की तरह दो कदम आगे... चार कदम पीछे वाली पटकथा तो नहीं? सियासत में आवाज उठाना कठिन नहीं, उसे अंत तक निभाना कठिन होता है। इसलिए अब सबकी निगाहें शब्दों पर नहीं, कदमों पर हैं। अगर आवाज के बाद कार्रवाई हुई तो इसे परिवर्तन का शंखनाद माना जाएगा। और अगर फाइलों की धूल में यह स्वर भी दब गया, तो जनता इसे भाषण कला का एक और सफल प्रदर्शन मानकर आगे बढ़ जाएगी। तब तक जैसे कमलप्रेमी चुप है, हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मोर्चों की पर्ची किसके नाम..?
कमलप्रेमियों के बीच इन दिनों न कोई वैचारिक बहस है, न संगठन विस्तार की चिंता। सबसे बड़ा मुद्दा सिर्फ एक है—मोर्चों की सूची आखिर निकलेगी कब? सात में से एक मोर्चे की घोषणा कर संगठन ने ऐसा सस्पेंस बना दिया है कि बाकी दावेदार रोज सुबह उम्मीद का मोबाइल चार्ज करते हैं और शाम तक उम्मीद डिस्चार्ज हो जाती है। चर्चा है कि अनुसूचित जाति मोर्चे की नियुक्ति से हाइनेस का खाता खुल चुका है। अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि विकासपुरुष की पर्ची कब खुलेगी। राजधानी की ओर इतनी उम्मीद से देखा जा रहा है, मानो वहां से नियुक्ति नहीं, अमृत वर्षा होने वाली हो। युवा मोर्चे में प्रिंस लोदवाल और नितिन सेन के समर्थक अपने-अपने नेता को लगभग तय घोषित कर चुके हैं। पिछड़ा मोर्चे में घनश्याम राठौड़ और पुष्कर यादव के नाम चाय की हर टेबल पर मौजूद हैं। महिला मोर्चे में नीना चौहान का नाम सबसे ज्यादा सुनाई दे रहा है। अल्पसंख्यक और अजजा मोर्चे के नाम अभी भी ऐसे सुरक्षित हैं कि शायद उन्हें लिखने वाली कलम भी गोपनीयता की शपथ लेकर बैठी है। दिलचस्प बात यह है कि सूची से ज्यादा चर्चा उन लोगों की है, जो खुद को सूची में मान चुके हैं। समर्थकों ने तो बधाइयों के मसौदे भी तैयार कर रखे हैं, बस राजधानी से सेंड बटन दबने का इंतजार है। अब देखना यह है कि संगठन पहले मोर्चों की घोषणा करता है या दावेदार अगली नियुक्ति की नई तारीख खुद तय कर लेते हैं। तब तक राजनीतिक पारा भी गर्म रहेगा, मोबाइल भी व्यस्त रहेंगे और राजधानी की ओर उठती निगाहें भी...तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रिटायरमेंट तो हो गया... मगर आदेश अभी भी जारी हैं!
अपना पढ़ाने-लिखाने वाला विभाग भी कमाल का है। यहां कभी किसी की सेवा दो साल बढ़ जाती है, तो कभी रिटायरमेंट के बाद भी साहब का प्रशासनिक अवतार खत्म होने का नाम नहीं लेता। विभाग के एक अधिकारी पिछले महीने विधिवत सेवानिवृत्त हो चुके हैं। मातहतों ने उन्हें उनके कार्यकाल में प्यार से विभाग की बीमार की उपाधि दे रखी थी। सबको उम्मीद थी कि रिटायरमेंट के साथ यह बीमारी भी खत्म हो जाएगी। लेकिन लगता है यह बीमारी सरकारी सेवा से नहीं, स्वभाव से जुड़ी है। नियम साफ कहते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी अधिकारी को आदेश या निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं रहता। लेकिन साहब को शायद नियमों से ज्यादा अपने निर्देशों पर भरोसा है। तभी तो 2 जुलाई को विभाग के सोशल मीडिया ग्रुप में एक-दो नहीं, पूरे 10 निर्देश एक साथ परोस दिए। अब मातहत असमंजस में हैं—साहब वास्तव में रिटायर हुए हैं या चुपचाप सेवा विस्तार भी मिल गया? यदि नहीं मिला, तो फिर इन आदेशों की वैधानिक हैसियत क्या है? और यदि मिला है, तो विभाग ने इसकी जानकारी किससे छिपा रखी है? फिलहाल विभाग में कोई कुछ बोल नहीं रहा। सब खामोश हैं। आखिर सरकारी नौकरी में कई बार सबसे सुरक्षित जवाब यही होता है।चुप रहो, नौकरी करो। तो हम भी चुप हो जाते हैं।
एक आईएएस ऐसे भी थे...
कृपया शीर्षक में लिखे "थे" का अर्थ गलत न निकालिए। साहब पूरी तरह सक्रिय हैं और इन दिनों राजधानी में एक अच्छे-खासे "कमाऊ" विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। "थे" का संबंध केवल पुराने किस्से से है। याद इसलिए आ गई क्योंकि हाल ही में अपने उज्ज्वल जी को मिले सम्मान की तस्वीरें सामने आईं। राष्ट्रीय स्तर का सम्मान था, मंच भी बड़ा था, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह रही कि तस्वीरों में किसी को छोटा-बड़ा साबित करने की कोशिश नहीं हुई। जूनियर हों या टेसू जी, किसी की मौजूदगी से साहब को कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन कुछ साल पहले ऐसा ही एक राष्ट्रीय पुरस्कार लेने एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दिल्ली पहुंचे थे। जो बाबा की नगरी में उस समय पदस्थ थे । उनके साथ में एक जूनियर आईएएस भी थे। पुरस्कार ग्रहण करते समय दोनों की साझा तस्वीर जारी हुई। दिनभर सब सामान्य रहा। लगा कि प्रशासन में वरिष्ठता के साथ सहजता भी है।
फिर रात हुई... और कहानी बदल गई।
बताया जाता है कि वरिष्ठ साहब ने आग्रह किया कि साझा तस्वीर में से जूनियर आईएएस को क्रॉप कर केवल उनकी तस्वीर प्रकाशित की जाए। यानी पुरस्कार भले सामूहिक माहौल में मिला हो, लेकिन सुर्खियां अकेले ही बटोरनी थीं। इधर उज्ज्वल जी ने अलग उदाहरण पेश कर दिया। उन्होंने न किसी की तस्वीर हटवाई, न किसी की मौजूदगी से असहजता दिखाई। शायद यही नेतृत्व का अंतर होता है।जहां सम्मान बांटने से कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। अब सवाल यह है कि वह वरिष्ठ आईएएस अफसर कौन थे, जिन्हें अपनी तस्वीर में किसी और का चेहरा रास नहीं आया था? थोड़ा दिमाग पर जोर डालिए... शायद नाम याद आ जाए। बाकी, हमारी आदत तो आप जानते ही हैं—चुप रहना।
वजनदार की नाराजगी... कार्ड में नाम गायब, तो मूड भी आउट!
अपने वजनदार जी इन दिनों खासे नाराज बताए जा रहे हैं। चर्चा उनके विरोधी नहीं, बल्कि अपने ही करीबी कर रहे हैं। वजह बनी पिछले दिनों शुरू हुई एक औद्योगिक इकाई, जिसका उद्घाटन बड़े ठाठ-बाट से हुआ और जिसमें अपने विकासपुरुष ने वर्चुअल माध्यम से सहभागिता भी की। उद्घाटन से पहले निमंत्रण पत्र बांटे गए। शिष्टाचार निभाते हुए एक कार्ड वजनदार जी के यहां भी पहुंचा। लेकिन जैसे ही उन्होंने कार्ड पर नजर दौड़ाई, उनका पारा चढ़ गया। कारण यह कि पूरे निमंत्रण पत्र में उनका नाम तक नहीं था। मानो कार्यक्रम में उनका कोई अस्तित्व ही न हो। फिर क्या था... निमंत्रण लेकर पहुंचे शख्स को पहले नाराजगी का पूरा डोज मिला। इसके बाद एक जिम्मेदार अधिकारी को फोन लगाकर भी भड़ास निकाली गई। बताते हैं कि सवाल सिर्फ कार्ड का नहीं था, बल्कि सम्मान और राजनीतिक वजन का था। अब यह चूक थी, लापरवाही थी या कोई सोची-समझी रणनीति।यह तो आयोजक ही बेहतर बता सकते हैं। हम तो वही लिख रहे हैं, जो उनके करीबी बता रहे हैं। और रही हमारी बात। तो अपनी आदत के मुताबिक अनुसार चुप ही रह सकते हैं।
बाऊ जी का उद्बोधन... और कमलप्रेमियों की छूटी हँसी!
महाकाल नगरी के कमलप्रेमी इन दिनों अपने जिले के प्रभारी बाऊ जी के उद्बोधन को लेकर खूब चुटकियां ले रहे हैं। मजेदार बात यह है कि हँसी विरोधी खेमे में नहीं, बल्कि अपने ही सत्ता-प्रेमियों के बीच गूंज रही है। ऐसे में पंजाप्रेमियों का मजाक तो फिर अलग से लिखने की जरूरत ही नहीं बचती। वैसे बाऊ जी के लिए यह कोई नया अंदाज नहीं है। अलग-अलग मंचों से वे पहले भी कई बार नेतृत्व का ऐसा स्तुतिगान कर चुके हैं। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। पहली बार अपने ही जिले की सभा में उन्होंने इतनी धाराप्रवाह प्रशंसा की कि सुनने वालों को लगा मानो भाषण से पहले अच्छी-खासी रिहर्सल हुई हो। कहते हैं, जब शब्दों की मिठास जरूरत से ज्यादा हो जाए तो मुस्कान अपने आप निकल आती है। मंच पर भी कुछ ऐसा ही हुआ। खुद विकासपुरुष भी मुस्कुरा पड़े और बीच में बाऊ जी को रोकना पड़ा। बस, फिर क्या था।सभा खत्म हुई और कमलप्रेमियों के बीच चर्चा शुरू हो गई। अब राजनीतिक गलियारों में मजाक चल रहा है कि भविष्य में जैसे ही बाऊ जी माइक संभालेंगे, लोगों को वही पुराना स्तुतिगान याद आ जाएगा और चेहरे पर मुस्कान तैर जाएगी। आखिर राजनीति में भाषण तो खत्म हो जाते हैं, लेकिन उनके किस्से लंबे समय तक चलते रहते हैं। बाकी, हम तो अपनी आदत के मुताबिक चुप ही रहेंगे।
एक पेटी डूबी... 35 पेटी भी गई! अब साहब किससे मांगें हिसाब?
अन्नदाताओं के लिए बनाई गई ई-टोकन व्यवस्था के बीच इन दिनों खाद कारोबार में एक नई चर्चा अन्नदाता वाले विभाग के गलियारों में तैर रही है। चर्चा यह है कि सुपर फास्फेट (एसएसपी) की बिक्री के लिए कथित तौर पर "हाइब्रिड मॉडल" को चुपचाप हरी झंडी देने की कोशिश हुई। दिलचस्प यह है कि इस संबंध में कोई अधिकृत आदेश सामने नहीं आया, लेकिन कुछ चुनिंदा व्यापारियों तक अलग ही संदेश पहुंचने की बातें जरूर सुनाई दे रही हैं। कहा जा रहा है कि विकास पुरुष के जिले में प्रभार संभाल रहे एक अधिकारी ने सीमित व्यापारियों को भरोसा दिलाया कि बिना ई-टोकन भी एसएसपी बेचने में कोई दिक्कत नहीं होगी। बदले में दो पेटी की शर्त रखी गई। बाद में कंपनियों और व्यापारियों के बीच बातचीत हुई और सौदा एक पेटी पर तय होने की भी खूब चर्चा रही। एक व्यापारी ने कथित तौर पर तबादलों का हवाला देते हुए इंतजार करने की सलाह दी, लेकिन जवाब मिला।राजधानी तक पूरी सेटिंग है।रिटायरमेंट भी यहीं से लेंगे। मगर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। अगले ही दिन तबादले का आदेश आ गया और पूरी कथित सेटिंग धरी की धरी रह गई। अब जिन लोगों ने एक पेटी लगाई थी, वे उसके लौटने का हिसाब तलाश रहे हैं। लेकिन असली चर्चा तो इसके बाद शुरू हुई। विभागीय गलियारों में कहा जा रहा है कि साहब तो केवल एक पेटी ही जुटा पाए, जबकि बाबा की नगरी में अपना पद बचाए रखने के लिए राजधानी के एक वरिष्ठ आईएएस को कथित तौर पर 35 पेटी की भेंट चढ़ा दी थी। शर्त सिर्फ इतनी थी कि न कुर्सी जाएगी, न बाबा की नगरी छूटेगी। मगर दांव उल्टा पड़ गया। स्थानीय पॉवरफुल कमलप्रेमियों ने पूरी बाजी ही पलट दी और आखिरकार रवानगी का आदेश निकल गया। यही वजह बताई जा रही है कि साहब तबादला रुकवाने के लिए सीधे उच्च न्यायालय तक पहुंच गए। मगर वहां से भी तत्काल राहत नहीं मिली। मामला सरकार के विचार पर छोड़ दिया गया। उधर विभाग में कार्यमुक्त करने की चर्चाएं हैं, तो इधर उज्ज्वल जी भी प्रभारी अधिकारी को पद छोड़ने की सलाह दे चुके हैं। मगर चर्चा है कि साहब राजधानी में बाबू बनकर बैठने के मूड में नहीं हैं। अब नई जुगाड़ एक छोटे जिले की बताई जा रही है, ताकि कथित तौर पर 35 पेटी का नुकसान किसी तरह वसूल किया जा सके। अब इन चर्चाओं में कितना सच है और कितना मसाला, यह तो जांच का विषय है। मगर अन्नदाता वाले विभाग में इन दिनों यही किस्सा सबसे ज्यादा चटखारे लेकर सुनाया जा रहा है और हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।
प्रोटोकॉल का प्रसाद... किस पुण्य का फल?
उज्जैन में आम श्रद्धालु अगर किसी वीआईपी दर्शन की आस लगाए तो पहले सिफारिश खोजता है, फिर जुगाड़ और अंत में किस्मत। तीनों साथ दे जाएँ तो ठीक, वरना बाबा के भरोसे लाइन में लग जाइए। लेकिन कुछ भाग्यशाली लोग ऐसे भी होते हैं, जिन पर सरकारी कृपा ऐसे बरसती है मानो पूरा प्रशासन उनके स्वागत के लिए ही बना हो। पिछले सप्ताह आए एक महामहिम नहीं, मगर महामहिम जैसी व्यवस्था वाले वीआईपी परिवार की खूब चर्चा रही। तीन-तीन इनोवा, आगे फॉलो गाड़ी, पीछे वर्दीधारी जीप, तीन दिन तक सरकारी विश्राम गृह में आराम और फिर यही सरकारी लश्कर ओंकारेश्वर तक साथ। देखकर तो वर्दी वालों को भी लगा होगा कि कहीं उन्हें किसी अतिविशिष्ट की ड्यूटी पर तो नहीं लगा दिया! बताने वाले बताते हैं कि मेहमान का नाम 1857 की क्रांति के एक महानायक से मिलता है। अब नाम में इतना वजन कब से आ गया कि सरकारी डीज़ल, सरकारी गाड़ियाँ और सरकारी अमला भी नतमस्तक हो जाए? बेचारे वर्दी वाले भी क्या करें? आदेश ऊपर से आता है, पेट्रोल नीचे से जलता है और पसीना बीच वाला बहाता है। गाड़ी में बैठे-बैठे व्यवस्था को कोसते रहे, लेकिन नौकरी में जी साहब बोलना ही सबसे सुरक्षित प्रोटोकॉल है। अब सवाल जनता का है। आखिर यह शाही प्रोटोकॉल किस नियम की किताब में लिखा है? अगर नियम है तो सबको मिले, और अगर नियम नहीं है तो फिर यह सरकारी मेहरबानी किस चमत्कार का प्रसाद है?ऐसा हम नहीं मंदिर वाले बोल रहे है। हमकों तो आदत के अनुसार चुप रहना है।
परछाई छुट्टी पर है... या धूप बदल गई?
सबसे पहले भ्रम दूर कर दें। यहाँ जिन दादा दयालु की चर्चा है, उनका बाबा की नगरी से कोई लेना-देना नहीं है। ये तो देवी अहिल्या नगरी वाले दादा हैं। कम बोलते हैं, ज़्यादा मुस्कुराते हैं और राजनीति में उनकी चुप्पी कई नेताओं के भाषणों से भी ज़्यादा सुर्खियाँ बटोर लेती है। माजरा अपने 2 नम्बरी नेताजी की पौधारोपण वाली बैठक का है। बैठक हुई, कुर्सियाँ सजीं, फोटो खिंचे, संदेश दिए गए। दो हस्तियां भी नहीं आई। प्रथमसेवक भी रस्म अदायगी करने आए थे। लेकिन चर्चा न उनकी हुई, न किसी और की। पूरे आयोजन की सबसे बड़ी अनुपस्थित हस्ती रहे दादा दयालु। अब वजह क्या थी? इसका जवाब देने का ठेका हमने नहीं लिया है। हो सकता है पौधों की व्यवस्था देख रहे हों, हो सकता है किसी और काम में व्यस्त रहे हों। राजनीति में कारणों की कमी नहीं होती। मगर राजनीति का गणित बड़ा अजीब होता है। जब परछाई साथ न दिखे, तो लोग सूरज की दिशा नहीं, रिश्तों का तापमान नापने लगते हैं। देवी अहिल्या नगरी के कमलप्रेमियों ने भी थर्मामीटर निकाल लिया है। गलियारों में फुसफुसाहट है।दादा दयालु कुछ खामोश ज़्यादा हैं।कहीं खामोशी का मतलब नाराज़गी तो नहीं? वैसे राजनीति में नाराज़गी कभी प्रेस नोट जारी करके नहीं आती। वह पहले मंच से दूरी बनाती है, फिर बैठकों से और बाद में चर्चाओं में स्थायी सदस्य बन जाती है। अब सच क्या है, यह तो आने वाला पौधारोपण कार्यक्रम बताएगा। अगर वहाँ 2 नम्बरी नेताजी के साथ दादा दयालु पहले की तरह कंधे से कंधा मिलाकर दिख गए, तो सारी अटकलें खाद बन जाएँगी। और अगर दूरी बनी रही।तो फिर कमलप्रेमियों की कल्पना को पानी देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तब तक हम भी वही करेंगे, जो हमारी आदत है। कयास सुनेंगे... मुस्कुराएँगे... और अपनी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।
सब पर भारी... भवन अधिकारी!
नगरीय विभाग का यह नया नारा बताया जा रहा है।आदेश कहीं भी बनें, आख़िरी फैसला मंद -मुस्कान जी की टेबल पर होगा।ताज़ा घटनाक्रम ने यही संदेश दिया है। अपने 2 नम्बरी नेताजी ने पूरे उत्साह से तबादलों की सूची जारी कर दी। लगा कि इस बार व्यवस्था कुछ सख़्ती दिखाएगी। लेकिन कुछ ही दिनों में पूरी कहानी पलट गई।जिन नौ अधिकारियों का पिछले साल तबादला हुआ था, वही इस साल फिर सूची में आ गए। पिछले साल वे स्थगन लेकर जमे रहे। इस बार पहले पुराने आदेश निरस्त हुए, फिर नए आदेश निकले। लेकिन हुआ वही, जिसका अंदाज़ा निगम भवन के गलियारों को पहले से था।कार्यमुक्ति की फाइल ऐसी चली कि स्थगन पहले पहुँच गया और तबादला पीछे रह गया।अब सवाल उठ रहा है कि यदि विभाग का चेहरा भी अपने फैसलों को ज़मीन पर नहीं उतार पा रहा, तो फिर ताक़त किसके पास है? निगम भवन में तंज़ उड़ रहा है कि 2 नम्बरी नेताजी आदेश जारी करते हैं और भवन अधिकारी तय करते हैं कि आदेश मानना भी है या नहीं। अगर हर साल वही चेहरे हटें, हर साल वही रुक जाएँ और हर साल विभाग अपनी ही सूची का तमाशबीन बन जाए, तो इसे प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, आदेशों की औपचारिकता कहा जाएगा।तभी तो एक ही जुमला सुनाई दे रहा है। सब पर भारी-भवन अधिकारी। इस जुमले में दम है, मगर चुप रहना ही हमारा कर्म है।
सबसे ज़रूरी काम अटकाने में कौन अव्वल?
अपने विकासपुरुष ने जब समीक्षा बैठक में यह सवाल पूछा होगा, तब शायद कई अफसरों की नजरें फाइलों पर थीं और कई मंत्रियों की नजरें एक-दूसरे पर। जवाब भी मिल गया—सबसे ज्यादा ए+ नोटशीट नगर विकास विभाग में धूल फांक रही हैं। यानी जनता के सबसे जरूरी काम भी "विकास" के इंतजार में हैं। बैठक में विकासपुरुष ने साफ कहा।फाइल रखकर मत बैठिए, निर्णय लीजिए। रातों-रात आदेश भी निकल गए। लेकिन असली सवाल यह है कि अगर एक बैठक में सैकड़ों लंबित फाइलें निकल सकती हैं, तो अब तक वे किसकी अनुमति का इंतजार कर रही थीं? जनता की या व्यवस्था की?अब सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहट है कि विकासपुरुष की नाराजगी का निशाना सिर्फ अफसर थे या उन विभागों के राजनीतिक मुखिया भी, जिनके यहां फाइलें सबसे ज्यादा जाम मिलीं? आखिर 2 नम्बरी नेता जी का विभाग नंबर-1 आया है, तो क्या नंबर-1 की कोई जवाबदेही भी तय होगी, या फिर यह रिकॉर्ड भी अगले प्रेजेंटेशन तक सीमित रह जाएगा?फैसला अपने विकास पुरूष को करना है। हमकों तो बस चुप रहना है।
कॉशन मनी... या "भूल जाओ निधि"?
बाबा की नगरी में धर्म, संस्कार और सत्य का पाठ पढ़ाने वाले संस्थान में इन दिनों एक अलग ही शिक्षा की चर्चा है। नाम है। कॉशन मनी। नियम-कायदे की किताब कहती है कि कॉशन मनी ली जाए तो उसकी रसीद भी दी जाए, अलग खाते में जमा हो और पढ़ाई पूरी होने पर विद्यार्थी को लौटा दी जाए। लेकिन यहां लगता है कि नियम भी प्रवेश द्वार पर जूते-चप्पलों के साथ बाहर ही उतरवा दिए जाते हैं। चर्चा है कि हर विद्यार्थी से करीब एक हजार रुपये कॉशन मनी के नाम पर लिए जाते हैं। न रसीद, न कोई आधिकारिक लेखा-जोखा। पढ़ाई पूरी होते-होते अधिकांश विद्यार्थी इस राशि को भूल जाते हैं और संस्थान शायद इसी भूलने की संस्कृति पर सबसे अधिक भरोसा करता है। जो छात्र या पालक जिद कर दें, उन्हें अपने वैदिक धोती द्वारा राशि लौटा दी जाती है। यानी पैसा मौजूद है, लेकिन केवल उन्हीं के लिए जिन्हें अपनी जेब का हिसाब याद रहता है। अब असली सवाल यह है कि जब कॉशन मनी ली जा रही है तो उसका हिसाब किस रजिस्टर में दर्ज है? किस बैंक खाते में जमा है? कितने विद्यार्थियों की कितनी राशि वर्षों से संस्थान के पास पड़ी है? और यदि कोई रिकॉर्ड ही नहीं है, तो यह राशि आखिर मनी किस मद में जाएगी? विडंबना देखिए, जहां वेदों में सत्य और पारदर्शिता का उपदेश दिया जाता है, वहीं व्यवस्था पर उठते इन सवालों का उत्तर मौन में खोजा जा रहा है। लगता है यहां धर्म शिक्षा के साथ-साथ राशि भूल जाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी अनौपचारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा है।अब निगाहें अपने फटाफट जी पर हैं। देखना यह है कि वे इस कॉशन मनी का पूरा हिसाब सार्वजनिक कराते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों की धूल और विद्यार्थियों की भूली हुई यादों के हवाले कर दिया जाएगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रास्ता... रिक्शा... और रविवार का संदेश...
अपने उम्मीद जी का आदेश है।हर रोज सुबह 10 बजे, 12 खोली पर हाजिरी जरूरी। मकसद है, 2028 के रुके कामों को दौड़ाना। आज तीसरे दिन भी एंग्रीमैन की टीम और इन्दौरीलाल पूरे उत्साह के मौजूद थे। मगर सरकारी दौरे भी कभी-कभी फिल्मी पटकथा लिख देते हैं। पहले मोड़ 12 खोली पर सड़क किनारे संडे स्पेशल मांसाहारी पार्टी चल रही थी। धुआँ भी उठ रहा था और खुशबू भी। अधिकारियों ने एक नज़र डाली और बिना किसी कार्रवाई के अपना रास्ता बदल लिया। आखिर रविवार सबका होता है। थोड़ा आगे बढ़े तो सड़क पर पानी ने स्वागत किया। अब पानी को आदेश तो दिया नहीं जा सकता था, इसलिए सामने दिखे ई-रिक्शा को ही आदेश मिल गया। रिक्शा रुका और बड़े-बड़े साहब उसमें सवार हो गए। कहते हैं, कुर्सी बड़ी हो या छोटी, मंजिल तक पहुँचाने वाला पहिया ही होता है। अब यह लिखने कि जरूरत नहीं है कि रिक्शा चालक शाम को घर जाकर पूरे गर्व से बोला होगा। आज मेरी गाड़ी में इतने बड़े अफसर बैठे थे। परिवार ने भी खुश होकर कहा होगा।लगता है अब जिस सड़क का निरीक्षण हुआ है, अगली बार उस पर रिक्शा हिचकोले नहीं खाएगा। वैसे इस पूरे दौरे ने एक बात जरूर सिखा दी—जमीन पर उतरने वाला अधिकारी कभी-कभी फाइल से ज्यादा सच्चाई देख लेता है। बस अब इंतजार इस बात का है कि सड़क पर दिखा पानी, अगली समीक्षा बैठक तक फाइलों से भी गायब हो जाए। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अपराध रोकना या सिर्फ फोटोशूट?
वर्दी की पूरी कार्यप्रणाली चार मूल सिद्धांतों पर टिकी मानी जाती है—अपराध की रोकथाम (Prevention of Crime), अपराधी की पहचान (Detection of Criminal), कानून-व्यवस्था बनाए रखना (Law & Order) और अपराधों की निष्पक्ष विवेचना (Investigation of Crimes)। सवाल यह है कि क्या आज भी काम इन मूल सिद्धांतों के अनुसार हो रहा है?हाल के दिनों में जिले की दो घटनाएं पूरे देश की सुर्खियां बनीं। इन घटनाओं के बाद सिर्फ आमजन ही नहीं, बल्कि वर्दीधारी भी दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि व्यवस्था का पूरा जोर अपराध होने के बाद अपराधी को पकड़ने और उसके साथ सुर्खियां बटोरने तक सीमित होता जा रहा है। जबकि वर्दी की असली कसौटी तो अपराध होने से पहले उसे रोकना है। यदि अपराध ही न हो, तभी व्यवस्था की सफलता मानी जाएगी।उधर कमलप्रेमियों का भी अलग सवाल है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर की कार्यशैली का जवाब आखिरकार उच्च स्तर पर विकासपुरुष को देना पड़ता है। प्रशासनिक चूक का राजनीतिक भार नेतृत्व पर आना स्वाभाविक है।
वर्दीधारी ओर कमलप्रेमियो के सवाल में दम है।।मगर चुप रहना हमारा धर्म है।
मेरी पसंद
एक पड़ोसी ने मेरे पास अमानत रख दी।
अब मैं ईमान संभालू या जरूरत देखूं।
हाशिम नोमानी