08 सितम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
सरकारी सुख का मोह…
रिटायरमेंट को आम आदमी “आराम का मौका” समझता है,
लेकिन हमारे साहब के लिए यह सरकारी सुख छिनने का खतरा है।
पद से मुक्त हुए पूरा महीना गुजर गया, मगर साहब अब भी उसी अंदाज़ में—
सरकारी बंगले में ठाठ, सरकारी गाड़ी में फर्राटा, और सरकारी स्टाफ से सेवा जारी।
जैसे कह रहे हों—
“पद गया तो क्या हुआ, पदाधिकारी तो आज भी मैं ही हूँ।”
बाबा की नगरी के यह रिटायर्ड अफसर विकास पुरुष से भी मिन्नतें कर चुके हैं—
“कोई न कोई कुर्सी यहीं थमा दो, वरना मोहभंग हो जाएगा।”
मतलब साफ है—
कुर्सी चाहे बदले, पर बंगले का पता और गाड़ी का नंबर प्लेट वही रहना चाहिए।
अब सवाल यह है कि विकास पुरुष इनकी गुहार कब सुनते हैं।
लेकिन इतना तय है कि साहब का इरादा बिल्कुल साफ है—
और हम?
हम वही करेंगे जो हर बार करते हैं—
चुप रहेंगे और मुस्कुराएंगे, क्योंकि सच बोलेंगे तो ‘साहब की सेवा भावना’ पर चोट लग जाएगी।
जब धुर विरोधी एक मंच पर दिखे…
पाठकगण!
आपको मिशन 2023 का यादगार रण जरूर याद होगा।
एक तरफ हमारे विकास पुरुष,
दूसरी तरफ होटल वाले भिया।
हर रोज़ शब्दों के तीर।
हर सभा में कटाक्ष के वार।
नतीजा?
होटल वाले भिया को हार का घूंट पीना पड़ा,
और विकास पुरुष सीधे सूबे के मुखिया बन बैठे।
इसके बाद से दोनों कभी साथ नहीं दिखे।
मगर डोल ग्यारस पर दृश्य बदला हुआ था।
दोनों एक ही मंच पर।
एक-दूसरे का हाथ थामे।
विकास पुरुष के चेहरे पर खुली मुस्कान,
तो होटल वाले भिया के होंठों पर झिझकती हंसी।
देखने वालों ने इसे दरियादिली का नजारा बताया।
तो पँजा-प्रेमियों में नई चर्चा छिड़ गई—
क्या यह आने वाले भविष्य का इशारा है?
कयासों की डोर मजबूत भी है,
क्योंकि होटल वाले भिया दो बार धोखा खा चुके हैं—
पहले बिरयानी नेताजी से,
फिर चरणलाल जी के मुखिया बनने से।
राजनीति का पहला सबक यही कहता है—
“ना स्थायी दोस्त, ना स्थायी दुश्मन।”
यह मुस्कानें किस करवट बैठेंगी।
फिलहाल तो हम…
हमेशा की तरह अपनी आदत के अनुसार—
चुप!
गुस्से में बोले..अब यह काम भी मैं करूँगा
अपने उज्ज्वल जी इन दिनों वाकई ‘लोड’ लेकर घूम रहे हैं। वैसे अकेले वो ही नहीं हैं। संकुल से लेकर विकास भवन तक सब तरफ ‘टेंशन’ ही टेंशन है। अन्नदाताओं के कारण। ऐसे में अगर कोई नई मुसीबत सामने आ जाए तो आना लाजिमी है।
कुछ ऐसा ही हुआ छुक-छुक गाड़ी वालों की बैठक में। अपने उम्मीद जी, हिटलर जी, इन्दौरीलाल जी, हवाबाज जी सहित छुक-छुक विभाग के आलाधिकारी मौजूद थे। बस, अपनी चटक मैडम जी ही नदारद रहीं। शायद होतीं तो “समन्वय” का राग और ऊँचा बजता।
बैठक का मुद्दा बड़ा पवित्र था—2028 के कामों में कोई रुकावट न आए। मगर रुकावट खुद बैठक में आ गई। जब यह खुलासा हुआ कि 20 खोखे का भुगतान रोककर बैठे हैं शिवाजी भवन के हवाबाज जी। जैसे भुगतान रोकना भी उनका कोई शौक़ हो।
मगर मानना पड़ेगा—फटकार ने कमाल किया। शाम ढलते-ढलते शिवाजी भवन के मुखिया ने 20 खोखे का भुगतान क्लियर कर दिया।
अब हम तो बस बाबा तुलसीदास की चौपाई ही याद करते हैं—
“भय बिनु होई न प्रीति गुसाईं।”
और फिर अपनी आदत के मुताबिक चुप हो जाते हैं।
आंखों की बोलियां समझती हैं
अभी-अभी एक बैठक हुई थी। मंच पर विराजे थे—प्रथम सेवक। साथ में शिवाजी भवन के मुखिया, अधीक्षणयंत्री और अफ़सरों का पूरा जत्था। मुद्दा था निर्माण कार्यों का। उसमें तालाब का निर्माण भी शामिल। काम शायद रुक गया है।
प्रथम सेवक ने सवाल दागा अधीक्षणयंत्री पर।
अब जवाब की जगह जनाब ने मुँह खोलने की बजाय आंखों से इशारे करने शुरू कर दिए।
बकौल शायर मंजर भोपाली—
“गुफ्तगू मोहब्बत में कीजिए इशारों से,
लड़कियां तो आंखों की बोलियां समझती हैं।”
शिवाजी भवन के मुखिया ने इशारे पकड़ लिए। तल्खी से बोले—
“जवाब क्यों नहीं देते?
बेचारे अधीक्षणयंत्री की घिग्गी बंध गई। फटकार के बाद उन्होंने क्या जवाब दिया, यह तो दीवारें भी नहीं सुन पाईं।
हाँ, बैठक से निकलने के बाद अफ़सरों की गुनगुनाहट जरूर सुनाई दी—
“आंखों की बोलियां समझती हैं…”
अब ऐसे माहौल में हम क्या करें?
हम तो अपनी पुरानी आदत के मुताबिक चुप ही रह सकते हैं।
नीली सफारी का चस्का
जब से अपने विकास पुरुष सूबे के मुखिया बने हैं,
कुछ खास लोगों को सरकारी नीली सफारी वाले अंगरक्षक मिल गए।
ये तो ठीक है, जिसे खतरा है उसे सुरक्षा भी मिलनी चाहिए।
मज़ा उन लोगों का है,
जिन्हें न खतरा है, न सरकार से गार्ड।
लेकिन नीली सफारी देखकर उनका दिल ललचा गया।
बस फिर क्या था—
निजी तौर पर गार्ड रख लिए और सबको नीली सफारी पहना दी।
अब जहां भी जाते हैं,
चार गार्ड आगे-पीछे ऐसे चलते हैं
जैसे कोई बड़ी साज़िश उनके पीछे पड़ी हो।
असलियत सब जानते हैं—
ये सुरक्षा नहीं, बस दिखावा है।
नीली सफारी का चस्का ऐसा लगा है
कि लोग जेब ढीली करके खुद को वीवीआईपी घोषित कर बैठे हैं।
बाकी, हम तो अपनी पुरानी आदत के मुताबिक
बस चुप ही रहते हैं।
सीट रिज़र्व का अध्यादेश
तीसरे माले के प्रभारी मुखिया ने नया संविधान लागू कर दिया है—”जहाँ हम चलें, वहाँ कुर्सी पहले से बंधक रखी जाए।”
होटल का एक कार्यक्रम था। आगे वाली सोफे-कुर्सियाँ पहले ही भर चुकी थीं। तभी मुखिया जी ने एंट्री मारी। देखा तो अपनी शान के लायक़ जगह गायब!
बेचारे तहसीलदार भागे-भागे आए। किसी से खिसकने का अनुरोध, किसी से दया की याचना। तब जाकर आधा सोफा मिला। पर बैठना ऐसा मानो किसी रिक्शे में ठूँसा गया हो। अंत में एक अतिथि ने मनुहार के बाद सीट छोड़ी और प्रभारी जी ने चैन की साँस ली।
जिसके बाद तहसीलदार को ज्ञान दिया गया—”आगे से सीट रिज़र्व रखा करो। वीआईपी की इज़्ज़त सीट से ही शुरू होती है।”
अब जनता कह रही है—
सीट चाहे संसद की हो या सोफे की,
रिज़र्व न हो तो
सम्मान भी अधूरा ही लगता है।
बाकी हम तो…
अपनी आदत से मजबूर, चुप ही रहेंगे।
जब अधिकारीगण ‘उड़ने’ लगे…
चुप रहेंगें के पाठकगण,
यह कोई मुहावरा नहीं, सचमुच का किस्सा है।
हेलीपैड पर विकास पुरुष की वापसी का इंतज़ार था।
मौसम बिगड़ा हुआ।
उड़नखटोला जमीन पर अटका हुआ।
साहब अंदर बैठे धैर्य रखे हुए।
इधर बाहर—
तीसरे माले के प्रभारी, अल्फ़ा जी, डेल्टा जी, उज्ज्वल जी, कप्तान जी, चटक मैडम और इन्दौरीलाल जी—
सबके सब हवा से दो-दो हाथ कर रहे थे।
जमीन में पैर गाड़े हुए।
मानो धरती कह रही हो—“भाई, पकड़ कर रहना, वरना उड़ जाओगे।”
उड़नखटोले ने जैसे ही उड़ान भरी,
हवा ने भी तांडव किया।
मैडम के बाल और दुपट्टे ने पीठ मोड़कर भी हवा की तरफ मुख कर लिया।
बाकी अधिकारियों का हाल ऐसा कि लग रहा था—
अभी हवा उन्हें भी आकाश में उड़ा ले जाएगी।
करीब एक मिनट तक पूरा नज़ारा यही था—
अधिकारी ज़मीन पर, पर एहसास आसमान का।
तभी दर्शक बोले—
“सच में, आज तो अधिकारीगण उड़ने लगे हैं!”
और हम?
हम तो ज़मीन पर जमे हुए,
अपनी पुरानी आदत के मुताबिक—
चुप!
जिसकी पूजा… वही जेब ढीली करे!
गंभीर डेम लबालब भर गया है। ऊपर वाले की मेहरबानी और इंद्र देव–बिलकेश्वर महादेव की कृपा का आभार जताने शनिवार को पूरा दरबार डेम पर पहुँचा। अपने प्रथम सेवक, उनकी कैबिनेट, बहन जी, दालवाले नेताजी और शिवाजी भवन के महारथी – सब माथा टेकने, पूजा करने और जयकारे लगाने पहुँचे। भक्ति का पूरा रंग चढ़ा, मंत्रों की गूँज हुई और फोटो खिंचवाकर सबने भक्ति का प्रमाण भी दर्ज कर लिया।
लेकिन असली मज़ा तब आया जब दक्षिणा की बारी आई। शगुन पंडित जी को देना था, मगर सबकी नज़रें एक-दूसरे की तरफ घूमने लगीं — जैसे कोई पूछ रहा हो, “तुम दो न!” तभी दालवाले नेताजी ने तंज से कहा — “जिसकी पूजा है, वही अपनी जेब ढीली करे!”
नतीजा। अपने बूटी प्रेमी कैबिनेट सदस्य ने बिना बहस अपनी जेब ढीली कर दी। पूजा पूरी हुई, भोजन भी पूरा हुआ और फिर सब ‘चुपचाप’ लौट गए — जैसे कुछ हुआ ही न हो!
ऐसा हम नहीं, बल्कि अपने कमलप्रेमी बोल रहे हैं।बात सच भी है, मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
उपहार में ‘तस्वीर’ देकर विदा किया…
राजनीति में कौन किसे घेरता है, इसका प्रयोग पहले सिर्फ विरोधियों पर होता था। पर पिछले सप्ताह पहली बार देखने को मिला कि सत्ताधारी दल ने विरोधी दल का मुख्यालय घेर लिया। यह घटना कमलप्रेमियों के लिए जितनी चौंकाने वाली थी, उतनी ही पँजाप्रेमियों के लिए भी।
हाईकमान से निर्देश मिलते ही कमलप्रेमी बहन जी, हाइनेस, दालवाले नेताजी ने हल्ला बोल दिया। मंच सजाया गया, भाषण चल रहे थे कि तभी पँजाप्रेमियों ने चाल चली — माइक को ढोल वालों के सामने रख दिया। नतीजा यह हुआ कि मंच पर भीड़ बढ़ी और मंच झूलने लगा तो खाली करना पड़ा। कमलप्रेमी बेरिकेड्स पर चढ़ गए। वहाँ पँजाप्रेमी चरणलाल जी अपने खास साथियों के साथ साए की तरह मौजूद थे।
ऐसे में विवाद भड़कता इससे पहले दोनों पक्षों ने समझदारी दिखाई। एक अनौपचारिक समझौता हुआ — “फोटो खिंचवा लेने दो, फिर उतर जाएंगे।” कमलप्रेमी उकसाते रहे, पर पँजाप्रेमियों ने धैर्य नहीं खोया। आखिर थक हार कर दोनों पक्ष अलग हुए। जाते-जाते चरणलाल जी की टीम ने कमलप्रेमियों को ‘गांधी जी और अंबेडकर जी’ की तस्वीर उपहार में देकर विदा कर दिया ।
अब सबकी नज़र आगामी 12 सितम्बर पर है, जब पँजाप्रेमी ‘हल्ला बोल’ करेंगे। लक्ष्य है 50 हज़ार का। देखना यह है कि क्या वे कमलप्रेमियों जैसी ताक़त दिखा पाएंगे या नहीं। तब तक हम अपनी आदत के मुताबिक चुप हो जाते हैं — मगर आँखें खुली हैं!
रोजा रखा जो दावत की… !
किसी शायर ने खूब कहा है…
ये भी एक बात है अदावत की!”
रोजा रक्खा जो हमने दावत दी।
वाह! शायर ने क्या खूब लिखा है। पर यहाँ जो हुआ, वह तो इससे भी मज़ेदार निकला। किसी ने रोजा नहीं रखा, लेकिन दावत देखकर सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। प्लेट-चम्मच का तो नाम तक नहीं, केले के पत्ते पर मोटे चावल, पापड़, तरह-तरह की चटनियाँ… और आदेश — “हाथ से ही खाइए, तभी स्वाद आएगा!”
अपने कप्तान जी ने नई शैली का स्वाद परोस दिया — “भक्ति भी हाथ से, भोजन भी हाथ से!” जिन्हें आदत थी प्लेट–चम्मच की, उन्हें उंगलियों से खाना पड़ा। कोई गुर्राया नहीं, कोई भौंह नहीं चढ़ी… बस मुस्कराहट के साथ स्वाद लिया गया।
इस खास दावत में उम्मीद जी, उज्ज्वल जी, हिटलर जी, शिवाजी भवन के महारथी और छुक-छुक गाड़ी वाले भी शामिल हुए। अब देखना है कि यह दक्षिण भारतीय ‘नमक’ आने वाले 2028 के खेल में कितना काम आता है… या फिर स्वाद लेकर ही सब लौट जाएँगे!
तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
दुःखद हादसा – शोक की लहर
वर्दी पहनकर सेवा करना केवल एक पेशा नहीं, एक संकल्प है। 24 घंटे, सातों दिन, बिना थके, बिना रुके समाज और देश की रक्षा में जुटे तीन वर्दीधारी साथियों की असमय मृत्यु ने सबको गहरे दुख में डुबो दिया है।
यह हादसा उन परिवारों के लिए अपूरणीय क्षति है, जिन्होंने अपने अपने प्रियजन खो दिए। उनके माता–पिता, जीवनसाथी, बच्चे – सबके जीवन में जैसे अंधकार छा गया है। शब्द यहाँ ठहर जाते हैं। केवल संवेदनाएँ ही साथ खड़ी रह सकती हैं।
“हम चुप रहेंगे” परिवार दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। हम प्रार्थना करते हैं कि बाबा महाकाल उन्हें अपने चरणों में स्थान दें और उनके परिजनों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
वे अपने कर्तव्य के लिए जिए… उनकी स्मृति हर दिल में दीप की तरह जलती रहे। उनकी सेवा, निष्ठा और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनें।
ॐ शांति ॐ
मेरी पसंद
ऐसी नहीं है बात के कद अपने घट गए।
चादर को अपनी देखकर हम खुद सिमट गए।
जब हाथ मे कलम था तो अल्फाज ही न थे।
अब लफ़्ज मिल गए तो मेरे हाथ कट गए।
मरहूम डॉ सागर आजमी साहब