01 जून 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

01 जून 2026 (हम चुप रहेंगे)

तो क्या हुआ...
अपने विकासपुरुष को वह काम करने में ज्यादा मजा आता है।जिसमें चुनोतियाँ हो ? फिर वह काम राजनीतिक हो या फिर 2028 के लिए गए निर्णय का काम हो।एक बार ठान लिया। होगा तो फिर भले कितना भी असंभव कोई उस काम को बताएं। वह अपने आत्मविश्वास से उसको पूरा करवाने की कला जानते है। जैसे मंगलवार की रात को उन्होंने साफ कर दिया। जब चंद अधिकारियों के साथ बात कर रहे थे। एलिवेटेड ब्रिज को लेकर सवाल कर लिया। अपने उम्मीद जी ने बोल दिया। समय कम बचा है। इसका अर्थ यही कि नहीं बन सकता है। मगर विकास पुरूष जानते है। कैसे करवाना है। उन्होंने साफ कह दिया। तकनीकी जमाना है। पिलर ही तो खड़े करना है। जो कि मुश्किल काम नहीं है। उनके इस जवाब के बाद साफ हो गया है। 2028 के पहले एलिवेटेड ब्रिज भी हर हाल में तैयार होगा!

वेबसाइट बंद रही...
संचार युग का दौर है। सरकारी कामकाज अब वेबसाइट के माध्यम से ही चलते हैं। जिसके लिए हर विभाग का अपना आईटी सेल भी होता है। इसके बाद भी शिवाजी भवन की ऑफिशियल वेबसाइट 2-3 बंद रही। यह किसी हैकर का कारनामा नहीं था। बल्कि लापरवाही के चलते यह हुआ। इसी वेबसाइट के माध्यम से शिवाजी भवन सभी प्रकार के टैक्स वसूल करता है। वेबसाइट के लिए डोमिन को रिचार्ज करवाना होता है। जैसे हम अपने अपने मोबाइल को रिचार्ज करते है। जिसकी यह जिम्मेदारी थी। उनकों याद नहीं रहा। इधर जनता परेशान होती रही। आखिरकार नींद खुली तो रिचार्ज करवाया। तब वेबसाइट शुरू हुई। जिसके बाद शिवाजी भवन वाले ही बोल रहे है। जब हम इतनी छोटी सी बात का ख्याल नहीं रख सकते है तो विकास भवन की योजनाओं को लेकर उस काम को कैसे कर पाएंगे? बात में लॉजिक तो है। मगर  हम कर क्या सकते हैं।बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

टोना-टोटका...
अपने विकास पुरूष की आँख के तारे हाउसिंग बोर्ड के माटसाब  अच्छे खासे स्वस्थ -मस्त-प्रसन्न थे। पद भी संभाल लिया था और काम भी शुरू कर दिया था। मगर अचानक ही उनके दिल पर ऐसा दवाब आया। आधी रात में। अस्पताल जाना पड़ा। जहाँ उनको स्टंट डालने पड़ गए। यह दिखने में एक सामान्य घटना है। मगर इसको अपने कमलप्रेमी अलग नज़र से देख रहे है। कमलप्रेमियों में चर्चा है। माटसाब का बढ़ता हुआ राजनीति में कद कुछ लोगों को खटक गया है। तभी तो किसी ने पूजा के ज़रिए टोना-टोटका करवा दिया। हालांकि बात गले नही उतरती है। मगर यह भी सच है कि राजनीति में अपने विरोधी को निपटाने के लिए अक्सर पूजा-हवन-टोटके अक्सर किये जाते है। इसके लिए नलखेड़ा और पीताम्बरा पीठ मशहूर है। यह भी अपने कमलप्रेमियों का ही दावा है। जिसमें हम क्या कर सकते है। हम तो बस अपने माटसाब के जल्दी स्वस्थ होने की कामना करते हुए ,आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

आलूबड़ा- स्विमिंग पूल- फोन...
अनुशाषित कमलप्रेमियों का वर्ग शनिवार को संप्पन हो गया। इसमे अपने विकासपुरुष भी शामिल हुए थे।सारा बोझ अपने दालवाले नेताजी पर था। जो कि इस बात को नही मानते है। 
जब भी बोलना सोचकर बोलना
मुदत्तो सोचना मुखतसर बोलना
जिसके चलते जो हेडिंग ऊपर पढ़ी है।वह तीन विवाद हो गए।
1-नेताजी ने वर्ग के कर्ता-धर्त्ता को आलूबड़ा की उपाधि से सम्मानित कर दिया। उनके शरीर की संरचना गोल-मटोल है। जिसके चलते विवाद हो गया।
2 दिन भर वर्ग में उपदेश सुनते सुनते कमलप्रेमी मानसिक तनाव में थे। ऐसे में तनाव मुक्त होने के लिए स्विमिंग पूल बेहतर लगा। मगर फरमान सुनाया गया। फोटोशूट कोई नहीं करेगा। इसको लेकर विकास भवन के नवीन सदस्य लाला जी और नेताजी में तू तू- मैं मैं हो गई। बीच -बचाव से विवाद टल गया।
3 नियम बनाया गया था। वर्ग में शामिल सभी के फोन जमा होंगे।36 घण्टे के लिए। जो कि इस दौर में असम्भव है। घर से दूर रह सकते है, मगर फोन से नही। फिर भी जमा करवा दिए। मगर पद वालों ने इस नियम की धज्जियां उड़ा दी। उनके हाथों में फोन थे। नतीजा अगले दिन कमलप्रेमियों ने बगावत कर दी। फोन जमा नही करेंगे-या फिर सबके जमा होंगे। कमलप्रेमियों की बात मान ली गई।
फोन जमा नही हुए।
अव वर्ग खत्म होने के बाद अपने कमलप्रेमी चटकारे लेकर यह तीन किस्से सुना रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

गोपनीय निर्देश...
पिछले सप्ताह अपने विकासपुरुष एक रात के लिए पधारे थे। वर्ग में शामिल होने के लिए।तो नियम का पूरा ध्यान रखा। संगठन सर्वोपरि का मामला था। इसलिए रात्रि विश्राम भी वहीं किया। जहां वर्ग लगा था। बस कुछ देर के लिए वीवीआईपी गेस्ट हाऊस आए थे। पीछे पीछे अल्फा जी-उम्मीद जी-डेल्टा जी-उज्ज्वल जी-कप्तान जी-हिटलर जी-एंग्रीमैन-इन्दौरीलाल  सभी थे। क्या पता विकासपुरुष कब क्या सवाल कर ले। सभी बाहर खड़े थे। तभी अंदर से बुलावा आया। अपने उज्ज्वल जी को तलब किया गया। अंदर विकासपुरुष और उज्ज्वल जी के बीच गोपनीय चर्चा हुई। ज्यादा देर नहीं लगी। फिर विकास पुरूष सीधे वर्ग पहुँच गए। अब उज्ज्वल जी को क्या निर्देश मिले। यह अगर किसी को पता होगा? तो वह केवल अपने उम्मीद जी हो सकते है। जिनकी आदत है। एक हाथ से काम करो तो दूसरे को पता नहीं चलना चाहिए। ऐसे में गोपनीय निर्देश क्या दिए। कोई माई का लाल पता नहीं कर सकता है। तो हम किस खेत की मूली है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

कब तक आओगे घर...
शनिवार को सिंहस्थ समीक्षा हो रही थी। जमाना डिजिटल है। पीपीटी के जरिए बड़ी स्क्रीन पर सब कुछ लुभावना दिखता है। एसीएस साहब गौर से देख रहे थे। अचानक स्क्रीन पर कब तक आओगे घर लिखा नजर आया। यह देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गए।जो कर्मचारी प्रजेंटेशन दिखा रहा था। वह खुद भी। फिर तत्काल बंद किया। तब तक एसीएस ने चुटकी ली। लोग अपनी पर्सनल लाइफ छुपाते है। तुम उजागर कर रहे हो। यह मैसेज लंच बुलावे का था।उसी मोबाइल से प्रजेंटेशन दिखाया जा रहा था। तब अचानक अपने उम्मीद जी ने भी चुटकी ली। वाइफ शहर में है भी या नहीं? जिसके बाद जोरदार ठहाका लगा और कर्मचारी बेचारा चुप रह गया। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

विक्रमादित्य से तुलना...
यह सर्वविदित है। अपने विकासपुरुष के आइडियल राजा विक्रमादित्य है। अपने जिले के प्रभारी बाऊ जी शिप्रा यात्रा की ओपनिंग में आए थे। स्पीच देते वक्त इमोशनल हो गए। इतने ज्यादा कि यह बोल गए। जितना विकास राजा विक्रमादित्य के काल में नहीं हुआ था, वह अब हो रहा है। जिसे सुनकर वहां मौजूद कमलप्रेमी आश्चर्य में आ गए। इसके बाद गंगा संवर्धन के लिए फ़ोटो खींचने की रस्म अदायगी हुई। प्रभारी बाऊ जी सफाई तो क्या करते। किन्तु फ़ोटो के लिए फावड़ा उठाकर कंधे पर जरूर रख लिया। नतीजा-पीछे खड़े एक कमलप्रेमी के मत्थे से टकरा गया। ग़नीमत रही। कमलप्रेमी चोटिल नही हुआ। वरना सुर्खियां बन जाती। अब दोनो मामलों को लेकर अपने कमलप्रेमी चटकारे लेकर सुना रहे है। खासकर विक्रमादित्य से तुलना। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

शब्दबाण किसको लगा...
कहते है कि गोली का घाव भर जाता है।मगर शब्दबाण का नहीं। शनिवार को इस विद्या में पीएचडी एसीएस की बैठक थी। जिन्होंने ऐसे-ऐसे शब्दो के तीर चलाए। जिससे कई आत्मग्लानि के शिकार हो गए। ऐसा ही एक बाण शिवाजी भवन पर चला। जब अग्निशमन की स्लाइड दिखाई जा रही थी। डिजिटल की दुनिया है। तो एक ऐसी तस्वीर स्लाइड में दिखाई गई। जिसमें आग लगी नही ,बल्कि भभक रही थी। एक फायरकर्मी उसे बुझाने की कोशिश करता दिख रहा था। यह देखकर शब्दबाण से घायल करने वाले साहब ने तंज कसा। उनका कहना था। अगर ऐसी आग सिंहस्थ में भभकी,तो बुझाने से पहले ही सब सस्पेंड हो जाओगे। साहब का यह शब्दबाण किसको जाकर लगा होगा? क्योंकि बैठक में उम्मीद जी,उज्ज्वल जी, हिटलर जी, एंग्रीमैन,इन्दौरीलाल सब मौजूद थे। इसका फैसला हमारे समझदार पाठकगण खुद कर लें। हम तो बस यह लिखकर चुप हो जाते है कि.. 
चापलूसी के चक्कर में जब ऐसी पीपीटी बनाई जाती है
फिर बैठक में उसकी सच्चाई बताई जाती है...

ग़ज़ब के इंजीनियर...
इंजीनियरिंग का अर्थ होता है। कम लागत में बेहतर काम। मगर 2028 के लिए ढूंढ -ढूंढ कर ऐसे अनमोल रत्न लाए गए हैं। जो काम की लागत बढ़ाने का हुनर रखते है। ऐसे ही दो मामलों की चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। जिनके ऊपर उंगली उठ रही है। वैसे तो उनका मूल पद सहायक यंत्री है। शासन के नियम से उनको एक पद ऊपर का प्रभार दिया जा सकता है। मतलब कार्यपालन यंत्री का। लेकिन इससे भी ऊपर का प्रभारी बना दिया है। इनको अपने ज्ञान का अजीरण है। तभी तो रामघाट पर प्रजापति समाज की धर्मशाला की वह दीवार तुड़वा दी। जो ऐरन की बनी थी और बरसो से शिप्रा के बढ़ते पानी को रोकती थी।यह प्रोजेक्ट कुल 5 खोखे का था। अब इस दीवार को बनाने में इंजीनियर साहब ने जो दिमाग लगाया है। उसका बजट 3 खोखे का बताया जा रहा है। कारण 60 मीटर की दीवार बननी है। बाकी सभी मातहत इंजीनियर इसके लिए अपनी असहमति दिखा चुके है। किंतु ज्ञान के अजीरण इंजीनियर अड़े हुए है। दूसरा मामला हामुखेड़ी का है। जहाँ पानी सड़क पर रोकने के लिए पाइप लाइन डालकर काम चल सकता है। मगर यही अजीरण इंजीनियर यहां बॉक्स बनाने पर तुले है। ताकि 15 पेटी का काम खोखे में तब्दील हो जाए। सीधी -साफ भाषा में ठेकेदार को फायदा पहुँचाने की कोशिश है। ताकि ज्यादा से ज्यादा अंशदान जेब में आए। यहाँ यह लिखना जरूरी है।2016 के सिंहस्थ में भी एक ऐसे ही अजीरण वाले इंजीनियर आए थे। उनकी यह कार्यशैली देखकर तत्कालीन मेलाधिकारी ने उनको रवानगी का टिकट थमा दिया था। देखना यह है कि इस अजीरण इंजीनियर के साथ क्या होता है?तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

निविदा निरस्त हुई...
मंदिर के गलियारों में इन दिनों एक निविदा निरस्त किए जाने की चर्चा चरम पर सुनाई दे रही है। यह निविदा लड्डू से जुड़ी हुई है। यह तब निकाली गई। जब पिछले दो दशक से लड्डू बना रहे वेंडर ने काम छोड़ दिया। वजह उसका भुगतान रुकना था। मगर प्रचारित यह किया गया। वेंडर घी का उपयोग ज्यादा करता था। इसलिए अपने फटाफट जी ने एक्शन लिया। जिसके बाद से सुरक्षा कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा यूनिट में लड्डू निर्माण किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ अन्य को भी यह काम दिया गया है। मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाने के लिए।ऐसा यूनिट के सूत्रों का कहना है। इस बीच एक निविदा निकाली गई। जिसमें शर्त थी। सब कुछ सामग्री वेंडर की-मंदिर केवल भुगतान करेगा। इस निविदा में बाबा की नगरी के एक बड़े इंटरनेशनल उधोगपति की कंपनी ने टेंडर डाला था। किन्तु इस निविदा को अब निरस्त कर दिया गया है। कारण क्या है? यह किसी को पता नहीं है। जिनकों जानकारी है। वह चुप है। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

सिंघम रिटर्न...?
वर्दी पर आधारित यह फ़िल्म तो हमारे पाठकों को याद होगी?इन दिनों इसकी चर्चा वर्दीधारी खूब कर रहे है। आधार पिछले दिनों वायरल हुआ एक वीडियो है। जिसमें राजा भोज की नगरी के कप्तान जी चेतावनी देते नजर आ रहे है। भोजशाला को लेकर। उनका यह अंदाज वर्दीधारियों में चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि फिलहाल यह बातचीत दूर की कौड़ी है। वजह -देश की राजधानी से अभी -अभी सिंघम की वापसी हुई है। इधर अपने कप्तान जी का भी अच्छा कार्यकाल चल रहा है। बाबा महाकाल की उनके ऊपर भरपूर कृपा है। मगर 2028 तक उनका रहना इतिहास बना सकता है? इसीलिए तो वर्दीधारी कयास लगा रहे है? सिंघम रिटर्न हो सकता है? वैसे भी बाबा की नगरी में कम से कम दूसरी दफ़ा तो सेवा करने आना ही पड़ता है। इसके कई उदारहण है। जैसे उम्मीद जी ,उज्ज्वल जी और अल्फा जी। तीसरी बार सेवा देने अल्फा और उम्मीद जी आए हैं। उज्ज्वल जी दूसरी बार। ऐसे में अगर वर्दीधारी सिंघम रिटर्न के अगर कयास लगा रहे है। तो इसमे हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप ही रह सकते हैं।

संविदाकर्मी का हाईवोल्टेज करंट..
स्मार्ट भवन के गलियारों में उनका पद तो संविदाकर्मी का है। मगर उन पर मेहरबानी इस कदर है। कार्यपालन यंत्री का प्रभार दिया गया है। वजह प्रकाश की जिम्मेवारी इनको मिली है।तभी तो हाईवोल्टेज करंट हमेशा मारते रहते है। इनको साथी लोग टेसू जी के नाम से जानते है।यह एक फूल का पर्याय शब्द है। इन्होंने अभी पर्दे के पीछे से जोरदार करंट लगवा दिया। दो ठेकेदारों को। जो कि वीडी मार्केट तरफ काम कर रहे है।   अपने टेसू जी के काम मे रुकावट बन रहे थे।   दोनो से उनके घर का पता पूछा।एक ने यहीं  का बताया और दूसरे ने देवीआहिल्या नगरी का। कुछ समय बाद दोनों के घर जेसीबी खड़ी थी। यह संदेश दिया गया। काम में अड़ंगा डाला तो यह बुलडोजर चल सकता है। इस संदेश के पीछे अपने टेसू जी की भूमिका बताई जा रही है। इधर ठेकेदार शरणम गच्छामि हो गए है। टेसू  जी के इस हाईवोल्टेज करंट लगने से। अब सवाल यह है कि एक संविदा कर्मी पर इतनी जिम्मेदारी देने के पीछे असली कारण क्या है। तो दबी जुबान से बोला जा रहा है। चापलूसी और सबकों खुश रखने की कला में टेसू जी पीएचडी है।जिसको जो चाहिए-वह उपलब्ध कराते हैं। तभी तो मलाईदार विभाग के मुखिया बनकर बैठे हैं।लेकिन अब उनके किस्से बाहर आने लगे है।जल्दी ही एक बड़ा खुलासा होगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मेरी पसंद
मैं शहर में हर इक से यही पूछ रहा हूँ
बस लाश बता दो मेरी दफनाई कहाँ है
सलमान जफर