माननीयों, इगो खूंटे पर टांग दो, नहीं तो उज्जैन के हाथ फिर कुछ नहीं लगेगा

माननीयों, इगो खूंटे पर टांग दो, नहीं तो उज्जैन के हाथ फिर कुछ नहीं लगेगा

विकासपुरुष से इन दिनों कई माननीयों की खटपट चल रही है।यह जगजाहिर बात है।अपने विकास पुरुष भी इससे वाकिफ है।सबकी अपनी अपनी राजनीतिक और निजी पीड़ा हो सकती है। इस मानवीय स्वभाव की हम कद्र करते है। मगर चुने गए जनप्रतिनिधियों से जनता क्या चाहती है। वह अपनी निजी लड़ाई को सार्वजनिक स्तर पर जाहिर करे या एकजुट होकर इस दिशा में प्रयास करे।उज्जैन शहर का विकास हो-रोजगार के अवसर मिले।उज्जैन का नाम ,जो हमेशा इंदौर के कारण दबा हुआ रहता था। वह विश्व पटल पर नजर आए। अभी तक केवल बाबा महाकाल -सिंहस्थ के कारण ही शहर और हमारी पहचान थी।आज कम से कम उससे कुछ हद तक तो ऊबर रहे है। पिछले 19 सालों में कौन सा उद्योग इस जिले को मिला? कोई भी जनप्रतिनिधि
अपने -अपने मतदाताओं को यह बताने की जुर्रत उठायेगा? केंद्रीय मंत्री रह चुके 5 बार के सांसद दादा भी एक उद्योग नही ला पाएं ? हम सबके चहेते मामा जी इस नगरी को प्राणों से ज्यादा प्यारी कहते रहे। मगर जनता को रोजगार के अवसर नहीं मिले।
जब -जब रोजगार की बात आई इंदौरी जनप्रतिनिधियों ने हर बड़ी योजना को हमसे छीन लिया! उनकी भी क्या गलती। पॉवर था-विजन था-और अपने मतदाता के प्रति जिम्मेदारी का भाव था। तो उन्होंने वहीं किया। राजनीति में समय पर फायदा उठाना ही असली राजनीति की निशानी है।

अब अगर अपने विकासपुरुष इसका सदुपयोग कर रहे है। शहर में उन उद्योगों को लाने की कोशिश कर रहे है। जिनकी ना तो कल्पना थी और ना इनके नाम कभी सुने थे।भले ही अभी यह कारखाने धरातल पर नजर नहीं आ रहे है। मगर नीव तो रखी जा चुकी है। 2028 तक कई उद्योगों की शुरुआत हो चुकी होगी। जिसमें योग्यता के आधार पर ज्यादा न सही,कुछ हजार लोगों को तो रोजगार मिलेगा। याद रखे इंदौर भी महानगर तभी बन पाया।जब उसको पीथमपुर जैसी इंड्रस्ट्री मिली। वही मौका इस शहर को दशकों बाद मिला है।

इस शहर से 1972 में एक मुख्यमंत्री बने थे स्व.प्रकाशचंद्र सेठी। उनके कार्यकाल में इस शहर की पहचान टेक्सटाइल के रूप में थी।मगर धीरे धीरे सब बंद हो गई।हजारो परिवार बेरोजगार हो गए।
उसके बाद से एक भी उद्योग स्थापित नही हुआ।अब जाकर 53 साल बाद यह स्वर्णिम अवसर आया है। जो उज्जैन को केवल धार्मिक नगरी के रूप में नही,बल्कि उद्योग नगरी के रूप में पहचान देगा।

इसलिए गुजारिश/इल्तजा/निवेदन है।अपने अपने निजी ईगो*को 28 तक के लिए किसी खूंटे पर टांग दीजिये। जनता ने आप सभी को चुनकर इसलिए नही भेजा है।शहर के विकास में बाधक बनो,बल्कि इस विश्वास के साथ चुना कि आप सभी एकजुट होकर विकास के पथ पर सहभागिता का सफर तय करेंगे। तभी आने वाली नस्लें आपकों याद रखेंगी। अमर कोई नही रहने वाला। काम ही अमर रखते है। आने वाली पीढ़ी को कुछ ऐसा देकर जाएं। ताकि दादा अपने पोता-पोती  को,पिता-पुत्र को और यह दोनो अपनी पीढ़ी को और आज के युवा आने वाली भविष्य की पीढ़ी को *आप सबका नाम गर्व से बता सके।वरना कोई नाम लेने वाला नही बचेगा। याद रखे शायर नदीम शाद का यह अशआर...
तुम खुदा तो नहीं हो नदीम एक दिन तुम भी मर जाओगे
फिर तक्कवुर भला किसलिए तुम कहाँ से अलग हो गए

आप सभी जनप्रतिनिधियों से जनता की तरफ से अनुरोध है।
ये वक्त मिलकर-एकजुटता दिखाने का है। एक दिन बाद ही  गणतंत्र -दिवस है। तो दिल के अंदर पनप रही जलन को हटाकर ,इस नगरी को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि उद्योग नगरी का खिताब दिलाने के लिए पहला-कदम उठाए। उस तिरंगे और लोकतंत्र की कसम खाएं। जिसके कारण आप आज माननीय कहलाते है।

यहाँ यह लिखने में हमकों आपत्ति नही बल्कि गर्व है कि मध्य प्रदेश औधोगिक विकास निगम के उज्जैन संभाग मुखिया राजेश राठौर की भूमिका सराहनीय रही है। जब एक अधिकारी अपनी मिट्टी का कर्ज उतारने के लिए तत्पर है,तो आप पर तो माननीय की मोहर लगी है।जिसे हम जनता ने इसीलिए चुनकर भेजा है कि.....

माननीयों, इगो खूंटे पर टांग दो, नहीं तो उज्जैन के हाथ फिर कुछ नहीं लगेगा...? बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।