15 जून 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
हंगामा है क्यो बरपा...
पाठकगण यह अंदाजा नहीं लगाए। हम गुलाम अली साहब की ग़ज़ल थोड़ी सी जो पी ली है की कोई घटना लिख रहे है। हमारा इशारा तो मंदिर की अलसुबह होने वाली आरती -अनुमति की तरफ है। जिसको लेकर हंगामा बरपा हुआ है। अनुमति बेचने का। यह कोई गोपनीय घटना नही है। ओपन -सीक्रेट है। सभी जिम्मेदारों को यह पता है। बरसों से धंधा फल-फूल रहा है। अपने मामा जी के कार्यकाल में तो चरम पर था। तब जिले के मुखिया नम्बर-1 थे। उन्होंने इसको पकड़ा था। सीडीआर तक जप्त की थी। तब भी हंगामा बरपा था। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला था। अब एक बार फिर बोतल से जिन्न बाहर निकला है। जिसका राजनीतिक मकसद है ।विकासपुरुष के गृह नगर पर दाग लगाना है। इस पर अंकुश लग नही सकता है। अगर कोटा खत्म हो जाए तो जरूर कमी आ सकती है। वरना अनुमति बिकेगी-शिकायत होगी-एफआईआर भी होगी। अब फैसला विकासपुरुष को लेना है।वरना अनुमति बेचने की घटनाएं हमेशा होती रहेगी। ऐसी चर्चा मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रही है। चर्चा में दम है और आदत अनुसार चुप रहना हमारा कर्म है।
फैसला नहीं देते..
शायर नवाज देवबंदी का अशआर है। आजकल ना जाने किस कशमकश में है मुंसिफ/बहस रोज सुनते हैं फैसला नहीं देते। यह शे'र इन दिनों दाल-बिस्किट वाली तहसील में सुनाई दे रहा है। मामला कस्बे की 4 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। जिसमें निशाने पर इस है तहसील के राजस्व मुखिया। जिन्होंने फैसला तो सुनाया।मगर पूरे 12साल बाद। जिसमें उन्होंने गजब की हिम्मत दिखाई। 2014 में तहसीलदार रहते हुए जो फैसला दिया था। उसको उसी तहसील में पुनः पदस्थ होने के बाद इस साल 30 जनवरी को बदल दिया। मतलब पहले जिनके पक्ष में निर्णय दिया था। उसको 12 साल बाद विरोधी के पक्ष में सुना दिया। जबकि राजस्व नियम अनुसार उनको इस प्रकरण को सुनने का अधिकार ही नहीं था। इसके बाद भी मीठे बोल-बड़े अनमोल अधिकारी ने ऐसा कर दिया। जिसको लेकर उस आईएएस अधिकारी के न्यायालय में अपील हुई। जिनकों अपने पिस्तौल कांड नायक ने हेलीपेड पर खरी -खोटी सुनाई थी। उस वक्त जब विकासपुरुष उड़नखटोले पर सवार हो रहे थे। अपील सुनने वाले आईएएस अधिकारी ने मीठे बोल-बड़े अनमोल को दोषी पाया है। अपने फैसले में साफ -साफ लिखा है। अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दिया है। जिसकी प्रतिलिपि अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी को भी प्रेषित की है। इधर दाल-बिस्किट वाली तहसील में चर्चा है। इस फैसले के पीछे खोखे में लेन-देन हुआ है। इसमे कितना सच है। मीठे बोल-बड़े अनमोल जानते है या जिनके पक्ष में निर्णय हुआ वह। लेकिन यह सच है। फैसला गलत हुआ है। अब देखना यह है कि उम्मीद जी इस मामले में विभागीय जांच शुरू करते है या उज्ज्वल जी मीठे बोल-बड़े अनमोल को संकुल में बैठाते है। इस फैसले का इंतजार करते हुए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बाहरी दलाल...
पिछले सप्ताह चुप ने दो ग्राम देवताओं की दलाली का उल्लेख किया था। इनकी दलाली तबादला नीति पर चलती है। कोई भी इनका बाल-बांका नही कर सकता है। कारण राजनीतिक प्राश्रय है। लेकिन संकुल के गलियारों में एक और दलाल है। जिसको डॉ दलाल बोला जाता है। इनकी बैठक संकुल के बाहर बना लायंस प्रतीक्षालय है। जहाँ बैठकर यह अपने क्लाइंट पकड़ते हैं। राजस्व के मामले वाले। इनकी पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। राजस्व न्यायालय के हर रीडर से इनका गहरा याराना है। उन्हेल और खाचरोद से तो सीधी डीलिंग है। यह वही दलाल है। जिस पर एक आईएएस एसडीएम ने अपने कार्यकाल के दौरान संकुल में दिखाई नहीं देने का प्रतिबंध लगाया था। यह आईएएस इन दिनों देवीआहिल्या में पदस्थ है। बहरहाल इन दिनों डॉ दलाल की दुकान जमकर चल रही है। देखना यह है कि इस दलाल पर अंकुश लगता है या नहीं? तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
निजी वास्तुशिल्प...
शिवाजी भवन के एक आलाधिकारी अपने निजी वास्तुशिल्प पर ज्यादा भरोसा करते है। मूलपद सहायक यंत्री है। मगर टॉप पद पर विराजमान है। ज्ञान का अजीरण है। इसलिए इंजीनियरिंग कालेज से स्वीकृत ड्राइंग-डिजाइन पर भी भरोसा नहीं करते है। उनका विश्वास केवल अपने भोपाली वास्तुशिल्प पर है। तभी तो कोई भी ठेकेदार जब सरकारी डिजाइन दिखाता है। तो साहब निजी वास्तुशिल्प से मिलने की नसीहत देते है। ठेकेदार की मजबूरी है। वह मिलता है और निजी शिल्प से मोहर लगवाता है। इसके लिए उसको अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ती है। उसके बाद डिजाइन पर मोहर लग जाती है और ठेकेदार काम शुरू कर देता है। ऐसा हम नहीं, बल्कि पीड़ित ठेकेदारों का कहना है। कुछ दबी जुबान से यह बोल रहे है। साहब ने अतिरिक्त इंकम यह रास्ता निकाला है। बात में दम है, मगर आदत के अनुसार चुप रहना हमारा कर्म है।
182 फीट ऊंची प्रतिमा...
फ़िल्म का नाम तो हमकों याद नहीं है। मगर उस फ़िल्म का एक डायलॉग बहुत चर्चित हुआ। जिसमे विलेन कहता है। मेरे जैसा चतुरपन कहां से लाओगे? यह डायलॉग अपने इन्दौरीलाल पर सटीक बैठता है। जिन्होने अपनी लकीर बड़ी करने के लिए नया खेला कर लिया है। जिसके लिए सहारा लिया है श्रीकृष्ण लोक का। जो कि यूनिट मॉल के पास बनना है। पहले यहाँ पर श्रीकृष्ण की प्रतिमा की ऊंचाई कम थी। मगर अब बदलाव हुआ है। 182 फीट ऊंची प्रतिमा बनेगी। इस पर मोहर भी आसानी से लग जाएगी। कारण -सर्वविदित है। अपने विकासपुरुष के आराध्य श्रीकृष्ण है। अब देखना यह है कि अपने इन्दौरीलाल जी का चतुराई क्या गुल खिलाती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अपलोड नहीं तो वेतन नहीं..
अपने उम्मीद जी हर दिन दौड़ रहे हैं।निरीक्षण करने। उज्ज्वल जी और एंग्रीमैन भी। लक्ष्य तीनों का एक है। समय सीमा में फैला -रायता समेटना। मगर नीचे की टीम है कि निर्देश तो सुनती है। लेकिन अमल करने में पीछे रह जाती है। तभी तो उम्मीद जी ने समीक्षा बैठक में फरमान जारी कर दिया। जिस-जिस अधिकारी ने साइट पर जाकर पिछले तीन दिनों की प्रगति के फ़ोटो अपलोड नहीं किए हैं। उन सभी का एक-एक दिन का वेतन काट लिया जाए। मगर हमारा अनुभव कहता है। जिस जिस का वेतन कटेगा। वह ठेकेदार से दुगनी वसूली कर लेगा। वेतन कटौती या पेनल्टी लगाने से कुछ नहीं होने वाला। उम्मीद जी को कोई ऐसी सजा तलाश करनी होगी। जिससे मातहतों को बाबा तुलसी की चौपाई भय बिनु होई न प्रीत गुसाईं 24×7 याद रहे। हमकों पूरा भरोसा है। उम्मीद जी कोई तरकीब निकाल लेंगे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
'सैंपल मैनेजमेंट सेंटर'?"
चुप रहेंगे.कॉम के पाठकों को याद होगा कि पिछले वर्ष किसानों के हितों की रक्षा का जिम्मा संभालने वाले विभाग में एक ऐसे अधिकारी की एंट्री हुई थी, जो अब संभागीय स्तर का प्रभार भी संभाल रहे हैं। इनके कार्यकाल में नियमों से ज्यादा "सेटिंग" की चर्चा होती है और वसूली के नए-नए मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। ताजा मामला उर्वरकों के नमूनों की कथित अदला-बदली का है। बताया जा रहा है कि जिलों से लिए गए उर्वरक सैंपलों के बाद संबंधित कंपनियों के प्रतिनिधियों को बुलाया जाता है और संभागीय स्तर पर कथित रूप से "मास्टर सैंपल" से मिलान के नाम पर खेल खेला जाता है। सूत्रों का दावा है कि शाखा प्रभारी बाबू की निगरानी में तीन-चार जिलों के नमूनों में हेराफेरी कर फेल होने वाले सैंपलों को पास कराने की व्यवस्था बनाई जा रही है।मगर मुफ्त में नहीं। रेट फिक्स है।10 हजारी प्रति सेंपल।अभी तक 5 पेटी का खेल हो चुका है।ऐसी अन्नदाताओं से जुड़े विभाग में चर्चा चल रही है। खेल हो रहा है। जो माल पीट रहे है, उनका तो चुप रहना लाजिमी है, मगर देखने वाले भी चुप है। तो हमारा तो काम ही है चुप रहना।
याद आ गए साहब...
आमतौर पर तबादला होते ही कुछ दिन बाद जनता अफसरों को भूल जाती है। मगर इस डिजिटल दुनिया मे अब ऐसा नहीं होता है। खासकर तब ,जब उस अफसर की कोई वीडियो सोशल मीडिया वायरल हो जाए। पिछले सप्ताह एक वायरल वीडियो में साहब-मरीज का इलाज करते दिखे। जिसको देखकर अपनी दाल -बिस्किट वाली तहसील की जनता शिद्दत से साहब को याद करने लगी। कोविड -2 में पदस्थ थे। सुविधाभोगी साहब। उनके कार्यकाल में जनहित में दान का हिसाब -किताब किसी को नही मिला। इतना ही नहीं जब तबादला हुआ। तो साहब ने सामान ऐसा समेटा था कि नल की टोटियां तक गायब मिली थी। उसके बाद किसी को कभी उनकी याद नहीं आई । मगर अब वीडियो देखकर सब उनको याद कर रहे है। लेकिन हमकों यह पता नहीं है। साहब को हिचकी आ रही है या नहीं? क्योंकि किसी शायर ने लिखा। कौन है जो मुझे याद करता है/बेवजह तो हिचकियाँ आने से रही। अब उनको हिचकी आई या नहीं।यह तो साहब ही बता सकते हैं। जिनसे हम तो पूछ नही सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पंजाप्रेमियो में अमावस कौन...
अपने पँजाप्रेमी इन दिनों एक पुरानी फ़िल्म का उल्लेख कर रहे है।जिसके मुख्यपात्र स्वर्गीय अभिनेता कादर खान और मिठुन चक्रवर्ती है। कादर खान ने मालिक का रोल निभाया ओर मिठुन ने नोकर का। उनका फ़िल्म में नाम अमावस है। जो इतना आज्ञाकारी है। कभी मालिक के सामने नही बैठता है-हाथ बांधकर रहता है और मीठी-मीठी बात करता है। मालिक खुश होकर उसको चुनाव में खड़ा कर देता है। वोटो की गिनती शुरू होने से पहले तक अमावस अपना रंग नही बदलता है। घोषणा होती है। 5हजार वोट से आगे। बस यहां से वह गिरगिट का रूप धारण करता है। फिर अंतिम चरण में 75 हजार से जीत की जैसे ही घोषणा होती है। अमावस का रंग गिरगिट की तरह बदल जाता है। कुर्सी पर बैठ जाता है। मालिक को नाम से बुलाता है। खुद के नाम का नारा लगाने का आदेश देता है। इस चरित्र पर शहर के एक पँजाप्रेमी नेता खरे उतरते है। जबकि जब यह छात्र राजनीति में आए थे। तब इनकी फीस भी अपने पँजाप्रेमी साथीगण भरते थे। आर्थिक रूप से भी इनको आगे बढ़ाया। तब यह अमावस का रोल बखूबी निभाते थे।मगर जैसे ही जीते-तो इतने आगे बढ़ गए कि अब पँजाप्रेमी संस्था में दो-फाड़ कर दी और किसी की नही सुन रहे है। पँजाप्रेमी तो यह तक बोल रहे है। 18 महीने की सरकार में राजधानी में इनको खुलकर अमावस के नाम से बुलाया जाता था। तभी तो पँजाप्रेमी फ़िल्म जल्लाद को याद कर रहे है। यू-ट्यूब पर इस फ़िल्म को सर्च करके इलेक्शन सर्च करके करके देखिए। समझ में आ जाएगा।अमावस आखिर कौन है? ऐसा अपने पँजाप्रेमी बोल रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
क्लब संस्कृति...
संघ हमेशा भारतीय विरासत को बचाने और उसके उत्थान के लिए काम करता आया है। जिस पर हर हिंदू को गर्व है। इसी कड़ी में समाज मे व्याप्त क्लब-संस्कृति को खत्म करने के लिए भी एक संगठन है। विकास -परिषद। जिसमें परिवारों को जोड़कर गठन किया जाता है। इसके नाम सांस्कृतिक विरासत पर होते है। पिछले दिनों ऐसे ही तीन नदियों के संगम वाले नाम का शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। जिसकी विशेषता यह रही। शपथ समारोह उस जगह पर हुआ। जिसके नाम के पीछे क्लब शब्द लगा है। कभी इस क्लब में शाम होते ही सोमरस पीने वाले धनाढ्य वर्ग की भीड़ लगती थी। शराबबंदी के कारण अब सूनापन रहता है। मगर सवाल यह है। क्लब संस्कृति को खत्म करने वाली संस्था का क्लब में शपथग्रहण करना कहाँ तक जायज है। फैसला पाठकगण खुद कर लें। हमकों तो बस चुप रहना है।
कोई नहीं रोक सकता...
ऊपर लिखा हंगामा है क्यों बरपा तो पाठकगण पढ़ चुके हैं। अब इसका ताजा सबूत पेश करते है। रविवार की सुबह हुई आरती का। जिसमें करीब 85 की अनुमति बनी थी। लेकिन 220 लोगो ने वीआईपी बनकर आरती का आनंद लिया। वह भी नंदी हॉल में बैठकर। मजाल है कि कोई रोकने की हिम्मत जुटा पाता। कारण-सबकों अपनी नोकरी प्यारी है। इन सभी के लिए स्थान भी आरक्षित रहता था। कोई दूसरा वीआईपी इस आरक्षित स्थान पर बैठना तो दूर ,सोच भी नहीं सकता है। मतलब उम्मीद जी,अल्फा जी,डेल्टा जी,उज्ज्वल जी,कप्तान जी ,एंग्रीमैन आदि की सिफारिश से बनी अनुमति का गेस्ट इस आरक्षित स्थान पर नहीं बैठ सकता है। इसके अलावा इन विशिष्ट अतिथियों को अंदर तक लाने के लिए अलग से रास्ता बनाकर लाया जाता है। जबकि आम भक्तगण बेरिकेड्स से गुजर कर आते है। यह घटना तब हुई है। जबकि इतना हंगामा बरपा हुआ है। इस अनुमति में संकुल में विराजमान एक सहायक का अमूल्य योगदान रहा है। उसकी भी मजबूरी है। अपनी नोकरी बचाने की। ऐसी चर्चा सुबह की आरती में ड्यूटी देने वाले दबी जुबान से कर रहे है। जिसकी पुष्टि सूत्र भी कर रहे है। ऐसे में अगर चुप रहेंगे दावा कर रहा है । कोई नहीं रोक सकता! तो गलत क्या है। बाकी पाठकगण जानते ही है। हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।
मेरी पसंद
शायरी चीखने चिल्लाने से होती है खराब।
इसमें हल्के से कही जाती है भारी बात।
अब्बास कमर