22 जून 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
वजनदार जी का वजनदार बयान!
महाकाल मंदिर के गर्भगृह विवाद पर वजनदार जी ने फिर वही अमर वाक्य बोला—"मुझे पता चला है, पूछता हूं, मांग रखूंगा..उज्जवल जी से फोन पर बात की है ..विकासपुरुष से मांग रखी है..2 घण्टे सबको प्रवेश मिले.. आदि"। सुनकर लगा जैसे अपने वजनदार जी नहीं, मोहल्ले की शिकायत समिति के सदस्य बोल रहे हों। पांच लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधि अगर हर बार केवल "मांग" ही रखते रहें, तो जनता पूछेगी कि फिर "निर्णय" कौन लेगा? वीआईपी दर्शन गलत हैं, यह बात तो वर्षों से कही जा रही है। नया क्या है? कार्रवाई का आश्वासन नहीं, केवल लाचारी का प्रदर्शन। कमलप्रेमी अब तंज कस रहे हैं—"वजनदार जी का बयान भारी था, बस उसमें वजन ही नहीं था!" तो गलत क्या बोल रहे है। उनके करीबियों का कहना है। इससे अच्छा तो बयान ही नहीं देते। चुप रहते। करीबियों की बात में दम है और हमेशा की तरह चुप रहना हमारा धर्म है।
फिर खिसक गया स्थान...
सिंहस्थ-2028 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। तैयारियों के दावे भी पूरे शबाब पर हैं। नक्शे बन रहे हैं, प्रस्तुतियां चल रही हैं और बैठकों में विकास की रफ्तार किसी बुलेट ट्रेन से कम नहीं दिखाई जा रही। मगर जमीनी हकीकत कभी-कभी फाइलों की रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पाती। जिस अंडर बायपास ( ज्ञान सागर के पास )का काम अब तक शुरू हो जाना चाहिए था, वह शुरू तो नहीं हुआ, लेकिन उसका स्थान जरूर बदल गया। बताया जा रहा है कि बायपास करीब 6 मीटर खिसका दिया गया है। अब छह मीटर सुनने में भले छोटी दूरी लगे, लेकिन सरकारी योजनाओं में कई बार यही छह मीटर करोड़ों की गणित और कई लोगों की राहत या परेशानी तय कर देते हैं। मजे की बात यह है कि इस परियोजना के लिए रेलवे को 21 करोड़ रुपये भी अनुबंध के तहत दिए जा चुके हैं। यानी रकम अपनी मंजिल की ओर बढ़ गई, लेकिन परियोजना अभी भी अपनी सही जगह तलाश रही है।नतीजा कमलप्रेमियो फुसफुसाहट है कि स्थान परिवर्तन के बाद अपने हाइनेस के करीबी एक कमलप्रेमी नेताजी की होटल अचानक परियोजना की जद में आ गई है। अब देखना यह है कि होटल पर बुलडोजर चलता है या नहीं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जिज्जी मुसीबत में...
अपनी जिज्जी के लिए मुसीबत का आगाज हो गया है। उनके क्षेत्र से 3 गए है-13 आए है। इशारा ग्राम देवताओं की तरफ है। ये सभी 13 ग्राम देवता जुगाड़ से आए है। इसमें अपने पँजाप्रेमी बटला जी के अनुज भी शामिल है। ये 13 साम-दंड-भेद में पीएचडी है। जो जनहित से ज्यादा स्वहित को महत्व देते हैं। ऐसे में अब जिज्जी के लिए इनको हल्के देना सबसे बड़ा सवाल है? वजह सभी राजनीतिक प्राश्रय रखते है और इनको वही हल्के चाहिए। जहां इनका जनहित के बदले स्वहित पूरा हो? अब देखना यह है कि अपने गुरु उत्तम जी के अंडर में रहकर राजस्व की बारीकियां सीखने वाली अपनी जिज्जी इन 13 से कैसे निपटती है। क्योंकि यह कटू सत्य है। मनपसंद हल्का नहीं मिलने पर विवाद तो होगा? इसीलिए संकुल के गलियारों में जिज्जी मुसीबत में सुनाई दे रहा है। अब देखना यह है कि जिज्जी इससे कैसे निपटती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
इशारा जी का प्रवास...
अपने इशारा जी शहर में दो दिन रुक कर निकल गए। किसी को खबर तक नहीं हुई। केवल उम्मीद जी,उज्ज्वल जी,और एंग्रीमैन को पता था। आश्चर्य इसलिए कि इशारा जी और सुर्खियों का चोली-दामन का रिश्ता है। लेकिन इस दफा बिल्कुल उलट रहा। एक दिन पहले आ गए थे। बैठक में भी शामिल हुए। फिर कोई दौरा नही-बस --मैं ओर मेरी तन्हाई की तर्ज पर होटल में रुके रहे। जबकि उनके विभाग के सैकड़ों काम चल रहे है। जिसके चलते कयास लगाये जा रहे है। इस बार उनकी यात्रा का मकसद दौरा नही था,बल्कि उन लोगों से मुलाकात करना था। जो कि विभाग के काम 2028 के लिए कर रहे है। उन्ही से मुलाकात करने के लिए बाहर नहीं निकले। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। अब ठेकेदारों से मुलाकात का मतलब क्या होता है। यह हमें लिखने की जरूरत नहीं है।क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
नोटिस पर धमकी...
अपने पिस्टल कांड नायक के क्षेत्र की घटना है। जहाँ पदस्थ ग्राम देवता को नोटिस थमाया गया। यह बात ग्राम देवता को खल गई। उन्होने अपने बड़े भाई से गुहार लगाई। जो कि उच्च पद पर विराजमान है। वर्दीधारी है तो ठसक होना स्वाभाविक है। उन्होंने तहसील के मुखिया को फोन लगाया। वर्दी की स्टायल में चमकाने लगे। राजस्व मुखिया ने कुछ देर तो सहन किया। फिर पलटकर जवाब दे दिया। गलती करी है तो नोटिस दिया है और काम नियमानुसार ही होगा। वर्दीधारी अधिकारी को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। आखिर अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी है। जवाब सुनकर उन्होंने चुपचाप फोन रख दिया। मगर अब ग्राम देवताओं में नोटिस पर धमकी की चर्चा सुनाई दे रही है। देखना यह है कि नोटिस पर धमकी दिलाने वाले ग्राम देवता पर अब क्या कार्रवाई होती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पोस्टर से गायब-इंतज़ार भी किया
अपने वजनदार जी की किस्मत में कोई तो राहु -केतु ग्रह बैठा है। जो उनको तकलीफ दे रहा है। उनके मान-सम्मान में आड़े आ जाता है।ताज़ा दो मामले है। दिल्ली से मंत्री जी आए थे। वजनदार जी गुलदस्ता लेकर पहुँचे। लेकिन 30 मिनिट इंतज़ार करना पड़ा।तब जाकर गुलदस्ता दे पाए और फ़ोटो खिंची। फ़ोटो से याद आया। अगले दिन यूनिटी मॉल का निरीक्षण था। तो पोस्टर लगे थे। मगर इसमे से वजनदार जी फ़ोटो गायब था। जिसकी शिकायत वजनदार जी ने एसीएस साहब को दर्ज कराई है। मगर होगा क्या? इससे बेहतर होगा। कोई पूजा-पाठ करवा लें,मगर अपने खर्चे पर। ऐसा अपने कमलप्रेमियो का कहना है और हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है
भुजंगासन-पद्मासन-आश्वासन...
ऊपर लिखे शीर्षक को पढ़कर पाठकगण समझ गए होंगे। हमारा इशारा किस तरफ है। बिलकुल सही समझ रहे। जो आपके दिमाग ने शब्द योग आया। उसी की बात लिख रहे है। एक तस्वीर देखी। जो सरकारी भोंपू ने जारी करी है। जिसमें अपने उज्ज्वल जी,कप्तान जी तो भुजंगासन सही कर रहे है। मगर उनके बगल में मौजूद अपने दालवाले नेताजी को मुश्किल हो रही है। बेचारे-वजन के मारे-अपने दोनो हाथों पर जोर देकर खड़े होने की नाकाम कोशिश करते दिख रहे है। अब बात दूसरे पद्मासन की। जिसमें बैठकर दोनो पैर को अपनी जांघ पर रखना पड़ता है। इसमें अपने जिले के प्रभारी बाऊ जी फिसड्डी रह गए। देखने वालों का कहना है। 10 सेकंड भी बाऊ जी इस आसन को नहीं कर पाए। कारण -हर कोई विकासपुरुष नही हो सकता है। जो योग को जीवन मे उतार लें। साल में एक दिन योग करेंगे तो यही होगा। वैसे योग में एक वेराइटी और जोड़ना चाहिए। जिसका नाम आश्वासन योग होना चाहिए। क्योंकि हमारे नेतागण इसमें पीएचडी नही डि-लिट् है। ऐसी चर्चा योगस्थल पर सुनाई दी है। प्रस्ताव स्वागत योग्य है। शायद अगले साल योग दिवस पर यह योग भी होने लगे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
सम्मेलन और '10 पेटी' का कृषि मॉडल!
कहते हैं कि कृषि में नवाचार जरूरी है। लेकिन उज्जैन में तो कथित तौर पर ऐसा नवाचार सामने आया है कि कृषि वैज्ञानिक भी माथा पकड़ लें। देवी अहिल्या नगरी में अभी कृषि सम्मेलन हुआ है। जिसमें बाबा की नगरी के एक अधिकारी ने दिमाग लगाया। जब सम्मेलन कृषि का है तो "फसल" स्थानीय स्तर पर भी काटी जानी चाहिए। नतीजा जिले की बीज उत्पादन कंपनियों से फोन पर सहयोग राशि के नाम पर लगभग 10 पेटी की फसल काट ली गई। जिस अधिकारी ने फसल काटी है। उनका तबादला हो गया है।मगर उनका मन जाने का नही है।तभी दावा कर रहे है सबसे दिलचस्प प्रसंग ट्रांसफर का है कि "रिटायरमेंट भी यहीं से होगा। फिलहाल जिले में चर्चा यही है कि सम्मेलन खत्म हो गया, मेहमान लौट गए, मंच हट गए, पोस्टर उतर गए, लेकिन "10 पेटी" की कहानी अभी भी हवा में तैर रही है।जिसमे हम क्या कर सकते हैं। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
दूरभाष पर फटकार...
भरतपुरी विकास भवन के नए मुखिया(नामकरण होना है) बाबा के रोजाना दर्शन वाले भक्त हैं। प्रोटोकॉल से कोई भी इ-कार्ट में बैठ जाते है। जो खाली नजर आ जाए। पिछले दिनों वह जिस वाहन में बैठे। उसको सुरक्षा अधिकारी अपनी बपौती मानते है। उन्होंने वाहन गायब देखा। तो चालक को फटकार लगाई और उसे निकाल दिया। गरीब चालक ने विकास भवन के मुखिया को जाकर सच बताया। बस फिर क्या था।खुद को विकासपुरुष का सखा बताने वाले सुरक्षाधिकारी की जमकर लू उतारी। सीधी भाषा में समझा दिया। रिटायर हो चुके हों?हवा में मत उड़ो?वरना जितनी ऊंचाई पर उड़ रहे हो-उतनी तेजी से नीचे गिरोगे और इस उम्र में हड्डी टूटने पर जुड़ती नहीं है। मुखिया की फटकार ने सुरक्षाधिकारी को जमीन पर ला दिया है।लेकिन उन पर अभी और अंकुश की जरूरत है। खासकर उनकी इस गन्दी आदत पर। दर्शन करवाने नाम पर अपनी जेब गर्म करने की आदत से पूरा मंदिर वाकिफ है। वर्दी की आदत बरकरार है। इस पर भी अगर कोई उनको फटकार के साथ अंकुश लगा दे। तो सोने पर सुहागा हो जाए।अंदरखाने की खबर है। सुरक्षाधिकारी के कारनामों की भनक अपने विकासपुरुष के कानों तक पहुँच चुकी है। कयास लगाये जा रहे है। शायद अगला एक्सटेंशन नहीं मिले।फैसला विकासपुरुष को करना है । ऐसी चर्चा मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रही है। जो कि सच भी है। मगर हमारी मजबूरी है चुप रहना।
धमक हो तो ऐसी...
अपने दालवाले नेताजी को संगठन कैसे चलाए? इसमे महारथ हासिल है,भले ही भुजंगासन में नहीं हो। ऐसा हम नही,अपने कमलप्रेमी बोल रहे है। एक घटना का हवाला देते हुए। जो करीब दो सप्ताह पुरानी है। उन्होंने बैठक बुलाई थी। सभी कमलप्रेमी नगरसेवकों की। मकसद था। अगले साल चुनाव होना है। इसलिए सभी अपने अपने वार्ड में जनकल्याण शिविर लगाए । जनता की समस्या का निराकरण करें। जिसमे दो नगरसेवक गायब थे । एक तो वह नगरसेवक जो दंत चिकित्सा डॉ के कारण नागझिरी क्षेत्र में चर्चित है। दूसरे प्रथम सेवक के मंत्रिमंडल में शामिल नगरसेवक। पहले नागझिरी के कारण प्रसिद्ध नगरसेवक को फोन किया गया। उनको दालवाले नेताजी ने हिदायत दी। तत्काल हाजिर हो?क्या बड़े नेता बन गए हो?दूसरे मंत्रिमंडल के सदस्य को लेकर सवाल किया। जवाब आया। उनके क्षेत्र में आज भूमिपूजन है। तो नेताजी ने फरमान सुनाया। अपनी बहन जी के सामने। कोई भी भूमिपूजन में नहीं जाएगा। उसके बाद वह नगरसेवक भी तत्काल हाजिर हो गए। तभी तो अब अपने कमलप्रेमी बोल रहे है। धमक हो तो ऐसी। जिससे हम भी सहमत है। संगठन भय बिना नहीं चल सकता है। जिसके लिए दालवाले नेताजी को साधुवाद देते हुए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
हाइनेस की जिद्द...
अपने हाइनेस भी कभी-कभी बच्चों जैसी जिद करने लगते है। जबकि उनसे उम्मीद की जाती है। वह बचपना छोड़ दें। तीन दिन पहले एक घटना हुई। उस टनल पर जिसका निरीक्षण करने केंद्र से पधारे अतिथि,विकासपुरुष और 2 नम्बरी नेताजी आदि पहुँचे। अनुमति 8 की थी। पहले 4 अफसर गए। जिनको टनल की प्रगति बतानी थी। फिर बाकी गए। इस बीच अपने हाइनेस को जिद सवार हो गई। वह भी हेलमेट आदि पहनकर तैयार हुए। तब तक लिफ्ट अतिथि ओर विकासपुरुष को लेकर चल दी। इधर बाहर खड़े हाइनेस ने जिद पकड़ ली। अंदर जाना है। उनसे वर्दी और राजस्व मैडम ने आग्रह भी किया। इजाजत नहीं है। लेकिन हाइनेस अड़ गए। 200 फीट अंदर गई लिफ्ट को वापस आने में टाइम लगा। फिर अपने हाइनेस रवाना हुए। जब तक वह अंदर पहुँचे। तब तक जिस मकसद से हाइनेस गए थे। फोटोशूट की इच्छा। वह पूरा हो गया। जिसके बाद सब बाहर आ गए, लेकिन हाइनेस को आने में समय लगा। इधर अतिथि का काफिला रवाना हो गया। हाइनेस के साथ गए कमलप्रेमी नेतागण उनके इंतजार में खड़े रहे और उनकी जिद का मजाक उड़ाते रहे। जब वह अंत में बाहर आए ,तब सभी कमलप्रेमी सीधे सांवेर के लिए निकले। ऐसा उन कमलप्रेमियो का कहना है। जो साथ थे। जिसके बाद इस जिद की चर्चा कमलप्रेमी चटकारे लेकर सुना रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। जुबान तो पकड़ नहीं सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अनुमति बनाम बगैर अनुमति..
मंदिर के गलियारों में चर्चा आम है। किसी आम इंसान को अलसुबह की आरती अनुमति के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे विशिष्ट अतिथि आते है। जो बगैर अनुमति के सीधे प्रवेश कर जाते है। ऐसे लोगो का पिछले सप्ताह का आंकड़ा 611 का रहा है। जिन्होंने आरती का लाभ लिया। हालांकि अपने फटाफट जी कोशिश करते है। ऐसा नहीं हो पाए। लेकिन अभी तक तो उनकी कोशिश नाकाम साबित हो रही है। अब शायद बाबा महाकाल ही कोई चमत्कार दिखाए। ऐसा मंदिर की व्यवस्था में लगे लोगो का कहना है और हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
मेरी पसंद---
रास्ते भी निकलेंगे, रिश्ते भी बचेंगे
"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा।"
उज्जैन सदियों से आस्था और सहअस्तित्व की भूमि रहा है। यहां मंदिरों की घंटियां और मस्जिदों की अजान कभी प्रतिस्पर्धी नहीं रहीं, बल्कि शहर की साझा सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बनी हैं। ऐसे में सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच सड़क चौड़ीकरण को लेकर उठी चिंताओं का समाधान भी संवाद और विश्वास से ही निकलेगा।विकास किसी एक समुदाय की जरूरत नहीं, पूरे शहर की आवश्यकता है। चौड़ी सड़कें, बेहतर यातायात और सुगम आवागमन का लाभ हर नागरिक को मिलेगा। वहीं धार्मिक आस्थाओं का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह पूरी पारदर्शिता के साथ सभी पक्षों को विश्वास में ले और यह सुनिश्चित करे कि नियम सबके लिए समान हों। उज्जैन का इतिहास बताता है कि यहां विवादों से अधिक संवाद की परंपरा मजबूत रही है। यही कारण है कि बड़े से बड़े सामाजिक मुद्दों का समाधान आपसी सहमति से निकला है। आज भी आवश्यकता टकराव की नहीं, बातचीत की है। यदि प्रशासन संवेदनशीलता दिखाए और समाज धैर्य रखे, तो ऐसा रास्ता अवश्य निकलेगा जिसमें विकास भी आगे बढ़े और सामाजिक सौहार्द भी मजबूत हो। आखिर शहर की पहचान केवल उसकी सड़कों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बीच बने विश्वास से होती है।इससे ज्यादा हम क्या लिखे। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।