08 जून 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
बैठक मीठी-आइस्क्रीम फीकी...
अभी तक तो अधिकारियों से यही सुनने को मिलता था। बैठक से निकलने के बाद। तीखी-फटकार और मसालेदार रही। लेकिन पहली दफा ऊपर लिखी हेडिंग बैठक के बाद अफसरों के बीच सुनाई दी। शनिवार को यह सम्प्पन हुई। पहले तो ऐन वक्त पर स्थान बदला गया। संकुल से निकलकर सब स्मार्ट भवन पहुँचे। बैठक अन्नदाता से जुड़े सभी विभागों की थी। जिसमें शामिल होने के लिए राजधानी के आलाधिकारियों का दल आया था।संभाग के सभी जिलों के कलेक्टर-सीईओ और तमाम अफसर हाजिर थे। भीड़ के चलते स्थान बदला। बैठक शुरू होने से पहले सभी का बीपी फटकार के डर से बढ़ा हुआ था। मगर जब बैठक खत्म हुई। तो सभी इस मीठी बैठक से खुश थे। किसी पर कोई ऐसा बम विस्फोट नहीं हुआ। जिससे वह विचलित होता। अंत मे आइस्क्रीम आई। जिस पर अंकित था वजन। 100 ग्राम-शुगर 8 प्रतिशत। किन्तु असली में वजन 54 ग्राम और शुगर कम थी। जिससे कई अधिकारियों के मुँह का जायका खराब हो गया। तभी तो बैठक के बाद चर्चा थी। बैठक मीठी-आइस्क्रीम फीकी। अब इस प्रकार का कमेंट्स करने वालों की जुबान तो हम पकड़ नहीं सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जहाँ सही जगह है वहाँ लगाओ..
घटना उसी बैठक की है। जहाँ बैठक मीठी-आइसक्रीम फीकी लगी थी। जो राजधानी से अधिकारियों को प्रभावित करने से जुड़ी है। पहले जगह बदली गई और जहाँ बैठक हुई उस जगह बड़े -बड़े पौधे रखवा दिए गए। ताकि हरियाली नजर आए। वजह केवल इतनी थी। बैठक में पर्यावरण को दिखाना था। लेकिन इस चक्कर मे बैठक में शामिल अधिकारियों के चेहरे मुखिया को नजर नहीं आ रहे थे। नतीजा उन्होंने नाराजगी व्यक्त कर दी। मगर सभ्य लहजे में। इन पौधों को वहाँ लगाओ-जहाँ इनकी सही जगह है। बस फिर क्या था। तत्काल ही जुगाड़ से मंगाए गए पौधों को चलती बैठक में से हटाया गया। ऐसा बैठक में शामिल एक अधिकारी का कहना है। मगर हमारा तो काम बस आदत के अनुसार चुप ही रहना हैं।
गले की घण्टी..
कहावत तो सबको पता है। बिल्ली और चूहों से जुड़ी कहानी वाली।मगर अब अपने विकासपुरुष ने इसमे फेरबदल कर दिया है। अब इसे फोन की घण्टी कहा जा रहा है। जो सभी जिलों के कलेक्टर को बंध गई है। इसका खुलासा शनिवार को हुई बैठक में हुआ। वैसे यह एक योजना है। सूचना प्रदाता पुरुस्कार। जो खाद की कालाबाज़री रोकने के लिए बनाई गई है। एक हेल्पलाइन नंबर भी है। जिसकी विशेषता यह है। यह नंबर हर जिले के कलेक्टर के निज सहायक से जुड़ा है। जब भी फोन की घण्टी बजेगी-सूचना मिलेगी। कलेक्टरों को तत्काल पता चलेगा। अगर सूचना सही निकली।तो सूचना देने वाले को 1 हजारी पुरुस्कार मिलेगा। भले ही योजना सही है। मगर गले की घण्टी कुछ आईएएस इसे बोल रहे है। अब यह उनकी सोच है। हमकों तो बस आदत के अनुसार चुप रहना है।
लौहपुरुष की तस्वीर पर पुष्पमाला
हम उन लौहपुरूष की बात नहीं कर रहे है। जिन्होंने आजादी के बाद देश को जोड़ने में भूमिका निभाई थी और यह उपाधि प्राप्त की थी। हमारा इशारा तो अपने कमलप्रेमियों के लौहपुरुष की तरफ है। जिन्होंने आजाद भारत में राम भूमि के लिए यात्रा निकाली थी।जनमत तैयार किया। संगठन को मजबूत किया। आजकल सेवानिवृत्त होकर बैठे हैं। उनकी तस्वीर पर माल्यापर्ण कर दिया गया। जबकि हमारी संस्कृति में किसी की तस्वीर पर तभी पुष्पमाला अर्पित की जाती है। जब वह दुनिया को अलविदा कह दे। लेकिन ऐसा हो गया। कमलप्रेमियों की एक कमंडल बैठक में। ग्रामीण क्षेत्र का मामला है। जिसके बाद कमलप्रेमी आश्चर्य में है। एक -दूसरे से पूछ रहे है।आखिर ऐसा किसने कर दिया।तो इशारा एक जनप्रतिनिधि की तरफ किया जा रहा है? मगर उस जनप्रतिनिधि के नाम पर सबने चुप्पी साध रखी है।फिर हमारी तो आदत ही है चुप रहने की।
अपलोड और डिलीट..
पंजाप्रेमियो को भले ही प्रदेश मुखिया नसीहत देकर गए। वर्ग में कि पोस्ट अपलोड संस्कृति से बचो। मगर जो इस पर अमल करें वह पँजाप्रेमी कैसा? वर्ग के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम था। अब यह कोई कमलप्रेमी संस्था का वर्ग तो था नही। जहाँ सब अनुशाषित होता है। पंजाप्रेमियो की संध्या थी। वैसे ही दिन भर के बौद्धिक ने तन-मन से थका दिया था। थकान मिटाने के लिए जब नीले-नीले पानी का पूल दिखा तो सब कूद पड़े। इसमें अपने चरणलाल जी और मुंगेरीलाल जी भी शामिल थे। बढिया मदमस्त करने वाला गीत बज रहा था। मुंगेरीलाल जी ने चरणलाल जी को पानी के अंदर कांधे पर बैठा लिया। यह वीडियो सुबह अपलोड हो गया। करीब 15 मिनिट बाद अपलोड करने वाले को फटकार लगी और फिर डिलीट हो गया।मगर तब तक घात लगाकर बैठे पंजाप्रेमियो ने इसे save कर लिया है। जिसके बाद अपलोड-डिलीट की चर्चा पंजाप्रेमियो के बीच सुनाई दे रही है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
ग्राम देवता बने दलाल
संकुल के गलियारों में इन दिनों 2 ग्राम देवताओं के दलाल बनने की चर्चा सुनाई दे रही है। वैसे इनका असली काम सीमांकन-बटवारा-नामांतरण आदि का है। मगर यह दोनो इन कामों से ज्यादा ग्राम देवताओं को इधर-उधर करवाने में रुचि रखते है। रेट कार्ड भी ओपन कर दिए हैं। 3 पेटी शहरी क्षेत्र और बाकी जगह के लिए 2 पेटी। इसके अलावा जहां टिके हो वहीं के लिए जैसा बकरा मिला-वैसा काट देते है। दोनो का दावा है कि जो सूची वह तैयार करेंगे।उसी पर मोहर लगेगी। ऐसा वह ग्राम देवता बोल रहे है। जो कि प्रयास में लगे थे। क्योंकि फेरबदल का मौसम शुरू होने वाला है। देखना यह है कि दोनों अपने दावे में कितना खरा उतरते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
चरण आखिर किसने पकड़े...
पंजाप्रेमियो के प्रथम दिन के वर्ग खत्म होने के बाद की घटना है। जिसमें कुल आधा दर्जन कांग्रेसी थे। इसमें अपने दाल-बिस्किट वाली तहसील के पँजाप्रेमी पहलवान भी मौजूद थे। जो कि प्रदेश मुखिया के साथ अपनी तहसील से लद गए थे। रास्ते में चर्चा हुई। जिसके चलते यह गोपनीय चर्चा हुई। इसमे अपने पहलवान के चरणों में एक नेता झुक गए। माफी मांग ली। पहलवान ने शर्त रखी है। उनकी तहसील के ब्लॉक-प्रेमी को बदला जाए। इस पर नतमस्तक हुए नेताजी ने आदत के अनुसार पैंट वाली बात बोल दी। जिसे सुनकर पँजाप्रेमी प्रदेश मुखिया ने चरण पकड़े नेताजी को शब्दों पर लगाम कसने की नसीहत दे डाली। अब किसने चरण पकड़े होंगे? यह तो कोई नहीं खुलकर बोल रहा है। लेकिन इसकी चर्चा पंजाप्रेमियो में जमकर सुनाई दे रही है। इसमे कितना सच है-कितना झूट। पढ़ने वाले पाठकगण अपने विवेक से खुद निर्णय कर लें। क्योंकि हमकों तो आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
बीमारी का उन्मूलन जरूरी....
हमारे पाठकगण उन्मूलन शब्द का अर्थ तो समझते होंगे? सीधी भाषा में इसका अर्थ जड़ से खत्म करना होता है। पिछले सप्ताह अपने प्रथमसेवक ने दिल पर पत्थर रख कर बीमारी को हटाया। यह इलाज एलोपैथी वाला है। क्योकि अब अपने बीमारी जी बिल्कुल फ्री हो गए है। अब किसी का लिहाज नही होगा। ऐसे में अब उन्मूलन जरूरी हो गया है। कारण वह इतने प्रतिभावान है। अब अपने जैसी कई बीमारियों का समूह बना लेंगे। फिर किस -किस को संक्रमित करेंगे? कोई नहीं जानता है। ऐसे में उनका सही समय पर आयुर्वेदिक तरीके से उन्मूलन करना ही सर्वोत्तम कदम होगा। वरना प्रथमसेवक सहित कई अधिकारियों को संक्रमण के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। ऐसा हम नहीं कह रहे है, बल्कि शिवाजी भवन से लेकर अपने कमलप्रेमी बोल रहे है। अब यह देखना रोचक होगा। उन्मूलन होता है तो कब होता है या इसके पहले ही अपने बीमारी जी अपने दुश्मनों को संक्रमित कर देते है। फैसला आने वाला वक्त करेगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अब तो अपनी आंख खोलिए..
पिछले कुछ दिनों से मंदिर के गलियारों में डॉ सागर आजमी के अशआर को तोड़-मरोड़कर सुनाया जा रहा था।
जाने कब की सुबह हो चुकी चलिए उठिए खूब सो लिए
मंदिर में अव्यवस्था हो रही अब तो अपनी आंख खोलिए।
इसमें निशाने पर थे अपने फटाफट जी।इस बीच मंदिर को पुरस्कार की घोषणा हो गई। जिसके लिए उज्ज्वल जी और फटाफट जी को बधाई। शायद इसी खुशी में फटाफट जी की आंख खुल गई। छापा मार स्टायल में निरीक्षण कर लिया। परिणाम भी सकारात्मक निकला। कोटे की अनुमति बेची गई थी।प्रकरण दर्ज हुआ। लेकिन यह निरीक्षण लगभग 6 महीने बाद हुआ है। जबकि हर महीने होता रहना चाहिए। नतीजा -इतने लंबे समय बाद के निरीक्षण ने अशआर की जगह रामायण के एक पात्र की कहानी अब चर्चाओं में है। यह वही पात्र है ।जिसको लेकर किवदंती है। 6 महीने सोना-6 महीने जागना। अब जबकि जागरण हो गया है। तो व्यवस्था में सुधार भी होने लगा है। तभी तो मंदिर के गलियारों में उनको धन्यवाद देने की चर्चा सुनाई दे रही है। तो हम भी उनको देर आए-दुरुस्त आए की कहावत याद दिलाते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जंगल के शेर....खिड़की खोल दूंगी
दो गुटों में बटी पँजाप्रेमी संस्था का वर्ग भले खत्म हो गया है। लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का दौर तूल पकड़ता जा रहा है। जो कि इतना बढ़ गया है कि अब डांस पर सवाल खड़े किए जा रहे है। दिन भर बौद्धिक सुनने के बाद मधुशाला की तलाश और फिर डांस।जिसमें अपने चरणलाल जी और मुंगेरीलाल जी भी ठुमके। अपने साथियों का उत्साह बढ़ाने। उन्होंने इस जंगल के हम दो शेर गीत के सहारे विरोधी गुट को अघोषित संदेश दिया। तो विरोधी एक ऐसा वीडियो तलाश कर लाएं। जिसमें एक ऐसा गीत बज रहा है। जिसके बोल लिखने योग्य नहीं है। उस गीत पर भी जंगल के शेर थिरकते नजर आ रहे है। इस गीत को हमारे पाठकगण यू-ट्यूब पर तलाश कर सकते है। बीच बजरिया के नाम से। जो सपना अवस्थी का गीत है।अब देखना यह है कि यह लड़ाई और कितने निम्न स्तर पर जाकर रुकती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
शाम होते ही तलाश...
पंजाप्रेमियो को वर्ग का पहला दिन खत्म होते ही तलब होने लगी थी। तो तलाश होने लगी थी। अब यह कोई कमलप्रेमियों का तो वर्ग था नही। जिनकों बौद्धिक की घुट्टी शुरू से मिलती रहती है। पंजाप्रेमियो की इसकी आदत नहीं है।तो उन्होंने मधुशाला की पंक्तियों को याद करना शुरू कर दिया। मगर मधुशाला आसपास नजर नहीं आ रही थी। तो पूछताछ शुरू कर दी। अब तलाश करने पर तो भगवान भी मिल सकता है। बस सच्ची लगन होनी चाहिए। पंजाप्रेमियो की इस मामले में लगन पक्की थी। नतीजा मधुशाला का पता चल गया। बस फिर क्या था। जिसको जैसा साधन मिला,उसने पकड़ा और मधुशाला से खरीदी कर के वापस आ गया। जहाँ बेहतर व्यवस्था थी। अपने अपने कमरे में आनंद उठाया । हालांकि कई पँजाप्रेमी वापस भी लौट गए थे।अपने अपने घर। लेकिन अपने चरणलाल जी और मुंगेरीलाल जी ने ऐसा नहीं किया। वर्ग में ही रात्रि विश्राम किया। इधर पंजाप्रेमियो ने देर रात तक इंजॉय किया। पंजाप्रेमियो का तो यही कहना है। मगर हमकों आदत के अनुसार चुप रहना हैं।
RBI में होना चाहिए...
अपने मंद-मुस्कान जी इन दिनों देवीआहिल्या नगरी में पदस्थ है। ईमानदारी की मिसाल है। उन्होनें वित्त विभाग का एक नियम अपनी कार्यशैली में शामिल कर लिया है।
सरकारी पैसे का भी उपयोग ऐसे करना चाहिए, जैसे अपने निजी धन का किया जाता है।
तभी तो जब भी कोई ठेकेदार उनके पास बिल भुगतान की गुहार लगाता है या कोई सिफारिश आती है। उनका रटा-रटाया जवाब होता है। मेरे पास पैसा ही नहीं है। जिस पर अहिल्या नगरी के प्रथम सेवक उनको बोल चुके है। आपको तो आरबीआई में होना चाहिए। हालांकि प्रथमसेवक इस आचरण से दुखी है। मगर उनकी भी मजबूरी है। मंद-मुस्कान जी से निभाने की। कारण -पिछले तीन मुखियाओं से उनकी कभी नहीं पटी थी। जिसको लेकर कमलप्रेमी अक्सर चुटकी लेते रहते है। तीन तलाक ले चुके है। अब चौथे से निभाना प्रथमसेवक की मजबूरी है। इसी चक्कर में वह चुप है।जबकि अहिल्या नगरी के शायर साजिद लखनवी के अशआर को याद कर रहे हैं।
तलाक दे तो रहें हो गुरुर -ओ -कहर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे महर के साथ
अब अपने कमलप्रेमियों की जुबान तो हम पकड़ नहीं सकते हैं। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद...
अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ/तो एक वृक्ष जाएगा/ फलों-फूलों-ऋतुओं से बिछड़कर/साथ जाएगा एक वृक्ष/अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले/कितनी लकड़ी लगेगी/श्मशान की टाल वाला पूछेगा/गरीब से गरीब सात मन तो लेता ही है/लिखता हूं अपनी अंतिम इच्छाओं में/कि बिजली के दाहघर में हो मेरा अंतिम संस्कार/ताकि मेरे बाद/एक बेटे और एक बेटी के साथ/एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में... कवि नरेश सक्सेना।5 जून को मनाए गए विश्व पर्यावरण दिवस की याद में। बाकी चुप के पाठकगण समझदार है और हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।