20 अक्टूबर 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

20 अक्टूबर 2025 (हम चुप रहेंगे)

बैंक पर नजरें...

पिछले कुछ दिनों से अपने लेटरबाज जी लगातार सक्रिय नजर आ रहे है। विकास पुरुष के आगमन पर हेलीपेड हो या ग्रामीण इलाकों में कोई कार्यक्रम। हर जगह नजर आते है। उनके इस तरह एक्टिव होने के पीछे कारण क्या है। तो अपने कमलप्रेमी इशारा कर रहे है। लेटरबाज जी की इच्छा है। उन पर विकास पुरुष की कृपा हो जाए। ताकि अन्नदाताओं के हितों से जुडी सहकारी बैंक के मुखिया बन जाए। इसीलिए अपनी तरफ से कोशिश कर रहे है। हर जगह मौजूद रहते है। मगर कुछ कमलप्रेमी उनकी इस मेहनत की तुलना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से कर रहे है। जिसमे हम क्या कर सकते है। हम तो केवल पुराने कमलप्रेमी मुखिया को मेहनत के लिए, शुभकामनाएं देते हुए, चुप हो जाते हैं।

दूध-सब्जी भी मुफ्त में...

हर इंसान अपने और परिवार के दूध और सब्जी खरीदता है। भले वह गरीब हो या अमीर। मगर हमारे शहर के अधिकारी पद का फायदा उठा कर गजब करते है। अच्छा खासा वेतन शासन से मिलता है। नौकर,गाडी,बंगला भी मिलता है। इसके बाद भी इनको मुफ्तखोरी की आदत लग जाती है। तभी तो दूध की व्यवस्था अपने मातहत की डेयरी से करवा लेते है। या फिर खुद मातहत ही अपने नम्बर बढवाने के चक्कर में दूध दही भेजने लगता है। जिसका भुगतान संभवत वह खुद नही लेता है। जबकि सब्जी के लिए अधिकारी मंडी वालों को फोन कर देता है या करवा देता है। नतीजा मंडी से कर्मचारी सब्जी देने उदयन मार्ग निवास पर देने खुद जाते है। ऐसी चर्चा संकुल से लेकर मंडी के गलियारों में सुनाई दे रही है। यह अधिकारी कौन है। इसको लेकर डेयरी वाले मातहत औऱ मंडी के कर्मचारी चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

पुराना हो गया गेट   

इंदौर रोड स्थित महामृत्युंजय गेट अब पुराना हो गया है। उसकी अब वह चमक धमक नही रही। वैसे भी अब उज्जैन का चहुँओर विकास हो रहा है। अब बाबा की नगरी को आने के लिए 8 रास्ते है। ऐसे में केवल एक महामृत्युंजय गेट काफी नहीं है। अब तो हर रास्ते पर एक ऐसा गेट होना चाहिए। जो बाबा की नगरी के पुरातन महत्व को दर्शाए। गेट को देखते ही सिंहस्थ में आने वाला हर श्रद्धालु वहां रुककर सेल्फी लेने के लिए मजबूर हो जाए। यह सम्भव भी है। बस,अपने विकासपुरुष का एक इशारा चाहिए। अगर विकासपुरूष इन आठ गेट के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दें, तो उज्जैन आने वाला हर भक्त यह गेट देखकर बाबा और उनकी जय जयकार ही करेगा। फैसला विकासपुरुष को लेना है और हमकों बस आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

आदेश पर अमल....

पिछले सप्ताह जनहित में गुहार शीर्षक पाठकों ने जरूर पडा होगा। 15 फीट लंबी और 1 फीट के गड्ढे वाली सडक का उल्लेख किया था। घासमंडी वाली सडक का। गुहार अपने उम्मीद जी और उज्ज्वल जी से की थी। वरिष्ठ नागरिकों की परेशानी की। उस पर अमल हुआ। अगले ही दिन बारीक चूरी और डामर से लीपापोती कर दी गई। लीपापोती शब्द इसलिए, क्योंकि काम करने वाले ज्यादा चतुर सुजान निकले। उन्होंने 15 फीट की इस सडक पर केवल बीच के 6 फीट के हिस्से में रिपेयरिंग कर के काम पूरा कर दिया। बाकी दोनो तरफ सडक को वैसे ही छोडकर, डामर और चूरी की बचत कर ली। अब सवाल यह है कि क्या विकासपुरुष के गृह नगर में इसी तरह से आदेश पर अमल होता है? अधिकारियों का डर निचले स्तर पर खत्म हो गया है? यह घटना तो यही इशारा कर रही है। फैसला उम्मीद जी और उज्ज्वल जी को लेना है और हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है

माइक-माला-मंच...

अपने फटाफट जी मंदिर में जूझ रहे है। कई व्यवस्था को सुधारने के लिए। जिसमें से उनको कुछ हद तक सफलता शोध संस्थान में मिली है। यहां पर उनका अंकुश काम कर गया है। तभी तो अपनी वैदिक धोती अब अपने मातहतों के बीच यह कहते फिर रहे है। अब मेरे पास केवल माइक-माला-मंच का काम ही बचा है। वजह फटाफट जी ने उनके पंख पूरी तरह से कतर दिए है। जिसके लिए वह साधुवाद के हकदार है। बस,फटाफट जी को दानदाताओ के भोजन दान की व्यवस्था पर भी थोडा ध्यान रखना होगा? ऐसा हम नही, शोध संस्थान वाले बोल रहे है। जिसके लिए हम अग्रिम शुभकामनाएं देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं 

ठेकेदार ने मना कर दिया....

मंदिर के भरोसेमंद सूत्र दावा कर रहे है। अपने फटाफट जी के नए प्रयोग को करने से उस ठेकेदार ने साफ इंकार कर दिया। जिसमें नए किस्म के लड्डू बनाने का दावा किया गया था। ठंड के लिए यह विशेष लड्डू बनाने की योजना लाई गई थी। जिनको लड्डू यूनिट में बनाया जाना था। किन्तु ठेकेदार का कुछ महीनों से भुगतान अटक गया है। तो उसने हाथ ऊंचे कर दिए। जिसके बाद सुरक्षा कम्पनी के एक कर्मचारी से सोशल मीडिया पर स्टेटस डलवाया गया। हलवाई की जरूरत है। हलवाई मिल गए। अब यह विशेष लड्डू अन्न क्षेत्र में तैयार हो रहे है। इनकी गुणवत्ता कैसी होगी? यह तो जब आम श्रद्धालु उनका स्वाद लेगा? तभी खुलासा होगा। तब तक हम यह दुआ करते हुए चुप हो जाते है कि बाबा का नाम और प्रसाद दोनो की प्रसद्धि बनी रहे।

बडे मगरमच्छ पर नजरें डालो....

अपने उज्जवल जी के निर्देश पर मिलावट खोरो पर कार्यवाही शुरू हो गई है। इस काम को अंजाम देने वाले विभाग को बधाई। जब जब दिवाली आती है। यह विभाग ज्यादा एक्टिव हो जाता है। यही वह टाइम होता है। जब पांचो उंगलियां घी में और सर कडाई में होता है। मगर लाख टके का जनता का यह सवाल है। विभाग को छोटी मोटी मछलियां ही छापे के लिए मिलती है। बडे मगरमच्छों पर कोई कार्यवाही क्यो नहीं होती है। जनता का सवाल जायज है। देखना यह है कि बडे मगरमच्छों की कॉलर पर हाथ डालने की हिम्मत विभाग कर पाता है या नही? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

इश्क नचाये जिसको यार...

यह गजल शायद हमारे पाठको ने सुनी होगी। जिसकी अगली लाइन है। वो फिर नाचे बीच बाजार। मतलब यह कि फिर इंसान सब कुछ भूल जाता है। तभी तो एक नगरसेवक इन दिनों इस दौर से गुजर रहे है। भले ही इस चक्कर में उन्होंने एक परिवार को तोड दिया है। हरिफाटक से नागझिरी तक के कमलप्रेमी इनके प्यार के किस्से चटकारे लेकर दबी जुबान में सुना रहे है। चर्चा तो यह तक है कि दंत चिकित्स मैडम को एक गिफ्ट दिया है। आई-फोन। जिसकी किश्त वसूलने अक्सर नगर सेवक पहुँच जाते है। आसपास के नागरिक चुप रहते है। वजह पॉवरफुल है। कौन पंगा ले। इसलिए हम भी उनके डर से अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

बिल तेरस और मुआवजा चौदस....

दिवाली शुरू हो गई है। शनिवार को धनतेरस थी। रविवार को रूपचौदस। किन्तु प्रशासन के निचले स्तर पर इन दोनों दिनों को अलग नाम दिया गया। शनिवार को बिल चौदस बोला गया। कारण इस दिन और रात तक किसानों को दी जाने वाली राशि के बिल बनते रहे। धनतेरस की किसी को याद ही नहीं आई। रविवार को विकास पुरुष के हाथों राशि वितरित होनी थी। हालांकि इस दिन रूप चौदस का त्यौहार था। मगर प्रशासन के लिए यह दिन मुआवजा चौदस बन गया। तभी तो जिले के हर तहसीलदार, नायब तहसीलदार औऱ पटवारी यह कहते नजर आए। हमारा त्यौहार तो बिल तेरस और मुआवजा चौदस था। राजस्व विभाग की इस मजाकिया शैली में भले तंज था। मगर बात तो सही थी। इसलिए हम तो बस अपनी तरफ से सांत्वना देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

हाइनेस की खरी खरी....

अपने हाइनेस की एक आदत हमकों पसन्द है। साफगोई से जवाब देना। फिर वह करीबी हो या दूरवाला। जैसे उन्होंने हमेशा साथ रहने वाले को खरी खोटी सुना दी। नवरात्रि में किए गए गरबे से जुडी घटना है। हाइनेस ने मना किया था। इस पचडे में मत पडो। गरबा मत करवाओ। मगर उनके करीबी झकमोला जी को जिद सवार थी। तो हाइनेस का बैनर लगवाकर गरबा उत्सव मना लिया। जिसमे खर्च भी हुआ। जिसका भुगतान करना था। तो समिति की बैठक हुई। जिसमें वही हुआ। जिसका डर था। भुगतान को लेकर विवाद खडा हो गया। इसकी खबर अपने हाइनेस को लगी। उन्होंने झकमोला जी को बुलाया। फिर अपने अंदाज में खूब खरी खोटी सुना दी। साफ कह दिया। भुगतान क्लियर करो सबका। यह सब नही चलेगा। उसके बाद हाइनेस विदेश यात्रा पर चले गए। वापस भी लौट आए हैं। किंतु आज भी करीब डेढ पेटी का भुगतान बाकी है। ऐसा हम नही, बल्कि हाइनेस के खास कमलप्रेमियो का कहना है। लेकिन हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

कॉपी-पेस्ट...

सोशल मीडिया के इस युग में कट- कॉपी-पेस्ट से जब काम चल सकता है। तो जेब ढीली कौन करेगा। भले ही विकासपुरुष ने पद दिलवाया हो। किन्तु जब बात खर्च की आती है। तो बदबूदार शहर के ग्रामीण मुखिया हो या उनके समर्थक। कॉपी-पेस्ट से काम चला लेते है। तभी तो पुराने होर्डिंग पर नए प्रदेश अध्यक्ष का फोटो चिपका कर विकासपुरुष का स्वागत कर दिया। पुराने होर्डिंग में पुराने प्रदेश अध्यक्ष का चेहरा था। ऐसा तराना के कमलप्रेमियो का कहना है। बात उनकी सच है। किन्तु हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

जुबान बनाम नकल...

अगर गौर किया हो तो अपने विकासपुरुष पिछले काफी समय से कुर्ता और धोती पहनकर हर कार्यक्रम में नजर आते है। वल्लभ भवन की बैठकों में भी। रविवार को तराना आए थे। सिंगल क्लिक से राशि वितरण के लिए। उसी भारतीय वेषभूषा में। यहाँ अपने वजनदार जी भी थे। वह आमतौर पर कुर्ता पजामा में नजर आते है। मगर कार्यक्रम में वह भी धोती कुर्ता पहने दिखे। इसके अलावा जब उदबोधन के लिए माइक संभाला। तो जुबान फिसल गई। उन्होंने कहा कि.. हमारे यशस्वी और लोकप्रिय ..न.. (मतलब नमो) से था। किन्तु तत्काल जुबान संभाल ली और अपने विकास पुरुष का नाम लिया। जिसके बाद कमलप्रेमी यह बोल रहे है। जुबान बनाम नकल। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

वर्दी में चर्चा...

प्रदेश के बहुचर्चित हवाला कांड को जिस तरीके से अंजाम दिया गया है। उससे वर्दी दागदार हुई है। तभी तो वर्दीधारी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता को याद कर रहे है। जब नाश मनुज पर छाता है/ पहले विवेक मर जाता है...! वर्दीधारियों की बात में दम है। वर्दी पर दाग तो लग गया है। जो किसी भी पॉवडर से नही छूटने वाला है। इस कांड के एक पात्र बाबा की नगरी में भी सेवा दे चुके है। इसीलिए वर्दी में ज्यादा चर्चा है। मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

शुभकामनाएं..

दीप-पर्व की हमारे सभी पाठकगण को अनंत शुभकामनाएं। आप सभी के जीवन में धन-धान्य भरपूर रहे। इसके साथ ही चुप रहेंगें डाटकॉम कालम के सभी स्थायी/अस्थायी नाम वालो से दिल से माफी। जो कि हमारी लेखनी से कभी व्यथित होते है तो कभी-कभी खुश भी। इन सभी के लिए दुआ है कि अपने अपने पथ पर चलते हुए इतनी तरक्की करे कि हमेशा इस कालम में बने रहे। इन सबको भी दीप पर्व की शुभकामनाएं।

मेरी पसंद

वो तुझको भूलें हैं तो तुझपे भी लाजिम है मीर

खाक डाल,आग लगा, नाम ना ले,याद ना कर