हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, लेकिन गर्मी की मार मुश्किल है
उज्जैन। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के....कल ये गाना लाजिमी था। आजादी का महापर्व मनाया जा रहा था। आजादी दिलाना वाकई किसी तूफान से कश्ती को सही-सलामत निकाल लाने जैसा ही था। कितने लोगों ने गोलियां खाईं, अपनी पीठों पर हंटर की मार सही, कई घरों के चिराग बुझे, कई घर जलाए गए लेकिन किसी ने उफ तक नहीं किया। सारे जुल्म-ओ-सितम हंस कर सहे और देश को आजादी दिलाई। इसी आजादी के पर्व में कुछ अधिकारी थोड़ी सी उमस और गर्मी नहीं झेल पाए।
सुबह का समय, चढ़ता सूरज और आजादी के पर्व का उत्साह सब फीके हो गए। लोग खुले में खड़े होकर प्रस्तुतियां देख रहे थे। प्रस्तुति देने वाले भी खुले आसमान के नीचे थे। यहां तक कि कलेक्टर और एसपी भी धूप झेल रहे थे। लेकिन, तंबू के नीचे बैठे कुछ अधिकारियों के लिए धूप असहनीय हो गई। सिर से पैर तक पसीना-पसीना हो गए। आदेश जारी हुआ, जल्दी पंखे-कूलर लाओ। चलते कार्यक्रम में अफसरशाहों के लिए कूलर बुलवाए गए। निरीह जनता देखती रही। तंबू के नीचे छांव में बैठे अधिकारी कूलर की हवा खाते आजादी के पर्व का आनंद ले रहे थे। जो देशवासी आजाद हुए थे, वो धूप में ही थे।
उनको तो आदत है धूप की। अधिकारियों की बात अलग है। वो एसी केबिन में बैठते हैं। घर में एसी भी हैं। तो ग्राउंड पर तो कम से कम कूलर होना ही चाहिए। एयर कंडीशन कमरों के आदी हो चुके शरीरों से धूप की मार कहां झेली जा सकती है। और, अगर अधिकारी बने हैं इतनी पढ़ाई-लिखाई और मेहनत के बाद तो क्या गर्मी से बेहाल होने के लिए। अगर अधिकारी भी गर्मी से बेहाल होते रहे तो बेहाल जनता को कौन संभालेगा। जनता बेहाल है तो अधिकारी तो कूल-कूल होने चाहिए ना, तभी तो संतुलन बनेगा। हमारा क्या है, हम तो चुपचाप देख ही सकते हैं।