18 अगस्त 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
रायशुमारी बनाम नौटंकी ...
पिछले सप्ताह 2 दिन तक रायशुमारी चलती रही। कमलप्रेमी मुख्यालय पर। नगर जिला व ग्रामीण कमलप्रेमी पदाधिकारी नजर आये। सभी खुश थे। हमारी राय ली जा रही है। मगर पुराने अनुभवी कमलप्रेमी इस रायशुमारी की हकीकत जानते है। यह केवल नौटंकी है। इसीलिए उन्होंने औपचारिकता निभाई। एक किस्सा भी सुनाया। तराना विधानसभा का। चुनाव का मामला था। वर्तमान विधायक मैकेनिक थे। साध्वी दीदी के कारण पहली दफा टिकिट मिला था। दूसरी दफा भी दावेदार थे। उस वक्त रायशुमारी के लिए धार के एक बड़े नेताजी को भेजा गया था। उस वक्त भी सभी की रायशुमारी ली गई थी। जैसे इस वक्त भी हुई है। तब सभी ने वर्तमान मैकेनिक का नाम लिखकर दिया था। मगर रिजल्ट में नाम चौंकाने वाला था। मैकेनिक की जगह दूसरे को टिकिट थमा दिया गया। कारण ... रायशुमारी का डिब्बा खोला ही नहीं गया था। तो वर्तमान रायशुमारी का क्या हश्र होगा? यह हमें लिखने और समझाने की जरूरत नहीं है। कमलप्रेमी हमसे बेहतर समझते है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
जिद की पक्की ...
सफलता उन्हीं को मिलती है। जो अपनी जिद के पक्के होते है। जैसे अपनी डिमांड वाली मैडम। जो कि कार्य-विभाजन के पहले संकुल में पदस्थ थी। ऑपरेटर कांड के कारण सुर्खियों में आई थी। काफी समय से किसी डिवीजन की मुखिया बनना चाहती थी। जिसके लिए वह अपने बदबू वाले शहर के माननीय के पास भी गई थी। वहां से उनको बैरंग लौटना पडा था। चुप रहेंगे में यह घटना हमने लिखी थी और पाठकों ने पढ़ी थी। जो याद भी होगी। किन्तु जिद की पक्की 20 हजारी मैडम ने नया रास्ता खोज लिया। उन्होंने किसी पॉवरफुल कमलप्रेमी को पकडा। जिन्होंने सिफारिश कर डाली। नतीजा जगजाहिर है। जब कार्य विभाजन हुआ। तो 20 हजारी मैडम को बदबू वाले शहर का मुखिया बना दिया गया। ऐसा हम नहीं, बल्कि संकुल से लेकर बदबू वाले शहर के कमलप्रेमी बोल रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस जिद की पक्की, 20 हजारी मैडम को बधाई देकर, आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
चिंता ... ता - ता- चिता ....
फिल्म रावडी -राठौड शायद हमारे पाठकों ने देखी होगी। जिसका यह गीत ... चिंता ... ता - ता- चिता .... गाना काफी मशहूर हुआ था। यह गीत इन दिनों अपने कमलप्रेमी गुनगुना रहे है। इशारा अपने हाइनेस की तरफ है। जो कि रायशुमारी बनाम नौटंकी की चिंता से व्यथित है। तभी तो नाश्ते से लेकर रात में दूध पिया या नहीं ... की चिंता करते रहे। उस पर्यवेक्षक के लिए। जो कि रायशुमारी लेने आये थे। राजधानी से। अपने हाइनेस की चिंता ... ता - ता- चिता .... के लिए यह उदाहरण काफी होंगे। पहला ... उन्होंने मंदिर के बाहर बैठकर फल खाये और मुख्यालय पर नजर बनाकर रखी। अपनी निजी सीआईडी को अलर्ट कर रखा था। जो कि कमलप्रेमी मुख्यालय पर रात को भी नजर रख रहा था। रायशुमारी के बाद कौन-कौन पर्यवेक्षक से मिलने चुपचाप गया। अब देखना यह है। सूची जारी होने के बाद, अपने हाइनेस की ... चिंता ... ता - ता- चिता .... क्या परिणाम निकलता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
आदेश की ऐसी-तैसी ...
आजादी पर्व पर पहली दफा ऐसा नजारा देखा गया। जिसमें आदेश की अवेहलना की गई। वह भी डंके की चोट पर। महज इसलिए कि ... मंच से प्रमाण-पत्र लेते हुए फोटो खिचवाना था। यह कृत्य उनके द्वारा किया गया। जो कि बच्चों को पढाई में अनुशासन का सबक सिखाते है। आदेश की ऐसी-तैसी करवाने में ... शिक्षा की बीमारी ... मास्टर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिन्होंने मौका देखकर 46 मास्टरों को मंच पर चढा दिया। जबकि इजाजत 6 से 15 की थी। 46 मास्टरों के कारण मंच पर अव्यवस्था हो गई। यह देखकर अपने उज्ज्वल जी भी हैरान रह गये। अपनी चटक मैडम जी का हमको पता नहीं। क्योंकि सूची दमदमा से ही जारी हुई थी। जिसमें निर्देश थे। इस घटना के बाद विभाग में चर्चा है। यह सारा खेल अपनी जेब गर्म करने के लिए किया गया था। मास्टर प्रजाति तो दबी जुबान से यही बोल रही है। निशाना ... शिक्षा की बीमारी की तरफ है। मास्टरों की बात सच है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
पंचम सुर ...
हमको संगीत का ज्ञान शून्य है। बस सुना है। 7 सुर होते है। मगर हम संगीत सुरो की बात नहीं लिख रहे है। हमारा इशारा तो उस सौभाग्य की तरफ है। तो कि बाबा की नगरी को मिला है। अभी-अभी शिवाजी भवन के मुखिया का आगमन हुआ है। जो कि अपनी बैच के टॉपर है। पूरे देश में इनकी पांचवी रैंक आई थी। जबकि इसके बाद वाली बैच में पांचवी रैंक लाने वाले अपने फटाफट जी थे। अब दोनों का बाबा की नगरी में मिलन हुआ है। दोनों पंचम के बीच जबरदस्त जुगलबंदी भी है। देखना यह रोचक होगा कि ... दोनों पंचम सुर मिलकर ... कौनसा नया राग ... आम जनता के हित में सुनाते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
अग्रिम बधाई ...
अखिल भारतीय सेवा में दो अधिकारी जल्दी ही शामिल होने वाले है। दोनों का रिश्ता अपनी बाबा की नगरी से है। जिसमें से एक का आगमन हुआ है, और दूसरे की रवानगी हुई है। दोनों ही शिवाजी भवन से रिश्ता रखते है। एक अपने स्मार्ट पंडित तो दूसरे अपने जयमहाकाल। दोनों ही अखिल भारतीय सेवा का तमगा हासिल करने वाले है। डीपीसी हो गई है। नोटिफिकेशन होना बाकी है। तो हम दोनों को अपनी तरफ से बधाई देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
वह 17 मिनिट ...
आजादी पर्व का समारोह दशहरा मैदान पर मनाया गया। इसके लिए मिनिट-टू-मिनिट कार्यक्रम आया। जिसमें अतिथि आगमन से लेकर पुरूस्कार वितरण तक का समय निर्धारित था। सूत्रधारों को मिनिट-टू-मिनिट के अनुसार संचालन करना था। अगर वह ऐसा करते तो 17 मिनिट तक मैदान में सभी को चुप बैठना पडता। क्योंकि 9 बजकर 8 मिनिट पर ध्वजारोहण- परेड निरीक्षण सहित बाकी सब निपट चुका था। इधर 9 बजकर 25 मिनिट से विकासपुरूष का उद्बोधन शुरू होना था। 17 मिनिट का खाली समय था। नतीजा... संचालकों ने समझदारी दिखाई। कार्यक्रम में अवरोध नहीं आने दिया। खाली समय का सदुपयोग किया। बीच में मीसाबंदी सम्मान सहित दूसरे कार्यक्रम जोड दिए। समय का बेहतर उपयोग हो गया, वरना 17 मिनिट भारी पडते। इसलिए हम सूत्रधारों को बधाई देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
धोती की लू उतारी ...
अपने फटाफट जी फूलफार्म में है। मंदिर की व्यवस्था सुधारने के लिए। आखिर टॉपर है। यह खिताब कायम रखना है। तभी तो 12 अगस्त को शोध वाले वैदिक-धोती की लू उतार दी। पहले लड्डू यूनिट गये थे। यहां वैदिक-धोती से पूछ लिया। क्या करते हो? जवाब मिला... लड्डू बनवाता हूं। यह सुनकर वहां मौजूद डिप्टी कलेक्टर मैडम ने कह दिया। यह काम तो मैं करती हूं। फटाफट जी ने तत्काल यही पर फटकार लगाई। फिर शोध संस्थान पहुंचे। वहां भी लापरवाही दिखी। तो दूसरी दफा वैदिक-धोती को फटकार सहनी पडी। शायद नोटिस भी मिल जाये। ऐसी चर्चा मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रही है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
सुदर्शनधारी ...
अपने विकासपुरूष, शनिवार की रात को कुछ देर के लिए सुदर्शनधारी बन गये थे। वीवीआईपी गेस्टहाऊस में। उनको किसी ने बैटरी चलित सुदर्शन-चक्र गिफ्ट किया था। तो गाडी से उतरे। उंगली में वह सुदर्शन-चक्र पहनकर बैटरी चालू कर दी। सुदर्शन-चक्र घूमने लगा। यह नजारा अपने उज्ज्वल जी, कप्तान जी, हिटलर जी, फटाफट जी, दालवाले नेताजी और शिवाजी भवन के नये मुखिया ने भी देखा। नजारा वाकई देखने लायक था। जिसकी सभी तारीफ कर रहे है। तो हम भी उस नजारे की कल्पना करते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
मंगलकामनाएं बोलिए ...
अपने विकासपुरूष का शब्द ज्ञान सुदर्शनधारी से कम नहीं है। कब -कहां-कौनसा शब्द बोलना चाहिये। इस पर पकड रखते है। तभी तो शनिवार को अपने तीसरे माले के प्रभारी मुखिया को नसीहत दी। शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं को लेकर। दरअसल, प्रभारी मुखिया ने गुलदस्ता देते हुए शुभकामनाएं व्यक्त की थी। जन्माष्टमी पर्व की। तो विकासपुरूष ने वहीं तत्काल समझा दिया। भगवान के जन्म का पर्व है। शुभकामनाएं नहीं- मंगलकामनाएं दीजिए। बेचारे ... तीसरे माले के स्मार्ट प्रभारी मुखिया को कल्पना भी नहीं होगी। शुभकामना और मंगलकामना में क्या अंतर होता है। इसीलिए विकासपुरूष की बात सुनकर चुप हो गये। मगर घर जाकर जरूर शब्दकोष या गूगल-बाबा पर सर्च किया होगा। दोनों में क्या अंतर होता है। यह कयास लगाते हुए, हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
किस्मत हो तो ऐसी ...
संकुल के गलियारों में चर्चा है। किस्मत हो तो अपने उज्ज्वल जी जैसी। जिनको मौका मिला। वह भी विकासपुरूष के गृहनगर में। झंडावंदन करने का। वह भी आजादी पर्व पर। क्योंकि पिछले तीन दशकों में ऐसा कोई नजारा हमने तो नहीं देखा। हमेशा मंत्रीगण ही झंडावंदन करते आये है। अपने उज्ज्वल जी पहले और शायद आखिरी कलेक्टर होंगे। इसीलिए हम ... रौशन राहें सदा रहेंगी आपकी / खूब सेवा करो दिल से महाकाल की... लिखकर अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
दसवें रत्न को ...
अपने पंजाप्रेमी चरणलाल जी को शुभकामनाएं। जिनको पंजाप्रेमी संगठन ने नये सृजन की जिम्मेदारी दी है। घोषणा के बाद शहर एवं जिला के पंजाप्रेमियों को सांप सूंघ गया है। बेचारे ... पंजाप्रेमी नेता अब फोन तक नहीं उठा रहे है। खासकर वह सभी। जिन्होंने कोशिश की थी। चरणलाल जी का कोई भी समर्थक जिले का मुखिया ना बन जाये। शिकायते हुई थी। लिखित और आडियों सबूत के साथ। जिसे संगठन ने गंभीरता से लिया। उनके किसी समर्थक को जिम्मेदारी नहीं दी। खुद चरणलाल जी को सौंप दी है। वैसे भी चरणलाल जी को अभी-अभी मालवा के दसवें रत्न की उपाधि विधानसभा में मिली थी। वह भी अपने कमलप्रेमी दो नंबरी नेताजी द्वारा। जिस पर अब पंजाप्रेमी संगठन ने भी मोहर लगा दी है। अब भले ही दिलजले पंजाप्रेमी संगठन- सृजन- विर्सजन का राग अलापते रहें। होना कुछ भी नहीं है। चाहें तो इस्तीफा दे दे। कोई फर्क नहीं पडने वाला। ऐसा अपने पंजाप्रेमी बोल रहे है। मगर हम तो अपने चरणलाल जी को शुभकामनाएं देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
मेरी पसंद ...
बैरागी तुम नाचो-गाओं/ आग लगे इस दुनियां में।
ध्यान लगाओं भस्म रमाओं/ आग लगे इस दुनियां में।।
यह दुनियां मरघट है, जिसमें जिंदा लाशे फिरती हैं/ मरघट में त्यौहार मनाओं... आग लगे इस दुनियां में...
विष्णु विराट