देखिएगा, कहीं ये सिंदूर भी सूख ना जाए...
हर साल की तरह इस साल भी विश्व पर्यावरण दिवस आया। पौधे लगाने से लेकर प्रकृति को सहेजने-संवारने तक की कसमें खाई गईं। शाम तक आधे लोग भूल गए होंगे और कल तक शायद सारे ही भूल जाएंगे। पर्यावरण दिवस एक इवेंट बन कर रह जाएगा और फिर अगले साल याद आएगा। कभी मां के नाम, कभी भारत माता के नाम तो कभी किसी और के नाम पौधे लगाने और उन्हें भूल जाने का चलन पुराना है। ये प्रकृति की सेवा नहीं, एक पॉलिटिकल इवेंट जैसा है।
कभी एक पेड़ मां के नाम भी लगाए गए थे। सुबह लगाए और दोपहर बाद उन्हें सूखने के लिए छोड़ दिया गया। ऐसे जाने कितने ही पौधे लगे और सूख गए। प्रकृति को तो कुछ फायदा नहीं हुआ। पेड़ लगाना पुण्य का काम है, लेकिन उन्हें सूखने के लिए छोड़ देना पाप है। पॉलिटिकल इवेंट्स में लगाए गए पौधे अक्सर पाप का भागी बनाते हैं क्योंकि जैसे चुनाव जीतने के बाद पार्टियां वादे भूल जाती हैं, वैसे ही लगाने के बाद पौधे भी भूला दिए जाते हैं। जरूरी ये नहीं है कि आप पर्यावरण दिवस पर हजारों-सैंकड़ों पौधे लगाएं, जरूरी ये है कि एक ही लगाएं लेकिन ये व्यवस्था निश्चित कर दें कि वो पौधा कुछ सालों में पेड़ बने।
मुख्यमंत्री मोहन यादव से यही अनुरोध है कि वह पौधारोपण करने के साथ,प्रशासन को कठोर निर्देश दें कि उनके हाथ से लगा कोई भी पौधा सूखने न पाए।उसकी देखभाल की जाए।जब तक पौधा 'पेड़' का रूप धारण न कर ले।
इस बार सिंदूर ट्रेंड में है तो पौधे भी सिंदूर के लगे हैं। दिल्ली से लेकर उज्जैन तक सिंदूर के पौधे लगे। पौधे लगे तो उनकी देखरेख भी हो। नहीं तो सिंदूर भी सूखने में देर नहीं लगेगी।