पद तो प्रहरी का, मगर वेतन जेल डीजीपी से ज्यादा...!
उज्जैन। एक जेल प्रहरी का वेतन अधिकतम कितना हो सकता है। ज्यादा से ज्यादा 62 हजार के करीब। लेकिन प्रदेश के जेल डीजीपी से ज्यादा तो नहीं हो सकता है? गबन कांड के मुख्य आरोपी का वेतन जेल डीजीपी से भी ज्यादा था। जो उसने लगातार कई बार निकाला। मगर किसी ने भी यह चेक करने की कोशिश नहीं की। आखिर एक प्रहरी की नेट सेलरी 4 लाख 83 हजार 302 रूपये माह कैसे निकाली जा रही है।
वेतन की छायाप्रति
शासन के सिस्टम आईएफएमएस (इंट्रीग्रेड फायनेंस मानिट्रिंग सिस्टम) की कमी का फायदा कैसे उठाया जा सकता है। यह जेल प्रहरी रिपुदमन सिंह से सीखा जा सकता है। जिसने कर्मचारियों के खाते से जीपीएफ की राशि तो गबन की ही, बल्कि सिस्टम का फायदा उठाकर खुद की भी सेलरी बड़ा ली। अपनी बेसिक को 1 लाख 38 हजार 500 दर्शा दिया। सरकारी मकान आवंटित था। फिर भी एचआरए (हाऊस रेंट अलाउंस) 3 लाख 44 हजार ले लिया। चुप रहेंगे डॉट-कॉम के पास मार्च 21 की पे-स्लीप मौजूद है। (देखे चित्र) जिसमें किस तरीके से इस शातिर प्रहरी ने खुद का अधिकारी बताकर 4 लाख 83 हजार 302 रूपये का आहरण अपने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अकाउंट नम्बर 32146709864 में आहरित करवा लिया। किसी ने भी, खासकर ट्रेजरी ने भी चेक नहीं किया। एक प्रहरी की सेलरी आखिर इतनी कैसे हो सकती है।
हर महीने निकाला ...
गबन कांड के शातिर मुलजिम रिपुदमन को एक बार वेतन निकालने में सफलता मिल गई। बस फिर क्या था। डीडीओ पॉवर उसके ही पास थे। जेल अधीक्षक उषाराज की मेहरबानी से। तो वह खुद ही 3 स्टेप (क्रियेटर-प्रोसेसर-अप्रुवर) का काम करने लगा। जबकि नियमानुसार तीनों स्टेप के इस कार्य के लिए 3 अलग-अलग व्यक्ति होना चाहिये। प्रहरी रिपुदमन ने इसका भरपुर फायदा उठाया। हर महीने अलग-अलग हथकंड़े अपनाते हुए, करीब 2 साल तक कभी 3 लाख- कभी साढ़े 3- कभी 4 और कभी 4 लाख 83 हजार रूपये तक का वेतन निकाला। ऐसा हमारे भरोसेमंद सूत्रों का कहना है।
लापरवाही ...
ज्ञात रहे कि आईपीएस अधिकारियों में डीजीपी सबसे सर्वोच्च पद होता है। इस पद पर तैनात अधिकारी को प्रतिमाह 2 लाख 25 हजार वेतन मिलता है। जबकि जेल प्रहरी का वेतन सातवें वेतन आयोग के अनुसार 19500 से 62 हजार तक होता है। इस नियम को ट्रेजरी (कोषालय)भी जानती है। लेकिन हर माह 15 हजार से ज्यादा वेतन बिल ऑनलाइन चेक कैसे करे। नियम कहता है। पहले बाबू-फिर एटीओ और बाद में टीओ (जिला कोषालय अधिकारी) को चेक करना होता है। निचले स्तर पर बिल पास करवाने के लिए जेब गर्म करने का दस्तूर हमेशा से चला आ रहा है। इसी का फायदा प्रहरी रिपुदमन ने उठाया। जिला कोषालय अधिकारी जब अंतिम स्टेज पर चेक करता है। तो एक ओटीपी जनरेट होता है। डीडीओ का क्लियरनेंस देखकर, टीओ भी वेतन आहरित कर देता है। इसी लापरवाही के चलते जेल प्रहरी ने 2 साल से ज्यादा डीजीपी से ज्यादा अपना वेतन आहरित किया। ऐसा भरोसेमंद सूत्रों का कहना है।
केवल 10 मिनिट ...
15 करोड का यह घोटाला बडी आसानी से रोका जा सकता था। अगर शुरूआत में ही जेल अधीक्षक मात्र 10 मिनिट निकालकर वह रिपोर्ट चेक कर लेती। जो कि हर महीने के अंत में जनरेट होती है। जिसे समाशोधन रिपोर्ट बोला जाता है। इस रिपोर्ट को देखकर तत्काल पता चल जाता है। किस खाते में, कितना ट्रांजेक्शन हुआ है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बात केवल जेल विभाग की नहीं है। लगभग हर विभाग के अधिकारियों ने डीडीओ पॉवर अपने बाबूओं को दे रखे है। यही बाबू सारे काम करता है। जिलाधिकारियों पर इतना वर्कलोड होता है। वह इस तरफ ध्यान ही नहीं दे पाता है। जिसके चलते ऐसे गबन कांड होते है। भैरवगढ़ जेल में ही ऐसा कांड नहीं हुआ है। अभी-अभी कटनी और इंदौर में भी ऐसे कांड उजागर हुए है।