17 मार्च 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

पीड़ा ...
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है/ सुना है शेर का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करता/ दरख्तों की घनी छाँव में जाकर लेट जाता है/ हवा के तेज झोंके जब दरख्तों को हिलाते हैं/ तो मैना अपने बच्चे छोड़कर/ कव्वे के अंडो को परो से थाम लेती है/ सुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो सारा जंगल जाग जाता है/ सुना है जब किसी नद्दी के पानी में/ बए के घोंसले का गंदुमी रंग लरजता है/ तो नद्दी की रूपहली मछलियाँ उस को पडोसन मान लेती है/ कभी तूफान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तो/ किसी लकडी के तख्ते पर/ गिलहरी- सांप- बकरी और चीता साथ-साथ होते है/ सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है ...जेहरा निगाह
दस्त- ए-जरूरियात में बटता चला गया/ मैं बे-पनाह शख्स था घटता चला गया/ पीछे हटा था मैं रास्ता देने के वास्ते/ फिर यूं हुआ कि राह से हटता चला गया...शौकत फहमी।
सच बात मान लीजिए चेहरे पे धूल है/ इल्जाम आइनों पे लगाना फिजूल है...अंजुम रहबर।
हमारे पाठक यह पढ़कर सोच रहे होंगे। यह सब क्या है। तो क्लियर कर देते है। दरअसल यह एक अधिकारी की पीडा है। जो उन्होंने सोशल मीडिया पर अपलोड की है। गुरूवार को। एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी। इसके पीछे कारण चल रहा शीतयुद्ध है। जो कि लंबे समय से जारी है। प्रशासनिक संकुल से लेकर शिवाजी भवन तक सबको पता है। शीतयुद्ध किसके बीच है। पीडा जाहिर करने वाले अपने स्मार्ट पंडित है। देखना यह है कि इससे उनको फायदा होता है या नुकसान ? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
बच गये ...
तो किस्मत के धनी अपने चुगलखोर जी बच गये। रंगे हाथ पकडऩे वालो का निशाना चूक गया। बाबू रंगे हाथों धरा गई। जबकि ईमानदारी वाली बात यही है। बगैर बॉस की मर्जी से बाबू की कभी हिम्मत नहीं होती है। बॉस के इशारे पर ही मैंडम हरे रंग के कागज ले रही थी। यही असली सच है। कार्रवाई तो चुगलखोर जी पर होनी चाहिये। मैंडम तो कठपुतली है। अपने चुगलखोर जी का एक पसंदीदा शेर है। रिश्वत के भी दो पहलू है/ लोगे तो फसा देगी/ दोगे तो छुडा देगी...। अपने इस पसंदीदा अशआर के कारण वह हमेशा बच जाते है। स्मरणीय रहे कि 10 मार्च के अंक चुप रहेंगे में ही ज्ञापन शीर्षक से ही लिख दिया था। हमने चुगलखोर जी के हरे रंग का प्रेम। उसके बाद दबिश पड गई। अब देखना यह है कि अपने चुगलखोर जी का कुछ बिगडता है या नहीं? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
रिकार्डिंग ....
एक बार फिर बात उसी विभाग की है। जो हरे कागजों पर गुलाबी रंग लगाकर साल भर होली मनवाता रहता है। इसका निशाना कुछ दिन पहले एक नायब तहसीलदार थे। उसी जगह के, जहां पर अभी-अभी बाबू पकडाई है। इसके पहले नायब तहसीलदार की रिकार्डिंग हो गई थी। पूरी तैयारी थी। मगर किसी तरीके से संकुल के गलियारों तक रिकार्डिंग पहुंच गई। बदनामी से बचने के लिए तत्काल एक्शन लिया गया। नायब साहब का आदेश निकल गया। उनको संकुल में तत्काल प्रभाव से अटैच कर दिया गया। ऐसा हम नहीं कह रहें है।बल्कि उन ग्राम देवताओं में इसकी चर्चा है। जिनको यह घटना पता है। नतीजा ... ग्राम देवता यह तक बोल रहे है। अगर नायब साहब के कामों की जांच दूसरे माले के मुखिया करवा ले। तो सैकड़ों प्रकरण नियम विरूद्ध किये जाने के निकल आयेंगे। मगर ऐसा होगा नहीं। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
बगावत ....
दमदमा के गलियारों में बगावत की चिंगारी भड़क गई है। अपनी चटक मैडम जी के खिलाफ। बगावत भी खुलकर सामने आई है। खबर भी छप जाती। मगर इज्जत बचाने के लिए एक खबरची से सेटिंग की गई। इस खबरची ने फोन करके मामले की जानकारी ली थी। जिसके बाद मामला दबा दिया गया। मगर चिंगारी अभी भी सुलग रही है। दमदमा के गलियारों में चर्चा है। चटक मैडम जी की भाषा और कार्यशैली के चलते यह बगावत भड़की है। तभी तो दमदमा के नीचे से ऊपर तक के कर्मचारियों ने ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। फिर सभी एक साथ उनके ऑफिस जाकर खड़े हो गये। इस घटना के बाद फिलहाल अभी मामला शांत है। देखना यह है कि आगे अब क्या होता है। चटक मैडम जी अपनी भाषा व कार्यशैली सुधारती है या फिर कर्मचारी हड़ताल पर जाते है। फैसला वक्त करेगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
लापता ...
मंदिर के गलियारों में चर्चा है। कर्मचारियों के लापता होने की। यह कर्मचारी वैसे तो ऑन-ड्यूटी है। मगर मंदिर में नजर नहीं आते। इसलिए उनके सहयोगी इनके लापता होने की चर्चा कर रहे है। दबी जुबान से संख्या बताई जा रही है। करीब 2 दर्जन। हालांकि हमको 2 दर्जन संख्या पर भरोसा नहीं है। किन्तु मातहत दावा कर रहे है। यह बोला जा रहा है कि यह सभी कर्मचारी बारी-बारी से उद्यन मार्ग के एक बंगले पर ड्यूटी कर रहे है। सुबह-दोपहर-शाम की शिफ्ट में अलग-अलग कामों का दायित्व निभा रहे है। मंदिर के भरोसेमंद सूत्र भी इसकी पुष्टि कर रहें है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।
सेल्यूट ...
शुक्रवार की रात की घटना है। उस वक्त जब अपने विकासपुरूष मंच से उतरकर वापस जा रहे थे। पीछे वाले रास्ते से। इस रास्ते में पोल गाढकर रखे थे। जिन पर पर्दे लगे थे। विकासपुरूष निकल रहे थे। कुछ लोग सेल्फी के चक्कर में आगे-आगे थे। तभी किसी के धक्के से पोल उखड गया और गिरने लगा। यह देखकर अपने कप्तान जी तत्काल अलर्ट हो गये। उन्होंने गिरते हुए पोल को पकड लिया। जो शायद अपने विकासपुरूष पर गिर जाता? जिससे हंगामा मच जाता। मगर कप्तान जी ने सतर्कता दिखाई। उनकी इस सतर्कता पर हम आदत के अनुसार सेल्यूट देकर चुप हो जाते है।
तुम कौन ...
अपने स्मार्ट पंडित इन दिनों अलसुबह निकलते है। साईकिल पर। वह भी अकेले। कोई लवाजमा नहीं होता उनके साथ। जो पहचाना जा सके। यह फला अधिकारी हैं। चेहरे पर तो किसी के लिखा नहीं होता है। इसीलिए एक घटना पिछले दिनों हो गई। स्मार्ट पंडित साईकिल चलाते-चलाते तीनबत्ती से स्टेशन रोड की तरफ मुड गये। थोडी दूर जाकर देखा। कोई नाली के लिए खुदाई कर रहा था। उन्होंने उससे पूछ लिया। क्या कर रहे हो? किसकी अनुमति से कर रहे हो? सामने वाले ने समझा। कोई ऐसे ही चलता-फिरता काम में टांग अडा रहा है। इसलिए उसने पलटकर कह दिया। तुम कौन ? तुमसे मतलब? बस फिर स्मार्ट पंडित चुपचाप लौटे। एक फोन लगाया। थोडी ही देर में गैंग पहुंच गई। ऐसी चर्चा अस्पताल के सुरक्षाकर्मियों के बीच चल रही है। अब सच है या झूठ? फैसला स्मार्ट पंडित कर ले। क्योंकि हमको आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
इतिहास रचा ...
अपने विकासपुरूष की खासियत क्या है। जो ठानते है-करके दिखाते है। इतिहास रचने में उनको आनंद आता है। जैसे होली के दिन रच दिया। वह चाहते तो राजधानी में ही होली मनाते। मगर इतिहास रचना था। क्योंकि आज तक सूबे का कोई मुखिया होली मनाने नहीं आया। बाबा की नगरी में। मगर विकासपुरूष ने पहले कमलप्रेमियों- फिर आम नागरिकों और जाते-जाते वर्दी और अधिकारियों के साथ होली खेलकर इतिहास रच दिया। उस दिन मस्ती के मूड में थे। तभी तो कमलप्रेमी मुख्यालय पर कहने से नहीं चूके। आज कोई राजनीति वाली बात नहीं होगी। बस मस्ती। गीत-कविता-चुटकुले सुनाओं। हाइनेस ने खटिया खडी करने की बात कही। तो विकासपुरूष ने उसमें सुधार किया। खटिया नहीं, बल्कि पटिया उलाल कर दिया। विकासपुरूष ने जब यह कहा तो जोरदार ठहाका लगा। इसके पहले अपने हाइनेस ने आदत अनुसार प्रथमसेवक पर खटिया खडी ना हो जाये, कहकर माहौल में गर्माहट ला दी थी। खैर ... होली को इतनी रंगीनमय बनाने को लेकर जनता-कमलप्रेमी और अधिकारी सब खुश है। तभी तो इतिहास रचने की बात कर रहे है। जो कि सच है। इसलिए हम भी इतिहास बनाने की बधाई देकर अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
चिंता ...
सबको पता है। सिंहस्थ कामों को लेकर चिंता जाहिर कर चुके है। अपने विकासपुरूष। शोधपीठ संस्थान की बैठक में। इसके बाद भी कोई हलचल नजर नहीं आ रही है। जबकि शोधपीठ के बाद राजधानी में भी एक बैठक हो चुकी है। जिसमें अपने जय-वीरू, चटक मैडम जी, स्मार्ट पंडित, इंदौरीलाल सहित 2 नंबरी इंदौरी नेताजी भी शामिल थे। 120 मिनिट बैठक चली। जिसमें विकासपुरूष ने फिर चिंता जाहिर की। लेकिन इस बार तेवर अलग थे। 2 घंटे तक अनवरत उन्होंने प्रत्येक विषय पर सभी को समझाया। बैठक में मौजूद सभी के जाले साफ कर दिये। अब इसके बाद 18 मार्च को फिर बैठक है। जो कि प्रशासन के बड़े साहब लेंगे। देखना यह है कि विकासपुरूष की डबल चिंता से प्रशासनिक टीम क्या सबक लेती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
चर्चा ...
इश्क और मुश्क (खुशबू) कभी नहीं छुपते है। भले ही कितनी भी कोशिश कर लो। इस सोशल मीडिया के दौर में तो इकतरफा इश्क करना, आ बैल मुझे मारना ... साबित होता है। ऐसा हम नहीं, शिवाजी भवन के गलियारों में बैठने वाले बोल रहे है। इशारा एक अधिकारी की तरफ है। जिनका दिल एक उपयंत्री पर आ गया है। हालांकि उपयंत्री की तरफ से लगातार इंकार किया जा रहा है। मगर साहब तो दिल तो पागल है ... के कारण मजबूर है। मामला दिल का है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।