30 मार्च 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
फोन नहीं उठाने पर...
अपने विकासपुरुष उस अफसर को पसंद नहीं करते है। जो कि आमजनता की परेशानियों को लेकर आने वाले फोन नही उठाएं। शिकायत मिलने पर तत्काल एक्शन लेते है। जैसे पिछले सप्ताह लिया। विंध्य क्षेत्र के दौरे पर थे। तब कमलप्रेमियो सहित जनता ने इस सच से अवगत कराया। बस फिर क्या था। आईएएस अफसर का बोरिया-बिस्तरा तत्काल बंध गया।रवानगी के आदेश जारी कर दिए। उनकी जगह जिनकों भेजा गया। वह एक बुजुर्ग महिला के हाथ पर अपना फोन नम्बर लिखते एक तस्वीर में नजर आए। इस घटना के बाद बाबा की नगरी के कमलप्रेमी भी खुलकर बोल रहे है। एक ऐसे ही अफसर की आदत को लेकर। जिनको सभी फटाफट जी के नाम से जानते हैं। उनकी भी यही आदत है। चुनिंदा लोगों के ही फोन रिसीव करते है। आमजनता को तो उनका नम्बर ही नहीं पता है। जिनको पता है। उन कमलप्रेमियो के भी फोन नही उठाते है। जबकि उन पर मंदिर की जिम्मेदारी है। जहाँ आमजनता परेशान होती रहती है। इस अफसर पर राजधानी के बड़ेसाहब का वरदहस्त है। यह बात जगजाहिर है। तभी तो विकासपुरुष से गुहार लगाई जा रही है। इन पर भी एक्शन लेने की कृपा करें। देखना यह है कि विकासपुरुष कब सख्त कदम उठाते हैं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
चेतावनी का असर होगा या....
अपने उज्ज्वल जी ने एक बार फिर चेतावनी दी है। यह दूसरी दफ़ा उन्होंने चेतावनी दी है। इस बार कप्तान जी के सामने। सड़क सुरक्षा की बैठक में। उज्ज्वल जी ने साफ लफ्ज़ो में बड़ा गणपति से हरसिद्धि तक लगने वाली चलित दुकानों पर आपत्ति ली है।इसके पहले दौरे पर गए थे। इन्दौरीलाल और एंग्रीमैन के साथ। तब भी सवाल उठाया था। दुकान नही लगनी चाहिए। यही पर दीवार गिरी थी। 2 लोग मरे थे। इस दफा जरा कड़क आपत्ति ली है। अब अपने उज्जवल जी बात अगर मानी गई। तो रोज़ की करीब 2 से 3 पेटी नगद आमदानी से हाथ धोना पड़ सकता है।सबको पता है। वसूली होती है। इन दुकानदारों से। जिसमें मंदिर -वर्दी-शिवाजी भवन तीनो का सहयोग रहता है। जिसे यह तीनों नही खोना चाहते है। अब इन तीनो को ही उज्ज्वल जी जवाबदारी दी। देखना यह रोचक भरा होगा कि चेतावनी का कितना असर होता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बेगानी शादी में अब्दुल्ला...
यह कहावत तो सभी को याद होगी। इन दिनों इसको स्मार्ट गलियारों में याद किया जा रहा है।कारण-अपने निखट्टू जी के चलते। जो इन दिनों एक पुरस्कार को लेकर रील सोशल मीडिया पर डालकर बधाई ले रहे है। जबकि जिस विषय पर वह देश की राजधानी जाकर पुरस्कृत हुए है। उसमें उनका रत्तीभर भी योगदान नहीं है। पुराने काम है। ताज्जुब इस बात का है कि जिस विषय पर अभी पुरस्कार लाए है। उसी पर 2 दफ़ा पहले भी राजधानी से ट्राफी और प्रमाणपत्र मिल चुका है। तभी तो उनके ही मातहत बेगानी शादी की कहावत को याद कर रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। हम तो बस उनकी खुशी के लिए अपनी तरफ से भी बधाई देकर ,आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
उविप्रा का मुखिया कौन बनेगा..
अपने कमलप्रेमी इन दिनों यह सवाल एक दूसरे से पूछ रहे है।किसको मिलेगी विकास भवन की जिम्मेदारी। अपने विकासपुरुष की कृपा किस पर होगी? इधर उच्चस्तरीय सूत्रों ने इस कुर्सी को लेकर संकेत दिए है। पँजाप्रेमी सरकार को गिराकर कमलप्रेमी बने श्रीमंत ने इस कुर्सी के लिए अपने एक ठाकुर भक्त का नाम आगे बढ़ाया है। उनकी तरफ से केवल एक नाम अपनी सूची में जोड़ा गया है। यह सूची उनके द्वारा सीधे दिल्ली दरबार मे दी गई है। जिसके चलते वर्षों से विकास भवन के मुखिया बनने की दौड़ में लगे विकासपुरुष के सखा की राह में बाधा उत्पन्न होती नजर आ रही है। कारण-श्रीमंत ने मालवा क्षेत्र के लिए केवल यही एक डिमांड रखी है। अब देखना यह है कि फैसला दिल्ली दरबार से होता है या श्यामला हिल्स से।तब तक हम इंतजार करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
आईएएस-आईपीएस-आमआदमी
अपने विकासपुरुष अचानक कभी कभी ऐसा सवाल कर लेते हैं। जिनका जवाब आईएएस आईपीएस भी नहीं दे पाते है। नतीजा गूगल-बाबा की शरण लेनी पड़ती है। वीवीआईपी गेस्ट हाउस की घटना है। रात की जब सारे आईएएस-आईपीएस मौजूद थे। तब विकासपुरुष ने सवाल दाग दिया। उज्जैन-भोपाल-इंदौर कहाँ पर ज्यादा गर्मी -ठंडी होती है। सवाल सुनकर सभी आश्चर्य में आ गए।फिर सबने अपने अपने हिसाब से उत्तर दिया। जिसमें नदी के प्रवाह का भी उल्लेख किया। मगर सही जवाब कोई नहीं दे पाया। यह जरूर हुआ कि जवाब के लिए गूगल-बाबा का सहारा लेना पड़ा। जिसे देखकर अपने विकासपुरुष मुस्कुराते रहे। उन्होंने यह जरूर कहा। आप सब आईएएस-आईपीएस है और मैं आम आदमी।विकासपुरुष की खरी बात सुनकर सब चुप हो गए। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
मैं आ तो रहा था..
अपने विकासपुरुष के जन्मदिन के अवसर पर जब हाइनेस कहीं नजर नहीं आए। तो अपने कमलप्रेमी सवाल उठाने लगे थे। जितने मुँह-उतनी बातें। मगर हाइनेस चार कदम आगे की सोच कर राजधानी निकल गए। जब उनकी विकासपुरुष से मुलाकात हुई।तो हाइनेस को देखकर साफ कहा। मैं आ तो रहा था।यहाँ क्यो आ गए जिसके बदले हाइनेस ने कहा कि बस आ गए। हालांकि हाइनेस को विकासपुरुष के पास पहुँचने के लिए back door इंट्री लेनी पड़ी। कारण भीड़ बहुत थी। अगर पिछले दरवाजे से इंट्री नही मिलती तो काफी समय तक इंतजार करना पड़ता। वैसे हाइनेस का राजधानी जाकर स्वागत करने के पीछे असली कारण कुछ और था। मुहावरे की भाषा मे 1 पंथ 2 काज। स्वागत के बाद वह अपनी निधि से स्वीकृत कामों को लेकर उस अधिकारी से मिले। जो विकासपुरुष के osd हैं। उज्जैन के कलेक्टर रह चुके है। वित्तीय वर्ष खत्म होने को है। तो उनसे निवेदन कर लिया। उनके द्वारा स्वीकृत सूची के लाभार्थियों को राशि जारी करने में कोई संकट पैदा नही हो? ऐसा हम नहीं बल्कि अपने हाइनेस के करीबी बोल रहे है। देखना यह है कि हाइनेस के 1 पंथ 2 काज को कितनी सफलता मिलती है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
एकांत में चर्चा...
पिछले दिनों मंदिर के महंत जी के इस्तीफे की खबर ने हड़कंप मचा दिया था। हालाकि यह खबर निराधार निकली। लेकिन इस घटना के बाद जब विकासपुरुष अपने जन्मदिन पर आए ।अगले दिन जब वह वापस जा रहे थे। तब हवाई पट्टी पर अपने महंत जी भी मौजूद थे। जिन्होंने विकासपुरुष से एकांत में चर्चा की। दोनो के बीच हुई गोपनीय बात को लेकर कयास लगाये जा रहे है। महंत जी ने इस्तीफे के अलावा मंदिर में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर भी जरूर कुछ कहा होगा? खासकर अपने फ़टाफ़ट जी की मनमानी को लेकर? वैसे यह मुलाकात जन्मदिन की बधाई देने से जुड़ी थी। इस दौरान सभी अफसर भी मौजूद थे।लेकिन दोनों के बीच चल रही बातचीत से सभी की दूरी थी। इसलिए कयास लगाये जा रहे है।असली बात केवल विकासपुरुष और महंत जी को पता है। जो कि चुप है। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
असली वाला कौन सा ...
पिछले दिनों प्रदेश के प्रथमसेवक ने शहर को एक सौगात दी थी।अपने विकासपुरुष की मौजूदगी में। जिसका नाम गीता भवन है। 72 खोखे खर्च से इसका निर्माण होगा। जिसकी परिकल्पना अपने इन्दौरीलाल जी की है। इसके लिए वह बधाई के हकदार है। मगर इन दिनों एक सवाल उठ रहा है। जो कि गीता-भवन से ही जुड़ा है। जो कि देवास रोड पर बनाया गया है। इस साल के प्रथम महीने में इसका दौरा अपने विकासपुरुष ने किया था। इसकी लागत 32 खोखे थी। तब खबरे भी प्रकाशित हुई थी। विकासपुरुष ने देखा भी था निर्माणाधीन गीता भवन। उनको डिजाइन भी दिखाई गई थी। फिर अचानक से दुगनी राशि वाला यह दूसरा गीता भवन कहाँ से प्रकट हो गया? तभी तो कमलप्रेमी पूंछ रहे है। असली वाला कौनसा है? जिसका जवाब हमारे पास नहीं है। जिनके पास है। वह विभाग इस सवाल को लेकर चुप है। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
चाबी किसने भरी...
Big -b की एक फ़िल्म का गीत शायद याद होगा। जितनी चाबी भरी राम ने-उतना चले....! इन दिनों यह गीत निर्माण एजेंसी से जुड़े अधिकारी गण गुनगुना रहे है।कारण-अचानक अपने उम्मीद जी-उज्ज्वल जी-एंग्रीमैन ने सुबह-दोपहर-शाम और रात को निरीक्षण शुरू कर दिया है।हालाकि इसके पहले भी निरीक्षण हो रहे थे।मगर इतनी तेजी नहीं थी।सप्ताह में 3 दिन मंगल-गुरु- शनि समीक्षा होती थी। जिसमे परिवर्तन हुआ है।अब केवल दो दिन समीक्षा और बाकी दिन निरीक्षण-निरीक्षण हो रहा है। फिर भले ही इतवार का दिन क्यों न हो। तभी तो निर्माण एजेंसियों से जुड़े अधिकारी बोल रहे है। आखिर चाबी किसने ज्यादा टाइट की है? इशारा अपने विकासपुरुष की तरफ किया जा रहा है। अब सच क्या है? हमकों पता नहीं है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
आकाशवाणी से अचरज में प्रशासन
पौराणिक कथा कृष्ण जन्म की तो सबको याद होगी। जो कृष्ण भगवान के जन्म होने से पहले हुई थी।जिसे सुनकर मामा कंस ने अपनी बहन-बहनोई को कैद कर लिया था। तब भी आकाशवाणी सही साबित हुई थी। लेकिन अपने विकासपुरुष के जन्मदिन पर हुई आकाशवाणी कार्यक्रम ने प्रशासन को हैरत में डाल दिया। राजधानी से जो प्रोग्राम जारी हुआ था। उसमें कही भी जिक्र नहीं था। अपने विकासपुरुष अपने जन्मदिन पर आकाशवाणी से प्रसारण करेंगे। उसी हिसाब से प्रशासन ने तैयारी की थी। हेलीपेड से काफिला रवाना हुआ। अचानक ही वाहन मंदिर जाने वाले मार्ग की तरफ मुड़ गए। पीछे चल रहे अधिकारियों ने सोचा। मंदिर का प्रोग्राम बन गया है। लेकिन काफिला सीधे आकाशवाणी केंद्र जाकर रुका। जिसके बाद विकासपुरुष ने 17 केंद्रों पर अपना उदबोधन दिया। जिसे 1 करोड़ से ऊपर जनता ने सुना। किन्तु इसके पहले अपने कप्तान जी ने सुरक्षा के चलते आपत्ति दर्ज कराई थी।अपने उज्ज्वल जी भी इस प्रोग्राम को अचरज में थे। ऐसी चर्चा प्रशासन में सुनाई दे रही है। जिसमें हम कर क्या सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
सीढियां तो बनाओ...
विकासपुरुष की नजरें एक पल में गलती पकड़ लेती है। अधिकारियों को लगता है कि शायद उनका ध्यान नहीं जाएगा। लेकिन जन्मदिन की अगली सुबह उन्होंने साबित कर दिया। उस वक्त जब वह पूजा करके घाट निर्माण का निरीक्षण कर रहे थे। उनके face को देखकर कई कयास लगाये गए। लेकिन असली बात यह थी। 500-500 मीटर लंबे घाट तो बना दिए गए। मगर घाट तक सुविधापूर्वक पहुँचने के लिए सीढ़ियां विकासपुरुष को नजर नहीं आई। उन्होंने इस पर प्रशासन का ध्यान अवगत कराया। जनता कैसे घाट तक पहुँचेगी? जिसके बाद अपने उम्मीद जी ने वादा कर लिया है। 200-200 मीटर की दूरी पर सीढियां बना दी जाएंगी। ऐसा चुप के सूत्रों का कहना है। बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।
पहले money दीजिये-फिर काम कीजिए...
अपने विकासपुरुष जिले का विकास करने में लगे हैं। मगर कमलप्रेमी और पँजाप्रेमी नेताओं के समर्थक कमाई करने में जुट गए है। ताज़ा मामला पवन चक्की लगाने वाली कम्पनियों से जुड़ा है। लगभग दो दर्जन ग्राम में यह लगनी है। जिसके लिए किसानों से अनुबंध भी किया है। राशि भी दी है। मगर जिस रास्ते से उपकरणों को ले जाना है। वहाँ के दोनो पार्टी के चमचों को अपनी जेब गर्म करने का मौका मिल गया है। कंपनियों के मातहतों से डिमांड की जा रही है। रास्ता साफ तभी मिलेगा,जब राशि दोगे। जिसके चलते कम्पनियों ने वर्दी तक शिकायत की है। वर्दी ने उनके नाम मांगे हैं। जो डिमांड कर रहे है। हालाकि कम्पनियों ने खास समर्थकों को पहले ही लिफाफा भेंट कर दिया है। इसके बाद भी छोटे-मोटे छर्रे मुसीबत पैदा कर रहे है । विकास की राह में रोड़ा अटका रहे है। नतीजा-कम्पनियों के संचालक दुःखी है। वर्दी से गुहार लगा रहे है। देखना यह है कि वर्दी कितनी मदद करती है। तब तक जैसे कंपनियां चुप है। वैसे हम भी चुप हो जाते हैं।
सफेद-काला-खाकी और कोने का पत्थर
अपने दालवाले नेताजी एक कार्यक्रम में गए थे। बदबूदार शहर में। जहाँ फिर एक बार मांग उठी। इस शहर को जिला बनाने की। कमलप्रेमी और पँजाप्रेमी दोनो पूर्व माननीय ने इसका समर्थन किया। अब बारी अपने दालवाले नेताजी की थी। जिन्होंने साफ लफ़्ज़ों में कहा। मेट्रोपोलिटन का दौर है। जिसमें यह शहर भी शामिल है। जिले की बात छोड़ो। विकासपुरुष के शासन में विकास हो रहा है। हर क्षेत्र में। कई योजनाएं गिना दी। अंत में उन्होंने कहा। सफेद-काला-खाकी कोट से कभी भी काम पड़ सकता है और मैं रास्ते का वह पत्थर हूँ। जो कभी भी गाड़ी को टेका लगाने के काम आ सकता हूँ। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर विरोध में पोस्ट अपलोड हुई है। जिसमें हम तो कुछ कर नहीं सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
मेरी पसंद..
मुर्दो के गम को भी हम अब तक स्वीकार नहीं करते
आंगन में शव था और हँसती तस्वीर बिठा ली है
सुसाइड करने का भी कोई मतलब नहीं बनता
थोड़े ही दिन में वैसे भी छुट्टी होने वाली है
भूपेंद्र सिंह