09 फ़रवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

09 फ़रवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)

सिफारिश हो तो ऐसी...
तो गुरुवार को आखिर अपने वर्दीवाले जोगी जी ने  विदाई ले ली। एकदम से ऐसे पद पर छलांग लगाई है। जहाँ पर लक्ष्मी माता की विशेष कृपा रहती है। इस पद के लिए तगड़ी सिफारिश लगती है। बाकी शिष्टाचार अपनी जगह निभाना पड़ता है। अपने जोगी जी ने दोनों का पालन किया। अंदरखाने की खबर है।जनवरी 20 को केंद्र से एक पॉवरफुल मंत्री जी आए थे।जिनकी सुरक्षा में ब्लैक कमांडो लगे थे। मंदिर में दर्शन किए। बेहद विन्रम मंत्री। मातहतों का भी ख्याल रखने वाले। दक्षिण भारतीय। दर्शन के बाद अपने जोगी जी के सरकारी निवास पर गए थे। डिनर किया और  निकल गए। इसके बाद 29 जनवरी को उस पद के लिए ऑर्डर निकल गया। जिसकी अभिलाषा अपने जोगी जी को थी। ऐसी चर्चा अब अपने वर्दीवाले दबी जुबान से कर रहे है। अब हम वर्दीवालों की जुबान तो पकड़ नहीं सकते है।इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

कोई भी नहीं आया...
एक निजी होटल में पिछले सप्ताह खबरचियों को बुलाया गया था। जिसके लिए एक दिन पहले संदेश भेजा गया। प्रभारी बाऊ जी सहित सभी माननीय गण मौजूद रहेंगे।मगर जब अवसर आया तो केवल बाऊजी के अलावा कोई माननीय नजर नहीं आया। खबरचियों को भी बाऊजी ने लिखा हुआ संदेश पढकर सुना दिया। जो बज़ट को लेकर था। जिसके बाद कमलप्रेमियो में चर्चा थी। कहाँ तो जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति को विशेष रुप से मौजूद होने का दावा संगठन का था।मगर एक भी हाजिर नहीं हुआ।दूसरा बज़ट को लेकर खुद कमलप्रेमी बिलाल सहरानपुरी का शे'र हमको सुना गए।हमारे पाठकगण भी पढ़े,जो कमलप्रेमी हमकों बोल रहे है।
उसने पढ़ा इवान में करोड़ों का बज़ट
लेकिन उदास लोगों के चेहरे नहीं पड़े
कमलप्रेमियो के इस अशआर में दम है।मगर आदत के अनुसार चुप रहना हमारा धर्म है।

गलत लिखा आपने...
पिछले सप्ताह के चुप प्रकाशन के बाद ऊपर लिखी लाइन हमकों लिखकर भेजी गई।अपनी महारानी मैडम जी ने।जिसमें हमने उल्लेख किया था। मैडम जी का मन संकुल के गलियारों में नहीं लग रहा है। उनकी इच्छा किसी तहसील में पदस्थ होने की है।जिसको पढ़कर उनकी सफाई थी।जब उनको दाल बिस्किट की तहसील से हटाकर संकुल पदस्थ किया गया। तो उन्होंने खुद उज्ज्वल जी से अनुरोध करके सरकारी जमीन की देखरेख का काम मांगा था। उदारमना उज्ज्वल जी ने इच्छा पूरी कर दी। महारानी मैडम ने यह भी लिखा। खाचरौद और इंगोरिया जाने का तो बिल्कुल मन नही है। उनकी बात को मान लेते है। अब यह देखना रोचक होगा।अगर अपने उज्ज्वल जी किसी अन्य तहसील में उनकों मौका देते है। तो वह उस अवसर को स्वीकार करती है या अस्वीकार। फैसला वक्त करेगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

12 पेटी का फरमान..
युवा कमलप्रेमियो के मुखिया का आगमन हुआ था। जोरदार स्वागत हुआ। जगह जगह मंच बने थे।इतना जोरदार स्वागत देखकर अपने दालवाले नेताजी की आंख खुली रह गई।उन्होंने फैसला लेने में देर नहीं लगाई।जब मुख्यालय पर कार्यक्रम चल रहा था। तो मंच से घोषणा कर दी। युवा कमलप्रेमियो को अब आजीवन निधि 5 की जगह 12 पेटी एकत्रित करके देनी होगी।वजह जोरदार स्वागत और खर्च था। वह यह कहने से भी नहीं चूके,भले वर्तमान युवा जिला मुखिया अपने स्वागतप्रेमी तब तक इस पद पर नहीं रहेंगे।जिसका अर्थ साफ है कि नए मुखिया को अब 12 पेटी निधि की देनी होगी।देखना यह है कि इस चुनोती को स्वीकार करने कौन युवा नेता आगे आता है।तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

दस हजारी की क्षति....
बैलून अग्निकांड में भले ही कोई जनक्षति नहीं हुई।मगर जेब की क्षति जरूर हुई है। ऐसा अपने युवा कमलप्रेमी बोल रहे है।इशारा अपने स्वागतप्रेमी की तरफ है।जिन्होंने प्रदेश मुखिया के लिए भोजन व्यवस्था अन्नक्षेत्र में की थी। दर्शन के बाद सीधे अन्नक्षेत्र। मगर बैलून कांड के बाद मुखिया जी का मूड बदल गया।उन्होंने होटल की इच्छा जाहिर की। उनके साथ करीब 40 युवा कमलप्रेमी थे।मजबूरी में होटल ले जाना पड़ा। नतीजा 10 हजारी क्षति उठानी पड़ी स्वागतप्रेमी नेताजी को। ऐसा युवा कमलप्रेमियो का कहना है।मगर हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।

सख्ती भी  -ईनाम भी...
अपने उज्ज्वल जी में इन दिनों गजब का परिवर्तन नजर आ रहा है। काम मे लापरवाही को लेकर एकदम सख्त हो गए है।मगर इसके साथ ही अच्छे काम पर अब प्रमाणपत्र भी देने लगे है।जबकि अभी तक ऐसा नहीं होता था।सोमवार की साप्ताहिक बैठक में उनका यह परिवर्तन रूप नजर आया। जब उन्होंने अचानक ही करीब आधा दर्जन अधिकारी को पहले शाबाशी दी और फिर पुरुस्कार के रूप में प्रमाणपत्र।जिससे अधिकारियों के चेहरे खिल उठे।हर अधिकारी यही इच्छा रखता है। उनका बॉस काम की तारीफ करें।वह भी सबके सामने।उज्ज्वल जी ने यह कर दिखाया। उनके इस कदम से मातहतों में खुशी व्याप्त है।अब हर महीने उन अधिकारियों को प्रमाणपत्र मिलेगा। जो बेहतर कार्य करते है। इसके लिए हम भी उज्ज्वल जी को साधुवाद देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

सवाल पर बवाल पक्का
अपने पिस्तौल कांड नायक हमेशा दुखती रग पर प्रहार करते है। फिर आराम से मजे लेते है।अभी ताज़ा ताज़ा आनंद वह अटैचमेंट पर सवाल लगाकर उठा रहे है। जिसमें कलेक्टर कार्यालय-जिला पंचायत और पटवारियों पर निशाना साधा है। अटैचमेंट का मजा वह कर्मचारी ज्यादा लेते है।जो जुगाड़ू होते है। जोड़-तोड़ -हाथ जोड़-पैर पड़कर मूल विभाग से ऐसी जगह पदस्थापना करवा लेते है। जिसमे उनकी जेब भी गर्म होती रहे और काम भी कम करना पड़े। हालांकि शासन के पहले ही निर्देश है। अटैचमेंट खत्म करें, मगर पूरी तरह से पालन हो नहीं सकता है। अब देखना यह है कि इस तारांकित सवाल पर जवाब कितना रोचक आता है। तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

अफ़वाह या सच...?
ज्यादा समय नहीं गुजरा है।पिछले महीने संविधान दिवस गया है।अपने विकासपुरुष के हाथों सम्मानित होने की होड़ मची थी।सब की इच्छा थी।होनी भी चाहिए।सूबे के मुखिया विकासपुरुष के हाथों पुरस्कृत होते हुए एक तस्वीर हो।जिसे अपने ड्राईंग रूम में टांग कर परिवार, बच्चे और आने वाले रिश्तेदार गौरव महसूस करें। यह होड़ वर्दी में ज्यादा थी। जिसके लिए मूल्य देने की चर्चा अब सुनाई दे रही है। यह अफवाह है या सच। हमकों कुछ नहीं पता,मगर जब धुंआ दिखा है,तो आग भी लगी होगी। ऐसा वर्दीवाले बोल रहे है। मगर हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।

गनमैन की तलाश...
पिछले दिनों एक आईपीएस ने कई माननीय और अधिकारियों को सकते में ला दिया। इस आईपीएस की बाबा की नगरी जन्मभूमि है।इनकी इच्छा थी।इनको अहिल्या नगरी में ग्रामीण इलाके की कमान सौपी जाएं।इसके लिए इन्होंने कई माननीयों से सम्पर्क किया।मगर सफलता नहीं मिली।बल्कि बटालियन की कमान थमा दी।  बस,फिर क्या था।सीनियर आईपीएस  साहब ने जिस जिस के पास गनमैन थे।सबको वापस बुला लिया। इससे विचलित कई ने उन्हें फोन करके गुहार की।वापस भेजने की। मगर साहब नही पिघले। इस चक्कर मे एक वर्दीधारी मैडम ने उनको सीधे फोन ठोक दिया।गनमैन के लिए।आईपीएस साहब ने उल्टा सवाल कर लिया।तुमको पात्रता है?जिसे सुनकर मैडम चुप हो गई।तो हम भी चुप हो जाते हैं।

भगाओ इनको-खाली कराओ...
अपने उज्ज्वल जी इन दिनों बाबा तुलसीदास की चौपाई पर अमल कर रहे है। जो कि वक्त के हिसाब से बहुत जरूरी है।विनय ना मानत जलाधि जड़ि/गए तीन दिन बीति/बोले राम सकोप तब/भय बिनु होई न प्रीति। तभी उज्ज्वल जी ने शनिवार को भय दिखाया।अपने एंग्रीमैन को कहा।भगाओ इनको-ऑफिस भी खाली कराओ।दरअसल 28 के निर्माण कार्य की समीक्षा कर रहे थे। दो कम्पनी है।जीटी और इवाय ,दोनो में समन्वय नहीं है। कामों की प्रगति पोर्टल पर दर्ज करना इनका काम है।जिसमे दोनो कम्पनी लापरवाही कर रही है। उज्जवल जी पहले भी नसीहत दे चुके है।मगर सुधार नही हुआ।तो फिर एक ही रास्ता बचता है। जिस पर अमल किया गया है।
अब देखना यह है कि कम्पनी के काम में सुधार आता है या फिर भगा कर -ऑफिस खाली करवाते हैं।फैसला जल्दी होगा,तब तक हम चुप हो जाते हैं।

बीमारी को फटकार-मातहत खुश
हमारे पाठक हेडिंग पढ़कर अंदाजा लगा सकते है।हम शिवाजी भवन की बीमारी का उल्लेख कर रहे है।मगर हमारा इशारा पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग की बीमारी की तरफ है। जिनकों उनके मातहत बदतमीज-बीमारी बोलते है।इनकी बदतमीजी व्यवहार से सभी गुरुजन परेशान है। किसी को भी फटकार लगाने में एक पल की देरी नहीं करते है।मगर 3 फरवरी को खुद शिकार हो गए। राजधानी से वीसी थी। आयुक्त महोदया के हत्थे लग गए। वेतन समय से नही देने के मुद्दे पर। मैडम जी ने सभी के सामने लू उतार दी। साफ साफ कहा। तुमकों हर महीने वेतन चाहिए, मगर गरीब लोगों को 3-3 महीने वेतन नहीं देते हो। इस फटकार को सुनते ही बदतमीज-बीमारी का चेहरा सफेद पड़ गया।जिसके बाद गुरुजनों तक यह घटना पहुँची।तो सभी ने खुशी जाहिर की, कुछ ने तो मिठाई बाटी।ऐसी चर्चा पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग में सुनाई दे रही है। चटकारे लेकर सब मज़े ले रहे है।मगर हमकों तो अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।

साहब व्यस्त-मातहत मस्त..
मंदिर के गलियारों में "साहब व्यस्त-मातहत मस्त" बोला जा रहा है। बोलने वाले भी वही कर्मचारी है। जो इन दिनों मस्ती छान रहे है। वजह अपने फटाफट जी इन दिनों मंदिर से कुछ ज्यादा दूरी बनाकर चल रहे है। कभी -कभी आते है। जब भी आते है।अपने अभेद-दुर्ग जैसे कार्यालय में कुछ देर बैठकर निकल जाते है। जिसका फायदा मातहत उठा रहे है। अपनी मर्जी से आते और जाते है। जबकि नियम यह है कि ड्यूटी पर टाइम से आए।लेकिन साहब की निजी पारिवारिक व्यस्तता है। जो कि जायज है।हम इसका सम्मान करते है।लेकिन इतनी उम्मीद अपने फटाफट जी से रखते है।वह अपने उज्ज्वल जी से थोड़ा सबक लेकर सख्ती दिखाए। ऐसी मंदिर में ईमानदारी से काम करने वालो की गुहार है। देखना यह है कि अपने साहब इस गुहार पर ध्यान देते है या नहीं?तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

किस्मत हो तो ऐसी...
हमारे पाठकगण पढ़कर यह समझे कि आखिर हम किसकी किस्मत पर लिख रहे है।उससे पहले उस अधिकारी को बधाई देना चाहते है। जिनकी किस्मत लिखते वक्त भगवान ने शायद दोनो हाथों में कलम पकड़कर रखी होगी।तभी तो अपने इन्दौरीलाल जी,अपने विकासपुरुष की नाक का बाल बने हुए है। इसके पीछे किस्मत और उनकी कार्यशैली है। नतीजा उनको अभी-अभी परिवहन सेवा के मंडल में जिम्मेदारी सौंप दी गई। पूरे संभाग की।इसलिए तो विकास भवन के गलियारों में उनकी किस्मत को लेकर मरहूम शायर सागर आजमी का अशआर सुनाई दे रहा है।
हसरत की बुलंदी में मत इतना उड़ो सागर
परवाज न खो जाए कहीं ऊंची उड़ानों में
सागर साहब के अशआर में दम है।मगर आदत के अनुसार चुप रहना ही हमारा कर्म है।

मेरी पंसद...
मौत को यूं व्यवहार में केवल दुर्घटना कह सकते है।
या जीवन का अंतहीन अवकाश कहा जा सकता है।