02 फ़रवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
मैडम की नजरें
दाल बिस्किट वाली जगह से संकुल आई मैडम की बेचैनी अब साफ नजर आने लगी है। संकुल की भूल भुलैया ओर आबोहवा उनको रास नहीं आ रही है।पिछले कई सालों से उनका अपना साम्राज्य था।जिसकी वह महारानी थी। उनके हर हुक्म का पालन होता था। अब संकुल में एक से एक बल्लम विराजमान है।ऐसे में अपनी महारानी मैडम जी दुःखी -परेशान है। उस पर उन पर सितम यह हुआ।वह काम उनको थमा दिया। जिसमें सरकारी ज़मीन की देखरेख का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसको जले पर नमक छिड़कना बोलते है। तभी तो उनकी नजरें खाचरौद और इंगोरिया पर इनायत है। ऐसा हम नही बल्कि संकुल में बैठने वाले बोल रहे है। ऐसे में हमें तो बस एक बहुत पुराना गीत याद आ रहा है।कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना....और हमारा तो काम है।चुप रहना।
अफसर के अगाड़ी-घोड़े के पिछाड़ी...
इस कहावत को तो आप सभी ने सुन रखा होगा। मगर यह किसी ने नही सुना होगा कि घोड़े के नीचे घुसना।ऐसे में घोड़े का बिदकना स्वाभाविक है।हालांकि वर्दी का ट्रेंड घोड़ा था।जिस पर अपने विकासपुरुष सवार हुए थे।भीड़ के बीच चलने की उसको आदत है।सवारी में भी शामिल रहते है।किंतु कोई अगर उसके नीचे घुसे तो बिदक जाता है। राहगिरी में यही हुआ।जिस वक्त विकासपुरुष सवार हुए थे।तब एक माननीय ने नीचे से घुसकर ,दूसरी तरफ निकलने की कोशिश की। ताकि फोटोफ्रेम में आ सके।बस,घोड़ा बिदक गया।उसके बाद की घटना जगजाहिर है। विकासपुरुष भी घुड़सवारी में माहिर है।वह घोड़े की हरकत से तत्काल संभल गए।बाकी का काम आसपास मौजूद वर्दी-नेता-जनता ने संभाल लिया।लेकिन दबी जुबान से यह सवाल जरूर पूछा जा रहा है।नीचे घुसने वाले माननीय कौन थे? इसको लेकर सब चुप है।तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बैठक में तू-तू -मैं मैं.....
अपने हाइनेस पर शायद इनदिनों शनि की दशा भारी चल रही है। तभी तो वह पदाधिकारी भी मुखर होने लगे है।जिनको खुद उन्होंने इस योग्य बनाया। अब वही उनके सामने ही खुलकर विरोध कर रहे है। घटना पिछले महीने की है।हाइनेस के ऑफिस में बैठक थी।एस आई आर को लेकर।जिसमें नगर के उप प्रमुख और कमंडल मुखिया सहित लीडर आदि शामिल थे। तभी लीडर ने काम को लेकर कुछ ऐसा बोल दिया।जो कमंडल और उप प्रमुख को चुभ गया। बस फिर क्या था।हंगामा हो गया।यह तक बोला गया। पिछवाड़े में छेद कर देंगे।हाइनेस ने बचाव की कोशिश की।उनको भी बोल दिया।बीच मे मत बोलो।बेचारे हाइनेस को यह उम्मीद नही थी। दोनो को हाइनेस ने कमलप्रेमी पदाधिकारी बनवाया और वही ऐसा बोल गए। जिसके बाद कमलप्रेमी इस तू-तू-मैं-मैं को लेकर चटकारे ले रहे है।जिसे हम तो रोक नहीं सकते है।बस,आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
साधुवाद, सबक लेने के लिए...
शायद हमारे पाठकों को याद होगा।इसी कॉलम में हमने एक घटना लिखी थी। अपनी चटक मैडम जी को लेकर। जिसमें बच्चों के साथ भोजन करते वक्त उनके लिए बिसलेरी की बोतल ओर ग्लास रखा गया था। बाकी बच्चों को यह सुविधा नहीं थी। उस वक्त ताज़ा-ताज़ा दूषित पानी कांड हुआ था। शायद अपनी मैडम जी ने पढ़ा होगा। तभी तो इस दफा जब वह बच्चों के साथ भोजन करने बैठी। तो उन्होंने समानता का विशेष ध्यान रखा। सभी के सामने प्लास्टिक ग्लास रखे गए।उसी तस्वीर को अपलोड किया। जिसके लिए मैडम जी को साधुवाद। आखिर सबक लिया।चुप रहेंगे उनका आभारी है ,बाकी तो चुप रहना हमारी बीमारी है।
अच्छा आप भी आए है...
राजनीति में मतभेद होना अच्छी बात होती है। मगर जब यह मतभेद निजी मनभेद में बदल जाए।तो परिणाम भविष्य में घातक सिद्ध होते है। इन दिनों दालवाले नेताजी और हाइनेस के बीच यही नजर आ रहा है।एक कार्यक्रम में अपनी बहनजी और दालवाले नेताजी साथ पहुँचे। उस वक्त हाइनेस भाषण दे रहे थे।उन्होंने मंच से बहनजी का स्वागत किया।नेताजी को इग्नोर कर दिया। तो मंच पर पहुँचकर नेताजी कहने में नहीं चूके। संगठन के मुखिया भी आए है।तो पलटवार करते हुए हाइनेस ने भी व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। अच्छा आप भी आए है। जिसे देखकर मतभेद और मनभेद की चर्चा सुनाई दे रही है।जो कि सच भी है। देखना यह है आगे चलकर यह मनभेद क्या रंग लाता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
दोस्ती में दरार...
सियासत में सगा शब्द का कोई मोल नहीं होता है। बरसो की दोस्ती में दरार आ जाती है। जैसे इन दिनों अपने प्रथमसेवक और बीमारी के बीच आ गई है। दोनो के बीच अबोला हो गया है। जबकि दोनो का दोस्ताना बरसों से था। मगर अपने अपने सियासी नजरिए के चलते अपने शिवाजी भवन की बीमारी ने अब हाइनेस का दामन थाम लिया है। वजह प्रथमसेवक मंत्रिमंडल से बीमारी को हटाने की तैयारी हो चुकी थी।ऐसे में अपने हाइनेस खुलकर सामने आ गए थे। साफ लफ्ज़ो में बैठक के अंदर बोल दिया था।नही हटेगा। जिसके बाद दोस्ती में दरार आना पक्का था। वही हुआ भी।तभी तो कमलप्रेमी रहीम का दोहा सुना रहे है। रहिमन धागा प्रेम का...वाला। मगर धागा टूट चुका है।अगर कभी भविष्य में जुड़ा भी तो गाँठ बरकरार रहेगी।फ़िलहाल तो दरार की चर्चा ज्यादा है। वैसे भी अपने बीमारी जी की आदत है।ज्यादा समय तक किसी के साथ निभा नही पाते है। जिसके साथ हुए,उसके लिए गड्ढा खोदने में पीएचडी है। प्रथमसेवक ने निभा लिया था अब तक,हाइनेस कैसे निभा पाएंगें। यह सवाल कमलप्रेमी उठा रहे है।मगर हमकों तो चुप रहने की आदत है।
100 नहीं 500 दीजिए...
प्रथम आराध्य देव गणपति के मंदिर में दादागिरी से दान वसूल किया जा रहा है। भक्त अपनी मर्जी से अगर 100 ₹ चढ़ाना चाहते है।तो पुजारी पूरी दादागिरी से 500 ₹ से कम का दान स्वीकार नही करता है। बेचारे भक्त को मजबूरी में जेब ढीली करनी पड़ती है। यह दान शासकीय खजाने के बदले पुजारी की जेब मे जाता है।ऐसी घटना रोजाना होती है। एक शिकायत हमको मिली ।जिसकी शिकायत भी की गई।मंदिर व्यवस्थापक को।जिन्होंने आश्वासन दिया था।कार्यवाही का,मगर नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा। कारण मंदिर व्यवस्थापक को आराध्य देव से ज्यादा रुचि उनके पिताजी बाबा के मंदिर में है।उनका ज्यादा समय बाबा के मंदिर में गुजरता है। इसलिये लूट सके तो लूट की तर्ज पर व्यवस्था चल रही है। भक्त जाए जहन्नुम में हम तो रहेंगे जन्नत में। इसीलिए दादागिरी से वसूली हो रही है।जिसे रोकना प्रशासन के बस की भी बात नहीं है। इसलिए हम केवल अपनी पीड़ा लिखकर ,आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
कमाई के लिए...
नगरसेवकों को ऊपरी कमाई के लिए क्या क्या जतन करने पड़ते है।कितना दिमाग लगाना पड़ता है।इसका एक उदाहरण सुनने में आ रहा है।कमाई के नाली सफाई के नाम रास्ता निकाला गया।नानाखेड़ा क्षेत्र तरफ एक विहार नाम की कालोनी है।जहाँ के मकान मालिकों ने अपने अपने घर के बाहर की नाली को ढकवा रखा है। क्षेत्र के पीपी जी ने फरमान सुना दिया।जेसीबी मशीन से इनको हटाया जाएगा,फिर सफाई होगी। मकान मालिक घबरा गए। लम्बा खर्चा होगा। तो फिर बातचीत हुई।जो सफल रही। 200₹ वर्गमीटर के हिसाब से सौदा पटा। निजी सफाई कर्मचारी सफाई करेंगे।जो केवल एक फर्शी हटाकर काम निपटा देंगे।सभी खुश हो गए। पीपी जी का भी काम हो गया है। केवल जानकारी के लिए बता दें। पीपी जी,एक पूर्व माननीय के सगे भाई है।उनकी भतीजी ग्रामीण विकास दमदमा सदन की सदस्य है।इसीलिए तो पीपी जी ने कमाई का यह रास्ता खोजा है। हींग लगे न फिटकरी की तर्ज पर। जिसके लिए हम भी कमाई के रास्ते की बधाई देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
सख्त तेवर के साथ मैदान में...
अपने उज्ज्वल जी ,कप्तान जी,फटाफट जी औऱ इन्दौरीलाल वापस आ गए है। हालांकि अपने उम्मीद जी भी साथ जाने वाले थे।मगर अचानक एक निजी दुःख के चलते वह एयरपोर्ट से वापस लौट आए। बाकी चारों प्रयागराज गए थे। जहाँ से लौटने के बाद अपने उज्जवल जी के तेवर सख्त है। तभी तो शनिवार को जब निरीक्षण पर निकले। माधवनगर अस्पताल से लगी सड़क का। इस सड़क को 24 मीटर करना है।पानी की टंकी तक। इस मार्ग पर रईसों ने आगे तक कब्जा कर रखा है। उज्ज्वल जी ने सख्त तेवर दिखाए। काम जल्दी शुरू करने के आदेश दिए है। अब देखना यह है कि सरकारी जमीन पर कब्जा किए बैठे रईसों के बगीचों पर कब बुलडोजर चलता है। तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
दूरी के पीछे की मजबूरी...
अपने वजनदार जी की माननीय की यात्रा तराना से शुरू हुई थी।इसलिए अपने मतदाताओं से उनका मोह होना जाहिर है।वजनदार जी हमेशा सुख दुःख में तिलभांडेश्वर की जनता के साथ नजर आए है।मगर इन दिनों अचानक दूरी बना ली है। पिछले सप्ताह दंगा हो गया। उनके करीबी की बस जला दी गई।तब भी वजनदार जी एक बार भी नहीं गए। इसके पीछे कारण क्या है।तो कमलप्रेमी खुलकर बोल रहे है। किस मुँह से आएंगे। उनका करीबी ही तो इस क्षेत्र में आतंक का पर्याय बना हुआ था। जिसके खिलाफ कोई नहीं बोल सकता था।अब जाकर कप्तान ने हिम्मत दिखाई और आतंक को सलाखों के पीछे भेजा है।हालांकि इसमें अहिल्या नगरी के सुदर्शन भवन की सराहनीय भूमिका रही है। जिसके बाद से वजनदार जी ने मजबूरी में दूरी बना ली है।तभी तो मावठा गिरने के बाद भी अन्नदाता से मिलने नही गए । दूरी के पीछे की यही असली मजबूरी है।बाकी आदत के अनुसार चुप रहना हमारा जरूरी है
महालोक के बाद अब कृष्ण लोक...
महाकाल महालोक बनाने के बाद भक्तों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। अब अपने विकासपुरुष एक कृष्ण लोक बनाने की तैयारी में है। जिसकी रचना की जिम्मेदारी अपने इन्दौरीलाल जी को दी गई है।जिन्होंने पिछले दिनों जब विकास पुरुष आए थे। तो चलते-चलते उनकों प्रोजेक्ट दिखा दिया। अगर अपने विकासपुरुष की सहमति मिल गई। तो 50 मीटर ऊंची कृष्ण -प्रतिमा महालोक जाते वक्त दिखाई देगी। यह कृष्ण लोक कितना अदभुत होगा। इसकी कल्पना केवल इस तथ्य से की जा सकती है। कृष्ण प्रतिमा के चरण स्पर्श के लिए लिफ्ट का उपयोग करना होगा। अगर हींग लगे न फिटकरी..की तर्ज पर कृष्ण लोक बन गया तो विकासपुरुष की यह बाबा की नगरी को एक अनोखी सौगात होगी। जिसके लिए हम आमजन की तरफ से हरी झंडी देने का अनुरोध करते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
संचालन बनांम पुरस्कार...
हमारे पाठकों को हेडिंग का अर्थ समझ आए। उसके पहले विकासपुरुष का सपना हकीकत में बदलने की उनकों बधाई। गणतंत्र दिवस को लेकर कभी उनकों ख़्याल आया होगा। एक बार यह दिवस नदी किनारे मनाया जाए। वह पूर्ण हो गया। इसके अलावा बाबा की नगरी से टेलीप्रॉम्प्टर पर स्पीच देने का भी उन्होंने इतिहास बना दिया है।अब सीधे उस मुद्दे पर आते है। जिसका शीर्षक आप पढ़ चुके हैं। इस दफा संचालन का काम राजधानी से था। जिसने संचालन के दौरान अपनी प्रतिभा का दुरपयोग किया। संचालन में कई गड़बड़ी वहाँ मौजूद आमजनों को नजर आई। तो पारखी नजरों वाले उज्ज्वल जी और कप्तान जी ने भी इसको महसूस किया होगा। अब झांकी पुरुस्कार के मुद्दे की बात करते है। अपने इन्दौरीलाल जी ने बाजी मार ली। यह बात दमदमा विकास भवन को खल गई है। अंदरखाने की खबर है। विकास विभाग के मुखिया ने पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग से निर्णायक मंडल की भूमिका की नम्बर शीट तलब की है।कारण- ग्रामीण विकास भवन को फ़ोटो खिंचाने का मौका नहीं मिला? पढ़ाई-लिखाई विभाग इस फरमान से परेशान है। क्योंकि नम्बर शीट मिल नहीं रही है। ऐसी दमदमा के गलियारों में चर्चा है। मगर हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
कुछ तो पुण्य मिला होगा
मावा नगरी में धर्ममय माहौल था।पिछले सप्ताह।इसका पूरा श्रेय अपने खनिज राजा को जाता है। जो भले ही दिल से पंजा और व्यापार के लिए कमलप्रेमी है। उनकी आस्था के चलते कई सालों से यह कार्यक्रम हो रहा है। गरीब परिवार की लड़कियों का घर भी बसाते है। साधुवाद के पात्र है वह और उनकी टीम। मगर इस दफा न जाने उनकी इस आस्था पर क्यों सवाल उठाए जा रहे है। उठाने वाले कमलप्रेमी है। जो यह बात दबी जुबान से बोल रहे है। अपने प्रकट दिवस पर गौ मांस आरोपी से अभिनन्दन करवाने वाले को शायद इस पुण्य कार्य से आत्मिक शांति मिली होगी। कमलप्रेमियो की बात में दम है। मगर आदत के अनुसार चुप रहना हमारा धर्म है।
वर्दी लॉबी में चर्चा....
वैद्यजी ने अकस्मात् कहा, ”सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गांव सभा का प्रधान तुम्हें बनाएँगे।”
सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिये-पुलक गात लोचन सलिल।
अपने आप को क़ाबू में करके उसने कहा, “अरे नहीं महाराज, मुझ जैसे नालायक़ को आपने इस लायक समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज़्ज़त के क़ाबिल नहीं हूँ।”
सनीचर का कंधा थपथपाकर रंगनाथ ने कहा,”लायक-नालायक़ की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक़ हो, पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हें जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलने वाले?“
राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल
तो हम भी अभी अभी हुए तबादलों की तरफ इशारा करते हुए चुप हो जाते है।
लिहाजा पहली सफा में नहीं बैठे...
किसी शायर का शे'र है। जो हमकों तो पसंद है। शायद हमारे कमलप्रेमियो को जोरदार लगे।
अमीरे शहर के आने पर उठना पड़ता है
लिहाजा पहली सफे मैं कभी नहीं बैठे
घटना से अवगत होने से पहले सफे का अर्थ समझ लें। प्रथम पंक्ति। गणतंत्र दिवस की घटना है। अपने पहलवान जी भी पहुँचे थे। पहली सफे में बैठ गए। उनके बगल में फार्मेसी के पूर्व मुखिया भी मौजूद थे। इस बीच एसडीएम भैय्या की नजरें पड़ी। उन्होंने पहलवान से जाकर निवेदन किया।वही निवेदन जो ऊपर आपने पढ़ा। यहीं घटना में टिविस्ट है। निवेदन के समय पड़ोस में बैठे नेताजी ने हस्तक्षेप कर दिया।हालांकि पहलवान राजी हो गए थे।एसडीएम भैय्या चुपचाप लौट गए। मगर कुछ देर बाद वापस आए।उन्होंने दोनो से निवेदन किया। नतीजा ..इस दफा पहली सफा से उठना पड़ा। यही घटना अपने बाबा के साथ भी हुई।ऐसा हम नहीं, बल्कि यह नजारा देखने वाले अपने कमलप्रेमी बोल रहे है। जिसमें हम तो बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
मेरी पसंद...
मैं वो नहीं देखता जो दिखाया जा रहा है
नजर उस पर रखता हूँ जो छुपाया जा रहा है