12 जनवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

12 जनवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)

काश ,पर्ची को पढ़ लेते...
बदबुवाले शहर में जमकर चर्चा है। अगर अपने माननीय डॉ साहब वह पर्ची पढ़ लेते।जो उनको उद्धबोधन देते वक्त अपने उज्ज्वल जी भेजी थी।जिसमे सम्भवतः यही लिखा होगा। बकौल किसी शायर के....
कुछ खुदा से डरो तो अच्छा है
बोलना कम करो तो अच्छा है
मगर डॉ साहब को मंच और माइक से इन दिनों कुछ ज्यादा मोह हो गया है। तभी तो उन्होंने उस पर्ची को इग्नोर कर दिया। नतीजा..विकासपुरुष ने जब समझ लिया कि डॉ साहब का बोलना रुकने वाला नहीं है। तो उन्होंने तत्काल दूसरा माइक संभाल लिया।
जय-महाकाल का उदघोष किया।
मगर उनका बोलना तब भी जारी था।यह देखकर अपने विकासपुरुष ,उज्ज्वल जी और वहाँ मौजूद सभी के चेहरों पर जोरदार मुस्कान नजर आई। तब जाकर उनका बोलना रूका।मगर तब तक ऐसा वीडियो बन गया। जो इतना वायरल हुआ कि अब  बोलना कम करो तो अच्छा है  का विषय बन गया है।कमलप्रेमी हो या आमनागरिक । सब आपस मे यही अशआर दोहरा रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है।हम भी बस आदत के अनुसार चुप हो जाते है |

सुर्खियों से दूरी- ठोस काम जरूरी...
अपने उज्ज्वल जी की अपनी आदत है। चुप रहकर ऐसे कामों की नींव रखना।जो आने वाली पीढ़ी के लिए रोजगार उपलब्ध कराने में सहायक हो।इसीलिए उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा के लिए विद्यार्थियों हेतु साप्ताहिक क्लास भी शुरू कर दी।ताकि भविष्य की पीढ़ी तैयार हो।शायद अपने उज्ज्वल के दिमाग मे कवि ज्ञानप्रकाश आकुल  का यह अशआर आया होगा।  
शहरों में जो मजदूरों की लाइन है
ये लड़के भी अफसर होने निकले थे। 

अब उन्होंने अगला कदम अभी अभी उठाया है।जिसे  प्रोजेक्ट स्वाध्याय नाम दिया है।
इसका शुभारंभ विकासपुरुष के हाथों से हुआ है। यह प्रोजेक्ट आने वाले 2 सालों में 50 हजार लोगों को उनका घर चलाने में  महत्ती भूमिका निभा सकता है।बशर्त नगरवासी इसमे रुचि दिखाए। utkarshujjain.com पर पंजीकरण करवाए। इसमे से चयनित अभ्यर्थियों को उद्योग घराने अपने खर्च पर प्रशिक्षण देंगे। जॉब भी पक्का मिलेगा। सोलर और बेस्ट कम्पनी ने वादा भी किया है। बाकी कम्पनी भी राजी है। अब फैसला तो उनको लेना है।जो रोजगार की तलाश में भटक रहे है।जबकि विकासपुरुष और उज्ज्वल जी ,दोनो अवसर उपलब्ध करवा रहे है। जिसके लिए हम दोनों को साधुवाद देते हुए चुप हो जाते हैं।

कागजी प्रभारी की पीड़ा
यह कहानी इन दिनों वर्दी वाले सुना रहे है। जो हम तक भी पहुँची है। इसमे एक घटना के बाद नियुक्त हुए प्रभारी की पीड़ा है। घटना करंट वाले विभाग के साथ हुई मारपीट से जुड़ी है।जिसको लेकर पिछले साल नवंबर-दिसंबर में खूब हंगामा मचा था। राजधानी तक घटना की जानकारी गई थी।जिसके बाद अपने कवि हदय वर्दीधारी अधिकारी की रवानगी कर दी गई थी। जो आजकल अवकाश लेकर विदेश घूम रहे है।तब एक ऑर्डर और निकला था। तीन स्टार धारी को लाइन भेजने का और दो स्टारधारी को प्रभारी बनाने का।
आदेश अपने कप्तान जी ने निकाला था। जिसका पालन होना था। मगर उल्टा हुआ। तीन स्टारधारी आज भी उसी आन-बान-शान से उसी जगह डयूटी कर रहे है।जहाँ से हटाया गया था।जबकि कागजों पर आज भी प्रभारी दो स्टार धारी है।निर्देश और निर्णय तीन स्टारधारी देते है।जबकि कागजों पर दस्तख़त प्रभारी के होते है। तभी तो वर्दीधारी बोल रहे है।
कागज पर तो वह प्रभारी है
दस्तखत करना उसकी लाचारी है
मिलता उसको कुछ भी नहीं
सामने बैठा असली खिलाड़ी है।
वर्दीवालों की बात में दम है, मगर वर्दी से हमकों डर लगता है।इसलिए चुप रहना ही हमारा असली धर्म है।


सदुपयोग या दुरपयोग...
हमारे पाठकगण ,पहले ऊपर लगी तस्वीर को देखे,फिर यह सवाल अपने दिमाग मे जरूर लाएं? आखिर दान में मिली राशि का कैसे सदुपयोग होता है। यह भवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।मगर लगभग एक दशक पुराना। इस भवन का निर्माण 2016 के पहले हुआ था। मकसद था शोध संस्थान में कार्यरत कर्मचारियों के लिए आवास सुविधा उपलब्ध कराना।मगर आजतक ऐसा हुआ नहीं।किराए का निर्धारण ही नही हो पाया। कर्मचारियों को देने का तो प्रश्न ही खड़ा नही होता।लगभग सवा करोड़ खर्च करके इसे तैयार किया गया था।  पिछले एक दशक से इस भवन का कोई उपयोग नहीं हुआ है।इसकी गवाह यह तस्वीर है। दान के पैसों का इससे बड़ा सदुपयोग अगर किसी ने देखा है तो हमारा उससे निवेदन है। हमकों जरूर बताए।तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

ग्रेड की चाहत में...
शायर नदीम शाद ने खूब लिखा है।जिसमे हम केवल एक शब्द विरसे की जगह मसूरी और तू-तू की जगह गुस्सा लिखकर पूरा शेर जस का तस लिख रहे है।वह भी उनसे अग्रिम माफी मांगते हुए।
मुश्किल था पर जादू करना सीख गए
अब हम खुद पर काबू करना सीख गए
आपको तो तहजीब मिली थी मसूरी में
आप कहाँ से गुस्सा करना सीख गए
यह शेर इन दिनों अहिल्या नगरी संभाग के एक जिले मातहतों के बीच सुनाई दे रहा है।इशारा अपनी चटक मैडम जी की तरफ है।जिनको ग्रेडिंग पाने की बीमारी लग गई है।हर योजना में।खासकर हेल्पलाइन में।नतीजा साप्ताहिक समीक्षा बैठक में उनकी फटकार के बाद कोई न कोई मातहत आंसू और अपमान का घूंट पीकर ही बाहर निकल रहा है। मैडम जी को 10 दिन पहले ही सभी शिकायतों का निराकरण चाहिए।जबकि फैसला 20 तारीख को होता है।ताज्जुब की बात यह है कि इस चक्कर मे एक दफा मैडम जी खुद इतनी हाइपर हो गई कि उनको बैठक से ब्रेक लेना पड़ गया।इस दौरान अभी अभी एक फोटो उस जिले की अधिकृत सोशल मीडिया पर अपलोड हुआ।जिसमें मैडम जी बच्चों के साथ भोजन कर रही है।मगर पानी की बोतल केवल उनके सामने ही रखी गई।बाकी के लिए कोई शुद्ध जल की व्यवस्था नही थी।इसको उनके मातहत दूषित पानी कां से जोड़ रहे है।दबी जुबान से बोल रहे हैं।केवल अपनी चिंता।आश्चर्य की बात यह है कि उस बोतल वाली पिक को बाद में एडिट कर दिया गया। ऐसा हमारा नहीं उस जिले के कर्मचारियों का कहना है। अब मातहतों की सोच पर हमारा क्या अंकुश।इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

पत्र की पटकथा का राज..
राजनीति में कोई भी बयान देना या पत्र जारी करना,एकदम से नहीं होता है। बाकायदा रणनीति होती है। उच्च स्तर से इशारा मिलता है। तब जाकर पत्र जारी होता है। जैसे अभी अभी अपने प्रथम सेवक ने जारी किया है।
उनकी मांग भी जायज है।इसमे कोई शक -सुबहा की गुंजाइश नही है।मगर पत्र की पटकथा के पीछे एक अंदरूनी कथा भी शामिल है।जो कि रास्ता बंद से जुड़ी है।पहले शहरवासियों को अवंतिका द्वार के लिए रास्ता मंदिर के प्रशासनिक भवन के सामने से मिलता था।जिसको अपने फटाफट जी ने बंद करवा दिया। अब मुख्य द्वार से अवंतिका द्वार जाना पड़ता है।इससे न्यास की दुकानें प्रभावित हुई है। इन दुकानों का धंधा-मंदा पड़ गया है। जो कि न्यास वालों को अखर रहा है। इसीलिए प्रथम सेवक के कंधे पर बंदूक रखकर ,मंदिर प्रशासन पर निशाना साधा गया है। यही पत्र के पीछे की असली पटकथा है।इस बीच रविवार की दोपहर में अपने प्रथम सेवक ने एक वीडियो भी वायरल कर दिया।जिसमे वह कह रहे है।जय श्री महाकाल-सब है तैयार। जिसके बाद अपने कमलप्रेमियो और मंदिर के गलियारों में तो यही चर्चा है। बाकी सच न्यास और प्रथम सेवक हमसे बेहतर जानते है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

प्रवक्ता पर संकट...
अपने कमलप्रेमियो के बीच एक अनोखी बात सुनाई दे रही है। इशारा संगठन में बदलाव की तरफ है।नए पदाधिकारी और कार्यकारिणी बनाई जा चुकी है।उस समय प्रवक्ता को बख्श दिया गया था। मगर अब अपने दालवाले नेताजी का मन अपने पुराने साथी से ब गया है।इसके अलावा एक कारण जगजाहिर है। प्रवक्ता का झुकाव अपने हाइनेस के लिए दिल से है और इन दिनों हाइनेस की ग्रह-दशा विपरीत चल रही है। तो यह पक्का है कि करीबी पर तो संकट आना ही है। तभी तो कमलप्रेमी दबी जुबान से बोल रहे है। अपने दाढ़ी वाले प्रवक्ता की जल्दी ही रवानगी हो सकती है। उनकी जगह वर्तमान के सह-प्रभारी को सम्भवतः मुख्य प्रवक्ता की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। सह-प्रभारी के रुप मे किसी नए चेहरे को मौका दिया जा सकता है। इसका फैसला अपने दालवाले नेताजी को लेना है और अपने विकासपुरुष से मोहर लगवानी होगी। फैसला आने वाले वक्त में जल्दी ही होगा। ऐसा हम नही,अपने कमलप्रेमी दम ठोककर कह रहे है। अब इसमें कितना सच है-कितना झूट। हमकों कैसे पता हो सकता है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

पहले आय बताओ
रविवार को राजधानी से दो एसीएस लेबल के अधिकारी आए थे। दोनो अपने बड़े साहब के निर्देश पर पधारे थे। मकसद 2028 को लेकर प्रस्तावित प्रोजेक्ट में कौन जरूरी-कौन गैर जरूरी की तलाश करना था।दोनो अधिकारी इस काम मे पीएचडी है।तभी तो शिवाजी भवन की डिमांड के बदले बोल गए। पहले अपनी आय भी बताओ। 2016 सिंहस्थ में लगे बल्व आजतक नहीं बदले गए।उसी के नाम पर फिर मांग कर रहे हो। यह स्वर थे नगरीय प्रशासन के मुखिया के।जो फटका लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। अब उनकी फटकार को लेकर हम क्या कर सकते है बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है ।

सरकारी संपत्ति आपकी है...
यह स्लोगन अकसर कही तो हमारे पाठकों ने पड़ा ही होगा।सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है। इसकी रक्षा करें। इसका असली मतलब तो यह होता है। नुकसान  नहीं पहुचाये। जिसका अर्थ एक संघ पदाधिकारी ने कुछ और ही निकाल लिया।उन्होंने एक अस्पताल के जीर्णोद्धार का फायदा उठा लिया।जितने टीन शेड और पेवर ब्लॉक लगे थे। अपने पॉवर का फायदा उठाकर खुद के घर पर लगवा लिए। ठेकेदार की हिम्मत नहीं थी।मना कर देता। वैसे भी पदाधिकारी के घर और अस्पताल के बीच की दूरी मात्र 50 मीटर से भी कम है।शायद इसीलिए तो उस क्षेत्र के कमलप्रेमी बोल रहे है।सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है।इसकी रक्षा करें ,इस पर सही अमल किया गया है।कमलप्रेमियो की बात में दम है और चुप रहना हमारी मजबूरी।

होंठ के  फ़ोटो..
राजधानी से रविवार को दो आलाधिकारी आए थे। उनको अपने बड़े साहब ने भेजा था। 2028 के कामों का जायजा लेने।इनमें से एक बाबा की नगरी के मुखिया रह चुके है। राजधानी के बड़े साहब  बनने की दौड़ में थे। मगर दिल्ली ने खेल बिगाड़ दिया था। आज उनका फ़ोटो लेने की कोशिश कर रहे फोटोग्राफर को देखकर उन्होंने कह दिया। इतने नजदीक से फ़ोटो क्यों? क्या मेरे होंठ की तस्वीर ले रहे हो। जिसे सुनकर वाहन चला रहे एसीएस और पीछे बैठे अपने उज्ज्वल जी और फटाफट जी ,सभी ने जोरदार ठहाका लगाया। इसकी गवाह वीडियो है। बाकी हमकों तो चुप ही रहना है।

मुआफी के साथ...
लगता है आजकल आईएएस प्रशिक्षण में लोक व्यवहार की शिक्षा देनी शायद बंद हो गई है।तभी तो उम्मीद जी ,उज्जवल जी ,जैसे अफसर खोजने पर भी नहीं मिलते हैं। जिले के मालि बनते ही इनके दिमाग मे यह फितूर घुस जाता है।  ऊपर खुदा, नीचे हम। तभी तो जो मन मे आया-बोल देते है।एक अखबार की खबर के मुताबिक। अपने मामा जी के गृह जिले की घटना है। जहाँ अपने पपेट जी विराजमान है।उन्होंने अपने एक मातहत को खुलकर बोल दिया। जूता मार दूंगा। जबकि मातहत की कोई गलती भी नहीं थी। हमारे पाठकगण सोचेंगें? दूसरे जिले की घटना से चुप का क्या लेना-देना। तो हम क्लियर कर देते है।दरअसल पपेट जी और चुप का रिश्ता काफी पुराना है। सीधी भाषा मे काफी पुरानी मोहब्बत है। जो दूर रहने पर और ज्यादा बढ़ती है।बहरहाल ताज़ा घटना पर हम डॉ नवाज देवबंदी के एक अशआर में थोड़ी तब्दीली करते हुए .....

अफसरों कुछ ना दो गाली तो मत दो गरीबों को
जरा सोचों अगर मंजर बदल जाए तो फिर क्या हो...
मेरा सर और तेरा पत्थर बदल जाए तो फिर क्या हो...
वो तो अपने पपेट जी समझदार निकले।जिन्होंने तिल का ताड बने,उसके पहले ही मुआफी मांगकर मामले को शांत कर दिया। क्योंकि दूषित जल कांड के कारण अपने विकासपुरुष पहले ही तीन पर गाज गिरा चुके थे। ऐसे में अगर जूता कांड उछलता तो कुछ भी हो सकता था? अपने पपेट जी ने यह भांप लिया और सुलगने वाली आग को ठंडा कर दिया। जिसके लिए उनकों साधुवाद देकर,हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मेरी पसंद...
जी-हुजूरी में माहिर हो बस सिर्फ अच्छे हो तुम इसलिए
हम बुरे इसलिए है के हम सर झुकाना नहीं जानते
जनाब नदीम शाद