05 जनवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
हैट्रिक कप्तान की...
हमारा इशारा उस खेल की तरफ़ नहीं है।जिसमे खिलाड़ी अगर तीन गेंद पर तीन विकेट चटका दे।तो उसकी हैट्रिक पर पूरा देश झूम उठता है।हम तो कार्यशैली पर तीसरी दफ़ा मिली शाबाशी की बात कर रहे है। कार्यप्रणाली की तारीफ करने वाले भी अपने विकासपुरुष है।सोमवार को खुले मंच से वर्दी के काम की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर दी।ऐसा कोई पहली दफा नही हुआ है।इसके पहले एक बार राजधानी में जब वर्दी के टॉप -बॉस मौजूद थे।तब भी तारीफ की थी।अल्फाज थे। उज्जैन पुलिस से सीखा जाएं।तब कप्तान भी मौजूद थे।इसके अलावा एक दफा वीसी में तारीफ कर चुके है।ताज़्जुब की बात यह है कि इतनी इज्जत मिलने के बाद भी कप्तान जी के व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया है।वह आज भी वैसे ही मिलते है आमजन से।जैसे शुरुआत के दिनों में थे।वर्ना, सूबे के मुखिया से तीन बार तारीफ पाकर कोई भी रंग बदल सकता है। कप्तान की इस उपलब्धि के लिए पूरी पुलिस टीम को हम बधाई देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
19 बनाम 25
अक्सर हम सभी पढ़ते-सुनते हैं।जीरो टॉलरेंस सर्वोच्च प्राथमिकता है।इसका मतलब किसी भी नियम या कानून तोड़ने वालों पर कोई नरमी नहीं दिखाई जाए।कठोर कार्यवाही हो।मगर इसके लिए शासन को भी अपने नियमों में परिवर्तन करना होगा।तभी तो 19 बनाम 25 का आंकड़ा राजस्व अधिकारियों के बीच सुनाई दे रहा है।इशारा अटैच वाहन की तरफ है।जिसके लिए शासन से केवल 19 हजारी की स्वीकृति है।जबकि वाहन मालिक 25 से कम में कोई वाहन नही लगाता है।यह अंतर की 6 हजारी राशि कोई भी अधिकारी अपने वेतन से तो देने से रहा।ऐसे में कहीं न कहीं से ऊपरी कमाई की जुगाड़ की जाती है।फिर जीरो टॉलरेंस की नीति का वजूद खुद ही खत्म हो जाता है।ऐसा खुद राजस्व अधिकारियों का कहना है।मगर हमकों तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है
पद के लिए पूजा
नदीम शाद का एक अशआर है :
ख्वाब जो पूरे करने हो तो जुर्रत करनी पड़ती है।
किस्मत भी होती है लेकिन मेहनत करनी पड़ती है।
यह बात हम नहीं बल्कि अपने कमलप्रेमियो के बीच सुनाई दे रही है।इशारा कमलप्रेमी संगठन के नवीन कार्यकारी मुखिया की तरफ है।भले ही उनकी ताजपोशी हो गई है।मगर अभी भी इस पद की दौड़ में शामिल एक शख्स की उम्मीद नहीं टूटी है। इसीलिए तो वह आज भी इसके लिए पूजा-पाठ करवा रहे है।वह भी मां-पीताम्बरा पीठ पर।पूजा करवाने वाले को अभी भी उम्मीद है।राजनीति में ग्रह-योग कब पलट जाए।कब किस्मत जिंदगी बदल दे।इसके लिए पूजा करवाना भी बहुत जरूरी है।तभी तो दौड़ में शामिल शख्स ने उन पंडितों को साफ-साफ कह दिया।पूजा नहीं रोकना-खर्च की चिंता मत करें।पूरी दक्षिणा मिलेगी।अब देखना यह है कि उनकी यह पूजा आखिर कब रंग लाती है।मगर यह सच है कि ऐसी पूजा-पाठ राजनीति में पद के लिए असर दिखाती ही है।कमलप्रेमियो के अनुसार जो यह करवा रहे है।वह अपने मोटा-छोटा भाई और विकासपुरुष के कट्टर विरोधी है।मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
उल्टी चाल..
हर इंसान नोकरी लगते ही यह जरूर सोचता है।अब मेहनत से काम करूंगा।तरक्की होगी और तनख्वाह बढ़ेगी।यही नियम भी है।मगर कुछ इंसान अपने कार्य से उल्टी चाल के शिकार हो जाते है।जैसे अपनी वैदिक धोती।जो कि संस्थान के मुखिया बन गए। तरक्की हुई तो वेतन भी बढ़ गया।मगर बुरे काम का नतीजा भी कभी तो असर दिखाता है।जैसे अपनी वैदिक धोती पर दिखाया।चौबे जी -छब्बे जी के चक्कर मे दुबे जी बन गए।मुखिया से प्रभारी और आधे वेतन की लाचारी।ऐसा संस्थान वालों का कहना है।मगर हमको तो अपनी आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
आज्ञा का पालन ...
अपने वजनदार जी ने विकासपुरुष से गुहार लगाई थी।उसी कार्यक्रम में,जहॉं उनको रोक दिया गया था।तब उनको कहना पड़ा था। पहचानते नहीं हो क्या? उसी मंच से गुहार की थी। गर्भगृह को लेकर।जनहित में।2 घण्टे सबको प्रवेश दिया जाए। जिसके बाद विकासपुरुष ने साफ कह दिया।जिसको गर्भगृह जाना है।वह बगल के जूना महाकाल जाकर खूब पूजा कर सकते है। अपने वजनदार जी ने उनकी इस सलाह को पूरा सम्मान दिया। नए साल के पहले दिन पहले बाबा के दरबार में आम नागरिक की तरह दर्शन किए फिर जूना महाकाल के गर्भगृह में अभिषेक किया। जिसके बाद मीडिया को बयान भी दिया।लेकिन उनके करीबी इस कदम से दुःखी है।इन लोगो का कहना है।दबी जुबान में।बेहतर यह होता कि अपना दलथन -दलथन राग के बदले वह मंदिर की व्यवस्था का निरीक्षण करते।कोई व्यवस्था सुधार के निर्देश देते। किन्तु इसके बदले उनका फोकस खुद के आमजन की तरह दलथन पर था।जो कि उन जैसे माननीय से अपेक्षित नही था।इधर मंदिर के गलियारों में चर्चा है। अपने विकासपुरुष की सलाह को कुछ पॉवर फुल ताकतों ने पूरी तरह से इग्नोर कर दिया है। अलसुबह की आरती के बाद पिछले साल के अंतिम दो दिनों और नए साल के प्रथम दिन गर्भगृह में जाकर दर्शन किए है। अब यह ताकतवर लोग कौन है? इसको लेकर यह नजारा देखने वाले मौन है।तो फिर हमारा तो काम ही है ,आदत के अनुसार चुप रहना।
25 मिनिट की मुलाकात
शनिवार की दोपहर बाद अपने उम्मीद जी,उज्जवल जी,एंग्रीमैन और इन्दौरीलाल अचानक ही राजधानी की तरफ निकल गए थे। शाम 5 तक राजधानी पहुँच गए। जिसके बाद मंत्रालय पहुँच गए।जहाँ इन सभी की पूर्व मुलाकात तय थी। अपने विकासपुरुष के साथ।ये मुलाकात करीब 25 मिनिट तक चली। इस मुलाकात के पीछे का लक्ष्य विकास कार्यो की रिपोर्ट देना बताया गया है।पिछले दिनों जब विकास पुरूष आए थे,तो बदबू वाले शहर से ही वापस लौट गए थे। इसलिए विकास कार्य को लेकर कोई भी उनसे बात नहीं कर पाया था। जिसके चलते सभी राजधानी पहुँच गए। अब अंदर बंद कमरे में आखिर क्या चर्चा हुई।यह तो हमकों नहीं पता है, मगर जाते वक्त का माहौल गाड़ी में उमंग-उल्लास का था और वापसी पर कैसा माहौल होगा।इसको लेकर कोई भी हमकों तो बताने से रहा।इसलिए हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बाबा की कृपादृष्टि...
तो आखिरकार बाबा जय महामंगल की कृपा हो गई।अपने स्मार्ट पंडित पर।जब से शिवाजी भवन से रवानगी हुई थी।तभी से वह लगातार अंगारेश्वर बाबा के दरबार मे हाजरी लगा रहे थे।हर सप्ताह-बगैर नागा किए। लूप लाइन में पड़े थे।समय भी खूब था।बाबा भी आखिर प्रसन्न हो गए। यह वही मंदिर है।जहाँ अपने विकासपुरुष ने बरसो तक अलसुबह पूजा की है। उनकी भी मनोकामना पूरी हुई।आज सूबे के मुखिया है।विकासपुरुष की मनोकामना बड़ी थी,तो इतने साल लगे।किन्तु स्मार्ट पंडित की इच्छा छोटी सी थी। वापसी मैन-स्ट्रीम में।जो जल्दी पूरी हो गई।देवी अहिल्या नगरी में पदस्थापित हो गए।मगर सर मुंडन करवाते ही ओले गिर गए।अपने पंडित जी को जल-सीवरेज की जिम्मेदारी सौंप दी गई।जो कि इन दिनों बारूद का ढेर है।अब देखना यह है कि आपदा को अवसर में बदलने पीएचडी स्मार्ट पंडित इस आपदा को कैसे निपटाते है और बाबा के दरबार मे मत्था टेकने कब आते है।तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते थे।
आर-पार ..निपटा दूंगा यार
यह बात इन दिनों देवी अहिल्या नगरी के ख़बरची वर्ग में सुनाई दे रही है। मामला ,जगविदित पानी-कांड है।जिसके चलते रवानगी हुए आईएएस ने ठान लिया है। वह अब आर-पार की लड़ाई में मूड में आ गए है।तभी तो उन्होंने कसम उठा ली है। अहिल्या नगरी के प्रथम सेवक-उनके मंत्रिमंडल की पोल खोलकर ही दम लेंगे।इसलिए दस दिनों तक पदभार ग्रहण नही करेंगे।उनके गुस्से का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है।उन्होंने अपना गुस्सा दिखाते हुए वह ,शब्द भी कह दिए,जिसकी कल्पना करना और उसे लिखना हमारे लिए जनहित में उचित नही होगा। अब देखना यह है कि वह अपने मकसद में कितनी सफलता हासिल कर पाते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
जागरूकता या गलती....
हेडिंग का अर्थ समझने के लिए पहले ऊपर अपलोड वीडियो को गौर से सुनें। जो कि दूषित-पानी से बचने का प्रचार कर रहा था।काम जनहित का था।सुनकर तो लगा कि जागरूकता दिखाई गई है।मगर देवी अहिल्या नगरी में हुए पानी-कांड के कारण यह जागरूकता भय पैदा कर रही थी। इस बीच चैनलों पर यह वीडियो और खबर सुर्खियों में आ गई। राष्ट्रीय स्तर पर खबर चल गई।जिसके बाद हड़कंप मचना स्वाभाविक था।तो फिर 2 घण्टे बाद ही उद्घोषणा पर विराम लग गया।मगर यह सवाल खड़ा हो गया कि आखिर किसके इशारे पर पर यह जागरूकता दिखाई गई।जो कि बिलकुल "आ बैल मुझे मार" की तर्ज पर थी। इस पर "चिराग तले अंधेरा" वाली भी कहावत सामने आ गई।शिवाजी भवन की छत पर लगी पानी की टंकी इसका प्रमाण है।जो कि बगैर ढक्कन की है। इसी से अपनी समस्या लेकर आने वाली आमजनता पानी पीती है।जबकि चुने गए माननीयों के लिए अलग से पानी का कैम्पर आता है। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। जबकि हमको किसी शायर का अशआर याद आ रहा है :
ये सच है कोई बात छुपाया नहीं करते
गलतियों को मगर अपनी नुमायां नहीं करते
इधर अपने एंग्रीमैन अब तीन सप्ताह की ट्रेनिंग के लिए जा रहे है।जिसके लिए हम उनको शुभकामनाएं देते हुए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
लापरवाही की इंतिहा
सबसे पहले ऊपर लगे स्क्रीन-शॉट में लिखे संदेश को ध्यान से पढ़े।फिर समय देखे।9 बजकर 13 मिनिट पर इसे अपलोड किया गया।2 जनवरी के दिन।वह भी समय की हिदायत के साथ। अब सवाल यह है। विकासपुरुष का यह आगमन कोई अचानक नहीं हो रहा था।एक दिन पहले ही दौरा तय था।फिर भी अपने सरकारी भोंपू ने कवरेज को लेकर कोई गम्भीरता नहीं दिखाई।जबकि यही संदेश 1 जनवरी की रात को डाला जा सकता था। ताकि जो मीडिया कर्मी जाना चाहते थे। वह रात से ही तैयारी करके समय पर सरकारी भोंपू कार्यालय पहुँच जाते। लेकिन इससे भोंपू विभाग को परेशानी है।तभी तो ऐसे वक्त पर सूचना दी।जब मीडिया चाहते हुए भी नहीं पहुँच पाए और भोंपू पर इल्जाम भी नही आए। ऐसी चर्चा ख़बरची वर्ग में सुनाई दे रही है। इसको लापरवाही की इंतिहा की संज्ञा दी जा रही है।बात दमदार है।मगर हमकों तो चुप रहने की बीमारी है
शुभकामनाएं..
कभी अपनी बाबा की नगरी में पदस्थ रहे अपने मंद-मुस्कान जी ने अहिल्या नगरी में पदभार संभाल लिया है। चुप रहेंगे की तरफ से शुभकामनाएं देते हुए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद..
सामाजिक इज्जत जिससे खरीदी जा सके।।
नाम के आगे वो ओहदा नही लगा पाया।
मैं अपने घर का सबसे बुरा लड़का हूँ।
बुराई ये है कि बस पैसा नही कमा पाया।
ऑडियो की चर्चा...
इन दिनों एक ऑडियो की चर्चा जोरों पर है।मगर दाल बिस्किट वाली तहसील में।जिसमे फरियादी और उसका हमदर्द बात कर रहे है।इशारा ग्रामीण विकास की *आवास* योजना की तरफ है। बातचीत सुनने के बाद साफ है कि फरियादी पर दवाब डाला जा रहा है।एक *जनपद सदस्य* के द्वारा। 1 पेटी की डिमांड की जा रही है उससे।जिसके चलते परेशान फरियादी अपने *खास* को अपनी पीड़ा बता रहा है।उसको सदस्य द्वारा धमकी दी जा रही है।अगर *डिमांड* पूरी नही की तो योजना के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा। इस बातचीत में फरियादी यह भी कह रहा है। उससे डिमांड करने वाले सदस्य यह भी उसे कहते है। क्षेत्र के माननीय को भी *देना* पड़ता है। जबकि उससे बात करने वाले का कहना है। ऐसा नहीं है।अब सच झूट का फैसला विकास विभाग दमदमा के मुखिया अपनी जांच में कर सकते है। ऑडियो हमनें सुना है और हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।