16 फ़रवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
कुर्सी पर कब्जा..
घटना बुधवार शाम की है। स्थल है अपना शिवाजी भवन का वह कमरा।जहाँ सिंहस्थ 28 की समीक्षा की गई। अपने विकासपुरुष द्वारा। यहाँ पर जगह और कुर्सी सीमित थी। फालतू झाँकीबाज़ नेताओ को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। केवल वही मौजूद थे।जिनकी जरूरत थी।इस पर भी कुर्सी पर कब्जा करने की नोबत आ गई।कब्जा करने वाले अपने कप्तान जी थे। जिन्होंने प्रजेंटेशन दिखाने वाले की कुर्सी हथिया ली। ऐसा यह नजारा देखने वालों का कहना है।मगर हमकों तो आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
दौरा पड़ा तो धड़कन बड़ी...
घटना कुछ दिन पुरानी है।जब एक "कमल-पंजा " प्रेमी का दिल ज्यादा धड़क गया। तत्काल इंदौर लेकर गए।इलाज हुआ। अब वह ठीक है। जिसके चलते इनसे जुड़े दोनों पार्टी के माननीय गण अब खुश है।लगभग एक दर्जन से ज्यादा माननीय इनके करीबी है। इन सभी की हर प्रकार की सुविधा ख़्याल इनके द्वारा रखा जाता है।हाई प्रोफाइल लाइफ जीते हैं।मगर किसी को नहीं पता।आखिर काम क्या करते है। इन्हीं के दिल की धड़कनें तेज हो गई थी.|जिसके चलते उनके करीबी सभी माननीयगणों की सांस फूल गई थी।कारण..राशियां-लंदन-चीनी-जापानी.... फिर भी दिल है हिंदुस्तानी का व्यापार इन माननीयगणों के लिए 24×7हाजिर रहता है। ऐसे में इन सभी का घबराना जायज था। अब सब कुछ ठीक है। माननीयों का भी स्वास्थ्य फिट और पंजा-कमलप्रेमी का भी।तो हम भी इस फिफ्टी-फिफ्टी नेताजी को स्वस्थ -मस्त की सलाह देकर, आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
साहब का कारनामा..
अक्सर ऐसा होता है।जब तक अफसर पदस्थ रहता है। उसके किसी भी कारनामे को मातहत उजागर नही करते है। लेकिन तबादला होने के बाद गड़े मुर्दे की तर्ज पर खुलासा होने लगता है। अभी अभी 30 पेटी के एक मामले की चर्चा बाबा पशुपतिनाथ की नगरी से निकल कर आई है।जिसमे जोगी जी की भूमिका पर सवाल उठ रहे है। एक तीन स्टारधारी ने कोई मामला निपटाया।30 पेटी का खेल हुआ। जिसकी किसी ने शिकायत कर दी।पेशी हो गई जोगी जी के समक्ष। तीन स्टार साहब 5 पेटी लेकर ही आए थे। तो पेश कर दी।बस फिर क्या था। पेश करने वाले वर्दीधारी को एक कमरे में बंद करवा दिया। फटकार लगा दी। कागज पर दर्ज होगी यह हरकत। बेचारा वर्दीवाला घबरा गया। उसने हड़बड़ी में 15 पेटी की पेशकश कर दी। उसकी पेशकश को स्वीकार कर लिया गया।तब जाकर जान बची। ऐसा हम नहीं, बल्कि वर्दीवाले बोल रहे है। मगर हमकों तो चुप ही रहना है।
तख्त पे नए आलम पनाह आए है
तो अब अपने विकासपुरुष के लिए अपने नम्बर-1 को लाया गया है। 2 साल के अंदर वह तीसरे आईएएस अफसर है।जिनकों यह जिम्मेदारी मिली है।अपने नम्बर-1को यहाँ तक पहुँचने के लिए बहुत सहन करना पड़ा है। जिस नम्बर-1 की कभी तूती बोलती थी। वहीं उन्होंने एकाकीपन को भी खूब झेला है। तब शायद आत्ममंथन किया होगा।उसी का परिणाम अब मिला है।अब वह अपने विकास पुरुष से न केवल रोज मिलेगे, बल्कि उनको लेकर चलने वाली खबरों में भी प्रमाणिकता को लाना भी उनकी जिम्मेदारी होगी। वर्ना हर कोई ऐरा-गैरा, हवा-हवाई खबरें सोशल मीडिया पर परोसता रहेगा। यही असली चुनौती अपने नम्बर -1 की होगी। वैसे भी इस काम में उनके अलावा अगर कोई परफेक्ट है। तो अपने उम्मीद जी। जो कि 2028 की जिम्मेवारी संभाल रहे है।अपने नम्बर-1 सही चयन हैं। देखना यह है कि इस चुनौती में अपने 1नम्बरी कितना खरे उतरते हैं। बस नम्बर -1 को यह याद रखना होगा।जिसके लिए उनकों डॉ बशीर बद्र के शे'र याद दिलाते हैं।
दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे
जब कभी दोस्त हो जाए तो शर्मिंदा न हो
अब आगे वक्त बताएगा, अपने नम्बर -1 ,अपने विकासपुरुष की योग्यता को पेज-1 पर लेकर आते है। तब तक हम उनको शुभकामनाएं देते हुए, आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
कुछ नहीं है भाता-जब रोग ये लग जाता
हमारे पाठको के मन मे ऊपर लिखी लाइन पढ़कर एक पल के लिए यह ख्याल जरूर आया होगा। हम प्रेम रोग का खुलासा करने वाले है।मगर यहाँ पर छपास रोग (पब्लिसिटी) की तरफ़ इशारा है।जिसकी शिकार एक तीन स्टारधारी मैडम जी हो गई है।मैडम जी तभी नजर आती है।जब या तो मीडिया की भीड़ हो,या फिर कोई बड़ा शिकार हत्थे चढ़ा हो। इन दो अवसरों के अलावा मैडम जी नजर नहीं आती है। ऐसा हमारा नही बल्कि उनके मातहतों का कहना है। हमारा तो काम बस आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
केवल तीन गाड़िया होनी चाहिए...
जब जब अपने विकासपुरुष का आगमन होता है।उड़नखटोला उतरने के बाद से ही उनके पीछे गाडियों का काफिला लग जाता है।जो तब तक पीछा नही छोड़ता।जब तक विकासपुरुष विश्रामगृह नही चले जाते।दिनभर विकासपुरुष के पीछे गाड़ियां दौड़ती रहती है। काफिले के कारण यातायात प्रभावित होता है। आमजन को दुविधा होती है।जो उनके चेहरे के भाव को देखकर महसूस किया जा सकता है।बेचारे आमजन कुछ बोल नही सकते है। तो अंदर ही अंदर कुड़कुडा के रह जाते है। मगर जब अपने विकासपुरुष को कोई गोपनीय जगह जाना होता है।तो वह काफिला घटाकर तीन गाड़ी का हो जाता है। बुधवार की रात भी यही हुआ।विकासपुरुष केवल तीन गाड़ी के साथ गुरुजी से मिलने गए थे। किसी को पता नहीं चला और परेशानी भी नहीं हुई।तो फिर आमजन क्यों काफिले की परेशानी झेले। आमजनों के लिए भी अगर तीन गाड़ी के बदले दुगनी गाड़ी का काफिले की व्यवस्था हो जाए। वैसे भी विकासपुरुष अब जिस पद पर विराजमान है। उस पर हर शहरवासी को गर्व है। तभी तो उनकी जनता हक से गुहार लगा रही है। इस विश्वास के साथ कि वह उनकी पुकार पर ध्यान देंगे।बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
वर्दी के बुरे दिन...
क्या बताए आपको भाई।कभी सोचा भी नहीं था।हम वर्दी पहनने वालो के इतने बुरे दिन आएँगे।कि स्टेशन के अंदर ही हमको न केवल धमकी मिलेगी,बल्कि अपशब्द भी सुनने को मिलेंगे। वह भी बाहरी व्यक्ति द्वारा।जिसको वर्दी की इज्ज़त क्या होती है। इसका ज्ञान नहीं है। तभी तो भरी दोपहर में स्टेशन का चेनलगेट लगा दिया।जिद पर अड़ गए। एक्सीडेंट करने वालों की तो हम अपने हाथों से कुटाई करेंगे। हम वर्दीवालों को भी अपशब्द कहे। वर्दी उतरवाने की धमकी दी। कब तक सहते और सुनते। इसलिए खुद वर्दी उतार दी। मगर स्टेशन के अंदर पिटाई नहीं करने दी।आखिरकार इन पॉवरफुल के परिजनों को सूचना दी। उन्होंने आकर मामला शांत किया। अब ड्यूटी करने का बिलकुल मन नहीं करता है।परिवार को अगर पालना नहीं होता। तो हम सब एक साथ वर्दी उतार कर खड़े हो जाते। ऐसा उन वर्दीवालों का कहना है। जो इस घटना के शिकार हुए है।वीआईपी वर्दीवाले ऐसी बोल रहे हैं।मगर खुलकर घटना आखिर क्या हुई।इस सवाल पर चुप हो जाते है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
सुधर जाओ वरना...
विकास पुरुष के लिए सिंहस्थ मेला करवाना हिमालय पर्वत चढ़ने से बडी चुनौती है।वह लगातार इसकी मोनिटरिंग कर रहे है। हर दफ़ा शराफत से समझा कर चले जाते है।मगर इस बार उन्होंने वह बोल ही दिया। जिसका हमकों इंतज़ार था। मीटिंग के अंत मे मात्र 60 सेकेंड सबसे कठिन गुजरे।जब उन्होंने साफ कहा। सुधर जाओ वर्ना...! इसके आगे के शब्द भले उनके श्री मुख से नहीं निकले,मगर अर्थ यही निकलता है।हमकों सुधारना भी आता है।अपने विकासपुरुष ने यह भी क्लियर कर दिया।जिसको नहीं रहना,वह जा सकता है।अब देखना यह है कि कितने सुधरते है-कितने टिकिट कटवाते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
इशारों को अगर समझो..
बुधवार को अपने विकासपुरुष साबित कर दिया। राजनीति औऱ अफसरशाही ,दोनो की पिच पर उनकों खेलना आता है। तभी तो जिस बैठक में राजधानी से किसी को नहीं आना था। उसमें उन्होंने तीन अफसरों को तलब कर लिया। जबकि अगले दिन यानि गुरुवार को राजधानी के बड़े साहब ने बैठक बुलाई थी।जिसमे इन तीनों को रहना था।विकासपुरुष ने अर्बन वाले साहब को साफ कह दिया।अब आपको यही रहना है।इसके अलावा एक ACS साहब ने बोला। सिंहस्थ की समितियों को लेकर। विकासपुरुष ने जरा सा इशारा किया। राजधानी से आए ACS इशारा समझ गए। वह तत्काल चुप हो गए। जिसके बाद बैठक में मौजूद आईएएस लॉबी यह गुनगुना रही है। इशारों को अगर समझो....| ताकतवर -प्रभावशाली लॉबी का यह गीत गुनगुनाना हमकों पल्ले नही पड़ा है। आप समझे तो हमकों भी समझा देना।तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पांच पांडवों की गोपनीय चर्चा
बुधवार की शाम को बैठक में विकास पुरुष कह चुके थे। चुनिंदा अफसरों और माननीय की बैठक में।सुधर जाओ वर्ना ।फिर मीटिंग खत्म हुई।विकास पुरूष वहाँ मौजूद नगरसेवकों से मिले। इस दौरान पांच पांडवों की टोली अलग थलग खड़ी थी।जिसमें से 3 राजधानी से आए पांडव थे,2 महाकाल नगरी के।करीब 10 मिनिट तक यह टोली आपस मे डिस्कस करती रही।विषय का अनुमान लगाया जा सकता है।विकासपुरुष के तेवर और सुधर जाओ उवाच। अब देखना है यह है कि पहले से ही*सुधरी* हुई टोली अपने मातहतों की बिगड़ैल टोली को सुधारने के लिए कौनसा फार्मूला आजमाती है। वरना मातहत तो कई दफा बोल चुके है।हमकों सुधारने वाले खुद बिगड़ गए हैं। मातहतों की बात में दम है और आदत के अनुसार चुप रहना अपना धर्म है।
विकासपुरुष की शालीन चुटकी
एक वक्त था।विकास पुरुष का पलटवार प्रहार खुलकर होता था।मगर जिम्मेदारी ने उनको खुद के अंदर परिवर्तन कर दिया है।प्रहार तो अभी भी करते है।मगर शालीनता और व्यंग्यात्मक लहजे में।जैसे बुधवार की बैठक में किया।एम आर 5 कचरा स्टेशन शिफ्ट करने पर। कह दिया कि अपने हाइनेस धरने पर बैठ गए थे। दक्षिण वाले सीधे पड़ गए। उनका विधायक भी नहीं था। तो काम हो गया। उन्होंने गोंदिया क्षेत्र में पानी पीने से बीमार पड़ने पर चिंता प्रकट की।इसके बाद वह चुप हो गए।मगर जो व्यंग्य प्रहार करना था। कर गए। जिसके बाद अधिकारी वर्ग में चिंता है। मगर हमकों कोई चिंता नहीं है।इसलिए हम आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
गंगाराम बनांम इको साउंड..
अपनी बात कैसे रखी जाए कि सब सुने।बकौल किसी शायर...
कौन सी बात कैसे और कब कही जाती है
यह सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।
इस कला में विकास पुरुष को महारथ हासिल है। तभी तो बुधवार को उन्होंने गंगाराम बनांम इको साउंड का जिक्र करते हुए अपने हाइनेस को निशाने पर ले लिया।उन्होंने दो उदाहरण देते अपनी बात रखी। पहले बात गंगाराम की।जिसको लेकर अदालत में गवाही देनी थी। सवाल पूछा गया। गंगाराम की हाइट कितनी है।बेचारा गवाह घबरा गया।उसने जैसे तैसे अपना एक हाथ उठाकर बताया।कि विरोधी चिल्ला उठे। देखिए.. गवाह झूट बोल रहा है। गंगाराम मुर्गा है। उसकी इतनी हाइट कैसे हो सकती है। तो गवाह ने तत्काल दूसरा हाथ 2 फीट के नीचे लगया और कहा।साहब ..दूसरा हाथ तो उठाने दीजिए। अब ईको साउंड की बात।विकास पुरूष ने सुझाव दिया था। शिवाजी भवन के पीछे खाली जमीन पर तरह तरह के निर्माण कार्य होना चाहिये। यह सुनते ही अपने हाइनेस खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने बोल दिया।मैंने भी यही बोला है। अब बारी थी विकासपुरुष की।जो सभी को कुछ पल के लिए कल्पना के माध्यम से मांडू ले गए। जहाँ पहाड़ियों के सामने कुछ बोलो,तो पलटकर वही सुनाई देता है।जो बोला गया है।इसको इको साउंड बोला जाता है। हाइनेस इको साउंड सिस्टम का इशारा तत्काल समझ गए और फिर चुप हो गए। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
हमें कोई मदद नहीं चाहिए..
माताश्री अक्सर यह सबक मुझे देती थी। कभी घमंड में आकर इंसान को ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहिए। खासकर धर्मगुरुओं को।जिससे बाद में पछतावा हो। अब सीधे मुद्दे पे आते है। पिछले साल एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमे एक धार्मिक संत का आक्रोश नजर आया था । उन्होंने साफ साफ कहा था। हमें कोई मदद नहीं चाहिए।अगर वह नही आ सकते हैं। तो पहले मना कर देते। जिसके बाद अपने विकासपुरुष ऑन लाइन हुए थे। विन्रमता के साथ अपनी बात रखी थी। नतीजा मामला खत्म हो गया था। अब वही स्वामी जी रडार पर है।पाप का घड़ा फूटने वाली कहावत के चलते। आरोप जो लगा है। गंभीर वाला।जिसमें यह खुलासा हुआ है। पहला दुष्कर्म बाबा की नगरी में हुआ था।यहीं से अपने कमलप्रेमियो की इंट्री होती है। जो यह कहने में चूक नहीं रहे है। जिस होटल का उल्लेख है। वह इन्दौररोड वाला है। जिसके निर्माण में कई नियमों की अनदेखी की गई है।इसके मालिक अज्ञात वासी स्वामी जी के परम भक्त है। कमलप्रेमियो का कहना है। होटल का शुभारंभ भी संभवत स्वामी जी के करकमलों से हुआ था।तभी तो अपने कमलप्रेमी जांच की मांग के साथ साथ यह बोल रहे है।क्या अब उनको मदद की जरूरत है? लेकिन स्वामी जी मौन साधना में चले गए है। तो हम भी आदत के अनुसार मौन हो जाते हैं।
याददाश्त गजब की..
अपने विकासपुरुष की मेमोरी के आगे कोई भी इलेक्ट्रॉनिक चिप कमजोर है। छात्रनेता से लेकर सूबे के मुखिया बनने तक हर खुशी-पीड़ा-किसने साथ दिया-किसने गड्ढे खोदे। उनकों सब याद है। इस यात्रा के दौरान कौन -कब अधिकारी पदस्थ रहा। यह भी नहीं भूले है। तभी तो बुधवार को जब आए थे। तो रेंज के नवागत मुखिया ने स्वागत किया। अपने टेनिस प्रेमी को देखते ही विकास पुरुष कहने में नहीं चूके। चौथी दफ़ा पदस्थापना है। महाकाल की असीम कृपा है।जिसे सुनकर रेंज के नए मुखिया क्या कहते है। बस,मुस्कुरा कर चुप हो गए। तो हम भी इस नई पारी के लिए शुभकामनाएं देते हुए,चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद
दुनियां को जहर पीकर बचाओ तो बात है।
बस भांग पीकर कोई शंकर नही हुआ।