26 जनवरी 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
आओ झुक कर सलाम करें उन्हें
जिनके हिस्से में ये मुकाम आता है
खुशनसीब होता है वह खून
जो देश के काम आता है
आप सभी को गणतंत्र पर्व की
शुभकामनाएं
एक दशक से राजा
वैसे तो सरकारी नियम/कायदे यही दर्शाते हैं।कोई भी जिला स्तर का अधिकारी अधिकतम तीन साल एक जिले में पदस्थ रह सकता है।शायद इसीलिए आईएएस अधिकारियों की इस अवधि के पूर्ण होने से पहले ही रवानगी कर दी जाती है। किंतु यह नियम शायद अन्य विभागों के प्रमुख पर लागू नही होता है।खासकर कमाई करके ऊपर तक खुश रखने वालों पर।तभी तो एक अधिकारी पिछले 10 सालों से एक ही पद पर जमे हुए है। इनका नाता आमजन के बीमार पड़ने पर,डॉ द्वारा लिखे जाने प्रिकैप्शन से है। जहाँ जनता को पर्चा दिखाने पर दवा मिलती है और अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। इस विभाग के मुखिया को दुकान वाले अधर्मी के नाम से पीठ पीछे बुलाते है। उनके इस नाम के पीछे कारण केवल इतना है।वह वसूली करने में कोई धर्म नही अपनाते हैं।कोई रियायत नहीं करते है। शायद इसीलिए पिछले एक दशक से ऊपर वालो के प्रिय है और राजा बनकर राज कर रहे है। ऐसा हम नही बल्कि उनसे दुःखी दुकानदारों का कहना है।मगर हमकों तो आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
बूटी का असर...
भागीरथ पूरा कांड के बाद हर जिले में इसका असर हुआ। सरकारी मशीनरी एक्टिव हो गई।जरूरी भी था और घटना से सबक भी लेना था। तो जल अदालत लगी। बाबा की नगरी में भी।इसके पहले उज्ज्वल जी इतने एक्टिव हुए थे।उन्होंने पूरे जिले की पानी सप्लाई व्यवस्था की जांच करवा ली और सफाई अभियान भी चला दिया।बगैर किसी प्रचार-प्रसार के।सब दूर से ओके रिपोर्ट आ गई। इधर जल अदालत लगी। जिसमें शहरी जल प्रदाय व्यवस्था के माननीय मुखिया विराजमान थे। जिन्होंने बयान दिया। हमारे पानी के आगे बिसलेरी भी फैल। जिसे सुनकर उनके ही करीबी दोस्त बोल रहे है। उस दिन बूटी डोज कुछ ज्यादा हो गया था। करीबियों की बात में दम है, और चुप रहना हमारा कर्म है
ओरन को शीतल करे...
वाणी में हमेशा संयम और शीतलता होनी चाहिए। शायद तभी अपने पूर्वज बाबा रहीम का दोहा है।
ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोए
ओरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होए..।
मगर इंसान की आदत है। उसकी अगर कोई तारीफ कर दे। खासकर अपने कप्तान जी। तो संयम वाणी का खो देता है। इन दिनों अपने वर्दीधारी यही बोल रहे है।एक मैडम जी की वाणी को लेकर। जो कि अक्सर सेट पर बोलते वक्त अपनी वाणी पर लगाम रखना भूल जाती है। जबकि उनका पद उन सभी से बहुत निचला है। जिनको वह आदेशित करती है। उनकी वाणी के इस व्यवहार कारण वर्दी में असंतोष पनप रहा है। वर्दीधारी दबी जुबान से बोल रहे है। इस भाषाशैली में तो अपने कप्तान जी भी नहीं सेट पर आदेश नही देते हैं, जिस भाषा में मैडम जी बोलती है। शायद कप्तान जी की तारीफ पाकर बौरा गई हैं। नाम पूछने पर वर्दीधारी प्रभु श्री राम का जन्मदात्री का इशारा करके चुप हो जाते है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अट्टू जी की चुप्पी...
तराना कांड में कानून व्यवस्था संभालने के लिए वर्दी के साथ अपने अट्टू जी भी मौजूद थे। मगर उनकी भूमिका केवल दर्शक वाली रही। जब पहली रात में प्रतिनिधि मंडल मिलने पहुँचा। तब एडी. एसपी की भूमिका एक्टिव नजर आई।उन्होंने ही हर सवाल का जवाब दिया। जबकि अपने अट्टू जी को ऐसे समय मे आगे बढ़कर कमान संभाल लेनी थी। मगर वह मूक दर्शक बनकर खड़े सब कुछ होते देखते रहे। जबकि उनकी पोजिशन जिले में नम्बर 2 की है। खासकर ऐसे विवाद में।ऐसी चर्चा तराना ड्यूटी पर लगे मातहतों के बीच सुनाई दे रही है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस,अपने अट्टू जी की तरह चुप हो जाते हैं।
जमीर बनाम कबीर...
अपने कमलप्रेमी इन दिनों यह दो लाइन सुना रहे है।
जमीर जिंदा रख-कबीर जिंदा रख। इसमें इशारा कमलप्रेमी प्रवक्ता की तरफ है। जिनका प्रकट उत्सव शनिवार को था। कमलप्रेमी मुख्यालय पर उनके सहित दालवाले नेताजी मौजूद थे।तभी अपने दालवाले नेताजी ने व्यंग्यात्मक शैली में प्रहार किया।
प्रकट उत्सव तो मनाना ही पड़ेगा।
आखिर यह हाइनेस के करीबी है। हालांकि करीबी की जगह उन्होंने जो शब्द बोला। उसे लिखना उचित नहीं है। जिसे सुनकर प्रवक्ता जी को आना तो गुस्सा ही चाहिए था। मगर वह खिसयानी हँसी के साथ मन -मसोस कर रह गए। दर्द तो पक्का हुआ होगा।मगर दालवाले नेताजी को पलटवार पसंद नहीं है।तभी तो उसके बाद भी प्रकट दिवस मनाया गया।हालांकि मौजूदगी उंगलियों पर गिने जाने वाले कमलप्रेमियो की थी। यह किस्सा प्रवक्ता के करीबी ने ही ऊपर लिखी लाइन के साथ सुनाया और फिर चुप हो गए। तो हमारा तो काम ही चुप रहना।
मुफ़्ते माल-दिल बेरहम....
वैसे इस कहावत को सही तरीके से माले मुफ्त-दिल बेरहम लिखा जाता है। अर्थ सबको पता है। तो सीधे मुद्दे की बात पर आते है।मुद्दा राहगिरी और प्रथमसेवक है। जिसमे प्रथमसेवक एक बड़ा झोला एक कर्मचारी के कंधे पर लादे नजर आए। झोले में उनको मिले अभी तक के वह उपहार रखे थे।
जो सम्मान स्वरूप दुपट्टा और माला के रूप में मिले थे। बस फिर क्या था। इससे बढिया अवसर क्या हो सकता था। माले मुफ्त ..को खर्च करने का। उन्होनें वही किया।राहगिरी में लगे मंच पर विराजमान अतिथियों को पहनाकर झोले को हल्का कर लिया। यह नजारा जब अपने कमलप्रेमियो ने देखा। तो तंज के रूप में वह कहावत सुनाने लगे,जो ऊपर आप सभी पढ़ चुके है।अब कहावत मौके के हिसाब से सही है या गलत। इस पर हम आदत के अनुसार चुप रहेंगे।
लिफाफा संस्कृति...
सरकारी विभागों में लिफाफे का कितना महत्व होता है।इसका अंदाजा उन मातहतों को ज्यादा होता है।जो मुख्य साहब के अधीन काम करते है। ऐसे ही एक साहब है।जिनके अधीन सम्भाग के 40 मुखिया है।जिनको शाखा-मुखिया की उपाधि दी गई है। इस विभाग का काम है। बड़े बड़े गोदामों में खाद्यन्न का एकत्रीकरण करना।मुख्य साहब बाबा की नगरी में विराजमान रहते है।इनकी माहवारी फिक्स है।बड़ी ब्रांच से 15 और छोटी से 10 हजारी ।सीधी भाषा मे प्रति माह 4से 5 पेटी का रास्ता निकाल रखा है।उस पर तुर्रा यह है कि इस विभाग की तरफ कोई झांकता भी नहीं है। तो ड्यूटी भी मनमर्जी से की जाती है। 10 से 6 वाला कोई नियम यहां लागू नहीं होता है। मर्जी से कार्यालय आते जाते है। वेतन पूरा उठातें है । इस छूट के बदले में बस प्रबंधन को लिफाफे में हल्के हरे रंग के कागज रखकर देने पड़ते है। सौदा बुरा नहीं है। सबसे ज्यादा फायदा यह है कि इस विभाग पर कोई ध्यान भी नहीं देता है। उपार्जन के वक्त ही यह चर्चा में रहता है। बाकी समय इसके प्रमुख बस लिफाफा संस्कृति पर भरोसा करके मस्त और चुप रहते है।तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
व्यवस्था में चूक...
हालात बद्तर हो तो व्यवस्था में चूक होना लाजिमी है। तराना कांड के चलते उज्जवल जी -कप्तान जी को डेरा डालना पड़ा। पूरी रात्रि जागरण करना पड़ा। इस चक्कर मे व्यवस्था में चूक हो गई। फाइनल रिहर्सल होनी थी। इतनी ठंड में विद्यार्थियों को बुलवा लिया। दोपहर तक कोई निर्देश भी नहीं पहुँचे।उस पर सितम यह हुआ। परेड में शामिल बच्चों को सुलभ-सुविधा के नाम पर राशि देनी पड़ी। जब विरोध उठा तो फोन बजे।तब जाकर शुल्क लेना बंद हुआ। यह सब इसलिए हुआ। क्योकि उज्ज्वल और कप्तान तराना में व्यस्त थे। किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। जबकि बाकी अधिकारी फ्री थे। इस चूक के लिए मानवीय संवेदना दिखाते हुए माफी मांगी जानी चाहिए।उन बच्चों से जो ठंड और राशि के चलते परेशान रहे। वसूली 10-10 ₹ की हुई थी। ऐसी हमारी सोच कहती है। बाकी हमकों चुप ही रहना है।
सुरक्षा में है अपनी भलाई...
सिंहस्थ 2028 को लेकर निर्माण कार्य प्रगति पर है। हर सप्ताह समीक्षा होती है। तीन दफ़ा कामों की।जिसकी तारीफ नहीं करना नाइंसाफ़ी होगी। मगर इस पर भी इंसाफ करना जरूरी है। जिस काम के लिए दिन रात जान जोखिम में डालकर इंसान काम कर रहे है। उनकी सुरक्षा उचित है या ढीली। इसका खुलासा पिछली दस तारीख को हुआ। उस टीम ने किया। जिसको जिम्मेदारी दी गई है।इंस्पेकेशन टीम ने। एम.पी. पावर ट्रांसमिशन- कान्ह डाक्ट योजना- सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी। इन सब साइट पर सुरक्षा मानकों की कमी को टीम ने इंगित किया है। सुरक्षा उपकरण में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु कोई ज्यादा महंगी नही आती है। हेलमेट जैसी व्यवस्था का ठेकदार द्वारा व्यवस्था नहीं करना।बाकी उपकरणों की तो हम बात ही नहीं कर रहे है। मगर जब जब विकासपुरुष या राजधानी से पधारे आलाधिकारियों का दल आता है।तो सभी तस्वीर में हेलमेट में नजर आते है।सवाल उठना जायज है?मजदूरों की जान की कीमत क्या कुछ भी नहीं है।खुदा न खास्ता कोई हादसा हो जाता है। तो बदनामी विकासपुरुष और शहर की होगी? अहिल्या नगरी प्रत्यक्ष प्रमाण है।
इसलिए हम अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी से गुहार करते है।
ठेकेदार को जरा टाइट करें।क्योकि....
सुरक्षा में है अपनी भलाई
यही है सबसे बड़ी कमाई
बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
आंखे लाल-बिखरे बाल- डंडे का कमाल......
तराना कांड को लेकर वर्दी में चर्चा है। वही जो ऊपर पढ़ी। मगर यह बात मेहनत को लेकर है। उज्ज्वल और कप्तान की। दोनो ने पूरी टीम के साथ रात्रि जागरण किया। कप्तान जी फील्ड पर तो उज्ज्वल जी ने थाने ओर फोन पर मोर्चा संभाला। कप्तान को तो शायद अपना प्रोबेशन टाइम याद आ गया। तभी गली -गली में दौड़ लगाते, डंडा थामे, जलती कार को देखते-फिर वीडियो की मदद से आरोपी को पकड़कर पट्टा चलाते देखे गए। जिस परिसर से संचालन हो रहा था। उसमें अगले दिन नुक़्ते का कार्यक्रम था। उसको खाली ,सख्ती से कराया। उपद्रवी निकल निकल कर साला-रूपा की तरफ भागे। ताला ठोक दिया गया।अलसुबह 5 बजे तक डंडे-पट्टे का जोरदार प्रदर्शन किया।अंदर कप्तान जी ने हाथों की खुजली मिटाई। बाहर उज्ज्वल जी संवाद और समन्वय से मामला निपटाते रहे। सुबह 6 बजे दोनो ने कमर सीधी की। केवल डेढ़ घंटे के लिए।फिर वापस मोर्चे पर हाजिर हो गए।तभी तो वर्दीधारी बोल रहे है। आंखे लाल-बिखरे बाल-डंडे का कमाल । जिसके लिए पुलिस-प्रशासन को साधुवाद देकर,अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जनता का सवाल...
हमेशा नया कदम -नया प्रयोग करने में विकासपुरुष कभी पीछे नहीं रहते है। बस उनके दिमाग मे कोई आईडिया आना चाहिए।फिर कोई क्या सोचेगा,इसके बदले उनकी सोच भविष्य के लिए यह जरूरी है,इस पर काम करती है। इसके पीछे छुपे मकसद को उनके कमलप्रेमी तक नहीं समझ सकते है?फिर जनता को तो कोई मतलब ही नहीं होता है।इसलिये कमलप्रेमी, जनता को आगे लाकर सवाल खड़े करते है। ताजा सवाल स्थान परिवर्तन से जुड़ा है। पिछले कई दशक से गणतंत्र दिवस दशहरा मैदान पर मनता रहा है। पहली दफा स्थान बदलकर शिप्रा नदी के किनारे पर होगा। सीधी भाषा मे दक्षिण दिशा के बदले उत्तर दिशा में होगा।यह बात कमलप्रेमियो के गले नही उतर रही है। कई सवाल खड़े हो रहे है। कुछ का कहना है कि अगर स्थान बदलना था। तो शहर के मध्य क्षीरसागर रख लेते?दोनो तरफ की जनता को भी सुविधा हो जाती। वैसे भी जनता अधिकतर ऐसे राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूरी बनाकर रखती है। ऐसे में शहर से बाहर गणतंत्र दिवस मनाना? इस कदम को न्यायोचित नही माना जा रहा है। मगर फैसला विकासपुरुष का है। उनकी सोच को परखना-समझना आमजन की बात नहीं है? आगे चलकर खुलासा होगा। स्थान क्यो बदला। इसलिए हम इंतज़ार करते हुए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
किसी की जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा..
अपने बड़े साहब ने वीसी में जो कुछ कहा। उससे आईएएस लॉबी का जो मनोबल गिरा है। लॉबी अचरज है। जब टॉप बॉस ही आरोपी बना दे। उसके बाद बचता क्या है? तभी तो लॉबी सवाल उठा रही है। जो कि शायर नदीम शाद के अशआरों के रूप में सुनाई दे रही है।अब इशारों को समझना जरूरी है।
सबब तलाश करो अपने हार जाने का
किसी की जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा......। यह बड़े साहब के बयान के बाद की प्रतिक्रिया है।
जिसको लेकर लॉबी में चर्चा है।
अगर हम सब .....
है बेगुनाह तो होने से कुछ नहीं होगा
सबूत दीजिए रोने से कुछ नहीं होगा...
इधर राजधानी में विराजमान वरिष्ठ आईएएस बोल रहे है कि....
मुश्किल कोई आन पड़ी तो घबराने से क्या होगा
जीने की तरकीब निकालो डर जाने से क्या होगा...
जबकि जिन पर सीधे आरोप लगे हैं।उन जिलों में से यह आवाज दबी जुबान से सुनाई दे रही है...
अगर न आज सही कल जरूर टूटेगा
गुरुर किसका रहा है गुरुर टूटेगा
अब देखना यह है कि आने वाले समय में बड़े साहब के बयान से प्रताड़ित आईएएस अधिकारी क्या कदम उठाते हैं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
वो सर भी काट देता.....
देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी शायरी की फनकारी से हिंदुस्तान का नाम रौशन करने वाले जनाब ताहिर फराज आज इस जमीं से रुखसत हो गए। उनकी मखमली आवाज़ के करोड़ों मुरीद थे-हैं-रहेंगे। उनके कई शे'र और नज्म लोगो को जुबानी याद होंगे। हमकों भी उनका एक गीत आज याद आ रहा है।
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से
तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना
कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
उर्दू ग़ज़ल की नर्म आवाज़, एहसासों की सादगी और मोहब्बत की शाइरी को नई पहचान देने वाले शायर ताहिर फ़राज़ आज भी अपने अशआर में ज़िंदा हैं।
उनकी शाइरी में दर्द भी था, सुकून भी, शिकायत भी थी और उम्मीद भी—जो सीधे दिल तक उतर जाती थी।
# chup की ओर से उस फ़नकार को भावभीनी श्रद्धांजलि,
जिसने लफ़्ज़ों से जज़्बातों की दुनिया रच दी।
अशआरों में आप हमेशा जिंदा रहेंगे और हम गुनगुनाते रहेंगे।
वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
अफसोस ये है उस ने मिरी बात काट दी
अलविदा ...फ़राज साहब