28 जूलाई 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
काजल चुराना ...
यह कहावत याद होगी। आंख से काजल चुराना। मतलब ऐसा काम करना। सामने वाले को पता ही नहीं चले। इस मामले में अपने प्रभारी बाऊजी को पीएचडी हासिल है। तभी तो अपने विकासपुरूष को कानों-कान खबर नहीं हुई। कब उनके गले से भगवा दुपट्टा प्रभारी बाऊजी ने उतार लिया। ठीक बिलकुल पीछे से। किसलिए उतारा? क्योंकि बाऊजी के पास रूमाल नहीं था। उन्हें अपना पसीने से लथपथ चेहरा साफ करना था। तो उन्होंने वही किया। विकासपुरूष को पता नहीं चला। यह घटना उस वक्त की है। जब पिछले सोमवार की सवारी में चलते-चलते विकासपुरूष एक घर में अल्पसमय के लिए रूके थे। उनके साथ 2 नंबरी इंदौरी नेताजी भी थे। भगवा अंगवस्त्र से मुंह साफ करने का वीडियों देखकर, अब कमलप्रेमी नाराज है। सवाल उठा रहे है। भगवा प्रेम पर। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।
विकासपुरूष का तंज ...
कब-कहां-कैसे शब्दों को तौल-मौल कर बोलना है। खासकर मीडिया के सामने। यह अपने विकासपुरूष से सीखा जा सकता है। तभी तो उन्होंने धर्म संसद पर बहस करने आई चैनल एंकर की बोलती बंद कर दी। उस वक्त, जब चैनल वालो के माईक खराब थे। एंकर और विकासपुरूष माईक को ठोक रहे थे। ताकि कार्यक्रम शुरू हो और साउंड सुनाई दे। इस कारण धर्म-संसद देर से शुरू हुई। विकासपुरूष का हर पल कीमती है। कीमती समय, माइक चालू होने के इंतजार में खराब हो रहा था। तो विकासपुरूष ने कह दिया। अगर बिजली गुल हो जाती तो आप हंगामा खडा कर देती। वाचाल चैनल एंकर को यह उम्मीद बिलकुल नहीं थी। विकासपुरूष ऐसा चुभता तंज भी कर सकते है। इसलिए उन्होंने अपनी भलाई इसी में समझी। विकासपुरूष से कहा। यह हमारी गलती है। जिसे सुनकर दरियादिल विकासपुरूष चुप हो गये। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
नियम की ऐसी की तैसी ...
अपने विकासपुरूष मंदिर के नियमों का पालन करते है। आमजनता तो वैसे ही नियम मानती है। किन्तु एक कमंडल अध्यक्ष, पार्षद पति और युवा कमलप्रेमी उपाध्यक्ष। यह तीनों मंदिर के नियमों की धज्जियां उडाने में यकीन रखते है। तभी तो मंदिर प्रांगण से बाहर नहीं जाने वाली ई-कार्ट को भी हरिफाटक ब्रिज पर बुलवा लेते है। वह भी एक डिब्बे खिचडी वितरण के नाम पर। उस पर गजब यह करते है। अपनी झांकी दिखाने के लिए वीडिया भी अपलोड करते है। सोशल मीडिया पर। जबकि कटू और कडवा सच यह है। कई बुर्जुग और वरिष्ठ नागरिकों को प्रांगण में ही ई-कार्ट की ही सुविधा नहीं मिलती है। बेचारे परेशान होते रहते है। यह नजारा कभी भी आसानी से देखा जा सकता है। किन्तु यह कमलप्रेमी तिकडी नियमों की ऐसी-तैसी करने पर तुली है। मंदिर के कई कामों में हस्तक्षेप भी कर रही है। हम अपने फटाफट जी से इतनी उम्मीद तो कर ही सकते है। वह ई-कार्ट बाहर जाने पर रोक लगा देंगे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
डिमांड से दु:खी ....
स्कूल के साथ छात्रावास चलाने वाले शासकीय कर्मचारी इन दिनों दु:खी है। इसका कारण डिमांड है। प्रतिमाह 10 से 15 प्रतिशत। मांग करने वाले उपायुक्त स्तर के अधिकारी है। जिनको बाबा की नगरी में आये ज्यादा समय नहीं हुआ है। उन्होंने अघोषित संदेश सबको भिजवा दिया है। प्रतिमाह जो रकम आती है। विद्यार्थियों के लिए। उस रकम का 10 से 15 प्रतिशत एक लिफाफे में रखकर देना अनिवार्य है। जो ऐसा नहीं करेगा। वह उनके प्रकोप से नहीं बच सकता है। इसीलिए अधीक्षकगण गुहार लगा रहे है। अपने उज्ज्वल जी से। हमको इस मुसीबत से मुक्ति दिलाओं। संवेदनशील उज्ज्वल जी से सबको यह उम्मीद है, और हमको भी। बाकी हमको आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
ढाई पेटी सालाना ...
ऊपर हमारे पाठकों ने डिमांड से दु:खी गौर से पढ़ा ही होगा। इसीलिए हम सीधे मुद्दे की बात पर आते है। ढाई पेटी सालाना डिमांड की मांग। करने वाले एक जिलाधिकारी है। जो कि अभी-अभी बाबा की नगरी में आये है। स्मार्ट बंदे है, मगर दिमाग से नहीं। खुद को फिट (स्मार्ट) दिखाने के लिए डाइट नामक पेय पदार्थ का सेवन करते है। वह भी जनसुनवाई में बैठकर। अपने उज्ज्वल जी जनता की शिकायत सुनते है। इस दौरान चोरी-छुपे यह डाइट कोक का सेवन करते है। इन्हीं ने अपने विभाग के अधीन चलने वाले ग्रुपों से ढाई पेटी सालाना की डिमांड की है। जबकि यह काम अभी तक 50 हजारी में चल जाता था। पिछले कई सालों से यह काम 50 हजारी में चल रहा था। नये मुखिया ने दो पेटी की अतिरिक्त डिमांड कर डाली। जिससे हडकंप मच गया है। ऐसा कृष्ण मंदिर के समीप स्थित कार्यालय के गलियारों में सुनाई दे रहा है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
आईएएस 'बाबू' ....
संकुल के गलियारों में चर्चा है। एक आईएएस बाबू की। जो कि दूसरे माले पर विराजमान है। स्टाइलिश दाड़ी रखते है। आईएएस के साथ रहते-रहते खुद को पॉवरफूल समझने लगे है। वैसे भी चाय से ज्यादा केतली गर्म होती है। तभी आईएएस बाबू किसी को कुछ नहीं समझ रहे है। जनता-अधिकारी-कर्मचारी कोई भी मिलने आये। वह .... साहब ने मना किया है ... कहकर टाल देते है। खैर ... यह उनके साहब और उनकी आपसी बातचीत है। जिसका पता कोई नहीं लगा सकता है। मगर इन दिनों एक-2 खोखे की फाइल की चर्चा है। चुनाव वाली। जिसका भुगतान होना है। कैमरों से जुड़ी फाइल है। जिसमें अपने आईएएस बाबू जी ने सेटिंग की है। ठेकेदार से 25 हजारी एडवांस लिए है। इतने ही बाद में मिलेंगे। फाइल क्लीयर होने के बाद। ऐसा दबी जुबान में संकुल वाले बोल रहे है। सच और झूठ का फैसला समझदार पाठकगण खुद कर ले। क्येांकि हमको तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
शहद और मधुमक्खी ...
अपने विकासपुरूष से मिलने कमलप्रेमी गये थे। राजधानी में। जिसमें अपनी बहन जी, हाइनेस, दालवाले नेताजी सहित कई कमलप्रेमी शामिल थे। दौरा ... स्वच्छता में मिले पुरूस्कार को लेकर था। तो अपने स्मार्ट पंडित का होना भी लाजिमी था। दल देरी से पहुंचा। फिर भी विकासपुरूष ने इंतजार किया। सबको सम्मान दिया। खुद चलकर हर कमलप्रेमी के पास गये। बात करी। फोटो खिचवाया। किसी को भी निराश नहीं किया। हाइनेस के उद्बोधन पर, उनकी पीठ थपथपाई । फिर विकासपुरूष ने शहद और मधुमक्खी का महत्व समझाया। इसके बाद उद्बोधन अपने दालवाले नेताजी का था। जिन्होंने संभवत: विकासपुरूष के संदेश को सही तरीके से नहीं समझा। तभी तो अपने भाषण में बोल गये। मधुमक्खी जैसे बनो। यह सुनकर, बाद में विकासपुरूष ने उनको प्यार से समझाया। अगर बात समझ में नहीं आये, तो नहीं बोलना चाहिये। ऐसा हम नहीं कह रहे है, बल्कि वापस लौटे कमलप्रेमी ऐसी चर्चा कर रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।
मार्कर ने दिया धोखा ...
वर्दी इन दिनों अभियान चला रही है। नशे से दूरी वाला। जिसके लिए अपने कप्तान जी और उनकी पूरी टीम को हमारा सेल्यूट। इस कडी में कई कार्यक्रम किये जा रहे है। जिसमें से एक कार्यक्रम बैनर पर हस्ताक्षर करने का था। गुरूवार की शाम को। कर्कराज मंदिर पर। नशे से दूरी ... अभियान में अल्फा जी, तीसरे माले के मुखिया, डेल्टा जी, उज्ज्वल जी, कप्तान जी सहित सभी को हस्ताक्षर करने थे। हल्की बारिश हो रही थी। जब सब वहां पहुंचे। मगर बैनर पर जब हस्ताक्षर का मौका आया। तो मार्कर ने धोखा दे दिया। वह चला ही नहीं। आखिरकार अपनी-अपनी कलम से हस्ताक्षर करके काम चलाना पड़ा। मार्कर के अचानक धोखा देने की चर्चा, सभी वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सुनाई दे रही है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
गोपनीय दौरा ...
काफी अरसे बाद, बल्कि यह लिखना ठीक होगा। कई सालों बाद। जिले में कोई अधिकारी आया है। जो गोपनीय दौरा भी करता है। बगैर किसी को कुछ बतायें। चुपचाप अपने काम पर फोकस रखता है। जिसकी कोई फोटो या खबर नहीं आती है। अपने उज्ज्वल जी ऐसे ही अधिकारी है। जो कि बुधवार की रात को ही मंदिर का गोपनीय दौरा कर आये। बगैर किसी को बताये। नागपंचमी व्यवस्था को लेकर उनका यह गोपनीय दौरा था। उज्ज्वल जी ने हर बारीक व्यवस्था का निरीक्षण किया। उसके अगले दिन, मतलब गुरूवार को अल्फा- डेल्टा, तीसरे माले के मुखिया, कप्तान जी आदि के साथ पहुंचे। अब इन सभी ने मिलकर क्या-क्या कमियां निकाली होंगी? यह हमको पता नहीं है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
FOC की मनाही ...
शायद हमारे पाठकों को पता हो या नहीं भी ? मंदिर में FOC का मतलब फ्री-ऑफ-कास्ट। सीधी भाषा में मतलब मुफ्त दर्शन। आमजनता को तो लाइन में लगकर या 250 की रसीद कटवाकर ही दर्शन करने होते है। जिसमें वह खुश रहते है। मगर माननीयगणों को यह व्यवस्था पसंद नहीं है। वह अपने चेलो के लिए मुफ्त दर्शन व्यवस्था चाहते है। तभी तो अपने प्रथमसेवक के फोन से फटाफट जी को कॉल किया गया था। करीब 2 हफ्ते पहले। बातचीत अपने पिस्तौल कांड नायक ने की थी। उस दौरान अपने वजनदार जी भी मौजूद थे। तीनों माननीय ने समझौता करके डिमांड की। मुफ्त दर्शन व्यवस्था की। अपने चेले-चपाटो के लिए। बेचारे ... फटाफट जी इधर कुंआ-उधर खाई वाली स्थिति में थे। तो उन्होंने उज्ज्वल जी तक बात पहुंचा दी। जहां से साफ निर्देश मिले। व्यवस्था नहीं बदलेगी। कुछ ऐसा ही अपने मामाजी के पीएसओ के साथ हुआ। उनके कुछ परिचित आये थे। मुफ्त दर्शन चाहते थे। वीआईपी व्यवस्था में। साफ मना कर दिया गया। शुल्क लिया गया। ऐसी मंदिर के गलियारों में चर्चा है। मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
सुकूनदायक तस्वीर ....
वर्षो बाद ऐसी तस्वीर नजर आई है। पूरे 13 साल बाद। इसके पहले बच्चों को पढाते हुए तस्वीर तत्कालीन कलेक्टर स्व. डॉ. एम गीता की आई थी। सन् 2011 -12 में । अब 2025 में कलेक्टर रौशनसिंह आंगनवाड़ी केंद्र पहुंचे है। यह तस्वीर वाकई आनंददायक है। जिसके लिए कलेक्टर को बधाई देकर हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
मेरी पसंद ...
मैं जो चुप रहता हूं...
तो मेरे कुछ कमजर्फ दोस्त ...
मेरी खामोशी को मजबूरियां समझते हैं...।
कुमार विश्वास