04 अगस्त 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

04 अगस्त 2025 (हम चुप रहेंगे)

गुहार बनाम प्रहार ...  

पिपलीनाका सिक्सलेन होगा या फोरलेन? फैसला विकासपुरूष को करना है। मगर इस चक्कर में अपने हाइनेस दो पाटन के बीच फंस गये है। इधर कुंआ-उधर खाई वाली स्थिति में। एक तरफ संघ तो दूसरी तरफ शासन-प्रशासन। तभी तो उनका मिशन-2023 के चुनाव का वीडियों फिर सोशल मीडिया पर अपलोड हुआ। जिसमें वह सिंहस्थ क्षेत्र में बने हर मकान को मंदिर का दर्जा दे रहे थे। चुनाव में ऐसे वादे हर नेता करता है। अपने हाइनेस भी कर बैठे? तब उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। जुबान पर उनकी सरस्वती विराजमान है। लेकिन अब जरूर सोच रहे होंगे। क्योंकि संघ के पदाधिकारी ने खुद अपनी सोशल मीडिया आईडी से वही वीडियों अपलोड किया है। इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ है। हालांकि बाजार बंद और ज्ञापन के पहले गुहार लगाई गई थी। संकुल तक खुद चलकर गये थे। अपने उज्ज्वल जी से गुहार करने। परिणाम सकारात्मक नहीं निकला। नतीजा... पहले गुहार बनाम प्रहार.. की चर्चा- संघ-कमलप्रेमी और आमजनता के बीच सुनाई दे रही है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

हम भी मतदाता है ...

यह गुहार लगाने वाले शासकीय कर्मचारी है। जो कि दमदमा क्षेत्र में कार्य करते है। बेचारे लंबे समय से कठोर शब्द सुनने के आदि हो चुके है। हर रोज बेवजह फटकार सुनते है। इतना कुछ सुन चुके है कि अब पानी नाक तक आ गया है। तभी तो अंदर ही अंदर योजना बना रहे है। अनोखे विरोध-प्रदर्शन की। बगैर कुछ बोले ... विकासपुरूष के आगमन पर गुहार लगाना चाहते है। हाथों में तख्तियां लेकर। जिस पर लिखा होगा। हम भी आपके मतदाता है। किन्तु अंदर ही अंदर डर भी रहे है। अगर ऐसा किया तो बड़ी कार्रवाई ना हो जाये। दमदमा वाले तो अब खुलकर बोल रहे है। अपनी चटक मैडम जी के खिलाफ। शुरूआत हो चुकी है। उपयंत्री नाराज होकर अवकाश पर चले गये है। अब देखना यह है कि तख्ती लेकर विरोध कब सामने आता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

अनोखा इतिहास बनाया ...

आजतक ऐसा नहीं हुआ। एक दिन के लिए खुलने वाले मंदिर के इतिहास में। केवल एक ही प्रकार के पास छपे हो? वह भी दो दफा। पहली दफा 5 हजारी प्रिंट हुए। जो राजधानी से छपवाकर मंगवाये गये। यह भी कम पड गये। तो वापस 5 हजार छपवाये गये। यही पर प्रशासन ने अनोखा इतिहास बना लिया। क्योंकि आजतक इतने सालों में कभी भी 10 हजारी अतिविशिष्ट कार्ड नहीं छपवाये गये। 5 हजारी में काम चल जाता था। इसके अलावा अतिविशिष्ट और विशिष्ट कार्ड छपते थे। इस दफा केवल 10 हजारी अतिविशिष्ट कार्ड छपे। ताज्जुब की बात यह है। इसके पहले कार्डो पर दर्ज होता था। किस प्रवेश द्वार से अंदर जाने की अनुमति है। इस दफा यह अंकित नहीं था। नतीजा ... अतिविशिष्ट पास लेकर भी विशिष्टजनों को खूब धक्के खाने पड़े। ऐसा यह नजारा देखने वालो का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

और चाबी कोई ले जाये ...

घटना ताजी और पिछले सप्ताह की है। जब मध्यरात्रि में उस मंदिर के पट खुलने वाले थे। जो कि साल में एक बार खुलते है। पूजा का समय हो चुका था। पूरी तैयारी थी। बस उस मंदिर के लिए जाने वाले शटर का ताला खुलना बाकी था। जिसके लिए चाबी की जरूरत थी। मगर चाबी कोई ले गया। बस फिर क्या था। हंगामा मच गया। अपने उज्ज्वल जी और कप्तान जी, दोनों ही अपने-अपने मातहतों से पूछते हुए नजर आये। चाबी कहां है- चाबी कहां है। बेचारे मातहत यही बोलते रहे। चाबी उनके पास नहीं है। इस कवायद में करीब 5 से 10 मिनिट गुजर गये। फिर कहीं जाकर एक कर्मचारी दौड लगाते हुए आया। जिसने शटर का दरवाजा खोला। ऐसा यह नजारा देखने वालो का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

शटर किस पर गिरा ...

ऊपर पाठकों ने चाबी कोई ले जाये पढ़ा। उसी घटना से जुड़ी दूसरी घटना है यह। जिसमें शटर एक वरिष्ठ अधिकारी पर गिर गया। यह तो महाकाल की कृपा रही। पीठ या सिर पर टकराया और ज्यादा चोट नहीं लगी। घटना देखने वाले तो यही बोल रहे है। वैसे ही 5 से 10 मिनिट देरी हो चुकी थी। जैसे-तैसे चाबी मिली। शटर खुला। जो की आधा ही खुला था। सब झुककर अंदर घुसे। उसी दौरान एक वर्दीधारी वरिष्ठ अधिकारी भी अंदर घुस रहे थे। तभी शटर वापस नीचे आ गया। जो कि अधिकारी की पीठ या सिर पर लगा। यह हमको पता नहीं है। मगर घटना के बाद मंदिर के गलियारों में शटर गिरने की चर्चा सुनाई दे रही है। अब शटर गिरा या टकराये? इसकी पुष्टि कोई नहीं कर रहा है। लेकिन घटना सच है और अधिकारी कौन था? इसको लेकर सभी चुप हैं। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

बेरोजगार हो गये ...

शीर्षक पढक़र यह अंदाजा नहीं लगाये। किसी शासकीय या प्रायवेट संस्था के कर्मचारीगण नौकरी से निकाल दिये गये है। ऐसा बिलकुल नहीं हुआ है। विकासपुरूष के शहर में तो नौकरी मिल रही है। यह बेरोजगारी तो उन उपयंत्रियों के बीच आई है। जो कि सिंहस्थमद में होने वाले कामों को लेकर खुश थे। खोखो की योजनाएं थी। अगर यह काम करने का मौका मिलता। तो सभी की जेब गर्म होती। इसमें कोई शक भी नहीं है। किन्तु उल्टा हुआ है। जिनको उम्मीद थी। महत्वपूर्ण काम मिलने की। उनसे यह काम छीनकर सिंहस्थ विंग और एक नये विभाग को सौंप दी गई है। लोनिवि और जलसंसाधन विभाग के गलियारों में तो यही चर्चा है। यही वजह है कि दोनों विभागों के गलियारों में यह सुनाई दे रहा है। बेरोजगार हो गये हम। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

सजगता काम आई ...

अपने फटाफट जी की सजगता काम आ गई। मध्यरात्रि वाली पूजा में। अगर वह सजगता नहीं दिखाते। तो मामला पक्का विकासपुरूष तक पहुंचता। क्योंकि शिकायतकर्ता शासन की एक मंत्री ही होती। जिसका खामियाजा प्रशासन को भुगतना पडता। घटना वीडियों में कुछ यूँ दिखाई दिये। महंतश्री, प्रभारी बाऊजी और हाइनेस द्वारा पूजा शुरू कर दी गई थी। जिले के प्रभारी बाऊजी के पीछे अपने फटाफट जी खड़े थे। उनको अचानक याद आया। विशेष तौर पर इस पूजा के लिए आई महिला मंत्री नजर नहीं आ रही है। उन्होंने चारों तरफ देखा। फिर तत्काल अपने बाऊजी के कान में फुसफुसाया। फटाफट जी की बात सुनते ही बाऊजी पलटे। हाथ के इशारे से वर्दी को इशारा किया। जिसके बाद 10 सेकेण्ड में ही महिला मंत्री पूजा में शामिल होती नजर आई। वीडियों में तो साफ यही नजर आ रहा है। इसलिए हम अपने फटाफट जी की सजगता को सेल्यूट करते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

खुद की विदाई ...

आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। जब कोई आईएएस रिटायर होता है। तो दूसरे सहयोगी आईएएस फेयरवेल देते है। मगर विभागीय पदोन्नति वाले आईएएस के मन में शायद डर होता है। सीधी भर्ती वाली आईएएस लाबी कब क्या कर दे। इसीलिए तो तीसरे माले के मुखिया ने खुद की विदाई पार्टी रख ली। संभाग के हर आईएएस और आईपीएस सहित एसएएस के अधिकारियों को खुद फोन करके दावत पर आमंत्रित किया। जिसमें 6 प्रकार की मिठाई- 4 तरह की सब्जी- 3 तरह की रोटी- माकटेल और सलाद आदि का इंतजाम था। इस दावत में अपने उज्ज्वल जी के पहले वाले जिले के मुखिया भी सपरिवार पधारे। जय-वीरू की जोडी वाले। इतनी बड़ी दावत थी। तो भाषणबाजी भी हुई। किसी ने उनको अपना गुरू बताया- तो किसी ने कार्यशैली की प्रशंसा की। जिसे मुंह दिखाई की रस्म की उपाधि दी जा सकती है। ऐसा हम नहीं, बल्कि दावत में शामिल हुए अधिकारी ही बोल रहे है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

देवतुल्य की पीडा ...

अपने कमलप्रेमियों को देवतुल्य कार्यकर्ता बोला जाता है। मगर सच इसके उलट है। उनको देवतुल्य कोई मानता नहीं है। ऐसा यह देवतुल्य कार्यकर्ता हमको फोन लगाकर खुद बोलते है। अपनी पीडा जाहिर करते है। ताजा मामला कन्या व गणेश पूजन की तरफ है। इसके लिए जजमान की तलाश हो रही है। हर बूथ पर। करीब 175 बूथ पर कार्यक्रम होना है। प्रति बूथ खर्चा 15 से 20 हजारी है। कमंडल मुखिया को जजमान तलाश करने है। इसके अलावा हर बूथ से 150 से 200 कन्याओं की सूची तैयार करना है। यही वजह है। देवतुल्य कार्यकर्ता दबी जुबान से कह रहे है। वैसे ही संगठन ने 365 दिन के कार्यक्रम दे रखे है। उस पर 2 यह नये कार्यक्रम। देवतुल्य कार्यकर्ता की पीडा को हम केवल समझ सकते है। कर कुछ नहीं सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार बस चुप हो जाते है।

गोपनीय चर्चा ...

शनिवार की रात को विकासपुरूष की गोपनीय चर्चा हुई। बंद कमरे में। करीब 1 से सवा घंटे। जिसमें अपनी बहन जी और दालवाले नेताजी शामिल थे। वीवीआईपी विश्रामगृह में। इस दौरान उज्ज्वल जी, कप्तान जी सहित पूरा प्रशासनिक अमला बाहर मौजूद था। बंद कमरे में क्या चर्चा हुई? इसको कोई नहीं बता सकता है। मगर कयास कई तरह के लगाये जा रहे है। किन्तु हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

पुर्नवास मुलाकात ...

अभी-अभी तीसरे माले से रिटायर हुए अधिकारी, अपने पुर्नवास के लिए जुट गये है। यह वही अधिकारी है। जिन्होंने खुद की विदाई पार्टी दी थी। रविवार की सुबह अपने विकासपुरूष से मिलने पहुंचे। उनकी मुलाकात उस वक्त हुई। जब विकासपुरूष रेल को हरी झंडी दिखा चुके थे। यह मुलाकात भी अपने उज्ज्वल जी के सौजन्य से हो पाई। विकासपुरूष से मिलकर बोले। मेरे लायक कोई काम हो तो बताये। जवाब मिला ... राजधानी में कुछ देखता हूं। इस पर रिटायर अधिकारी ने कहा। मेरी इच्छा बाबा की नगरी में काम करने की है। जिसे सुनकर विकासपुरूष आगे बढ गये। अब देखना यह है कि पुर्नवास मुलाकात का फायदा कब तक मिलता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

आखिरकार घेर लिया...

अपने स्मार्ट पंडित को घेरना हर किसी के बस की बात नहीं है? वह हत्थे ही नहीं लगते है। मगर पिछले माह के अंतिम दिन प्रथमसेवक मंत्रिमंडल की बैठक थी। जिसमें से स्मार्ट पंडित गायब थे। अपनी जगह हवासिंह जी को भेज दिया था। यह देखकर प्रथमसेवक व मंत्रिमंडल बिफर गया। पहले तो अपने हवासिंह जी को आडे हाथों लिया। अपनी गंभीर बीमारी और प्रथमसेवक ने। फिर बैठक छोडक़र नीचे आ गये। यह खबर मिलते ही स्मार्ट पंडित हाजिर हो गये। अपनी लच्छेदार भाषाशैली से प्रथमसेवक व मंत्रिमंडल को पटाने की कोशिश की। मगर नाराज प्रथमसेवक ने कह दिया। यह तरीका ठीक नहीं है। स्मार्ट पंडित ने खूब कोशिश की। मंत्रिमंडल की बैठक हो जाये। किन्तु नाराज सदस्यों ने बात नहीं मानी। बस ... जो नाश्ता आया था, वह किया और चल दिये। ऐसा प्रथमसेवक मंत्रिमंडल के सदस्यों का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

विकासपुरूष की तवज्जों ...

रविवार को कालिदास अकादमी में कार्यक्रम था। विकासपुरूष मुख्य अतिथि थे। उनका ही केवल भाषण होना था। मगर अचानक न जाने क्या हुआ। विकासपुरूष ने अपने पिस्तौलकांड नायक को तवज्जों दी। अपने भाषण से पहले उनका भाषण कराया। इस दौरान उन्होंने माईक से बोलकर पिस्तौलकांड नायक को अपने पास बुलाया। उनके कान में कुछ कहा। जिसके बाद पिस्तौलकांड नायक ने लगभग 15 मिनिट तक अपना उदबोधन दिया। यह देखकर सभी कमलप्रेमी हैरान थे। मगर राजनीति में सबकुछ संभव है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

बैठक स्थगित ...

अपने विकासपुरूष का अचानक रविवार का दौरा बनने से राजधानी के एक एसीएस स्तर के अधिकारी को अपनी बैठक रद्द करनी पडी। यह बैठक रविवार को होनी थी। सिंहस्थ 2028 को लेकर यह महत्वपूर्ण बैठक थी। जिसमें लगभग आधा दर्जन से ऊपर प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी आने वाले थे। किन्तु विकासपुरूष शनिवार की शाम को आ गये। जिसके चलते बैठक स्थगित हो गई। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

चलते-चलते ...

कौन बनेगा तीसरे माले का नया मुखिया ? इस सवाल का जवाब केवल अपने विकासपुरूष के पास है। मगर संकुल से लेकर राजधानी तक यह चर्चा है। संभवत: अहिल्यानगरी के अपने उम्मीद जी तीसरे माले के मुखिया हो सकते है। फैसला विकासपुरूष को करना है। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

आनंद आ जाता है ...

जब कोई बहन इधर से - उधर से चढकर राखी बांधती है। तो आनंद आ जाता है। बहनों का आशीर्वाद है। पहली दफा वोट दिया- विधायक बना। दूसरी बार- उच्च शिक्षा मंत्री और तीसरी बार मैं मुख्यमंत्री। यह बहनों का आशीर्वाद है। अपने विकासपुरूष की बात में दम है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।