03 नवम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
मेरी कुर्सी है....बस बहुत हुआ...
छठ पर्व मनाने अपने विकास पुरुष आए थे। उस दिन 2 दफा अपने दालवाले नेताजी को विकास पुरुष ने नसीहत दे डाली। वो भी सार्वजनिक मंच से। पहली नसीहत कालिदास अकादमी की ज्यादा चर्चाओं में है। जहाँ अपने दालवाले नेताजी को अपनी कुर्सी छोडनी पडी थी। कारण नवनियुक्त प्रदेश महामंत्री आ गई। उनके लिए कुर्सी छोडी। नई कुर्सी लगाई गई। दालवाले नेताजी के लिए। मगर उनको यह पसन्द नही आया। तो जो भी अतिथि भाषण देने जाता। वह उसकी खाली कुर्सी पर जाकर बैठने लगे। ऐसा कई दफा हुआ। विकास पुरुष यह सब देख रहे थे। जब वह स्पीच देने उठे, तो उन्होंने मंच से ही दालवाले नेताजी को कह दिया। देखना... यह मेरी कुर्सी है। जिसे सुनकर वहां मौजूद सभी के चेहरों पर अनोखी मुस्कान थी। दूसरी नसीहत छठ पर्व पर दी। जब दालवाले नेताजी बोलने उठे। वह कुछ शब्द ही बोल पाए थे। विकास पुरुष ने पीछे से कह दिया। बस बहुत हुआ। दोनों घटनाओं की चर्चा कमलप्रेमी इसलिए कर रहे है। क्योंकि दालवाले नेताजी बाकी किसी की सुनते नही है, सबको बस सुनाते हैं। पहली दफा उनको किसी ने सुनाया है। जिससे कमलप्रेमी खुश है। मगर हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
इनोवा खरीदने की चर्चा...
इंसाफ के मंदिर में हाजिर हो की आवाज लगाने वाले ने 35 पेटी खर्च करके गाडी खरीदी है। जिसकी चर्चा मंदिर के गलियारों में ज्यादा सुनाई दे रही है। कारण...हाजिर हो.. बोलने वाले हर रोज अलसुबह मंदिर में नजर आते है। उन वीवीआई के साथ। जो सुबह की आरती में शामिल होते है। कई सालों से यह दायित्व निभा रहे है। जलवा भी बरकरार है। कोई उनको बोल भी नहीं सकता है। क्योंकि इंसाफ के मंदिर से डर सबको लगता है। बाबा के न्याय से डर किसी को नही लगता है। इसलिए अपनी मनमर्जी से जिसको चाहे वीआइपी बना देते है। जिससे भक्त प्रसन्न होते है। जाते वक्त कुछ न कुछ तो दान हर कोई करता है। जिसका परिणाम इनोवा है। ऐसा मंदिर वाले कह रहे है। मगर हमकों तो बस आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
गिफ्ट गाडी में लेकर गए...
पिछले महीने दिवाली थी। जिसका मतलब गिफ्ट्स की भरमार। संकुल में बैठने वाले सभी को पद हैसियत के अनुसार गिफ्ट मिलते है। ऐसे ही एक अधिकारी है। जिनका पद संकुल में दूसरे नम्बर पर आता है। इसी कारण उनको दूसरे अधिकारियों की अपेक्षा ज्यादा गिफ्ट्स आए। इस कदर की किराये पर लिया गया आवास का आधा कमरा भर गया था। हालांकि उन्होंने अपने मातहतों को एक-एक पैकेट देकर, अपनी दरियादिली भी दिखाई। फिर भी गिफ्ट्स खत्म होने का नाम नही ले रहे थे। तो उन्होंने रास्ता निकाला। अवकाश लिया। अपने गृह नगर जाने के लिए और सारे गिफ्ट्स गाडी में भरकर ले गए। ऐसी चर्चा संकुल के गलियारों में सुनाई दे रही है। अधिकारी कौन है? यह सब खुलकर बोल रहे है। मगर हमकों उनके निजी जीवन से क्या लेना-देना। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
तुगलकी फरमान...
हेडिंग पढक़र ही पाठकों को मोहम्मद तुगलक की कहानी याद आ गई होगी। राजधानी बदलने वाली। जिसके बाद से ही शायद तुगलकी फरमान की कहावत पैदा हुई होगी। यह कहावत इन दिनों मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रही है। क्यो दे रही है? इसका कारण समझने से पहले एक सवाल का जवाब पाठकगण जरूर दे। सवाल यह है कि मंदिर में सप्ताह के किस दिन सबसे ज्यादा भीड रहती है? इसका उत्तर किसी से भी पूछ लो। यही मिलेगा कि ...रविवार। मतलब यह कि बाकी दिनों के बदले इस दिन मंदिर में व्यवस्था के लिए ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत होती है। लेकिन कोई ऐसा ऑर्डर निकल जाए। इस दिन साप्ताहिक अवकाश घोषित किया जाता है। प्रभारी और सहायकों के लिए। तो इस फरमान को तुगलकी फरमान की ही संज्ञा दी जाएगी। क्योंकि रविवार को करीब 1 दर्जन शाखा में ताले डले रहेंगे। जबकि इस दिन किसी की भी जरूरत, आमदिनों से ज्यादा होती है। अगर किसी भक्त को शिकायत करनी है, तो शाखा तो बंद है। ताज्जुब की बात यह है। 2015 में एक ऑर्डर निकाला गया था। जिसमे स्पष्ट उल्लेखित था कि मंदिर के किसी भी कर्मचारी को रविवार के दिन अवकाश नहीं दिया जाएगा। इसके बाद भी ऑर्डर निकाला गया। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस, इस तुगलकी फरमान पर आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
कोड..फैक्स...
जासूसी फिल्मों में अक्सर देखा होगा। किसी बैठक के लिए कोई ऐसा कोडवर्ड होता है। जिसको बोलने पर इंट्री हो जाती है। इन दिनों मंदिर गर्भगृह में यही हो रहा है। अलसुबह की आरती में। यह कोडवर्ड फैक्स है। जिसके आधार पर बगैर अनुमति बनाए हुए भी आसानी से प्रवेश मिल जाता है। वह भी नंदी हॉल में और बिना कोई शुल्क जमा कराए। इसकी जानकारी अपने फटाफट जी को नही हो। यह संभव ही नहीं है। उनकी बगैर अनुमति के यह संभव नहीं है। वैसे उनसे या मंदिर प्रबंधन से इसको लेकर अगर कोई सवाल किया जाए। तो जवाब यही मिलेगा। कोई कोडवर्ड नहीं है और नियमानुसार ही प्रवेश दिया जाता है। किंतु ठोस सबूत है। ऐसा हो रहा है। पिछले सप्ताह किस तारीख को कितनी अवैध इंट्री हुई। जितनी भी यह इंट्री हुई है। फैक्स के जरिए हुई है। इसकी बानगी पढिये। दिनांक 27 को 78 अनुमति-34 फैक्स-टोटल 112 । 28 को 72 अनुमति- 23 फैक्स- टोटल 95। 29 को 69 अनुमति- 14 फैक्स-टोटल 83। 30 को 65 अनुमति- 34 फैक्स-टोटल 99। 31 को 79 अनुमति-11 फैक्स- टोटल 90। 1 नवम्बर 98 अनुमति-7 फैक्स-टोटल 105। 2 नवंबर 84 अनुमति-59 फैक्स-टोटल 143। इसके बाद भी अगर मंदिर प्रशासन यह दावा करता है कि बगैर अनुमति प्रवेश नही दिया जाता है। तो हम बस डॉ वसीम बरेलवी के शेर ...वो झूठ बोल रहा था बडे सलीके से/मैं एतबार ना करता तो और क्या करता...को याद करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
भरोसेमंद कौन...
उज्ज्वल जी का भरोसेमंद कौन अधिकारी है? यह सवाल इन दिनों संकुल के गलियारों में सुनाई दे रहा है। सवाल उठाने वाले भी अधिकारी ही है। जो कि इस बात से दु:खी हैं। कहने को तो वह संकुल में नंबर 2 का दर्जा रखते है। मगर काम के मामले उनके हाथ में कोई विशेष शाखा नहीं है। हल्के फुल्के काम है। सभी महत्वपूर्ण शाखा तो उस अधिकारी के पास है। जिनके सिर के बाल चांदी के हो चुके है। तभी तो बेचारे अपना दुखडा अपने बैचमेट को सुनाकर दिल को हल्का करते रहते है। जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
वसूली अभियान चालू है ....
हमारे पाठकों को याद होगा। हमने वसूली का उल्लेख किया था। खेती बाडी वाले विभाग के मुखिया की। खेती बाडी वाले विभाग के नए साहब ने आते ही वसूली अभियान शुरू करने की कोशिश की थी। तब जिले के व्यापारियों के संगठन की ओर से जब उन्हें बताया गया था। यह गुना या शिवपुरी नहीं है जहां कुछ भी चल जाता है। यह प्रदेश के मुखिया का जिला है और प्रत्येक व्यक्ति अपने विकास पुरुष से जुडा है। किसी न किसी रुप में। तो तीन महीने की शांति के बाद अब विकास खण्ड के अधिकारियों के माध्यम से बडे व्यापारियों की जानकारी प्राप्त करने के बाद खाद के एक एक व्यापारी को व्यक्तिगत रूप से बुलाया गया। उनको लालच दिया गया। अगले सीजन में चुपचाप ऊंचे दामों पर यूरिया बेचने का। इस छूट को देने का आश्वासन देकर उनसे 25 से 30 हजारी वसूली प्रारंभ कर दी गई है। शुरुआत अपने पँजाप्रेमी चरणलाल जी के क्षेत्र से की गई है । डेढ पेटी की वसूली भी हो गई है। अब बदबू वाले शहर और उनसे जुडी दो तहसीलों तक खबर भेजी गई है। देखते हैं अब किस विकासखण्ड में ऊंचे दामों पर यूरिया बेचने की छूट मिलती है। ऐसी चर्चा खेती बाडी वाले विभाग से निकलकर सामने आ रही है। बात सच भी है। मगर हम कर कुछ नही सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
12 अतिविशिष्टगण और 3 गुलदस्ते..
हमारे पाठकगण का हिसाब किताब हमसे लाख दर्जा बेहतर है। 12 अतिथियों का अगर स्वागत करना है। तो गुलदस्ते भी इतने ही होना चाहिये। मगर 12 बनाम 3 हो तो क्या होगा? वही होगा, जो पाठकगण अपने दिमाग मे सोच रहे है। इसका स्वागत किया, उसका गुलदस्ता वापस लिया, फिर अगले अतिथि का कर दिया। स्थापना दिवस पर यही हुआ। मंच पर अपने प्रभारी बाऊ जी, अपने जोगी जी, अपनी बहन जी, प्रथम सेवक, हाइनेस, दालवाले नेताजी, नवनियुक्त उपाध्यक्ष, अल्फा जी, डेल्टा जी, उम्मीद जी, उज्जवल जी, कप्तान जी आदि मौजूद थे। मगर कार्यक्रम के आयोजक दमदमा विकास भवन ने गुलदस्ते केवल 3 ही मंगवाए थे। तो मंच पर गुलदस्तों की अदला-बदली चलती रही। सामने मौजूद दर्शक यह नजारा देख कर मुस्कुरा रहे थे। अतिविशिष्टगण को भी इसका अंदाजा हो ही गया होगा। मगर वह सभी चुप रहे, तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
विकास पुरूष की जुबानी...
अपने विकास पुरुष को जो अच्छे से पहचानते है। तो वह यह इस सच से वाकिफ होंगे। वह भावना में बहकर कभी कुछ नहीं बोलते है। खासकर सार्वजनिक मंच से। उनके हर शब्द और वाक्य के पीछे कोई मकसद जरूर होता है। तभी तो जब उन्होंने पिछले दिनों फिल्म शोले की कहानी और उनके पात्रो जय-वीरू-ठाकुर-गब्बर का उल्लेख किया। तो कमलप्रेमियो में खुसर -फुसर शुरू हो गई। वैसे तो शोले की कहानी कई दफा मंचो से मामाजी भी सुना चुके है। इंदौरी 2 नम्बरी नेताजी भी ..ठाकुर के हाथ कट गए। यह डायलॉग बोल चुके है। मगर अपने विकास पुरूष ने पहली बार यह कहानी सुनाई है। जिसमें उन्होंने गब्बर की मौत के तरीके का जिक्र करते हुए, कमलप्रेमियो में इसी जोश की भावना को जाग्रत किया था। जिसके बाद कमलप्रेमियो में चर्चा है। आखिर गब्बर कौन है । किसकी तरफ उनका इशारा था। खासकर दक्षिण में। इसको लेकर अब खोजबीन हो रही है। अपनी अपनी सोच के अनुसार कमलप्रेमी नाम बता रहे है। मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
कंगाल शिवाजी भवन...
हमारा यह शीर्षक पढकर शायद नगरसेवकों को बुरा लग सकता है। वह दलील दे सकते है। 900 खोखे का सालाना बजट है। कमलप्रेमियो का बोर्ड है। खुद विकास पुरुष का गृह नगर है। फिर शिवाजी भवन कंगाल कैसे हो सकता है। उसके पास 2 से 5 हजारी राशि तो होगी ही। जो भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी सभागृह को सुधार सके। इस नाम में सबसे आगे लिखा भारत शब्द जाने कब का टूट कर गिर गया है। जबकि इस हॉल में अक्सर बैठकें होती रहती है। किसी का भी इस पर ध्यान नहीं जाता है। पँजाप्रेमियो की बात छोड दीजिए, अपने कमलप्रेमी भी ध्यान नही देते है। ऐसे में शिवाजी भवन के इलाहाबादी एंग्रीमैन से गुहार है कि वह भारत शब्द पर ध्यान देकर सुधरवाने की कृपा करें। अब करना नही करना, उनकी मर्जी है। हमकों तो बस आदत के अनुसार चुप रहना है।
मुझे भी तो प्रथम सेवक समझो...
गुरुवार को शिवाजी भवन में सम्मेलन होना था। उसके पहले बैठक आहूत हुई। सत्तादल के कमलप्रेमियो की। कमलप्रेमी मुख्यालय पर। अपनी बहनजी सहित सभी नगरसेवक थे। प्रथम सेवक और उनकी केबिनेट भी थी। अपनी बहनजी ने सभी को सलाह दे। जो भी मतभेद हो, वह बंद कमरे में ही रहना चाहिए। उनको आपस मे ही सुलझाना चाहिए। शासन और प्रशासन दोनो ही अपने है। बाहर मतभेद के आने से गलत संदेश जाता है। इसके बाद अपने प्रथम सेवक की पीडा जाहिर हुई। उन्होंने भी कह दिया। मैं भी कमलप्रेमी हूँ और सत्ता का ही एक हिस्सा हूँ। मुझे भी तो प्रथम सेवक समझो। ऐसा बैठक में शामिल कमलप्रेमी नगरसेवकों का कहना है। मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
मेरी पसंद...
इक नई किस्म तलाशी गई है फूलों की
मेरी हसरत है उसे नाम तुम्हारा मिल जाए
विष्णु विराट