05 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का

05 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)

ई-कार्ट भी अब वीआईपी हो गई! — बुजुर्ग पैदल आएं, सुविधा से दूर रहें!

मंदिर के ही कर्मचारी वरिष्ठ नागरिकों से बड़ी साफ भाषा में कह रहे हैं—“अगर पैदल चलने में असमर्थ हैं तो मंदिर आने से बचिए।” सुनने में बात कड़वी है, लेकिन सवाल इससे भी ज्यादा कड़वा है—आखिर ऐसी नौबत आई क्यों? कुछ समय पहले तक वरिष्ठ नागरिकों और पैदल चलने में असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए ई-कार्ट की सुविधा थी। शंख द्वार तक पहुंचाने वाली यह छोटी-सी सुविधा बुजुर्गों के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं थी। अब बताया जा रहा है कि ई-कार्ट सुविधा केवल अतिविशिष्ट लोगों के लिए उपलब्ध रहेगी। वाह! भगवान के दरबार तक पहुंचने में भी अब शायद ‘विशिष्टता’ का प्रमाण जरूरी है। नियम किसने बनाया? मंदिर कर्मचारी भी साफ-साफ नहीं बता पा रहे। लेकिन इतना जरूर कहा जा रहा है कि उज्ज्वल जी इतने असंवेदनशील तो हो ही नहीं सकते कि बुजुर्गों की सुविधा छीनने का आदेश दें। फिर आदेश किसका है? यही तो असली सवाल है। उज्ज्वल जी से हमारी विनम्र गुजारिश है—वीआईपी के लिए ई-कार्ट चलाइए, लेकिन आम श्रद्धालु के लिए भी एक-दो पहिए बचाकर रखिए। आखिर बुजुर्ग श्रद्धालु भी दर्शन करने आते हैं, लोकतंत्र में वोट देने नहीं! बाकी हम क्या कर सकते हैं? सवाल पूछ सकते हैं... और फिर अपनी पुरानी आदत के मुताबिक—चुप हो जाते हैं।

वजनदार जी का पारा हाई… फटाफट जी सामने आए तो भड़ास हुई ‘फटाफट’ बाहर!

अभी पिछले सप्ताह ही अपने विकासपुरुष ने मंदिर में बस सेवा का शुभारंभ किया था। माहौल विकास का था, व्यवस्था की तारीफ हो रही थी और कमलप्रेमी भी विकास के इस नए अध्याय से गदगद थे। लेकिन इसी बीच मंदिर परिसर में एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसकी चर्चा अब कमलप्रेमियों की बैठकों से लेकर चाय की दुकानों तक पहुंच गई है। बताया जा रहा है कि कार्यक्रम के दौरान वजनदार जी भी मंदिर में मौजूद थे। तभी फटाफट जी उनके सामने आ गए। फिर क्या था—मौका भी था और दस्तूर भी! चर्चा है कि वजनदार जी ने दर्शन के अपने FOC पॉइंट पर अंकुश लगाए जाने को लेकर फटाफट जी के सामने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी। वह भी ऐसी कड़क भाषा में कि आसपास खड़े कमलप्रेमियों के कान खड़े हो गए। अब वजनदार जी की भड़ास कितनी थी और शब्द कितने वजनदार थे, यह तो वही दोनों जानें। हम तो केवल इतना जानते हैं कि मंदिर में बाबा के दर्शन के लिए लाइन लंबी हो सकती है, लेकिन नाराजगी की लाइन कभी-कभी सीधे सामने वाले तक पहुंच जाती है। कमलप्रेमी कहते हैं—वजनदार जी का वजन सिर्फ नाम में नहीं, गुस्से में भी दिखाई दिया! हम क्या कहें? किसकी FOC, किसकी रोक-टोक और किसकी भड़ास—यह सब बाबा जाने। हम तो बस अपनी आदत के अनुसार… चुप हो जाते हैं।

कप्तान की जुबान में मिश्री… लेकिन गलत लहजे पर ‘चीनी’ नहीं, सीधे कड़वी दवा!

कहते हैं—“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।” अपने कप्तान जी इस दोहे को सिर्फ पढ़ते नहीं, बाकायदा अमल में भी लाते हैं। उनकी जुबान में मिश्री है, अंदाज में तहजीब है और सामने वाले को समझाने का तरीका भी बड़ा सलीकेदार। लेकिन साहब, मिश्री का मतलब यह कतई नहीं कि कोई उनके मातहत को असम्मानजनक भाषा में संबोधित करता रहे और कप्तान जी मिठाई बांटते रहें! पिछले महीने दीपपर्व के दौरान ऐसा ही एक प्रसंग सामने आया। चर्चा है कि प्रभारी बाऊ जी ने एक राजपत्रित मैडम से कुछ ऐसे शब्द कह दिए, जिन्हें मैडम ने मौके पर तो पलटकर जवाब नहीं दिया, लेकिन पूरा मामला कप्तान जी तक पहुंचा दिया। फिर कप्तान जी को मौका मिला और उन्होंने बाऊ जी को बिल्कुल कप्तानी अंदाज में—शब्दों में सम्मान, लहजे में संयम और संदेश में सख्ती के साथ समझा दिया कि पद कोई भी हो, मातहत से असम्मानजनक भाषा स्वीकार नहीं होगी। न गाली, न गरमी, न तमाशा—बस इतनी साफ बात कि संदेश सीधे दिल-दिमाग तक पहुंच गया। इसके बाद बाऊ जी चुप, कप्तान जी चुप और मैडम जी भी चुप। अब जब सब चुप हैं तो हम क्यों बोलें? तो हम भी अपनी आदत के अनुसार… चुप हो जाते हैं।

पहचान कौन… ठेका है या नेताजी की नई पहचान?

जब चैनल पर पहली बार लाफ्टर-शो शुरू हुआ था, तब सुनील पाल का एक डायलॉग खूब चला था— “पहचान कौन?” बस, उसी डायलॉग के सहारे आज हम अपने कमलप्रेमियों के सामने एक नेताजी की पहचान की पहेली रख रहे हैं। नेताजी काफी सम्पन्न हैं और विकासपुरुष के नजदीकी बताए जाते हैं। इन दिनों उनकी कार्यशैली भी चर्चा में है। पिछले दिनों एक ऐसा काम हाथ में लिया कि सामने वाले को बस कागज देने थे और बाकी जिम्मेदारी मानो नेताजी की। कहते हैं अनुमति का रास्ता भी बड़ा सुगम रहा। अलग-अलग विभागों से एनओसी, संकुल में फाइल की रफ्तार और फिर अनुमति— सब कुछ रौशनी के त्योहार से पहले ही निपट गया। अब सवाल यह नहीं कि काम हुआ कैसे, सवाल यह है कि नेताजी की कार्यशैली इतनी फटाफट कैसे हो गई? ठेका कितने में हुआ? नेताजी ठेकेदार हैं, सुविधा-समन्वयक हैं या पर्दे के पीछे कोई और भूमिका है—इसका खुलासा फिलहाल नहीं हुआ है। और यही तो इस पहेली का असली मजा है। तो कमलप्रेमियों… पहचान कौन? अगर आपने पहचान लिया हो तो नाम बताने की जरूरत नहीं। हमारी तरह चुप रहिए… क्योंकि आदत के अनुसार हम चुप रहेंगे।

भरोसे की छत पर रखी थीं सीमेंट की बोरियां… फिर हादसा हो गया

बुधवार की रात खत्म होकर गुरुवार की रात में दाखिल हो रही थी। शहर सो रहा था, लेकिन प्रशासन जाग रहा था। मीनार के निरीक्षण से लेकर आगे की तकनीकी जरूरतों तक लगातार मंथन चल रहा था। अल्पसंख्यक वर्ग का सहयोग ऐसा था, जिसे केवल शब्दों में लिख देना उसके मायने छोटा कर देगा। निरीक्षण के दौरान मशीन को छत की धरातल से सपोर्ट देने की जरूरत महसूस हुई। आपसी सहमति बनी कि छत पर सीमेंट की भरी बोरियां रखकर बेस तैयार किया जाए। देर रात एंग्रीमैन ने अपने विभाग को निर्देश दिए और काम शुरू हो गया। बोरियां ऊपर पहुंचीं, बेस तैयार हुआ और विशेष वर्ग भी पूरी तत्परता से सहयोग करता रहा। यानी उस रात किसी के मन में अविश्वास नहीं, बल्कि सहमति और समाधान का भरोसा था। प्रशासनिक मशीनरी और नागरिक पक्ष एक-दूसरे के साथ खड़े थे। पूरी रात इसी समन्वय से काम चलता रहा। फिर गुरुवार का सूरज निकला और काम आगे बढ़ा। लेकिन अचानक ऐसा हादसा हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। हड़कंप मच गया। उपलब्ध परिस्थितियों को देखने वालों का कहना था कि इसे किसी एक की गलती मानना उचित नहीं होगा। किसी शायर ने खूब कहा है— मुश्किलों में जो साथ खड़े रहते हैं वही रिश्ते वक्त के साथ बड़े रहते हैं। उस सुबह का असली संदेश भी यही था—मुश्किल घड़ी में सौहार्द और सहयोग ही सबसे बड़ा सहारा है। हादसा अनहोनी थी, लेकिन उससे पहले की रात भरोसे और भाईचारे की मिसाल जरूर थी। जो दोनों तरफ से निभाई गई। जिसके लिए हम सभी को साधुवाद देते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मंदिर में पद चाहिए… मगर इंतजार अभी लम्बा है...

हेडिंग पढ़कर यह अंदाजा मत लगाइए कि कोई भक्त मंदिर में नौकरी मांगने पहुंच गया है। यहां मामला थोड़ा अलग है। यह गुहार अपने निखट्टू जी की है, जो पिछले दिनों बड़ी मुश्किल से रवाना हुए थे। अब अपने निखट्टू जी का मोह मंदिर को लेकर उजागर होने की चर्चा है। कमलप्रेमियों से लेकर आराधना से जुड़े कुछ सूत्रों के बीच कानाफूसी है कि निखट्टू जी ने अपने सरपरस्त आकाओं के सामने इच्छा जाहिर कर दी है— मुझे जल्दी बुलाकर मंदिर में पदस्थी दिलवा दीजिए। अब इच्छा है तो रास्ता भी चाहिए। लेकिन बेचारे निखट्टू जी के रास्ते में फिलहाल सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं अपने फटाफट जी। कहा जाता है कि फटाफट जी से कुर्सी का रिश्ता कुछ ऐसा है कि वह विकासपुरुष के सहयोगियों से सलाह करके कोई निर्णय लेते हैं। ऐसे में निखट्टू जी को फिलहाल इंतजार करना पड़ेगा। मंदिर में जगह मिलेगी या इंतजार की माला ही जपनी पड़ेगी, यह तो समय ही बताएगा। वैसे मंदिर का पद है, और अपने निखट्टू जी की विवादास्पद कार्यशैली से हर कोई वाकिफ है। अपने विकासपुरुष भी निखट्टू से अच्छी तरह परिचित हैं। इसलिए उम्मीद शून्य प्रतिशत है। बाकी बाबा की मर्जी है और हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

नमाज पढ़ने गए थे, रोजे गले पड़ गए...

पिछले बुधवार की रात जैसे ही गुरुवार में दाखिल हुई, घड़ी ने 12 बजाए और मस्जिद को हटाने का काम भी अपनी गंभीरता में आगे बढ़ता रहा। रात करीब एक बजे के बाद उम्मीद जी, डेल्टा जी, उज्ज्वल जी, एंग्रीमैन, 16वें तीर्थंकर और फटाफट जी नीचे से ऊपर चढ़कर मीनार पर पहुँचे। मुद्दा था—मीनार। तकनीकी मामला था, इसलिए निरीक्षण हुआ, बारीकी से देखा गया और तकनीकी सलाह भी दी गई होगी। रात गई, सुबह आई और काम फिर शुरू हुआ। लेकिन मीनार ने शायद तकनीकी सलाह को अपने हिसाब से समझ लिया! फिर जो हुआ, वह सब जानते हैं। तकनीकी गड़बड़ी ने एक मीनार गिराई, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दिल उन लोगों का धड़का, जो रात भर वहाँ खड़े होकर व्यवस्था को संभालने की कोशिश कर रहे थे। अब, निरीक्षण में शामिल एक अधिकारी की दिल की व्यथा इतनी ही है— नमाज पढ़ने गए थे, रोजे गले पड़ गए... अधिकारी की बात में दम है। बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

हादसा हुआ, होश उड़े… मगर हौसले ने संभाल लिया शहर

गुरुवार की सुबह जब धूल का गुबार उठा तो रातभर से जाग रहे उन सभी चेहरों पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं, जो पूरी रात हालात पर नजर रखे हुए थे। अचानक सबके मन में एक ही सवाल था— ये क्या हुआ, कैसे हुआ? जवाब तत्काल किसी के पास नहीं था। दिल तेज धड़क रहे थे और बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। तमाम एहतियात और सावधानियों के बावजूद हादसा हो गया। जो हुआ, उसे तत्काल पहले जैसा करना संभव नहीं था। ऐसे समय में सबसे बड़ी परीक्षा सिर्फ व्यवस्था की नहीं, बल्कि समझदारी और संयम की भी होती है। यहीं से इस पूरे घटनाक्रम की सबसे सकारात्मक तस्वीर सामने आई। संभावित विवाद को हवा देने के बजाय संवाद, सहयोग और शांति का रास्ता चुना गया। प्रशासन और पुलिस ने स्थिति को संभालने में अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन विशेष वर्ग के जिम्मेदार लोगों और नागरिकों का सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। तनाव के बीच संयम बनाए रखना और समाधान के लिए साथ खड़ा होना आसान नहीं होता। विशेष वर्ग ने जिस समझदारी और सहयोग का परिचय दिया, वह निश्चित रूप से सराहनीय है। हादसा भले ही अचानक हुआ, लेकिन उसके बाद दिखाई दिया आपसी भरोसा और सौहार्द का चेहरा उम्मीद जगाता है। इस सकारात्मक भूमिका के लिए विशेष वर्ग को दिल से साधुवाद देकर… हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

बाबा के दरबार में ‘दलाली दर्शन’—भक्त खुश, दलाल पूरे खुश!

बाबा सोमरस के दरबार में इन दिनों दर्शन की एक नई ‘अर्थव्यवस्था’ की चर्चा है। कहा जा रहा है कि एक माननीय के कुछ मुँहलगे समर्थकों पर दलाली का ऐसा रंग चढ़ा है कि अब भक्तों की भीड़ में भी ग्राहक नजर आने लगे हैं। चर्चा है कि तीन-चार कथित दलाल बाकायदा भक्तों की तलाश में रहते हैं—खासकर उन भक्तों की, जिन्हें लंबी लाइन नहीं, जल्दी दर्शन चाहिए। फिर शुरू होता है सौदेबाजी का खेल। सरकारी रसीद दो दिन काटने पर रोक है—शनि और रवि। जिसका फायदा उठाकर रसीद से दुगुना-तिगुना वसूल किया जाता है। फिर FOC के सहारे दबाव बनाकर VIP दर्शन करवाए जाते हैं। यह बात मंदिर के हर कर्मचारी को पता है। फिर भी मंदिर प्रशासन? वह तो इस पूरी पटकथा का सबसे शांत पात्र है। सब पता है, सब दिखता है, मगर कार्रवाई के नाम पर ऐसी ध्यान-साधना कि बाबा भी प्रसन्न हो जाएं! मजेदार बात यह है कि सरकारी व्यवस्था में रसीद की अपनी कीमत है और बाजार में कथित दलाली की अपनी मुंहमांगी दर। यानी भक्ति वही, बाबा वही, दरबार वही… बस दर्शन का रास्ता बदलते ही रेट बदल गया! अब सवाल उठाना भी शायद अपराध हो। क्योंकि जब दलाल सक्रिय हों, व्यवस्था मौन हो और भक्त मजबूर हों— तो सबसे सुरक्षित दर्शन शायद ‘चुप्पी’ के ही होते हैं! और हमारी तो आदत ही है चुप रहना।

मुझे मार दो…! वर्दी ने फिर लगा लिया चुप का ताला

वर्दी के गलियारों से एक दिन ऐसी आवाज बाहर निकली कि सुनने वाले भी कुछ पल के लिए सन्न रह गए—“अब आप मुझे मार दो…” मामला किसी अपराधी का नहीं था, न किसी मुठभेड़ का। एक वरिष्ठ नागरिक किसी बात को लेकर इतने नाराज हुए कि आलाधिकारियों के सामने अपनी पीड़ा कुछ इसी अंदाज में रख दी। बात बिगड़ सकती थी, लेकिन अधिकारियों ने संयम दिखाया, उन्हें शांत किया और मामला वहीं थाम लिया गया। अब असली मजा यहां से शुरू होता है। सवाल उठता है—आखिर वह वरिष्ठजन कौन थे? किस बात से इतने आहत हुए कि बात ‘मार दो’ तक पहुंच गई? बस, यहीं आकर वर्दी अचानक मौन साध लेती है। जरा ज्यादा कुरेदिए तो वर्दी अपने होंठों पर उंगली रखकर इशारा कर देती है—श्श्श… चुप! हमने भी सोचा, आखिर वर्दी की अपनी मजबूरियां होती हैं। हर बात खुलकर नहीं बोली जाती। कुछ बातें फाइलों में दबती हैं, कुछ बैठकों में और कुछ… सीधे ‘चुप्पी’ के खाते में। वैसे वरिष्ठ नागरिक की नाराजगी दूर हो गई, अधिकारी भी संतुष्ट हो गए और मामला शांत हो गया—यह अच्छी बात है। लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है—जब कोई वरिष्ठजन ‘मुझे मार दो’ जैसी बात कहने की नौबत तक पहुंच जाए, तो क्या सिर्फ उन्हें शांत कर देना पर्याप्त है? कारण भी कभी-कभी जानना चाहिए। लेकिन वर्दी चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मेरी पसंद
मेरी कड़वी लेखनी से तुम मेरी पहचान मत करना।
मुझे गुस्सा तो आता है मगर छल- वल नहीं आता।