28 सितम्बर 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का
वर्दी बची, जुबान हार गई… आखिर हटना पड़ा!
राजसी सवारी का दिन था। हरिफाटक ब्रिज पर व्यवस्था संभालने वाली वर्दी और प्रशासन आमने-सामने थे। मामला व्यवस्था का था, लेकिन लगता है किसी ने वर्दी के साथ शब्दों को भी हथियार समझ लिया। फिर क्या था—बात व्यवस्था से निकलकर अभद्रता की चौखट तक जा पहुंची। वर्दीधारी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद उन्हें लगा होगा कि वर्दी पहनते ही आवाज में भी सरकारी अधिकार-पत्र चिपक जाता है। लेकिन इस बार शब्द हवा में उड़कर नहीं गए। बात अल्फा और डेल्टा तक पहुंची, फिर उज्ज्वल जी और कप्तान जी तक। अंदरखाने खबर यह भी कि विकासपुरुष को भी घटनाक्रम का जीवंत प्रसारण सुनाया गया। फिर कहानी ने करवट ली। जिस जुबान ने मौके पर मर्यादा को मात देने की कोशिश की थी, आखिर उसे मैदान से हटना पड़ा। कार्रवाई किसी बाहर वाले ने नहीं, अपने कप्तान जी ने की। और यही बात तारीफ के काबिल है। क्योंकि वर्दी का मतलब यह नहीं कि जुबान को भी बेलगाम लाइसेंस मिल गया। सख्ती व्यवस्था के लिए हो सकती है, वरिष्ठ अधिकारी, नागरिक या सहकर्मी के सम्मान के खिलाफ नहीं। कप्तान ने बता दिया—वर्दी की प्रतिष्ठा बचानी है तो पहले वर्दी की भाषा बचानी होगी। तो हम कप्तान जी को साधुवाद देते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
विकास-भवन में बिग बॉस का नया सीजन: इन्दौरीलाल बने घर के ‘कप्तान’!
टीवी के बिग बॉस में कम से कम नियम तो साफ होते हैं—कैमरा चलता है, झगड़ा होता है, टास्क मिलता है और फिर कोई न कोई घर से बाहर जाता है। लेकिन भरतपुरी के विकास-भवन में चल रहे देसी बिग बॉस का प्रारूप कुछ ज्यादा ही मनोरंजक बताया जा रहा है। यहां नए किरदार आते ही ऐसे सक्रिय हुए हैं, जैसे नियुक्ति-पत्र के साथ “खेलो और खिलाओ” का अलग से प्रशिक्षण भी मिला हो। साम-दाम-दंड-भेद की रणनीतियां चल रही हैं और बीच में हमारे इन्दौरीलाल जी—कप्तान भी, मेजबान भी और सबसे बड़ी मुश्किल से जूझते खिलाड़ी भी! सुबह दफ्तर पहुंचते ही शायद पहला सवाल यही आता होगा—आज किसका मूड खराब है और किसे लॉलीपॉप चाहिए? किसी को पॉलीथिन में चिपका लॉलीपॉप देकर समझाओ, किसी को प्यार से मनाओ और किसी को देखकर ऐसा मुस्कुराओ जैसे घर में सब कुछ बिल्कुल सामान्य हो। मगर भीतर का कैलकुलेटर लगातार चल रहा है—कितने लॉलीपॉप बाकी हैं और कितने खिलाड़ी नाराज? हास्यास्पद स्थिति यह है कि विकास के कामों के लिए बने भवन में इन दिनों सबसे ज्यादा मेहनत शायद एक-दूसरे को साधने में हो रही है। बिग बॉस में कप्तान बदलता है, यहां बेचारे इन्दौरीलाल को हर दिन अपनी कप्तानी बचानी पड़ रही है। अब देखना सिर्फ इतना है कि लॉलीपॉप खत्म पहले होते हैं या धैर्य! तब तक विकास-भवन का शो जारी है… और दर्शक दीर्घा से हमारी आवाज अपनी आदत के अनुसार चुप है।
खाली कुर्सियों पर भीड़ बैठा दी—वाह रे सरकारी भोंपू!
सरकारी प्रेसनोट भी अब कमाल की चीज हो गया है। तस्वीर में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, सामने अभियान का सन्नाटा साफ दिखाई दे रहा है और प्रेसनोट में दावा—“हितग्राहियों की भीड़ उमड़ पड़ी।” यानी कैमरा कुछ और देख रहा है और सरकारी कलम कुछ और लिख रही है। सवाल यह नहीं कि भीड़ कहां गई। असली सवाल यह है कि प्रेसनोट लिखने वाले ने तस्वीर देखी भी थी या नहीं? सरकारी भोंपू का मूल काम है—जो हुआ, उसे सही-सही जनता तक पहुंचाना। लेकिन यहां तो लगता है पहले कहानी लिखी गई, फिर तस्वीर ढूंढकर उसके नीचे चिपका दी गई। तस्वीर ने सरकारी दावे की पोल खोल दी, मगर प्रेसनोट अपनी ही धुन में बजता रहा। घटना खण्ड स्तरीय विश्वास अभियान की है। यह सिर्फ एक गलती नहीं, कार्यशैली का आईना है। क्या प्रेसनोट जारी करने से पहले कोई तथ्य-जांच होती है? क्या तस्वीर और लिखे गए दावे का मिलान करना भी अब अतिरिक्त मेहनत मानी जाने लगी है? या फिर सरकारी प्रचार में वास्तविकता से ज्यादा जरूरी यह दिखाना हो गया है कि हर अभियान सफल, हर कुर्सी भरी और हर कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा? सबसे मजेदार बात यह कि तस्वीर खुद गवाही दे रही है और सरकारी भोंपू फिर भी कह रहा है—“भीड़ थी।” वाह! अब सवाल जनता से नहीं, सरकारी भोंपू की विश्वसनीयता से है। बाकी तस्वीर सामने है…और हमको अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।
पेटी की चोट लगी… तो गोपनीय बैठक में ‘काम बंद’ का ढोल बजा!
सरकारी दफ्तरों में पहले फाइलें चलती थीं, अब लगता है पेटियां चल रही हैं। उम्मीद जी ने पहले 5 पेटी का रास्ता दिखाया, फिर 10 पेटी तक पहुंच गए। ऊपर से इंजीनियरों की तनख्वाह पर भी कैंची चलाने का आदेश—मानो काम की रफ्तार नापने का नया पैमाना “मीटर” नहीं, “पेटी” हो गया हो। अब अंदरखाने की खबर पर भरोसा करें तो सख्ती की गर्मी कहीं और भी पहुंची है। बताया जा रहा है कि उपयंत्री समाज ने किसी गोपनीय ठिकाने पर बैठकर हिसाब-किताब लगाया। सवाल शायद यह रहा होगा—“जुर्माना कितना लगा?” से बड़ा सवाल अब अगला नंबर किसका? बैठक में उम्मीद जी की कार्यशैली पर सवाल उठने और कथित तौर पर यह बात सामने आने की चर्चा है कि अगर यही रवैया जारी रहा तो काम रोकने तक की नौबत आ सकती है। यानी सिंहस्थ की तैयारी में एक नया टेंडर खुल गया—एक तरफ जुर्माना, दूसरी तरफ नाराजगी। उम्मीद जी साफ कह रहे हैं—“काम चाहिए।” उधर बेचारे इंजीनियर शायद मन ही मन पूछ रहे होंगे—काम करें या पहले अपनी जेब बचाएं? मजेदार बात यह कि दोनों तरफ से लक्ष्य विकास ही बताया जा रहा है, लेकिन रास्ते में जुर्माना, वेतन कटौती और गोपनीय बैठक खड़े हैं। अब देखना यह है कि अगली बैठक गोपनीय रहती है या अगला जुर्माना सार्वजनिक होता है। तब तक हम भी ज्यादा कुछ नहीं जानते… और जो जानते हैं, वह चुप हैं! तो फिर हमारा काम ही है आदत के अनुसार चुप रहना।
वीआईपी आए तो स्वागत हुआ… प्रोटोकॉल की जेब रोई!
संकुल के गलियारों में इन दिनों एक नया दुख घूम रहा है—प्रोटोकॉल दुःखी है! वजह कोई काम का दबाव नहीं, बल्कि वीआईपी कल्चर का वह हिसाब है जिसमें मेहमान आते हैं सरकारी शान से और बिल रह जाता है सरकारी खाते में। बताया जा रहा है कि राजधानी तक 3 खोखे का आवेदन गया था, मगर हाथ आए 20 पेटी। ऊपर से पिछली उधारी के दो खोखे और 80 पेटी अभी राजधानी से वसूलने बाकी बताए जाते हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इधर वीआईपी आते हैं तो अकेले कहां आते हैं? साथ में पूरा छोटा-मोटा लाव-लश्कर। अपने प्रभारी बाऊ जी का काफिला तो इस मामले में खासा चर्चित बताया जाता है—दस आएं या बीस, ठहरेंगे वहीं जहां शहर का टॉप होटल हो। अब होटल की पसंद हो, मेन्यू की पसंद हो या ठहरने की पसंद—प्रोटोकॉल बाबू बेचारे किस-किस की पसंद पूछें? मुसीबत यह कि वीआईपी के स्वागत में सरकारी प्रोटोकॉल मुस्कुराता है और सरकारी बजट रोता है। वीआईपी संस्कृति का असली कमाल भी यही है—मेहमान की सुविधा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, चाहे भुगतान की सुविधा बाद में मिले या बिल्कुल न मिले। राजधानी से उधारी वसूलने की फाइल कब निकलेगी, यह तो पता नहीं; मगर अगला वीआईपी कब आएगा, इसका इंतजार शायद प्रोटोकॉल को पहले से रहता है। क्योंकि यहां मेहमान की आवभगत जरूरी है… बस बिल कौन देगा—यह सवाल पूछना प्रोटोकॉल की ड्यूटी में शामिल नहीं है! जिसमें हम क्या कर सकते हैं? बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
“मोह-माया छोड़ो” का प्रवचन… 50 पेटी का नोटिस आते ही माया पकड़ो!
अपने एंग्रीमैन ने इस बार ऐसा अध्याय खोल दिया कि मंगलनाथ से शिवाजी भवन तक चर्चाओं को नया मसाला मिल गया। आश्रम के नाम पर होटल संचालन से जुड़े मामले में जांच बैठी। हिसाब-किताब निकला और तौर पर 50 पेटी का नोटिस थमा दिया गया। बस फिर क्या था—आध्यात्मिक दर्शन का अगला अध्याय शुरू! कल तक ज्ञान था—“धन-माया सब यहीं रह जाएगी।” अब चर्चा है कि 50 पेटी वाली माया कहीं जेब से बाहर न निकल जाए, इसके लिए रास्ते तलाशे जा रहे हैं। वाह रे संसार! प्रवचन में त्याग, नोटिस में हिसाब और हिसाब आते ही माया से मोह! वैसे धर्म के नाम पर चलने वाले किसी भी प्रतिष्ठान के लिए नियम-कायदे कोई सांसारिक बाधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी हैं। यदि जांच में कोई देनदारी निकलती है तो उसका जवाब भी उसी पारदर्शिता से होना चाहिए, जिस पारदर्शिता का उपदेश दूसरों को दिया जाता है। सबसे मजेदार सवाल यही है—अगर मोह-माया इतनी ही व्यर्थ है तो 50 पेटी की चिंता क्यों? कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि रकम इतनी बड़ी नहीं कि संतुलन बिगड़ जाए। मगर शायद असली परेशानी रकम नहीं, नोटिस का दर्शन है। अब प्रवचन और परचेज बिल में कौन भारी पड़ेगा, यह देखना बाकी है। हम तो बस इतना कहेंगे—माया से मोह मत रखिए… और हिसाब से भी नहीं! बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।
अफवाह है या कुर्सी की आहट? एंग्रीमैन के नाम से गलियारों में हलचल!
शिवाजी भवन के गलियारों में इन दिनों हवा कुछ बदली-बदली है। हवा में धूल कम और कुर्सी की चर्चा ज्यादा है। दावा हम नहीं कर रहे, भविष्यवाणी का ठेका भी नहीं लिया। लेकिन कमलप्रेमियों की दबी जुबान अगर किसी एक नाम पर बार-बार जाकर रुक रही है, तो मामला सुनने लायक जरूर है। नाम है—अपने एंग्रीमैन का। चर्चा है कि उन्हें संभाग के दो जिलों में से किसी एक की नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। जिस जिले का नाम सबसे ज्यादा फुसफुसाहट में आ रहा है, उसे हम अपनी भाषा में कहेंगे—आगे जिला, पीछे किला। वहां मैडम लंबे समय से मोर्चा संभाले हैं। दूसरा जिला मां चामुंडा नगरी का बताया जा रहा है। एंग्रीमैन की सख्त कार्यशैली को देखते हुए सवाल भी दिलचस्प है—क्या विकासपुरुष को अब उनकी सख्ती किसी दूसरे जिले में आजमाने का मन हो रहा है? या फिर यह सिर्फ उन गलियारों की कल्पना है जहां हर खाली कुर्सी पर संभावित नाम चिपका दिया जाता है? राजनीति में आदेश आने तक सब चर्चा है और आदेश आते ही वही चर्चा इतिहास बन जाती है। फिलहाल गेंद विकासपुरुष के पाले में बताई जा रही है। हमने हवा सूंघी है..... इसलिए अफवाह को भविष्यवाणी बनाने की जल्दबाजी नहीं करेंगे। कुर्सी की आहट सुनेंगे… लेकिन अपनी आदत के अनुसार बस चुप रहेंगे।
फटाफट जी की फटाफट फाइलें… और अचानक मीठी-मीठी बातें!
दफ्तर में मौसम बदला हो तो पता नहीं चलता, लेकिन अधिकारी की भाषा बदल जाए तो गलियारों में मौसम विभाग तुरंत सक्रिय हो जाता है। इन दिनों अपने फटाफट जी को लेकर यही हो रहा है। गणपति बप्पा की विदाई से पहले मंदिर में कर्मचारियों का भोज हुआ। फटाफट जी पहुंचे, भोजन की तारीफ की और ऊपर से फरमान नहीं, फरमाइश कर दी—ऐसा भोज हर महीने होना चाहिए, सहायक प्रशासक सहयोग करेंगे। अब तक आदेशों की खटपट सुनने वाले कर्मचारियों ने जब यह मधुर संगीत सुना तो कुछ ने शायद चुपके से अपने कान भी छूकर देख लिए होंगे—कहीं सुनने में गलती तो नहीं हुई! किसी को पुराना दोहा याद आ गया—ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय… लेकिन असली मसाला अभी बाकी है। पिछले पंद्रह दिनों में फाइलें भी ऐसी दौड़ी हैं कि बाबुओं को शायद कुर्सी से उठकर फाइल पकड़ने का मौका ही नहीं मिला। सूत्रों ने भी नाम को सार्थक कर दिया—फटाफट जी ने फटाफट फाइल निपटा दी! अब कर्मचारी सोच रहे हैं—भोज में मिठास, बातचीत में मिठास और फाइलों में फटाफट रफ्तार… कहीं मामला सिर्फ हृदय परिवर्तन का तो नहीं? या फिर शिवाजी भवन की तरफ कोई नई कुर्सी मुस्कुराकर बुला रही है? फिलहाल यह सवाल हवा में है। जवाब समय देगा। तब तक फटाफट जी की नई मृदुवाणी का आनंद लेते हुए… हम भी फटाफट अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बोर्ड स्मार्ट निकला, मशीन गायब… वैदिक धोती ने कहा—लगाई ही नहीं!
मंदिर की वैदिक धर्म अध्ययनशाला में इन दिनों शिक्षा से ज्यादा स्मार्ट बोर्ड की गुमशुदगी पढ़ाई जा रही है। बच्चों के लिए सात स्मार्ट बोर्ड लगाए गए। सीएसआर की कृपा से आए इन बोर्डों की कीमत भी कोई मामूली नहीं—करीब डेढ़ पेटी प्रति बोर्ड बताई जा रही है। लेकिन सातों बोर्ड अब ऐसे शांत बैठे हैं, जैसे उन्हें भी ध्यान-साधना में बैठा दिया गया हो। वजह बताई जा रही है—उन्हें चलाने वाली मशीन ही गायब है! अब असली मजा यहां है। वेंडर की तरफ से मशीन की प्राप्ति बताई जा रही है। दूसरी तरफ हमारे वैदिक धोती का ज्ञान सामने आता है—मशीन तो लगाई ही नहीं गई! वाह! एक तरफ आधुनिक स्मार्ट बोर्ड, दूसरी तरफ वैदिक जवाब। लगता है तकनीक और परंपरा के बीच ऐसा संवाद चल रहा है जिसमें मशीन ही बीच से गायब हो गई। अब सवाल यह नहीं कि बोर्ड स्मार्ट है या नहीं। सवाल यह है कि स्मार्ट बोर्ड को स्मार्ट बनाने वाली मशीन आखिर गई कहां? बच्चे शायद बोर्ड देखकर सोच रहे होंगे—इससे पढ़ाई होगी या सिर्फ फोटो खिंचेगी? और वैदिक धोती कह रहे हैं—“मशीन लगी ही नहीं।” वेंडर कह रहा है—“मशीन मिली थी।” अब कौन सही है, यह खोज का विषय है। उम्मीद है फटाफट जी की नई कार्यशैली इस आध्यात्मिक पहेली का समाधान भी फटाफट करेगी। तब तक सात स्मार्ट बोर्ड मौन हैं… और हम अपनी आदत के अनुसार चुप हैं।
700 वाहन आए थे जलवा दिखाने… अब एक सीट भी न मिली!
कभी काफिले में 700 वाहनों का जलवा था। गाड़ियां इतनी कि सड़क छोटी पड़ जाए और स्वागत ऐसा कि लगता था शिक्षा जगत का नया सूरज निकला है। पदभार ग्रहण करने निकले तो सत्ता की चमक ने प्रोटोकॉल को भी पीछे छोड़ दिया। फिर वही काफिला सुर्खियों में आया और जलवा अचानक सवालों में बदल गया। उसके बाद से हमारे पुस्तक वाले नेताजी एकांतवास में हैं। रविवार को विकासपुरुष शहर में आए तो नेताजी ने रिसोर्ट में मुलाकात की। शायद पुराने जलवे की थोड़ी गर्मी बाकी थी। अनुरोध हुआ—“सर, आपकी गाड़ी में बैठने की इजाजत मिल जाए तो…” मगर असली परीक्षा गाड़ी तक पहुंचते ही शुरू हो गई। अपने दालवाले नेताजी बीच में ऐसे खड़े हुए, जैसे सीट नहीं, सत्ता की सीमा-रेखा हो। साफ मना। अब सवाल था—जगह किसे मिले? पुस्तक वाले नेताजी को नहीं मिली, मगर हिमाचली टोपी को सम्मानपूर्वक जगह मिल गई। यानी कभी 700 वाहनों का काफिला था, आज एक सीट की राजनीति है। कभी काफिले में जगह कम पड़ती थी, आज काफिले में जगह है, मगर अपने लिए नहीं। और पुस्तक वाले नेताजी? टोपी ने जगह ले ली, नेताजी ने चुप्पी। तो हमारी भी पुरानी आदत है—जहां नेताजी चुप, वहां हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहते हैं।
उड़नखटोले में आईटी की उड़ान, हेलीपेड पर बढ़ी ‘कयासों’ की गर्मी!
विकासपुरुष जब रविवार को राजधानी लौटने के लिए उड़नखटोले की ओर बढ़े, तो हेलीपेड पर इस बार दृश्य कुछ बदला-बदला नजर आया। अब तक तो इस उड़नखटोले में कमलप्रेमी संगठन के वरिष्ठ चेहरों की ही सीट पक्की मानी जाती थी। लेकिन इस बार आईटी सेल के प्रदेश पदाधिकारी ने भी उड़ान भर ली। बस फिर क्या था... हेलीपेड पर मौजूद कमलप्रेमियों के बीच उड़नखटोले से ज्यादा कयास उड़ने लगे। किसी ने कहा, जमाना डिजिटल है, तो उड़ान भी डिजिटल होनी चाहिए। किसी ने इसे संगठन में आईटी के बढ़ते ‘महत्व’ से जोड़ा। कुछ अनुभवी कमलप्रेमियों ने तो चेहरे पढ़ने की कोशिश भी की—आखिर हेलीपेड पर बैठने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानना था कि सीट किसने दिलाई और संदेश क्या गया? हालांकि असली कहानी क्या है, यह फिलहाल आईटी की फाइलों और विकासपुरुष की उड़ान तक ही सीमित है। आईटी सेल के संयोजक से पूछना भी ऐसा ही है जैसे पासवर्ड पूछकर जवाब में ‘सिस्टम एरर’ मिल जाए। विकासपुरुष तक हमारी पहुंच नहीं और आईटी वाले बोलेंगे नहीं। तो फिर सबसे सुरक्षित हथियार निकालिए—कयास! बाकी सच सामने आए तो खबर बदल जाएगी... फिलहाल तो उड़नखटोला उड़ गया, लेकिन हेलीपेड पर सवाल छोड़ गया! और हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहने पर मजबूर हैं।
जब साँसें फूल गईं… बस की नहीं, सिस्टम की!
शीर्षक पढ़कर पाठक सोच सकते हैं कि कोई दौड़ते-दौड़ते हांफ गया होगा। लेकिन विकासपुरुष का कार्यक्रम हो तो बिना दौड़े भी साँस फूल सकती है—वह भी तब, जब बस पूरे एक मिनट के लिए स्टार्ट होने से मना कर दे! रविवार को महाकाल लोक से विकासपुरुष ने बस को हरी झंडी दिखाई और खुद बस में सवार होकर रिसोर्ट की ओर रवाना हुए। मगर हरी झंडी मिलते ही सबसे आगे की बस ने शायद सोचा—पहले थोड़ा माहौल तो देख लिया जाए! देखने वाले कमलप्रेमियों में चर्चा है कि बस स्टार्ट नहीं हुई। सबसे पहले चालक के हाथ-पांव फूलने की नौबत आई और उसके बाद प्रशासन भी मुहावरे को चरितार्थ करता नजर आया। आखिर कार्यक्रम विकासपुरुष का था। कुछ पल की खामोशी में प्रशासनिक अमले में बेचैनी की गर्मी महसूस होने लगी। फिर बाबा महाकाल की कृपा हुई, बस ने स्टार्ट होकर चलना स्वीकार किया और सबने राहत की साँस ली। अब सच में बस खराब हुई थी, चालक घबराया था या सिर्फ संयोग ने थोड़ा रोमांच पैदा किया—इसका फैसला हम कैसे करें? हमारे कमलप्रेमी तो इसे आँखों देखा हाल बता रहे हैं। और जब कमलप्रेमी दावा कर रहे हों, तो हम कौन होते हैं सवाल उठाने वाले... बस इतना समझना है कि बस एक मिनट नहीं चली थी, लेकिन उस एक मिनट में कई लोगों की धड़कनें जरूर दौड़ गई थीं! यह अटल सत्य है। मगर हमको आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
बंद कमरे में 2028 की कुंडली!
शनिवार की रात विकासपुरुष आए और रविवार सुबह नौ बजे के बाद बैठक जम गई। कमरे में अल्फा जी, उम्मीद जी, डेल्टा जी, उज्ज्वल जी, कप्तान जी, एंग्रीमैन और फटाफट जी थे। इस बार कमलप्रेमी नेताओं को कमरे के बाहर ही रहना पड़ा। करीब 30 से 45 मिनट तक चली इस बैठक में क्या हुआ, यह बाहर बैठे लोगों के लिए उतना ही रहस्य है जितना किसी बंद लिफाफे के अंदर का मजमून। कयास है कि सिंहस्थ-2028 के विकास कार्यों की रफ्तार और रास्ते में खड़ी रुकावटों पर चर्चा हुई होगी। आखिर तारीख नजदीक आ रही है और काम को लेकर कागजों की रफ्तार से ज्यादा जमीन की रफ्तार जरूरी है। लेकिन असली मजा यहां है—बैठक खत्म हुई, अधिकारी बाहर आए और सवालों ने उनका पीछा किया होगा। जवाब मिला या नहीं, यह हम नहीं जानते। वैसे प्रशासनिक गलियारों में एक जवाब बड़ा लोकप्रिय है—“इस पर अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा।” यानी काम की समीक्षा भी हो गई, चिंता भी जत गई और जानकारी भी सुरक्षित रह गई! हमसे कोई पूछे तो हमारा जवाब साफ है—हम अंदर नहीं थे, इसलिए सच नहीं जानते। और जो अंदर थे, वे बोलते नहीं। ऐसे में हमारे पास बचता क्या है? कयास लगाना... और फिर आदत के अनुसार चुप हो जाना!
दुष्यंत का शेर, सियासत का फेर और शिवाजी भवन की खामोशी!
शिवाजी भवन के गलियारों में इन दिनों दुष्यंत कुमार का एक शेर खूब तैर रहा है—“मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम, तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।” ‘मस्लहत-आमेज़’ यानी परिस्थितियों, भविष्य के असर और राजनीतिक हितों को देखकर उठाया गया कदम। दुष्यंत समझाते हैं कि सियासत में हर फैसला उतना सीधा नहीं होता, जितना वह बाहर से दिखाई देता है। जो कदम आज सामान्य लगे, उसके पीछे कल की कोई रणनीति भी हो सकती है। अब इसी शेर को शिवाजी भवन के हालिया घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। शपथ-विधि समारोह में प्रथम सेवक को आमंत्रण गया, लेकिन वे नजर नहीं आए। वजह तबीयत नासाज होना बताई गई। बस, इसके बाद शेर को जैसे पंख लग गए। किसी ने कहा—बीमारी ही वजह होगी। किसी ने कहा—सियासत में कारण हमेशा एक नहीं होते। और कुछ कमलप्रेमियों ने तो दुष्यंत को ही व्याख्याकार बना दिया। फिर भी सियासत का मजा यही है—एक खाली कुर्सी भी कहानी बन जाती है और एक शेर उसकी पटकथा! हम न कुर्सी से पूछ सकते हैं, न जुबान पकड़ सकते हैं। इसलिए दुष्यंत को सलाम और हमारी पुरानी नीति कायम—जो समझ आए, उसे समझिए... जो न समझ आए, उस पर अपनी आदत के अनुसार चुप रहिए।
मेरी पसंद
तन्हाई से जो चोंके कभी खुद को पुकारा।
खामोशी से ख़बराये कभी जंजीर हिला दी।
अब्बास कमर