12 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का
ढाई पेटी का खेल! वसूली की दुकान खुली, फोन आया तो रकम वापस!!
शीर्षक पढ़कर उधारी की वापसी या काम नहीं होने पर रकम लौटाने का भ्रम हो सकता है। मगर इन्दौरी गलियारों में तैरती चर्चा कुछ और ही कहानी सुना रही है। मामला कथित वसूली का है, वह भी खाकी की चौकी में! बताते हैं कि किराने के सामान से लदा ट्रक एक चौकी प्रभारी और उनके शागिर्द के हत्थे चढ़ गया। ट्रक और ड्राइवर को अपने इलाके में लाकर पहले खातिरदारी हुई। फिर रात में ही देवी अहिल्या नगरी से मालिक को तलब कर लिया गया। घड़ी में रात के ढाई बजे थे और कथित तौर पर ढाई पेटी का हिसाब-किताब भी निपट गया! कमाल देखिए, चौकी में वन स्टार और उनके शागिर्द ने ऐसा खेल किया कि तीन स्टारधारी को भनक तक नहीं लगी। मगर व्यापारी ने देवी अहिल्या नगरी के पंजप्रेमी नेता तक बात पहुंचा दी। बस, ऊपर फोन घनघनाए और खाकी के गलियारों में हड़कंप मच गया। इन्दौरी सूत्रों की मानें तो कथित वसूली करने वाले के होश उड़ गए। आनन-फानन में ढाई पेटी वापस हुई, तब जाकर मामला ठंडा पड़ा। अब चौकी प्रभारी की खामोशी भी चर्चा का विषय है। सवाल बस इतना है—कानून की रखवाली करने वाली वर्दी में अगर वसूली की शिकायत उठे, तो उसकी जांच कौन करेगा? और रकम लौट जाना ही क्या जवाबदेही का प्रमाण है? बहरहाल, चर्चा है, पुष्टि नहीं। इसलिए हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
नमस्ते से भी परहेज! चेतावनी का ऐसा असर कि ऑडिट में बाल की खाल निकलने लगी!!
सिंहस्थ 2028 के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर उम्मीद जी, उज्ज्वल जी और एंग्रीमैन की चिंता समझ में आती है। आखिर मामला बाबा महाकाल की नगरी का है। निर्माण में जरा-सी लापरवाही भी लाखों श्रद्धालुओं की परेशानी बन सकती है। मगर उम्मीद जी की चिंता कुछ ज्यादा ही गहरी है। तभी तो केंद्र से आई थर्ड पार्टी ऑडिट टीम के अधिकारी को ऐसी चेतावनी दे दी कि किसी भी एजेंसी के अधिकारी या ठेकेदार के साथ दिखाई दिए, तो अनुबंध भूल जाना और रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए तैयार रहना। बस फिर क्या था! चेतावनी का असर ऐसा हुआ कि अब संबंधित अधिकारी एजेंसी के अफसरों के नमस्ते का जवाब देने से भी परहेज कर रहे हैं। मेल-मिलाप तो दूर, नजरें मिलाने में भी शायद ऑडिट की निष्पक्षता खतरे में नजर आने लगी है। अच्छा है! कम से कम ऑडिट में अब बाल की खाल निकल रही है। निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे, खामियां पकड़ में आएंगी और जिम्मेदारों को जवाब भी देना पड़ सकता है। उम्मीद जी की इस सख्ती को हमारा साधुवाद। बस एक छोटी-सी उम्मीद और है— ऑडिट की रिपोर्ट में चेतावनी की गूंज ही नहीं, निर्माण की हकीकत भी सुनाई दे। क्योंकि सिंहस्थ में श्रद्धालु नमस्ते का जवाब नहीं, सुरक्षित सड़कें और टिकाऊ निर्माण चाहते हैं। बाकी, उम्मीद जी की चेतावनी का असर देखकर हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
कमाई का तंबू, गोपनीयता की चादर!
सिंहस्थ के तंबू लगने में अभी वक्त है। मगर अपने एक दो सितारा वर्दीधारी ने अभी से अलग तंबू तान लिया है। फर्क इतना है कि यह तंबू श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि अपने कथित गोपनीय कामकाज के लिए लगाया गया है। टीन की चादरों से बनी इस खास व्यवस्था का ठिकाना एक कंटेनर के पास बताया जा रहा है। हैरानी यह कि जिस वर्दी स्टेशन को किराए पर लिया गया है, वहां बैठने की जगह भी है। मगर वहां काम करेंगे तो दीवारों को भी भनक लग सकती है। लिहाजा अलग इंतजाम बेहतर समझा गया! अब गोपनीयता इतनी जरूरी हो तो खुले दफ्तर की चारदीवारी भला किस काम की? इस पूरे किस्से में असली मजेदार मोड़ यह है कि स्टेशन के प्रभारी और तंबू तानने वाले वर्दीधारी बैचमेट हैं। प्रभारी जी को उनके साथी संतोषी स्वभाव का बताते हैं। उधर, तंबू वाले साहब की जेब और भूख को लेकर स्टेशन के दूसरे वर्दीधारियों में चर्चाएं गर्म हैं। अब जेब किसकी कितनी गहरी है और भूख किसकी कितनी बड़ी, यह तो जांच का विषय है। हम किसी की नीयत पर फैसला सुनाने वाले कौन होते हैं? लेकिन सवाल तो बनता है कि सरकारी वर्दी में निजी तंबू की जरूरत आखिर क्यों आन पड़ी? फिलहाल, तंबू तन चुका है। गोपनीयता की चादर भी पड़ चुकी है। अब देखना यह है कि इस तंबू में सिर्फ काम होता है या कोई और खेल भी चलता है। हम तो बस सुन रहे हैं, देख रहे हैं। किसी की जुबान पकड़ना हमारे बस में नहीं। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
तलाई की जमीन पर क्रेशर का राज, ग्रामीणों की फरियाद पर कौन-सा ताला!
विकासपुरुष पूरे प्रदेश की जनता को परेशानी से बचाने के जतन में जुटे हैं। मगर उनके अपने गृहनगर की ग्रामीण जनता है कि संकुल के चक्कर काटते-काटते थक गई। आवेदन पर आवेदन दिए, गुहार पर गुहार लगाई, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक उनकी समस्या का ताला अब तक नहीं खुला। मामला तलाई के लिए आरक्षित जमीन पर क्रेशर लगाकर उत्खनन करने और ग्रामीणों का रास्ता बंद होने से जुड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना वैध लीज के उत्खनन हो रहा है। यदि आरोप सही हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि नियम-कायदों की किताब आखिर किस दिन खुलने का इंतजार कर रही है? और तो और, ग्रामीणों की मानें तो इस मामले में कोई कमलप्रेमी नहीं, बल्कि पंजाप्रेमी नेताजी का दबदबा चर्चा में है। वही नेताजी, जिन्हें उनके इलाके में हवाई फायर नेताजी कहकर पुकारा जाता है। अब यह नाम उनके राजनीतिक अंदाज का है या रसूख का, यह तो वही जानें। मगर ग्रामीणों की परेशानी किसी उपनाम से दूर होने वाली नहीं। उनकी मांग सीधी है—रास्ता खुलवाइए, उत्खनन की वैधता जांचिए और तलाई की जमीन को उसके निर्धारित उपयोग के लिए सुरक्षित रखिए। ग्रामीणों ने हमसे कहा था कि उनकी आवाज विकासपुरुष तक पहुंचा दें। हमने अपना काम कर दिया। अब देखना यह है कि गृहनगर की इस पुकार पर कार्रवाई होती है या आवेदन फाइलों में ही रास्ता तलाशते रह जाते हैं। फैसला विकासपुरुष को लेना है। और हमको अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।
सिंहस्थ नहीं, सत्ता का सिंहासन! बिरयानी नेताजी ने अभी से बांस चढ़ाना शुरू किया
पंजाप्रेमी नेताओं में दबी जुबान से बोला जा रहा है—2028, 2028। जिसे सुनकर हमको लगा कि बात सिंहस्थ की तैयारियों को लेकर होगी। मगर जब बात की तह में गए, तो पता चला कि 2028 का मतलब सिंहस्थ नहीं, बल्कि पंजाप्रेमियों की चुनावी बिसात है, जहां बिरयानी नेताजी ने अभी से अपनी गोटियां चलानी शुरू कर दी हैं। निशाने पर हैं चरणलाल जी। चर्चा है कि इस बार उनकी नजर नई विधानसभा पर है। बस, यही बात बिरयानी नेताजी को रास नहीं आ रही। सो, अपने तकिया कलाम के मुताबिक बांस पर बांस चढ़ाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इस सियासी शतरंज में एक उभरती पंजाप्रेमी नेत्री को मोहरा नहीं, बल्कि संभावित चाल के रूप में देखा जा रहा है। इन दिनों वे टॉवर पर धरना दे रही हैं। चर्चा है कि उनके समर्थन में बिरयानी नेताजी युवाओं और पंजाप्रेमी नेताओं को फोन लगाकर टॉवर पहुंचने की अपील कर रहे हैं। करीबियों की मानें तो नेत्री उसी नई विधानसभा क्षेत्र की निवासी हैं, जहां चरणलाल जी की चुनावी महत्वाकांक्षा चर्चा में है। ऐसे में धरने का समर्थन सामाजिक सरोकार है या सियासी जमीन तैयार करने की कवायद—यह सवाल तो उठेगा ही! चरणलाल जी को भी समझना होगा कि चुनाव सिर्फ टिकट की चाह से नहीं, समीकरणों से जीते जाते हैं। उधर बिरयानी नेताजी की निगाहें अभी से बिसात पर हैं। लेकिन उनकी चाल कितनी सफल होगी, यह वक्त बताएगा। फिलहाल बांस चढ़ रहे हैं, फोन घनघना रहे हैं और 2028 दूर से मुस्करा रहा है। जीत किसकी होगी, यह भविष्य के गर्भ में है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पहले दिखाई हेकड़ी, फिर याद आई इज्जत! आखिर मान ही गए चरणलाल जी!!
पंजाप्रेमी राजा जी की सनातन यात्रा शुरू होने वाली है। तैयारियों को लेकर 23 तारीख को उनके निजसचिव जी भी पधारे थे। मकसद साफ था—कौन नेता क्या जिम्मेदारी संभालेगा, कहां मंच लगेगा और स्वागत-सत्कार की व्यवस्था कैसे होगी। मगर अपने चरणलाल जी तो उस वक्त अलग ही रौ में थे। अपनी विधानसभा में यात्रा के मंचों पर चर्चा करने आए निजसचिव जी को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा। अब इसे आत्मविश्वास कहें या कुछ ज्यादा ही हवा में उड़ना, यह तो चरणलाल जी ही जानें! नतीजा यह हुआ कि निजसचिव जी ने भी देर नहीं लगाई। संबंधित विधानसभा की जिम्मेदारी दाल-बिस्किट तहसील के पंजाप्रेमी पहलवान को सौंपी और चलते बने। यानी जिस इलाके में चरणलाल जी की चलती है, वहां की यात्रा व्यवस्था किसी और के हवाले! अब जाकर चरणलाल जी को अहसास हुआ कि सियासत में कभी-कभी एक छोटी-सी बेरुखी भी भारी पड़ जाती है। फिर ऊपर तक धौक लगाई गई, इज्जत का वास्ता दिया गया। चर्चाओं के मुताबिक, आखिरकार मंच और स्वागत-सत्कार की अनुमति मिल ही गई। लेकिन कहानी में ट्विस्ट बाकी है। पंजाप्रेमी पहलवान को अब उज्जैन नगर में स्वागत की जिम्मेदारी मिलने की चर्चा है। सियासत भी गजब है! पहले तवज्जो नहीं, फिर मान-मनुहार और आखिर में समझौता। राजा जी की यात्रा से पहले ही नेताओं की प्रतिष्ठा की यात्रा शुरू हो गई। बाकी, पंजाप्रेमी जो बता रहे हैं, वह सच ही होगा। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
भले जहर खाकर लाओ… उधारीलाल जी की बधाई ने पुराना हिसाब जगा दिया!
सोशल मीडिया पर बधाई देना अच्छी बात है। मगर कभी-कभी एक पोस्ट पुराने किस्सों की ऐसी पोटली खोल देती है कि पढ़ने-सुनने वालों के चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। अपने उधारीलाल जी इन दिनों कमलप्रेमी हैं। विकासपुरुष की कृपादृष्टि से एक संस्था के मुखिया भी हैं। हाल ही में उन्होंने अपने साथ 18 घंटे रहने वाले शख्स को चारधाम यात्रा से लौटने पर शुभकामनाएं दीं। पोस्ट सार्वजनिक हुई तो पुराने पंजाप्रेमियों की याददाश्त भी अचानक चार्ज हो गई। किस्सा उस दौर का है, जब उधारीलाल जी पंजाप्रेमी हुआ करते थे। बताते हैं कि एक दिन वाहन में साथ बैठे सज्जन ने उनसे अपनी उधारी का तकाजा करते हुए फरमाया था—“मुझे मेरी उधारी आज ही चाहिए, भले जहर खाकर लाओ!” कहते हैं, यह सुनकर उधारीलाल जी वाहन से उतरे और अपने संकटमोचक राणा को फोन लगाकर दुखड़ा सुनाया। उस वक्त मामला शांत हो गया था। समय का पहिया घूमता है। अब चारधाम यात्रा में उधारी का तकाजा करने वाले और संकटमोचक राणा दोनों साथ पुण्य कमाकर लौटे। उधर उधारीलाल जी की बधाई वाली पोस्ट ने पुराने साथियों को किस्सा दोहराने का मौका दे दिया। अब सवाल यह नहीं कि उधारी कितनी थी। सवाल यह है कि रिश्ते बदल जाएं, दल बदल जाएं, पद बदल जाएं, मगर पुराने तकाजे यादों से इतनी जल्दी कहां मिटते हैं! हमने भी किस्सा सुना और पाठकों तक पहुंचा दिया। बाकी, उधारी का हिसाब उनका, जिससे हमारा क्या लेना-देना। हमारा तो काम है अपनी आदत के अनुसार चुप रहना।
कागजों में ठेकेदारों के सरताज, जेब में चवन्नी नहीं—उपयंत्री जी बने ‘कंगलाराम’!
वाह रे विभागीय व्यवस्था! सिंहस्थ 2028 के करीब एक दर्जन बड़े-बड़े काम कागजों पर एक उपयंत्री के नाम दर्ज हैं। फाइलें देखिए तो लगता है, साहब के इशारे पर खोखों की दुनिया चलती है। मगर विभागीय गलियारों की चर्चाएं सुनिए तो तस्वीर उलटी है। अपने ही करीबी उन्हें कथित तौर पर ‘कड़केराम’ कहकर बुलाते हैं। यानी कागजों पर कामों का अंबार, लेकिन जेब की हालत पर सन्नाटा बरकरार! चर्चाएं तो यहां तक हैं कि काम नाम से इनके दर्ज हैं, मगर पर्दे के पीछे की पटकथा कोई और लिख रहा है। ठेकेदारों की कृपा हो जाए तो कभी-कभार हड्डी का टुकड़ा नसीब हो जाता है। अब इसे उपयंत्री की बदकिस्मती कहें या विभागीय व्यवस्था का कमाल। बोर्ड पर नाम अपना, बिसात पर चाल किसी और की! उधर, बाहर से आने वाले वीआईपी के ठहरने की व्यवस्था का जिम्मा भी साहब के कंधों पर है। उम्मीद की कोई छोटी-मोटी खिड़की खुले भी, तो फोन पर आने वाली फरमाइशें उसे तुरंत बंद कर देती हैं। साहब की हालत ऐसी कि जिम्मेदारियों का वजन पूरा, मगर राहत का वजन शून्य! इसीलिए चर्चाओं में नया खिताब उछल रहा है—कागजों के ‘खोखाराम’, हकीकत के ‘कंगलाराम’! साहब अपनी पीड़ा कई जगह सुना चुके हैं, मगर विभाग में खामोशी का ऐसा अनुशासन है कि दीवारें भी सुनकर चुप रहती हैं। तो फिर हमारा तो काम ही है आदत के अनुसार चुप रहना।
आपका नाम क्या है… बाकी आप सब तो जाने-पहचाने हैं!
शनिवार को दताना के रिसोर्ट में पंजाप्रेमी नेताजी के स्वागत का शानदार इंतजाम था। पंजाप्रेमी नेताओं का जमावड़ा था। नेताजी विपक्ष का मार्गदर्शन करते हैं, इसलिए उनके दीदार के लिए लंबा इंतजार भी करना पड़ा। आखिरकार नेताजी पधारे तो महफिल में रौनक आ गई। मगर असली नजारा तब बना, जब मौजूद नेताओं की भीड़ में उनकी नजर एकमात्र पंजाप्रेमी नेत्री पर पड़ी। नेताजी ने बड़े अपनत्व से उनका परिचय पूछा—‘आपका नाम क्या है?’ बस, इतना सुनना था कि वहां मौजूद बाकी पंजाप्रेमियों के दिल में अरमानों की घंटियां बजने लगीं। मन ही मन सोचने लगे—काश! नेताजी हमसे भी पूछ लेते कि भाई, आपका शुभ नाम क्या है? हम भी तो स्वागत में हाजिर हैं। कोई गुमनाम चेहरे तो नहीं! अब इसमें नेताजी का क्या कसूर? नजर जहां ठहर गई, सवाल वहीं हो गया। मगर राजनीति में एक सवाल भी कई सवाल खड़े कर देता है। क्या बाकी चेहरे इतने पुराने और पहचाने हुए थे कि परिचय की जरूरत ही नहीं पड़ी? या फिर नेत्री जी की मौजूदगी ने बाकी जमावड़े को कुछ देर के लिए पृष्ठभूमि में धकेल दिया? पंजाप्रेमियों की इस मन की पीड़ा में दम तो है। स्वागत सबने किया, इंतजार सबने किया, मगर नाम पूछने का सौभाग्य एक ही के हिस्से आया! जिसके बाद कई पंजाप्रेमी नाम पूछने की इस घटना को अलग-अलग तरीकों से पेश कर रहे हैं। इसमें हम क्या कर सकते हैं? बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
रेलिंग गई तेल लेने, भरोसा महामंगल के हवाले!
यह बात किसी शोध की मोहताज नहीं है कि वर्षा ऋतु विदा हो चुकी है और शारदीय नवरात्रि में श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई है। कायदे से बरसात में हटाई गई पुल-पुलियाओं की रेलिंग वापस लग जानी चाहिए थी। पर अपने जिम्मेदारों की कार्यशैली भी गजब है। कैलेंडर में मौसम बदल गया, त्योहार आ गया, भीड़ उमड़ पड़ी, मगर रेलिंग लगाने की याद नहीं आई! शनिवार को मंगलनाथ से सिद्धवट जाने वाले पुल पर श्रद्धालुओं की भीड़ थी। बताया जा रहा है कि इस बार भीड़ हर साल से ज्यादा थी। लेकिन सुरक्षा के नाम पर रेलिंग नदारद! अब सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग को किसी हादसे का इंतजार था? या फिर फाइलों में रेलिंग लग चुकी है और जमीन पर उसका इंतजार जारी है? जिस विभाग के जिम्मे यह काम है, उसकी कार्यशैली देखकर लगता है कि समय पर काम करने की कला से ज्यादा महारत काम को टालने में हासिल है। गनीमत रही कि शनिवार को कोई हादसा नहीं हुआ। श्रद्धालु सुरक्षित निकल गए। अब इसका श्रेय समय रहते जागे विभाग को तो दिया नहीं जा सकता। सो, महामंगल की कृपा को ही प्रणाम! मगर एक सवाल बाकी है— क्या पुलों पर रेलिंग लगवाने के लिए भी अब महामंगल को ही ठेका देना पड़ेगा? यह फैसला अपने पाठकगण खुद कर लें, क्योंकि हमको तो आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
सिंहस्थ बाद फीता काटना... या गुणवत्ता की भी परीक्षा होगी!
समीक्षा बैठक में अपने हिटलर जी की नजरें टेढ़ी हुईं। निशाने पर दो विभाग थे। एक सड़क वाला, दूसरा जल वाला। सवाल भी ऐसा कि गलियारों में बैठे जिम्मेदारों के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाए। दताना से नागझिरी तक आठ किलोमीटर सड़क बननी है। पहले 26 जनवरी को श्रीगणेश की बात हुई। फिर होली आई, फिर 15 अगस्त भी निकल गया। अब साल खत्म होने में करीब 80 दिन बाकी हैं। सड़क का श्रीगणेश कब होगा, यह बताने के बजाय तारीखें ही अपनी उम्र बढ़ाती जा रही हैं। तभी हिटलर जी को पूछना पड़ा क्या सड़क की ओपनिंग सिंहस्थ 2028 के बाद कराने का इरादा है? सवाल सड़क का है, मगर चोट पूरी कार्यशैली पर है। तारीख पर तारीख देने वालों को शायद यह समझ ही नहीं आ रहा कि सिंहस्थ कोई सरकारी फाइल नहीं, जिसे मनचाही तारीख तक दबाकर रखा जा सके। यहां लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही, सुरक्षा और सुविधा का सवाल है। सड़क समय पर नहीं बनी तो फीता काटने का कार्यक्रम भी क्या श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर तय होगा? अब आते हैं विकासपुरुष के ड्रीम प्रोजेक्ट सेवरखेड़ी पर। उम्मीद थी कि जल संकट से मुक्ति का सपना आकार लेगा। इस साल डैम में 75 प्रतिशत पानी भरने का लक्ष्य बताया गया था। लेकिन काम की चाल देखकर लगता है कि मंजिल सामने है और कदम पीछे लौटने में व्यस्त हैं। दो कदम आगे, चार कदम पीछे! बड़ा सवाल सिर्फ पानी भरने का नहीं, गुणवत्ता का भी है। डैम जैसे महत्वपूर्ण निर्माण में निर्धारित तकनीकी परीक्षण, संरचनात्मक सुरक्षा और गुणवत्ता की जांच को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यदि परीक्षण और जलभराव की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होती, तो सिंहस्थ के पहले इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठेंगे ही। आखिर ऐसे प्रोजेक्ट का उद्देश्य सिर्फ निर्माण पूरा दिखाना नहीं, लंबे समय तक सुरक्षित और भरोसेमंद सुविधा देना भी है। अपने हिटलर जी ने नाराजगी जताई, सवाल दागे। अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि नाराजगी के बाद अगला कदम क्या होगा? समयसीमा चूकने पर जवाबदेही किसकी तय होगी? ठेकेदार पर कार्रवाई होगी, जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा या फिर अगली समीक्षा में वही पुरानी कहानी नए शब्दों में सुना दी जाएगी? विभागीय गलियारों में काम की रफ्तार और जिम्मेदारी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। मगर चर्चा से निर्माण पूरा नहीं होता, न ही गुणवत्ता प्रमाणित होती है। जरूरत है स्पष्ट समयसीमा, नियमित तकनीकी परीक्षण और जिम्मेदारों की ठोस जवाबदेही की। क्योंकि सिंहस्थ की तारीख तय है। श्रद्धालु तारीख बदलकर नहीं आएंगे। बदलना है तो विभागों को अपनी चाल बदलनी होगी। वरना इतिहास में यह दर्ज होगा कि सिंहस्थ के लिए सड़क और डैम तो बन रहे थे, मगर विभागों की कार्यशैली अपनी ही गति से चल रही थी। अब हमको तो अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाना है। लेकिन हिटलर जी के सवाल का जवाब विभागों को देना ही पड़ेगा— ओपनिंग सिंहस्थ से पहले होगी या फीता काटने के लिए भी अगला सिंहस्थ देखना पड़ेगा?
छोटे CM साहब! प्रोटोकॉल में CM, जवाबदेही में कौन?
अपने विकासपुरुष को अपने पद का उतना गुमान नहीं होगा, जितना संकुल में पदस्थ छोटे CM साहब को होने की चर्चा है। स्वजातीय सरनेम के चलते संकुल में इन्हें छोटे CM कहकर पुकारा जाता है। चाचा विकास भवन में विकास की गंगा बहा रहे हैं और छोटे CM साहब प्रोटोकॉल की दुनिया में अपनी अलग सरकार चला रहे हैं! कहानी उम्मीद जी के एक पॉइंट से शुरू होती है। उज्ज्वल जी ने अपने अट्टू जी के जरिए मामला छोटे CM साहब तक पहुंचाया। मगर चर्चा है कि साहब ने उसे अपनी मर्जी के हिसाब से लिया। नतीजा यह हुआ कि पॉइंट बिगड़ा और आपत्ति उम्मीद जी तक जा पहुंची। वहां से मामला उज्ज्वल जी के दरबार में पहुंचा। फिर क्या था! गलियारों में चर्चा है कि उज्ज्वल जी ने अट्टू जी से जवाब-तलब किया और छोटे CM साहब को बुलाकर कार्यशैली पर जमकर फटकार लगाई। साथ ही नोटिस देने की बात भी कही जा रही है। अब छोटे CM साहब को शायद एहसास हो रहा होगा कि सरकारी कुर्सी पर बैठना और सरकारी प्रक्रिया का पालन करना दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। प्रोटोकॉल पद की गरिमा बढ़ाता है, मनमर्जी की छूट नहीं देता। फिलहाल सवाल यही है कि छोटे CM साहब को नोटिस मिलेगा या मामला भी प्रोटोकॉल में उलझकर रह जाएगा? क्योंकि... कुर्सी छोटी हो या बड़ी, जवाबदेही से बड़ी नहीं होती! बाकी फैसला अपने उज्ज्वल जी को करना है और हमको अपनी आदत के अनुसार बस चुप रहना है।
बहानों के इंजीनियरों सुन लो! अब सीधे सस्पेंशन का शटर गिरेगा!
उम्मीद जी की तीसरी पारी में लगता है मातहतों की मौज-मस्ती पर ग्रहण लगने लगा है। पिछली दो पारियों में साहब का मिजाज नरम रहा, तो अफसरशाही ने शायद इसे स्थायी छूट समझ लिया। लेकिन अब सिंहस्थ 2028 सिर पर है और निर्माण की रफ्तार ऐसी कि फाइलें दौड़ रही हैं, काम हांफ रहा है! हफ्ते में दो दिन समीक्षा, एक दिन समन्वय बैठक। यानी बैठकों का कैलेंडर फुल, मगर जमीन पर प्रगति का कॉलम खाली! कान्ह के काम में पानी को रुकावट बताकर विभागीय साहब ने ऐसी सफाई पेश की, मानो निर्माण की जिम्मेदारी निभाना नहीं, बहानों की प्रतियोगिता जीतना उनका लक्ष्य हो। लेकिन इस बार उम्मीद जी का पारा चढ़ गया। दो टूक सुना दिया—कल दौरा कर लेते हैं। कहीं भी काम शुरू होने की गुंजाइश मिली, तो वहीं निलंबित कर दूंगा! यह सुनते ही बहानों के बादशाहों की जुबान पर ताला लग गया। आखिर मौके पर निरीक्षण हो जाए, तो फाइलों में बहती विकास की गंगा और जमीन की सूखी हकीकत का अंतर खुलने का डर जो है! मगर सवाल है—क्या हर काम चेतावनी के इंजेक्शन से ही चलेगा? अफसरों की जवाबदेही तय करने के लिए हर बार गुस्से का दौरा जरूरी है क्या? सिंहस्थ की तारीख तय है, बहानों की नहीं! अब देखना है कि सस्पेंशन की धमकी जमीन पर काम कराती है या अगली बैठक में फिर बहानों का नया संस्करण पेश होता है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रास्ता बंद है... खुदाई के लिए या कप्तान जी के लिए!
बाबा की नगरी में इन दिनों किसी भी रास्ते पर बेरिकेड्स नजर आ जाएं, तो आम जनता को ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं। सीधा अनुमान लगाइए, आगे खुदाई चल रही होगी और रास्ता बंद होगा। विकास का दौर है, थोड़ी परेशानी तो उठानी ही पड़ेगी। मगर रविवार की दोपहर सतीगेट के आगे करीब सौ मीटर दूर एक गली में कुछ अलग ही चर्चा छिड़ गई। यह वही गली है, जहां की सब्जी-पूड़ी के चर्चे दूर तक हैं। अपने कप्तान जी अचानक पहुंच गए। अब भूखे पेट काम कैसे होगा, गोपाला! यह नियम कप्तान जी पर भी लागू होता है। आखिर उन्होंने सब्जी-पूड़ी खाकर कोई गुनाह तो किया नहीं। लेकिन असली चटपटा किस्सा तो इसके आगे है। चर्चा है कि कप्तान जी के पहुंचते ही वर्दी ने गली के दोनों तरफ बेरिकेड्स लगा दिए। अब यह व्यवस्था सुरक्षा के लिहाज से थी या कप्तान जी के सब्जी-पूड़ी प्रेम के चलते आम रास्ते पर अस्थायी विराम लगा, यह तो वर्दी ही जाने। हमने अपनी आंखों से यह नजारा नहीं देखा। हां, वर्दीधारियों के बीच चल रही चर्चाओं को पूरी तरह अनसुना भी नहीं कर सकते। वैसे जनता तो रोज रास्ता बंद देखकर खुदाई समझती है। रविवार को अगर किसी ने सब्जी-पूड़ी की खातिर रास्ता बंद होने का अंदाजा लगाया हो, तो उसे दोष कैसे दें! मगर वर्दीधारी तो यही बोल रहे हैं, मगर खुलकर नहीं, दबी जुबान में। अब इसमें सच कितना और झूठ कितना है, इसका फैसला हम अपने समझदार पाठकों पर छोड़ते हुए, आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
झपकी भर आई थी हुजूर... फिर इतना हंगामा क्यों बरपा!
अपने हाइनेस को सेवा-संकल्प के दौरान झपकी क्या आ गई, सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा बरपा है। हर तरफ उनकी तस्वीरें नजर आ रही हैं। मानो कोई ऐतिहासिक घटना घट गई हो। अरे भैया! झपकी ही तो आई थी, कोई सियासी भूकंप तो नहीं आया था। वैसे अपने कमलप्रेमियों को यह सब कुछ रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि पंजाप्रेमी सरकार के दौर में देश के तत्कालीन मुखिया को भी अक्सर झपकी लेते देखा गया था। फिल्म संजू में भी ऐसा दृश्य दिखाया गया है। तब इतनी तस्वीरें और इतनी चर्चा क्यों नहीं हुई थी? यह सवाल हम नहीं, बल्कि अपने कमलप्रेमी उठा रहे हैं। अब अपने हाइनेस की झपकी पर इतना बवाल क्यों? खैर, अपने हाइनेस की झपकी के पीछे दो संभावनाएं हो सकती हैं। पहली यह कि शायद पिछली रात देर तक जागते रहे होंगे। आखिर जिम्मेदारियां भी तो कम नहीं हैं। दूसरी संभावना यह कि देश के मुखिया का संबोधन इतना लंबा हो गया कि सुनते-सुनते पलकें बोझिल हो गई होंगी। मगर असली वजह क्या थी, यह तो अपने हाइनेस ही बता सकते हैं। उनके दिल में क्या था और दिमाग में क्या चल रहा था, इसका खुलासा तो वही कर सकते हैं। वैसे एक सवाल जरूर है। अपने ही नेता के भाषण में झपकी लग जाए तो खबर बनती है, लेकिन अगर अपने हाइनेस को यह भाषण सुनते-सुनते नींद आने लगी, तो उसे कौन-सी श्रेणी में रखेंगे? इस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है। इसलिए जवाब तलाशने के बजाय हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद....
ये दुनियां है यहाँ थोड़ी मक्कारी जरूरी है।
भले रोजा न रखो मगर अफ्तारी जरूरी है।