26 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का
मैं यहीं का रहने वाला हूँ… फिर भी सड़क नहीं देखी!
अफसरशाही को अपने मामा जी के कार्यकाल की आदत पड़ गई है। फाइल चलती रहे, बैठक होती रहे और विकास अपनी गति से चलता रहे। लेकिन अब विकासपुरुष हैं। जिन्हें सवाल पूछने से पहले जवाब पता होता है। सिंहस्थ 2028 की समीक्षा में उन्होंने पूछा कि नेता और अधिकारी में अंतर क्या है? सब चुप। फिर खुद ही समझाया। अधिकारी दूर की सोचता है, नेता चाहता है कि भूमि पूजन, शिलान्यास और लोकार्पण जल्दी हो। बात आगे बढ़ी तो पूछा, ऐसे कितने काम हैं जो लोकार्पण की सूची में आ सकते हैं? सूची सामने आई। तब राजधानी से आए विभाग के मुखिया एसीएस ने उज्जैन-इंदौर सिक्स लेन के लोकार्पण की ओर इशारा किया। बस, विकासपुरुष बोल पड़े— मैं यहीं का रहने वाला हूँ। जरा महामृत्युंजय द्वार की तरफ घूमकर आओ, फिर लोकार्पण की बात करना। सवाल सिक्स लेन का नहीं, कार्यशैली का था। जिस सड़क पर रोजमर्रा की हकीकत दिखाई देती है, उसे देखे बिना लोकार्पण की तारीख कैसे तय हो सकती है? फाइल में प्रगति और जमीन पर स्थिति के बीच का अंतर आखिर कौन बताएगा? बैठक में सब चुप थे। शायद पहली बार किसी ने फोल्डर के पन्नों से बाहर निकलकर सड़क का सच पूछ लिया था।जिसमें हम आखिर क्या कर सकते है। अपने शहर के चप्पे चप्पे की जानकारी रखना विकासपुरुष की पुरानी आदत है। जो अफसरशाही अभी तक समझ नहीं पाई है। तो हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
द्रोणाचार्य–द्रुपद की कहानी… कहीं दोस्ती का हिसाब तो नहीं!
इतिहास, धर्म और विज्ञान का अनंत ज्ञान अपने विकासपुरुष के पास है। मौका मिले तो ज्ञान की गंगा बहती है। मगर कमलप्रेमियों का कहना है कि उनकी हर कहानी में कोई न कोई संदेश जरूर छिपा होता है। पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम में द्रोणाचार्य और द्रुपद की मित्रता का इतिहास सुनाया। बचपन की दोस्ती, आधा राज्य देने का वादा और राजा बनने के बाद मित्र को पहचानने से इनकार। फिर द्रोणाचार्य ने अर्जुन से द्रुपद को हरवाया। आधा राज्य लिया और आधा लौटा दिया। अब कहानी तो इतिहास की थी, लेकिन चर्चा वर्तमान की होने लगी। कमलप्रेमी अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक अर्थ निकाल रहे हैं। कोई पुराने वादों की याद बता रहा है, तो कोई दोस्ती में बराबरी का संदेश खोज रहा है। कुछ को लगता है कि राजनीति में वादा याद रखना चाहिए, लेकिन कुर्सी मिलने के बाद दोस्ती का गणित बदल जाता है। जिस संस्था में कहानी सुनाई गई, वहां फिलहाल खामोशी है। विकासपुरुष ने किसके लिए, किस इशारे से इतिहास सुनाया… यह तो वही जानें। हम तो इतना ही कहेंगे—इतिहास पढ़िए, वर्तमान समझिए और भविष्य के संकेत खोजिए। बाकी, जब कहानी सुनने वाले चुप है, तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
अनुमति तीन हजारी… माननीय भी हुए सावधान!
मंदिर में अनुमति का खेल बड़ा निराला है। अब तक चर्चा थी कि दलालों से सेटिंग हो तो अनुमति मिल ही जाती है। बस जेब का वजन थोड़ा कम होना चाहिए। मगर इस बार दलालों ने माननीय के घर तक दस्तक दे दी। करीबी रिश्तेदार के जरिए अनुमति के पॉइंट होटल संचालक तक पहुंचे। संचालक को शक हुआ। सीधे पार्टी से पूछ लिया। जवाब मिला— प्रति अनुमति तीन हजारी दिए हैं। बात होटल संचालक सचिव से माननीय तक पहुंची। रिश्तेदार से पूछताछ हुई तो जवाब मिला—मुझे क्या पता, ऐसा भी धंधा होता है! अब माननीय छाछ भी फूंक-फूंककर पी रहे हैं। सावधानी के लिए बधाई। मगर सवाल यह है कि अनुमति के इस कारोबार में केवल रिश्तेदार ही जिम्मेदार हैं या व्यवस्था में भी कोई खिड़की खुली है? होटल संचालक को लेकर भी कमलप्रेमियों और मंदिर के गलियारों में चर्चाएं हैं। जनचर्चा अपनी जगह, सच अपनी जगह। माननीय को सावधानी मुबारक… बाकी दूध का हिसाब व्यवस्था जाने! क्योंकि हमकों तो आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
आठ महीने पुराना वीडियो… अब कमीशन का हिसाब!
कमीशनखोरी की पोल खोलता एक वीडियो इन दिनों सुर्खियों में है। खास बात यह कि कमीशन का खेल किस स्तर तक चलता है, इसका खुलासा एसीएस खुद कर रहे हैं। लेकिन कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है। वीडियो करीब आठ महीने पुराना बताया जा रहा है। इसमें अपने इशारा जी के साथ एंग्रीमैन और इन्दौरीलाल जी भी मौजूद थे। तब वीडियो सामने नहीं आया। अब अचानक वायरल हो गया। सवाल सिर्फ कमीशन के खुलासे का नहीं, आठ महीने की खामोशी के बाद वीडियो के वायरल होने की टाइमिंग का भी है। राजधानी के सूत्र इस पर चुप हैं। आखिर पुरानी रिकॉर्डिंग को अब किसने हवा दी और क्यों?अब जब राजधानी के उच्च सूत्र इस वीडियो पर कुछ भी बोलने के बदले मौन है। तो फिर हमारा तो काम ही है चुप रहना।
सिंहस्थ 2028 की तैयारी: मकान-मंडल बोला, हम तो कुछ कर ही नहीं रहे!
विकासपुरुष बैठक में सवाल लेकर पहुंचे थे। पहला सवाल प्रथम सेवक से—रीगल टॉकीज में काम कैसा चल रहा है? जवाब मिला, सब ठीक है। यानी काम की खबर नहीं, जवाब की रिहर्सल पूरी थी। अब बारी मकान-मंडल के मुखिया अपने माटसाब की। पूछा, 2028 के लिए क्या कर रहे हो? जवाब आया— हम कुछ नहीं कर रहे हैं। बैठक में मुस्कुराहट फैल गई। आखिर सिंहस्थ की तैयारी में आठ महीने की चुप्पी हो या दो साल की योजना, मकान-मंडल ने अपनी कार्यशैली का सार एक वाक्य में बता दिया। अब सवाल यह है कि जब मुखिया ही कुछ नहीं कर रहे, तो मकान किस भरोसे खड़ा होगा? सिंहस्थ आएगा, श्रद्धालु आएंगे, लेकिन तैयारी का जिम्मा शायद भगवान भरोसे रहेगा। तो हम भी चुप हो जाते हैं। आखिर काम नहीं करने वालों से सवाल पूछना भी एक काम है!
हमदर्दी का खेल, उर्वशी जी की फरियाद और कमलप्रेमियों की चुप्पी!!
हमदर्दी तो सबको होती है, मगर कमलप्रेमियों के बीच इन दिनों हमदर्दी का नया संस्करण चल रहा है। निशाने पर हैं पूर्व नगरसेवक और माननीय के वेतनभोगी हुक्मरान सचिव जी! कहते हैं, अकेले अकेले रात काट कर सचिव जी परेशान हो गए। इस चिंता में सचिव जी खुद ही वर्तमान के मोहजाल में फंस गए। विश्वामित्र की तपस्या भंग करने उर्वशी आई थीं, यहां जरूरतों ने दोस्ती करवा दी। दोनों एक-दूसरे के पूरक बने, मगर जिम्मेदारी की बारी आई तो सचिव जी की जेब ने साफ कह दिया— हम साथ-साथ हैं, लेकिन खर्च के मामले में नहीं! बस फिर क्या था। उर्वशी जी पहुंचीं हमदर्दी के दरबार। फोन की घंटियां बजीं, माफी के शब्द निकले और हर्जाने की गाड़ी भी चल पड़ी। यानी पहले दोस्ती, फिर नाराजगी और आखिर में हिसाब-किताब! ऐसा कमलप्रेमियों का कहना है कि मामला सुलझ गया। अब सवाल यह है कि हमदर्दी मुफ्त थी या उसका भी कोई बिल बना? सच-झूठ हमदर्दी जानती है। सचिव जी जानते हैं। उर्वशी जी जानती हैं। हम तो बस इतना जानते हैं कि जहां रिश्तों में हर्जाना उतर आए, वहां हमदर्दी भी हिसाब की पर्ची देखकर ही मुस्कुराती है! बाकी हम चुप हैं… क्योंकि कमलप्रेमियों की दुनिया में सवाल पूछना भी कभी-कभी महंगा पड़ जाता है!
टोकन का धंधा… रात नौ बजे, सड़क पर सौदा!
रात करीब नौ बजे। सर्किट हाउस के पास हमारे एक सूत्र को दोपहिया वाहन रोककर एक युवती ने लिफ्ट मांगी। सूत्र ने इंसानियत दिखाई। मगर कुछ दूर चलते ही युवती ने 300 रुपए मांगे। बदले में जो कहोगे, करने को तैयार हूं। वजह पूछी तो जवाब मिला-टोकन लेना है. सूत्र आरटीओ चौराहे तक पहुंच चुका था। बहाना बनाया और युवती को उतार दिया। फिर दोस्त को फोन लगाया। पूछा-भाई, ये टोकन क्या होता है? जवाब मिला-चुनिंदा जगहों पर पुड़िया मिलती है। टोकन बोलो और फिर सातवें आसमान की सैर! अब सवाल यह है कि रात के अंधेरे में यह कारोबार आखिर किसकी नजर से बचकर चल रहा है? सड़क पर लिफ्ट मांगने वाली युवती की मजबूरी थी या वह लड़की किसी गिरोह का शिकार बन चुकी है। जिसनें पहले मुफ्त टोकन की आदत डलवाई और फिर इस चौराहे पर लाकर छोड़ दिया कि लिफ्ट लेकर डिमांड करें। सूत्र की घटना ने चिंता बढ़ाई है। मगर शहर में ऐसे ठिकाने हैं तो निगरानी और कार्रवाई का हिसाब भी होना चाहिए। धंधा जारी है… टोकन चल रहा है… और जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल कायम है. लेकिन हमकों आदत के अनुसार चुप रहना हैं।
हेलीपेड पर कंधे का सहारा, उड़नखटोले तक सवालों का सफर…
हमारे विकासपुरुष जब वापस लौट रहे थे, तब हेलीपेड पर अपने हिटलर जी को पकड़ लिया। कंधे पर हाथ रखा और दोनों पैदल उड़नखटोले तक पहुंचे। ज्यादा से ज्यादा 60-90 सेकेंड का सफर। मगर चर्चा है कि इन चंद कदमों में सिंहस्थ 2028 के निर्माण कार्यों की पूरी कुंडली पूछ ली गई होगी। हिटलर जी की राजसिंहासन के प्रति निष्ठा जगजाहिर है। खरा बोलने में पीएचडी हासिल है। इसलिए कयास लगाने वाले मान रहे हैं कि रिपोर्ट भी खरी-खरी ही दी होगी। अब इसमें कितनी प्रगति, कितनी परेशानी और कितनी उम्मीद थी, यह तो वही दोनों जानें। वैसे सवाल बड़ा सीधा है। रिपोर्ट विकासपुरुष ने ली या हिटलर जी ने अपनी वस्तुस्थिति सुनाई? कंधे पर हाथ देखकर कुछ लोग इसे भरोसे का संकेत बता रहे हैं। कुछ इसे सिंहस्थ की परीक्षा का आखिरी मौखिक प्रश्न मान रहे हैं। बाकी असली बातचीत पूछना हिटलर जी से बेमानी है। विकासपुरुष तक पहुंचना अब चांद से तारे तोड़कर लाने जैसा है. नतीजा अब यह नजारा देखने वाले बोल रहे है कि.. 90 सेकेंड की मुलाकात… और चर्चा पूरे सिंहस्थ की! बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप रहने पर मजबूर है।
विरासत में तहजीब मिली, फिर यह अदब कहाँ खो गया!
शिवाजी भवन के गलियारों में इन दिनों विकास के साथ भाषा का भी नया प्रयोग चल रहा है। चर्चा है कि अपने हवा जी मातहतों से संवाद करते समय तू-तड़ाक की शैली अपनाने लगे हैं। अधिकारी सेट पर हों या सामने, भाषा का मिजाज एक जैसा रहता है। बेचारे कर्मचारी सुन लेते हैं। क्योंकि नौकरी छोटी है और साहब का पद बड़ा। विरोध करें तो परेशानी, चुप रहें तो आत्मसम्मान की कुर्बानी। ऐसे में कुछ पीड़ित अपनी पीड़ा चुप के पास लेकर आते हैं। उनकी व्यथा सुनकर डॉ. नदीम शाद का अशआर याद आ जाता हैं। अपने हवा जी भी मुलाहिजा फरमाएं... मुश्किल था पर जादू करना सीख गए. अब हम खुद पे काबू करना सीख गए. आपको तो तहज़ीब मिली थी विरसे में. आप कहाँ से तू-तू करना सीख गए. हवा जी, कुर्सी की ऊंचाई आवाज ऊंची करने का लाइसेंस नहीं होती। मातहतों से सम्मान पाने का रास्ता डर पैदा करना नहीं, अपने व्यवहार से सम्मान अर्जित करना है। पद की ताकत से तू-तू करना आसान है, मगर अपनी भाषा पर काबू रखना ही असली प्रशासनिक संस्कार है. आशा है, हवा जी बुरा मानने के बजाय इस सबक पर विचार करेंगे। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।
रील ने फोड़े फटाके... गुरु-चेले की दिवाली पहले!
कहावत तो याद होगी... बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है। मगर शिवाजी भवन में इन दिनों मगरमच्छ-कांड की रील ने ऐसा छींका तोड़ा कि तीन नम्बरी गुरु-चेले की दिवाली पहले ही मनने लगी है। रील क्या वायरल हुई, गुरु-चेले एक-दूसरे को बधाइयां देने लगे। चेहरे पर खुशी ऐसी कि मानो बरसों की मनोकामना पूरी हो गई हो। हालांकि तीन नम्बरी इलाके का असली बॉस कौन होगा? इसका फैसला तो अपने एंग्रीमैन ही करेंगे। जब वह हिंदुस्तान वापस लौटेंगे. फिलहाल गुरु ने चेले को वादा कर दिया है। मैं जहां-जहां रहूंगा, मेरा साया साथ होगा... वाह गुरु! वादे भी ऐसे कि चेले को धूप में भी छांव का भरोसा मिल गया। मगर सवाल यह है कि गुरु का साया कितना मजबूत है और एंग्रीमैन की नजर कितनी पैनी? अब गुरु के वादे की लाज रखने की जिम्मेदारी चेले की नहीं, एंग्रीमैन की है। वह लौटकर क्या नया इलाज करते हैं, यही असली पटकथा होगी। तब तक गुरु-चेले फटाके फोड़ें... हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रोप-वे को विराम... विकासपुरुष का विजन, हवा में नहीं जमीन पर!
अपने वजनदार जी की रोप-वे योजना पर पूर्ण विराम लगने की चर्चा इन दिनों आलाधिकारियों के बीच खूब सुनाई दे रही है। बात पिछले दिनों हुई 2028 की समीक्षा बैठक से निकली है। जिसमें विकासपुरुष ने खुद शामिल होकर योजना पर विराम लगा दिया। विजन ऐसा कि सिंहस्थ के नाम पर कोई नया सपना दिखाने से पहले उसकी उम्र और औकात दोनों देख लो। विकासपुरुष ने साफ निर्देश दे दिए हैं। अब कोई ऐसा नया काम शुरू नहीं करना, जो आगामी 15 महीनों में पूरा नहीं हो सकता. वाह विकासपुरुष! यही तो दूरदर्शिता है। सिंहस्थ की तैयारी में केवल शिलान्यास की पट्टिका चमकाना नहीं, बल्कि समय पर काम पूरा करना भी जरूरी है। रोप-वे हवा में सफर कराता, मगर अधूरे निर्माण जमीन पर परेशानी खड़ी करते. वजनदार जी की योजना पर विराम लगाकर विकासपुरुष ने यह संदेश दे दिया कि अब कल्पनाओं की उड़ान से ज्यादा धरातल पर निर्माण की रफ्तार मायने रखेगी. सिंहस्थ में जनता को वादों का रोप-वे नहीं, सुविधाओं का रास्ता चाहिए। इस विजन के लिए विकासपुरुष को बधाई. बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
700 से सीधे शून्य… जलवा दिखाया, फॉलोअर गंवाया!
शिवाजी भवन में इन दिनों एक बहुचर्चित कांड की चर्चा है। मामला ऐसा कि सात जन्मों की साथी ने सोशल मीडिया पर अपना जलवा दिखाने की कोशिश की। दोस्तों को इम्प्रेस करने का शौक भारी पड़ गया। अगर थोड़ा संयम रखतीं, तो किसी को कानों-कान खबर नहीं होती। मगर अब चर्चा है कि अपना ही अकाउंट बंद करके फॉलोअर्स को अलविदा कहना पड़ा। सात सौ से सीधे शून्य का आंकड़ा आ गया. गलती से बेहतर था कि अपने एंग्रीमैन को सच बता कर जाते।शायद अनुमति का रास्ता निकल आता। मदद भी मिल जाती। मगर अब पछताए होत क्या, जब फॉलोअर उड़ गए! गलियारों में दबी जुबान से सवाल है... तुम्हारा क्या है, तुम्हें अपना जलवा दिखाना था। हमारा सोचते, हमें लौटकर मुँह भी दिखाना था. अब किसकी जुबान पकड़ें।इसलिए हम तो शून्य के इस खेल पर खेद व्यक्त करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद...
बहुत मसरूफ हूँ खुद ,कहीं अपनी मरम्मत में आजकल।
कहीं से बनता हूँ , कहीं से फिर टूट जाता हूँ।