02 नवंबर 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
सीवरेज चालू होने से पहले ही बीमार! अभी से टैंकर, आगे क्या होगा?
सीवरेज प्लान अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ और उसकी ट्रंक लाइन से पानी निकालने के लिए टैंकर बुलाना पड़ रहा है! दो सप्ताह पहले बिड़ला अस्पताल से कालापत्थर रोड पर ऐसा ही नजारा एक चुप के पाठक ने देखा और फोन करके बताया। अब सवाल उठना तो लाजिमी है। पूरा शहर गली-मोहल्लों और कॉलोनियों में खुदाई का दर्द झेल रहा है। काम अभी जारी है। ऐसे में मुख्य सीवरेज लाइन में पानी भरने की नौबत क्यों आ गई? यह सामान्य तकनीकी समस्या है या निर्माण की गुणवत्ता, ढलान और जल निकासी की व्यवस्था में कोई खामी है? जवाब तो जिम्मेदारों को देना चाहिए। सीवरेज प्लान का मकसद शहर को राहत देना है, नई मुसीबत खड़ी करना नहीं। यदि शुरुआत में ही लाइन से पानी निकालने के लिए टैंकर दौड़ाने पड़ रहे हैं, तो भविष्य की कार्यक्षमता पर सवाल उठेंगे ही। कहीं करोड़ों का यह प्लान सफेद हाथी बनकर न रह जाए! वैसे असली परीक्षा अगली बारिश में होगी। तब पता चलेगा कि सीवरेज जमीन के नीचे पानी बहाता है या सड़कों पर परेशानी बढ़ाता है। चुप का दावा है—2028 से पहले ही इसकी असलियत सामने आ सकती है। बेहतर होगा, जिम्मेदार अभी जाँच कर लें; वरना बारिश जनता की और जवाबदेही फिर कागजों की होगी। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
चांद ने भी लगाए दो-दो ठिकानों पर ठुमके!
पिछले सप्ताह सालाना रिचार्ज वाउचर का त्योहार था। चांद की खास भूमिका थी। बादलों ने जरूर लुका-छिपी खेली, मगर एक ग्रामदेवता की किस्मत ऐसी चमकी कि चांद दो जगह नजर आया। पहले ग्रामीण इलाके में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देने वाले ग्रामदेवता अब नगर में विराजमान हैं। हल्का भी मिल गया है और ग्रामदेवताओं के संघ में पदाधिकारी रहने का अनुभव भी है। त्योहार पर स्लेटी जींस और ब्लैक चेक शर्ट में साहब ने चांद के दर्शन किए। साथ में केसरिया साड़ी वाली निज सहायक भी थीं। खास बात यह कि चांद ने एक जगह नहीं, दो जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। करीबी ग्रामदेवताओं की मानें तो साहब का नया सिद्धांत है— पहले निज सहायक, फिर घर! अब यह रिचार्ज सरकारी था या निजी, यह तो वही जानें। हम तो ग्रामदेवताओं की इस चर्चा पर बस इतना कहेंगे—किस्मत हो तो ऐसी कि बादल भी रास्ता न रोक पाएं! बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पैकेट ने खोल दी ओहदे की पोल!
सरकारी अधिकारियों को अपने ओहदे ओर वाहन का बड़ा गुमान रहता है। मगर कभी- कभी यह उल्टा पड़ जाता है। उदाहरण संकुल के दूसरे माले पर पिछले सप्ताह राजधानी के एसीएस स्तर के अधिकारी की मौजूदगी में दिनभर बैठक चली। संभाग के जिलों के मुखिया से लेकर मातहत अधिकारियों तक का जमावड़ा था। बैठक बड़ी थी, इसलिए भोजन की व्यवस्था भी छोटी नहीं थी। तीन श्रेणियां बनीं। ऊंचे ओहदों के लिए अलग इंतजाम और बाकी अधिकारियों के लिए भोजन के पैकेट! लेकिन होटल पहुंचते ही पूरी व्यवस्था का गणित बिगड़ गया। जो पहले पहुंच गए, उनके हाथ मातहतों के हिस्से वाले पैकेट लग गए। जब संभाग के अधिकारियों का दल पहुंचा, तो हाथ में उम्मीदों से उलट पकवान परोसे गए! अब बेचारे पैकेट क्या जानें कि कौन साहब किस ओहदे पर विराजमान हैं! उन्हें तो बस बांटने वाले हाथों का इंतजार था। सवाल यह है कि व्यवस्था भोजन की थी या ओहदों के हिसाब से निवाले तय करने की? जब बैठक में जिले और विभाग साधने वाले अधिकारी जुटे हों, तब भोजन के पैकेट ही व्यवस्था को चकमा दे जाएं, तो इसे चूक कहें या इंतजाम का जायका बिगड़ना? गलती किसकी थी, हमारे सूत्र नहीं जानते। संभाग के अधिकारी भोजन देखकर चुप रहे, तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
खून में NPK का उबाल, अफसरों की कार्रवाई में खाद का अकाल!
दिनभर चली बैठक में राजधानी से आए वरिष्ठ आईएएस ने खेती-किसानी के जिम्मेदारों की ऐसी नस दबाई कि पूरी बैठक में सन्नाटा पसर गया। मुद्दा था अन्नदाता के नाम पर खाद की कालाबाजारी। साहब का तंज था कि छापेमारी करने से ही जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। कालाबाजारी पकड़ने के बाद एफआईआर भी दर्ज कराना होती है। मगर यहां तो छापा मारकर अफसर ऐसे बैठ जाते हैं, मानो खाद माफिया को पकड़ने नहीं, उनकी कुंडली देखने गए हों! फिर साहब ने अपना सीना ठोककर कहा— मेरी रगों में NPK दौड़ता है। यानी नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम! अब बेचारे संभाग से आए खेती-बाड़ी वाले अफसर क्या बोलते? जिनकी ड्यूटी खाद की कालाबाजारी रोकने की है, उनकी कार्रवाई में ही पोषक तत्व गायब हैं। वैसे साहब का बयान सुनकर एक सवाल जरूर पैदा हुआ—जब रगों में NPK दौड़ रहा है, तो मातहतों की फाइलों में कार्रवाई का यूरिया कौन डालेगा? इस सवाल का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है। तो फिर हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मछली की बारी आई, तो अफसरों की नींद खुली ही नहीं!
दिनभर की बैठक थी। राजधानी से आए वरिष्ठ आईएएस साहब के विभाग की समीक्षा सबसे आखिर में रखी गई। विभाग भी ऐसा कि मछली जल की रानी, जीवन उसका पानी! मगर यहां तो पानी ही उतर गया। साहब ने चारों तरफ नजर दौड़ाई और सब्र का बांध टूट गया। बोल पड़े— सब तो ऊंघ रहे हैं... अब क्या समीक्षा करूं? फिर पूछा, किसी ने रोहू मछली खाई है? पूरा संकुल मौन! साहब ने अगला सवाल दागा। जैसे दूध के पार्लर खोलने देते हो, वैसे ही इस नगरी में मछली के 350 पार्लर खोलने हैं। खोलने दोगे क्या? इस बार भी जवाब नदारद। लगता है अधिकारियों की भूख भी बैठक के भोजन तक सीमित थी, रोहू तक पहुंचने की फुर्सत नहीं थी। आखिर साहब भी चुप हो गए। अब भला ऊंघते हुए अफसरों से क्या उम्मीद करें! इसलिए हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
तीन किरदार, एक अधिकारी... पहचानने वाले को इनाम नहीं, चुप्पी मुफ्त!
बहुत पहले लाफ्टर शो में एक सवाल खूब गूंजता था—पहचान कौन? आज वही सवाल अपने पाठकों के सामने है। बस फर्क इतना है कि इस बार पहेली फिल्मों के किरदारों की नहीं, दफ्तरों में निभाए जा रहे किरदारों की है। इशारा समझिए—बल्लू, लंगड़ा त्यागी और मुन्ना भैया! तीनों फिल्मी पात्रों के नाम हैं, मगर वर्तमान में इनकी भूमिकाएं एक अधिकारी निभा रहे हैं? यह पहचानने की चुनौती है। हां, एक बात पहले ही साफ कर दें। बल्लू जी अब स्वर्गीय हो गए हैं। उसके बाद उदय शेट्टी जी भी। दोनों को नमन। मगर त्यागी और मुन्ना भैया अभी मैदान में हैं। अब असली सवाल यह है कि लंगड़ा त्यागी का किरदार निभा रहे अधिकारी मुन्ना भैया की भूमिका में कब तक आएंगे? पहचान गए तो समझदार हैं। नहीं पहचाने तो और भी समझदार! बाकी हम तो अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
रास्ता खुला , फिर बंद हुआ ... दो पेटी की चर्चा!
गांवों में रास्ता खुलवाने और बंद करवाने के मामले राजस्व अदालतों में रोजमर्रा की बात हैं। तहसीलदार के यहां आदेश होता है, रास्ता खुलता है। फिर अपील होती है और कहानी नया मोड़ ले लेती है। इस मामले में भी निचली अदालत ने रास्ता खुलवा दिया था। मगर सात लोगों के परिवार की अपील के बाद फैसला पलट गया। राजस्व गलियारों में चर्चा है कि हल्के हरे रंग के कागजों ने ऐसी हरियाली दिखाई कि पुराने आदेश की जड़ें ही सूख गईं। दो पेटी की चर्चा भी खूब है। अब जिसकी जमीन पर रास्ता बंद हुआ , वह अपना सच लेकर दर-दर भटक रहा है। मगर सुनवाई के दरवाजे पर शायद ताला लगा है। सवाल इतना है कि अदालतों में फैसला दस्तावेजों से होता है या दस्तावेजों के रंग से? फैसला इसका हमारे समझदार पाठकगण खुद कर लें।क्योंकि हम तो आदत के अनुसार चुप रहने के लिए मजबूर हैं।
चपरासी की कलम से चल रहा है कमाई का विभाग!
संकुल के पहले माले पर इन दिनों एक अलग ही सत्ता चल रही है। कुर्सी पर मैडम जी विराजमान हैं, लेकिन गलियारों की चर्चा मानें तो असली जलवा एक चपरासी का है। उसे बिना किसी लिखित आदेश के डायवर्शन जैसे महत्वपूर्ण कामों का अतिरिक्त प्रभार सौंप रखा है। मजे की बात यह है कि डायवर्शन के मामलों में चपरासी जी जो फाइनल कर दें, वही मैडम जी का अंतिम फैसला बन जाता है। न कोई सवाल, न कोई पड़ताल और न ही फाइल पर जिम्मेदारी तय करने की जरूरत! जबकि नियमानुसार यह काम एक क्लर्क मैडम के जिम्मे बताया जा रहा है। वे भी चपरासी जी के इस जलवे के सामने खामोशी ओढ़े बैठी हैं। अब सवाल यह है कि संकुल में पद और जिम्मेदारी का कोई मतलब बचा भी है या नहीं? अगर चपरासी ही फैसले करने लगे तो फिर अधिकारी और बाबू किस मर्ज की दवा हैं? और यदि सब कुछ नियम से हो रहा है तो लिखित आदेश दिखाने में परेशानी कैसी? बहरहाल, गलियारों में चर्चा गर्म है।और हम अपनी आदत के मुताबिक चुप रहने को मजबूर हैं।
दिवाली का दीया, पीपी का खेल!
पिस्तौल कांड वाले नायक को शायद अंदाजा भी नहीं होगा कि उनके नाम की आड़ में पीपी जी कैसी दिवाली मनाने की तैयारी कर रहे हैं। किस्सा देवास रोड की इन्दौरी ब्रांड होटल का है। पीपी जी अपने नायक को नाश्ता कराने ले गए। नाश्ता हुआ, लेकिन भुगतान की बारी आई तो नायक का हवाला देकर बिल का पत्ता साफ करवा दिया। होटल संचालक ने भी सोचा, चलो माननीय का मामला होगा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। पीपी जी ने फोन घुमाया और शिवाजी भवन के एक विभाग को सफाई चालान काटने की याद दिला दी। टीम पहुंच गई। संचालक ने पुरानी पहचान और सेटिंग का वास्ता दिया, मगर जवाब मिला- पीपी जी ने भेजा है, उन्हीं से बात करो। बस, सुबह के नाश्ते का पूरा हिसाब समझ में आ गया। अब शिवाजी भवन के गलियारों में चर्चा है कि दिवाली की रोशनी का इंतजाम हो गया है। नायक के नाम की ढाल और पीपी जी का कमाल! जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
मंत्र जाप से प्लॉट जाप तक...
संकुल से शिवाजी भवन तक इन दिनों एक सड़क की बड़ी चर्चा है। देवास रोड पर 15 खोखे की सड़क बन रही है। पहले 10 खोखे का काम श्रीराम के नाम वाली कंपनी के पास था। बाकी 5 खोखे की जिम्मेदारी सरकारी विभाग की थी। मगर अचानक बिजासन माता की ऐसी कृपा बरसी कि बाकी 5 खोखे का काम भी उसी कंपनी की झोली में आ गिरा। बस, फिर क्या था! शिवाजी भवन में गायत्री मंत्र का जाप करने वाले अधिकारी की बांछें खिल गईं। चर्चा है कि नए-नवेले उपयंत्री के बॉस होने के साथ कंपनी में उनकी पर्दे के पीछे की साझेदारी भी है। काम बढ़ा तो राजधानी की दौड़ भी लग गई। कंपनी के प्रतिनिधि के साथ एक अदद बेहतरीन प्लॉट की तलाश में। गलियारों में 90 पेटी की चर्चा भी गर्म है।जिससे प्लाट की खरीदी होनी थी।आखिर पांच खोखे का अतिरिक्त काम मिला है, तो खुशियां मनाने का हक तो बनता ही है! अब सवाल यह है कि विभागीय जिम्मेदारी अचानक कंपनी को सौंपने का आधार क्या था? और प्लॉट की चर्चा महज संयोग है या कोई गहरा योग? हम तो बस इतना जानते हैं कि मंत्र जाप और प्लॉट जाप में फर्क होता है। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
पगार चालीस हजारी, जश्न दो पेटी वाला...!
पिछले महीने इंदौर रोड की एक होटल में देर रात तक जाम छलकते रहे। पांच-सात ब्रांड की महफिल सजी और सुरूर में झूमने वालों की भी कमी नहीं थी। मौका था एक कर्मचारी के प्रकट उत्सव का। दिलचस्प यह कि वेतन महज 40 हजार और पार्टी का बजट पूरे दो पेटी के आसपास। ताज्जुब की बात यह है कि आंखों पर पट्टी और हाथ में संतुलन का तराजू रखने वाली मूर्ति से जुड़े कई बाबा और अहिल्या नगरी के कर्मचारी भी मौजूद थे। सबकी एक कॉमन कड़ी थी— बाबा के दरबार से किसी न किसी रूप में नाता। अब सवाल यह कि चालीस हजारी की इतनी महंगी मेहमाननवाजी का राज क्या था?और सवाल यह है कि खर्च उठाया किसने? अगर हम नाम लिख दें तो कलम पर ही आफत आ जाएगी। आखिर प्रकट उत्सव वाले सत्ता-केंद्र के करीबी हैं। हम ठहरे अदने कलमकार! इसलिए जाम का हिसाब छोड़िए, हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद...
डूब गए हैं लोग सभी हैरानी में
जाने क्या बात कह दी रवानी में
मुझको चुप रहने की आदत है वरना
जानता हूँ मैं कौन है कितने पानी में
शौकत फहमी