19 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का

19 अक्टूबर 2026 (हम चुप रहेंगे)

गरबे का गरबा, चंदे का फंडा… दो-दो पेटी का गुप्त एजेंडा!

मातारानी के गरबे में भक्ति का रंग चढ़े, ढोल बजे, डांडिया खनके और चंदे की पेटियां भी खनखनाएं… तो समझिए आयोजन में चार चांद लग गए! मगर बदबूदार शहर में हो रहे गरबे की चर्चा कुछ अलग ही है। ग्रामीण इलाके के दो राजस्व अनुभागों के गलियारों में चार पेटियों की कहानी तैर रही है। चर्चा है कि दोनों अनुभाग प्रमुखों को फरमान मिला था— चुपचाप दो-दो पेटी की व्यवस्था कर देना। न ढोल पीटना, न किसी को भनक लगने देना। अपनी आठ हजारी मैडम भी इस व्यवस्था का हिस्सा बताई जा रही हैं। अब यह चर्चा है, कोई प्रमाणित सरकारी आदेश नहीं। इसलिए हम भी इसे गलियारों की गूंज ही मानेंगे। लेकिन सवाल बड़ा सीधा है। चंदा अगर स्वेच्छा से है, तो गोपनीयता की इतनी पहरेदारी क्यों? और अगर जेब अपनी नहीं ढीली करनी, तो मातहतों की जेब पर नजर क्यों? मुसीबत यह कि अधिकारी अपनी जेब से दो पेटी निकालें, यह उम्मीद करना भी सरकारी गलियारों में मासूमियत समझी जाती है। लिहाजा किसी मातहत को फरमान देना पड़ता है—व्यवस्था करो! बस, यहीं से गोपनीयता की अर्थी उठना शुरू हो जाती है। बताया जाता है कि दस नम्बरी जी का गोपनीय संदेश कमलप्रेमियों से होता हुआ हम तक पहुंच गया। सूत्रों ने सवालों पर हामी भी भरी, मगर साथ में शर्त जोड़ दी—चुप रहना! अब मातारानी के दरबार में हम क्या बोलें? चंदे की महिमा अपरंपार है। देने वाला कौन, दिलवाने वाला कौन और हिसाब रखने वाला कौन—यह सब जानने की हमारी कोई जिद नहीं। हम तो बस इतना जानते हैं कि भक्ति में डांडिया घूमना चाहिए, मातहतों की जेब नहीं! खैर, सूत्रों की आज्ञा और अपनी आदत के अनुसार हम चुप हो जाते हैं।

592 का चक्कर… प्रमाणपत्र में गोलमाल या व्यवस्था का कमाल!

नम्बर 592 पढ़कर लगा होगा कि किसी वर्दीधारी का बैज नम्बर है। मगर जनाब, यह राजस्व विभाग के प्रमाणपत्रों का मामला है। यहाँ मूल निवास और जाति प्रमाणपत्र के रजिस्टर अलग-अलग होते हैं, तो नम्बर भी अलग होने चाहिए। लेकिन बुंदेलखंड के एक एसडीएम कार्यालय से दो दशक पहले जारी हुए दो प्रमाणपत्रों का नम्बर एक ही बताया जा रहा है। गजब है! मामला बाबा की नगरी में पदस्थ संभाग स्तरीय अधिकारी से जुड़ा है। पहली जांच में क्लीन चिट मिल चुकी है। अब शिकायतकर्ता नए सबूत लेकर फिर मैदान में हैं। जिस राजस्व अनुभाग से प्रमाणपत्र जारी होने की बात है, वह भी लिखकर दे चुका है कि 592 नम्बर का कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि प्रमाणपत्र मौजूद हैं तो रजिस्टर में क्यों नहीं, और रजिस्टर में नहीं तो प्रमाणपत्र आए कहाँ से? इधर सूरज अस्त होते ही मस्त रहने वाले विभाग के गलियारों में 592 की गूंज है। जांच की फाइल फिर खुलेगी या क्लीन चिट ही अंतिम सत्य रहेगी? वैसे, मामला वर्दी वाले महकमे से जुड़ा है। और वर्दी से हमको डर लगता है। इसलिए सवालों का नम्बर 593 करने के बजाय, हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं!

वैदिक धोती का वैदिक ज्ञान! बच्चों की ड्रेस पर दो साल से अज्ञान!!

धर्म, संस्कार और भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाले गुरुकुल में बच्चों की ड्रेस दो साल से गायब है। इसे लापरवाही कहें या जिम्मेदारी से बचने की ऐसी कला, जिसमें व्यवस्था के पास सब कुछ है, बस इच्छाशक्ति नहीं! मंदिर संचालित गुरुकुल है। फंड की कमी नहीं। नियम के अनुसार हर साल एक जोड़ी सफेद कुर्ता-पायजामा, दो जोड़ी भगवा कुर्ता-धोती और एक ट्रैक सूट मिलना है। संस्थान प्रमुख को केवल एक आवेदन आगे बढ़ाना है। फिर भी बच्चे इंतजार कर रहे हैं। वाह रे व्यवस्था! धर्म पढ़ने वाले बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदारों को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए दो साल भी कम पड़ गए! आखिर वैदिक धोती की कार्यशैली में ऐसी कौन-सी वैदिक प्रक्रिया है, जो बच्चों की ड्रेस को भी तपस्या करने पर मजबूर कर रही है? क्या परंपरा केवल प्रवचन देने के लिए है, जिम्मेदारी निभाने के लिए नहीं? चुप की उज्ज्वल जी से गुहार है कि बच्चों को उनका हक दिलाने में पहल करें। क्योंकि गुरुकुल की गरिमा भगवा वस्त्रों के भाषण से नहीं, बच्चों के सम्मान और व्यवस्था की जवाबदेही से बढ़ती है। बाकी हम चुप हैं—शायद हमारी चुप्पी ही इस व्यवस्था का सबसे सुरक्षित कवच है!

छुकछुक करती रही… 33 खोखों की गाड़ी दस साल से आउटर पर!

शनिवार को संकुल में बैठक थी। छुकछुक विभाग की। अब आप पूछेंगे कि ये छुकछुक विभाग क्या है? तो देश की मशहूर शायरा अंजुम रहबर का गीत याद आता है— छुकछुक-छुकछुक रेल चली है जीवन की। इसकी ये पंक्तियां बड़ी मौजूं हैं— सामां बांध के बैठो लेकिन चोरों से होशियार रहो, जाने कब चलना पड़ जाए चलने को तैयार रहो, जाने कब सीटी बज जाए, सिग्नल जाए झुक! मगर बाबा की नगरी के छुकछुक विभाग की गाड़ी में सीटी तो कब से बज रही है, सिग्नल भी शायद मिल चुका है, बस मंजिल तक पहुंचने का इंतजार खत्म नहीं हो रहा। विभाग की मांग पूरे 33 खोखों की है। हर बैठक में यह मुद्दा उठता है। अधिकारी अपनी पीड़ा सुनाते हैं और बैठक आगे बढ़ जाती है। मगर ठहरिए! यह मामला सिंहस्थ 2028 के विकास कार्यों का नहीं है, जहां विकास की गाड़ी सरपट दौड़ाने की तैयारी है। यह तो 2016 का हिसाब है। तब मामाजी की सरकार थी। गऊघाट क्षेत्र में छुकछुक विभाग की जमीन के लिए 33 खोखों का वादा हुआ था। वक्त की रेल दस साल आगे निकल गई, सरकारें बदल गईं, मगर वादे की गाड़ी आज भी प्लेटफॉर्म पर खड़ी है। अब सवाल यह है कि जब 33 खोखों का मामला एक दशक से फाइलों और बैठकों में चक्कर काट रहा है, तो विभाग के अधिकारी आखिर अपनी फरियाद लेकर जाएं तो कहां जाएं? सिंहस्थ की तैयारियों में हर काम समय पर पूरा करने की चिंता है। अच्छी बात है। मगर पुराने वादों की भी कोई एक्सपायरी डेट तय होगी या नहीं? फिलहाल छुकछुक विभाग मांग करता रहेगा, बैठकें चलती रहेंगी और हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाएंगे।

तबादले की पतंग… और उम्मीद जी की कटने से बच गई!

राजधानी के हमारे खास दोस्तों का दावा है कि उम्मीद जी बाल-बाल बच गए! घबराइए मत, उनका नाम तबादला सूची में नहीं था। कहानी में ट्विस्ट तो घमंडी मैडम के नाम से आता है। सूची आने से पहले ही सोशल मीडिया पर मैडम की नई उड़ान की खबरें दौड़ने लगीं। संभाग के एक जिले में तैनाती की चर्चा, बधाइयों की बौछार… मानो आदेश नहीं, नियुक्ति का जश्न मन गया हो! अब पुराना किस्सा याद कीजिए। जब उम्मीद जी जिले के मुखिया थे, तब मैडम दमदमा क्षेत्र की बॉस थीं। बताते हैं, तभी उम्मीद जी ने मैडम की कार्यशैली को नजदीक से परख लिया था। बाद में राजधानी में भी दोनों का आमना-सामना हुआ। अब 2028 की तैयारियों के बीच मैडम की पड़ोसी राज्य की सीमा वाले जिले में तैनाती की चर्चा चली, तो राजधानी के दोस्तों को लगा—उम्मीद जी के लिए नई चुनौती तैयार है! मगर सूची आई और चर्चाओं की पतंग कट गई। बाबा महाकाल की कृपादृष्टि से ‘आ बैल मुझे मार’ वाला प्रसंग बनने से पहले ही टल गया! जिसके लिए हम बस यही बाबा से दुआ करते हैं कि—उम्मीद जी, उम्मीद बनाए रखिए। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं!

एक संबोधन पर पदोन्नति… कमलप्रेमियों का अपना ही मंत्रालय!

दालवाले नेताजी की पदोन्नति की चर्चा है। पहले ही साफ कर दें—न निगम-मंडल मिला, न कोई नया पद। नेताजी आज भी कमलप्रेमी परिवार के मुखिया हैं। मगर कमलप्रेमियों की चर्चाओं में जो ताकत है, उसके आगे सरकारी आदेश भी पानी भरें! गरबा मंच पर कप्तान जी माइक से बोल पड़े— हमारे अध्यक्ष जी! बस, फिर क्या था! रील बनी और कमलप्रेमियों ने नेताजी की पदोन्नति का फरमान खुद ही जारी कर दिया। अब चर्चा है कि नेताजी कमलप्रेमियों के ही नहीं, वर्दी के भी अध्यक्ष हो गए हैं! चुप तक रील पहुंची। हमने कहा, भाई, यह बोलचाल का संबोधन है, कोई नियुक्ति-पत्र नहीं। जवाब मिला—कप्तान जी खुद माइक से बोल रहे हैं, फिर आपको क्या दिक्कत है? आप तो हमेशा अफसरों का पक्ष लेते हैं! अब इन्हें कौन समझाए कि यहां पद पाने के लिए आवेदन नहीं, किसी का एक बार ‘हमारे अध्यक्ष जी’ बोल देना ही काफी है! नियुक्ति विभाग भले सोता रहे, कमलप्रेमियों का पदोन्नति मंत्रालय चौबीस घंटे चालू है। कल कप्तान जी किसी को भाईसाहब बोल दें, तो ये रिश्तेदारी का मंत्रालय भी खोल देंगे! हम तो बस इतना जानते हैं—माइक कप्तान जी के हाथ में था, लेकिन पदोन्नति का बटन कमलप्रेमियों ने दबा दिया! जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

सजा का सस्पेंस! उपयंत्री जी को ‘डांट की पुड़िया’, जांच गई ठंडे बस्ते में!

कृष्ण बिहारी नूर साहब की गजल याद आ रही है— जिंदगी से बड़ी कोई सजा ही नहीं, और जुर्म क्या है, पता ही नहीं। लेकिन सिंहस्थ 2028 में सेतु निर्माण के उपयंत्री जी की कहानी कुछ अलग है। यहां कार्रवाई हुई, सजा का माहौल बना, विभागीय जांच की बात चली। वजह थी निर्माण की गुणवत्ता पर थर्ड पार्टी ऑडिट की आपत्तियां। फिर अचानक सरकारी पटकथा में नया मोड़ आ गया। जिस कार्रवाई को गंभीर माना गया, वह नोटिस तक सिमट गई! अब सवाल यह है कि फाइल में ऐसा कौन-सा चमत्कार हुआ कि कार्रवाई की धार कुंद पड़ गई? ऑडिट की आपत्तियों का जवाब मिल गया या जिम्मेदारी तय करने का इरादा ही बदल गया? हमें कुछ मालूम नहीं। मगर सिंहस्थ का निर्माण कोई प्रयोगशाला नहीं, जहां गुणवत्ता पर सवाल उठें और कार्रवाई की दिशा बदल जाए। आखिर जवाबदेही की सजा घटेगी, तो भरोसे की मजबूती कौन बढ़ाएगा? खैर, हम इसमें कर क्या सकते हैं, इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

निरीक्षण का शतक, नाली का सिक्सर! दो बार धंसी, तीसरी बार मिट्टी से पास!

सिंहस्थ 2028 की तैयारियों में पूरा प्रशासन रोज सुबह दौरे पर निकल रहा है। निरीक्षणों का शतक भी इसी सप्ताह पूरा होने की उम्मीद है। वाह! निगरानी की रफ्तार देखकर भरोसा बढ़ता है। मगर इंदौर रोड के कीर्तिनगर की कहानी कुछ और ही तस्वीर दिखा रही है। यहां सड़क के साथ बनी नाली अगले ही दिन धंस गई। शिकायत हुई तो एजेंसी ने दोबारा बना दी। रहवासियों ने सोचा, इस बार तो गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा होगा। मगर दूसरी बार भी नाली धंस गई! अब तीसरी बार कोई नया प्रयोग नहीं हुआ। नाली पर मिट्टी डालकर मामला निपटा दिया गया। कमाल है! नाली दो बार धंसी, लेकिन जिम्मेदारी की नींव अब भी मजबूत नजर आती है! सवाल बस इतना है कि रोजाना के निरीक्षण में गुणवत्ता आखिर किस मोड़ पर छूट जाती है? शतक निरीक्षणों का बनेगा या गुणवत्तापूर्ण निर्माण का भी कोई हिसाब होगा? यह हम नहीं, क्षेत्र के रहवासी पूछ रहे हैं। अब जनता की जुबान पर तो हमारा बस नहीं। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

गाड़ी मुफ्त, पेट्रोल का बिल रोज एक पेटी!

कल्पना कीजिए। कोई आपको वाहन मुफ्त में दे और आप खुशी-खुशी स्वीकार कर लें। मगर शर्त यह हो कि उसे एक किलोमीटर चलाने में 1600 रुपए खर्च होंगे। तब क्या करेंगे? गिफ्ट लेंगे या हिसाब देखकर हाथ जोड़ लेंगे? शिवाजी भवन को ऐसे ही दो सफेद हाथी मिलने वाले हैं। प्रथम सेवक की बैठक में एंग्रीमैन के साथ इस पर हल्की तंजबाजी भी हो गई। योजना में पहले साल तक हींग लगे न फिटकरी वाला आनंद मिलेगा। उसके बाद दोनों वाहनों को सड़क पर उतारने के लिए रोज एक पेटी खर्चने की तैयारी रखिए। वैसे शिवाजी भवन में वाहनों का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं। पहले उम्मीद जी एक वाहन लगवा चुके हैं, फिर एक कमलप्रेमी नेताजी तीन खोखे वाला वाहन खरीदकर अटैच कर चुके हैं। अब दो और आने वाले हैं। विकास के लिए वाहन जरूरी हैं, इस पर सवाल नहीं। मगर 1600 रुपए किलोमीटर की सवारी में विकास कितना दौड़ेगा और बजट कितना हांफेगा, यह हिसाब भी जरूरी है। क्योंकि शिवाजी भवन की आर्थिक हालत कोई गोपनीय राज नहीं है। मगर 2028 के लिहाज से बढ़ते हुए विकास को लेकर यह ‘उपहार’ लेना भविष्य के हिसाब से बहुत ज्यादा जरूरी है। इसलिए शिवाजी भवन को नए मेहमानों की अग्रिम शुभकामनाएं। बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

Never Judge a Book by Its Cover!

अपने कमलप्रेमी हाइनेस को यही अंग्रेजी कहावत सुना रहे हैं। चर्चा के चार पन्ने हैं—पूजन, उपहार, वादा और एक नगरसेवक की चतुराई! हाइनेस हर साल कन्या पूजन करवाते हैं। इस बार भी हर वार्ड में आयोजन हुआ। जेब उन्होंने भी ढीली की, लेकिन चर्चा है कि खर्च का करीब 15 प्रतिशत ही उठाया। बाकी की व्यवस्था उन उम्मीदों ने की, जो 2027 में वार्ड से ताल ठोकने की तैयारी में हैं। वादे भी मिल गए, पूजन भी हो गया। अब उपासना का फल मिलेगा या नहीं, इसका फैसला तो 2027 ही करेगा। इधर कन्याओं के उपहार में भी कहानी का ट्विस्ट आ गया। हाइनेस ने गिफ्ट पर अपना प्रमोशन किया, लेकिन प्रथमसेवक के मंत्रिमंडल के एक नगरसेवक ने गजब की चतुराई दिखाई। गिफ्ट बांटे, मगर एक थैली में रखकर, जिसमें अपने हाइनेस पूरी तरह से गायब हो गए। जबकि गिफ्ट पर हाइनेस की तस्वीर थी। इस तरह नगरसेवक ने थैली में अपना प्रचार सजाया और सोशल मीडिया पर छा गए! अब कमलप्रेमी कह रहे हैं— कवर पर नाम किसी और का, अंदर का खेल किसी और का! मगर यह चर्चा दबी जुबान में है। सोशल मीडिया पर वीडियो आसानी से देखा जा सकता है। नगरसेवक की इस चतुराई के लिए हम उनका हाथ तो पकड़ नहीं सकते हैं। इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मेरी पसंद...
सर कलम होंगे कल यहां उनके 
जिनके मुंह में जुबान बाकी हैं
राजेश रेड्डी