06 अक्टूबर 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

06 अक्टूबर  2025 (हम चुप रहेंगे)

 4 महीने पीछे...

विकास पुरुष हर बार यह निर्देश देते है। सिंहस्थ के कामों में तेजी लाएं। मगर राजधानी के एयरकंडीशनर कक्ष में बैठने वाले अफसर उल्टा काम कर रहे है। ताजा मामला 10 टेंडरों में से 7 के रिजेक्ट होने का है। कारण प्रतिस्पर्धा कम होना बताया गया है। सिंगल टेंडर थे। मगर वो भी बिलो(कम) रेट पर थे उसके बाद भी रिजेक्ट कर दिये गए। जबकि इसके पहले कई टेंडर निर्धारित दर से ज्यादा थे। किंतु स्वीकृत किए गए। 7 टेंडर रिजेक्ट करने वाले अपने इशारा जी है। याद दिला दे,यह वही इशारा जी है। जिन्होंने दिव्यांग विवाह करवाकर खूब यश लूटा था। तब अपने उम्मीदजी शिवाजी भवन के मुखिया थे। इशारा जी के इस कदम से विकास की प्रगति 120 दिन पीछे खिसक गई है। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। जिसमे हम कर तो कुछ भी नहीं सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

समन्वय की कमी...

यह बात कई मौकों पर जगजाहिर हो चुकी है। निर्माण विभागों में समन्वय की कमी है। डेड लाइन 2027 भी तय हो चुकी है। किन्तु 3 प्रमुख निर्माण विभाग समझने को तैयार ही नहीं है। तभी तो पिपलीनाका से राणो जी की छतरी तक बनने वाली सडक को लेकर रस्साकशी चल रही है। निगम,लोनोवि और एमपीआरडीसी में। किसी को कुछ पता नहीं है कि सडक का लेबल किस जगह कितना होगा। इसी तरह हरिफाटक ब्रिज पर पांचवी भुजा निकालने को लेकर समन्वय नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि एलिवेटेड गधा पुलिया पर आ रहा है। जिसके लिए पांचवी भुजा की डिजाइन में परिवर्तन जरूरी होगा। मगर प्रतिस्पर्धा में उलझे विभाग एक दूसरे से समन्वय दिखाने के बदले ठेंगा दिखा रहे है। ऐसी चर्चा तीनों विभागों में दबी जुबान से सुनाई दे रही है। मगर हमकों तो बस चुप ही रहना है।

आपको अधिकार है...

पिछले सप्ताह राजधानी से आए साहब ने सोचा भी नहीं होगा। कोई, माननीय ऐसा भी सवाल कर सकता है। आपको अधिकार भी है। जिस फसल बीमा पर आप बैठक कर रहे है। क्या प्रॉब्लम को हल कर पाएंगे? सवाल करने वाले अपने पिस्तौल कांड नायक थे। सवाल सुनकर एसीएस साहब एक पल के लिए आश्चर्य में पड गए। क्योकि उनको ऐसी उम्मीद थी नही। मगर उन्होंने जैसे तैसे जवाब देकर अपनी इज्जत रख ली। इधर बैठक में 2 पँजाप्रेमी माननीय भी पहुँच गए थे। अपने चरणलाल जी और बॉस। जिनकी मौजूदगी से खतरा बढ गया था। सवालों ओर विवाद का। किन्तु उसके पहले ही अपने उज्जवल जी ने दोनो पँजाप्रेमियों का खुद आगे रहकर स्वागत किया। इस स्नेह से दोनों अभिभूत हो गए। जिसके बाद  दोनों पँजाप्रेमियों ने ऐसा कुछ नही किया। उल्टे उम्मीदजी और उज्ज्वल जी की तारीफ करके अपनी सज्जनता का परिचय दिया। ऐसा बैठक में मौजूद सूत्रों का कहना है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

नवाचार करेंगे 2 आईएएस...

संकुल में बैठने वाले 2 आईएएस नवाचार करने वाले है। इसमें से एक अपने उम्मीदजी तो दूसरे उज्ज्वल जी हैं। दोनों अलग अलग विषय पर नवाचार करेंगे। उम्मीद जी 2028 को लेकर आमजनों के लिए तैयारी कर रहे है। उनकी सोच है कि शहर की जनता को पता होना चाहियेसिंहस्थ के कुल कितने प्रोजेक्ट चल रहे है। कब शुरू हुए-कब खत्म होंगे-कौन सी कंपनी और विभाग काम कर रहे है। जिसके लिए शहर के प्रमुख चौराहों पर एलईडी स्क्रीन लगाने वाले हैं। जिसमे कार्यो की प्रगति रिपोर्ट भी समय समय पर देखी जा सकती है। इसके अलावा पत्थरों पर कलाकृति बनाने का काम भी अब रोबोट द्वारा किया जाएगा। जिसका प्रजेंटेशन भी जल्दी किया जाएगा। इधर अपने उज्ज्वल जी का फोकस युवा पीढी की पढाई पर है। यह उनका पसन्दीदा काम है। विदिशा में रहकर उन्होंने बच्चों को खूब पढाया था। अब बाबा की नगरी में भी शुरुआत कर दी है। इस कडी में जल्दी ही प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी हेतु वह कदम उठाने वाले हैं। दशहरा मैदान पर एक केंद्र तैयार होगा। जिसमें होनहार विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के टिप्स वह खुद देंगें और बाकी अधिकारियों का भी सहयोग लेंगे। दोनों आईएएस के नवाचार स्वागत योग्य हैं। जिसके लिए हम दोनों को ग्रिम शुभकामनाएं देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

50 की जगह 10...

कमलप्रेमियों में चर्चा है। लिफाफे में 50 रु देकर कन्याओं का पूजन करना था। बाकी सभी जगह तो इसका पालन हुआ। मगर जिस जगह अपने विकास पुरुष मुख्य अतिथि थे। जहाँ कन्याओ की अच्छी संख्या थी। वहीं पर अपने हाइनेस के साथ चीटिंग हो गई। यजमान ने 50 की जगह 10 का लिफाफा देकर अपना पल्ला झाड लिया। ऐसा क्यों हुआ। इसके पीछे की कहानी भी रोचक है। पहले जो यजमान चुने गए थे। वह एक दिन पहले फसर गए। यह यजमान अपने पहलवान के रिश्तेदार है। तुतला कर बोलते है। उन्होंने संख्या देखकर हाथ ऊंचे किए थे। इधर नए यजमान को 50 का आंकडा नही बताया गया। तो उसने 800 कन्याओं को 10-10 देकर निपटा दिया। इस सबके बावजूद अपने हाइनेस ने रिकार्ड बनाया। जिसके लिए उनको बधाई देते हुए, हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

मेरी मर्जी ...

फिल्म स्टार गोविंदा की किसी फिल्म का एक गीत है। मैं चाहे ये करूँ... मैं चाहे वो करूँ.. मेरी मर्जी। इन दिनों संकुल वाले यह गीत गुनगुना रहे है। इशारा अपने फटाफट जी की तरफ है। मामला सुबह की आरती अनुमतियों से जुडा है। खबर यह है कि गुरुवार को अचानक 70 सीटे शाम को बढाई गई। जिसका प्रोटोकॉल को कुछ पता नहीं चला। अगले दिन प्रोटोकॉल द्वारा भेजी गई अधिकांश अनुमति बगैर सूचना के निरस्त कर दी गई। जिसमें तीसरे और दूसरे माले के निज सचिवों द्वारा भेजी गई अनुमति भी शामिल थी। इस चक्कर में राजधानी के एक आला अफसर की सिफारिश भी रद्द हो गई। जिसके बाद हंगामा मच गया। इधर बेचारे प्रोटोकॉल के अपने अट्टू जी भी परेशान हो गए। जब शाम तक मेसेज नही मिले। जिनकी उन्होंने सिफारिश की थी। ऐसे में अब वह प्रोटोकॉल छोडने की गुहार लगा रहे हैं। इस मामले में प्रोटोकॉल के एक मातहत का नाम दबी जुबान से चर्चाओं में है। जिन्होंने इस घटना को ,फटाफट जी के कान में मंत्र फूंक कर अंजाम तक पहुँचाया है। इस मातहत की होटल वालों से सेटिंग की भी दबी जुबान से चर्चा है। इस पूरे कांड की अपने उज्जवल जी को जानकारी लग चुकी है। देखना यह है कि वह क्या कदम उठाते हैं या फिर हमारी तरह चुप रह जाते हैं

इस गलती का दोषी कौन...

बाबा महाकाल की सवारी साल में एक बार फ्रीगंज पुल पार करके आती है। जिसका भक्तों को इंतजार रहता है। पहली दफा ऐसा हुआ। सवारी भ्रमण के दौरान 2 गलती हो गई। निर्धारित मार्ग से दूसरे मार्ग पर जाने का मामला तो जगजाहिर है। किन्तु पहली गलती की खबर बहुत कम लोगों को पता है। इस गलती के शिकार अतिविशिष्टगण हुए है। अंदर खाने की खबर है। पुल पार करते ही इन सभी वीवीआईपी के मंच बने हुए थे। जहाँ पर सवारी को कुछ देर के लिए रुकना था। मगर ब्रिज से उतरते ही बाबा की पालकी को इस कदर तेजी से निकाला गया। जैसे अगर इन मंचो के सामने सवारी रुकी तो विस्फोट हो जाएगा। बेचारे..अतिविशिष्टगण देखते ही रह गए और सवारी टॉवर पहुँच गई। दूसरी घटना सवारी मार्ग बदलने की तो सबको पता है। इन दोनों घटनाओं में एक वर्दीधारी मैडम का नाम सामने आ रहा है। अब यह सच है या झूठ?बाबा महाकाल जानते है या फिर नजारा देखने वाले।अब देखना यह है कि गलती की दोषी को सजा मिलती है या अभयदान? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

निर्देश या नसीहत...

अपने विकास पुरूष अष्टमी की शाम से रामनवमी की दोपहर तक शहर में थे। इस दौरान पूरा प्रशासन आगे-पीछे था। जाते वक्त वीवीआईपी गेस्ट हाउस भी रुके थे। करीब 10 मिनिट तक। उसके बाद काफिला सीधे हेलीपेड पहुँचा। बमुश्किल 3 मिनिट के अंदर। यहाँ पर अचानक विकास पुरूष ने स्टैंडअप मीटिंग कर डाली। वह भी अलग बुलाकर। पहले उम्मीद जी और उज्ज्वल जी से। बाकी सब दूर थे। अल्फा-डेल्टा और कप्तान। करीब 5 मिनिट तक उम्मीदजी और उज्ज्वल जी से बतियाते रहे। फिर उन्होंने हाथ के इशारे से हाइनेस को इशारा करके बुला लिया। उनके साथ दालवाले नेताजी भी हो लिए। 2 मिनिट तक यह दोनों भी स्टैंडअप मीटिंग में शामिल रहे। जिसके बाद विकास पुरुष अपने उडनखटोले में बैठ गए। फिर अल्फा ,डेल्टा और कप्तान को नजदीक बुला लिया। इन तीनों से भी 5 मिनिट तक चर्चा की। इसके बाद रवाना हो गए। अब सवाल यह है कि आखिर ऐसी क्या गोपनीय बात थी। जो विकासपुरुष ने सबसे अलग -अलग की। सबसे बडा सवाल यह कि वीवीआईपी गेस्ट हाऊस में उनको मौका था। मगर हेलीपेड चुना गया। आखिर क्यों? इसको लेकर वह सातो चुप है। जिनसे मीटिंग हुई है। बस..समन्वय और मॉनिटरिंग का राग अलाप रहे है जबकि असल बात कुछ और है। जो हमको पता नहीं है। इसलिए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

सांप बनाम लकीर...

यह कहावत तो पाठको ने सुनी होगी। सांप निकलने के बाद लकीर पीटना। सीधी भाषा में इसको यूं भी बोला जा सकता है। घटना होने के बाद, चेतावनी जारी करना। इशारा दाल बिस्किट वाली तहसील में हुए हादसे की तरफ है। जिसमे 3 बच्चों की मौत हो गई। घटना होते ही सबसे पहले थाना प्रभारी पहुँच गए थे। उसके 30 मिनिट बाद क्षेत्र के माननीय भी। इसके बाद एसडीओपी और एसडीम। जबकि तहसीलदार मैडम सबसे लास्ट में। हादसे की पुष्टि होती, उसके पहले ही उस ब्रिज पर पोस्टर चिपका दिए गए। जिस पर लिखा था। यहाँ पर विसर्जन स्थान नही है। निर्धारित स्थान पर ही मूर्ति विसर्जन करें ऐसी चर्चा दाल बिस्किट वाली तहसील में सुनाई दे रही है। तभी तो ऊपर लिखी कहावत जनता बोल रही है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस, आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

माननीय की निजी खुन्नस....

उसी बैठक में एक माननीय अपनी निजी खुन्नस निकालते नजर आए। जिसमे पिस्तौल कांड नायक ने सवाल उठाया था। आपको अधिकार है? यह माननीय उस जिले से है। जहाँ से आगे जाकर राजस्थान की सीमा शुरू हो जाती है। इनका गुस्सा अपने जिले के कलेक्टर पर था। तो हाथ धोकर पीछे पड गए। 1 घण्टे तक बेसिरपैर के सवालों के साथ मगजमारी करते रहे। यह देखकर उनके ही जिले के 2 माननीय नाराज हो गए। आपस मे तीनों के बीच शब्द युद्ध हो गया। इस पर खुन्नस निकालने वाले माननीय ने आपा खो दिया। अपने ही साथियों को बोल दिया। कलेक्टर का बचाव न करें। यह नजारा वहाँ मौजूद संभाग के माननीयो , अधिकारियों और एसीएस ने भी देखा। सभी आश्चर्य में थे। इस निजी खुन्नस को देखकर। उस पर खुन्नस निकालने वाले माननीय नाश्ते को लेकर भी नाराज थे। क्योंकि 1 मिठाई, 2 काजू, 3 बादाम और चाय ही मिली थी। तो बगलवाले की प्लेट से उठाकर खाते देखे गए। क्योंकि भूख से परेशान थे। इसलिए भी कलेक्टर पर भडास निकाल रहे थे। ऐसी चर्चा बैठक के बाद अधिकारी कर रहे है। मगर हमको तो बस चुप ही रहना है।

धर्म की मर्यादा...

हिंदू धर्म की कुछ मर्यादा परम्परागत चली आ रही है। जिसका पालन करना सभी के लिए जरूरी होता है। मगर एक कमलप्रेमी, जो एक कमण्डल के मुखिया भी रहे, फिर बिल्डर बन गए। अपने पहलवान के कार्यकाल में। तो जमकर लक्ष्मी बरसी। अब जब जेब गर्म हुई तो प्रथम आराध्य देव का मंदिर बना लिया। खुद की कालोनी में। फिर तो जमकर कृपा बरसने लगी। इसका असर उनके एटीट्यूड पर आया। आ ही जाता है। अच्छा खासा इंसान बुद्धि खो देता है। यही इनके साथ हुआ। कन्या पूजन के दौरान। भूल गए धर्म की मर्यादा को। चरण पादुका पहनकर, देवी स्वरूप कन्याओं को लिफाफे देते नजर आए। उस पिक को दिलजले ने सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। अब यह कमलप्रेमी-बिल्डर-प्रथम आराध्य देव का मंदिर बनाने वाला धर्मरक्षक कौन है? तो पाठकगण उनके दर्शन उस मंदिर पर जाकर कर सकते है। जो कि कुछ महीनों पहले ही बनाया गया है। बाकी हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

मेरी पसंद ...

फिल्टर ईजाद किए गए/ क्योंकि आइना ईमानदार था...!