20 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
चंदा पार्टी और डांस... पदोन्नति का जश्न या परंपरा का नया अध्याय?
विकासपुरुष ने पदोन्नति की सौगात देकर कई चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी। सबसे ज्यादा चर्चा उस मैडम की है, जिनकी किस्मत के सितारे बुलंद हुए। अब आमतौर पर होता यह है कि पदोन्नति पाने वाला अपने साथियों को पार्टी देता है। लेकिन यहां कहानी थोड़ी अलग बताई जा रही है।
चर्चा है कि मैडम के अधिकार क्षेत्र के करीब 75 ग्रामदेवताओं ने एक-एक हजार रुपये का सहयोग कर शनि मंदिर के समीप स्थित एक होटल में पार्टी का आयोजन कराया। पार्टी में अपनी "जिज्जी" भी मौजूद रहीं, जो पदोन्नत मैडम की वरिष्ठ भी बताई जाती हैं। डीजे की तेज धुन बजी, कदम थिरके और माहौल देर तक रंगीन रहा। अब कौन किस दवा के असर में ज्यादा जोश में था, यह बताना हमारा काम नहीं। लेकिन संकुल के गलियारों में यह जरूर फुसफुसाया जा रहा है कि कुछ ग्रामदेवता जश्न में इतने डूबे कि टुन्न होने की चर्चा भी होने लगी। वैसे असली सवाल पार्टी से ज्यादा चंदे पर है। यदि यह आयोजन स्वैच्छिक था तो ठीक, लेकिन यदि पदोन्नति के जश्न में मातहतों से चंदा जुटाने की परंपरा शुरू हो गई है, तो फिर इसे सम्मान कहें या दबाव? बाकी... चर्चा कितनी सही और कितनी गलत, इसकी पुष्टि हम नहीं करते। हम तो बस पदोन्नत मैडम को बधाई देते हैं... और हमेशा की तरह चुप हो जाते हैं।
सहायिका के साथ थिरकते ग्रामदेवता... और गलियारों में उठते सवाल
ऊपर जो कुछ पढ़ा, उसी पार्टी की यह दूसरी कहानी है। एक वीडियो इन दिनों ग्रामदेवताओं के बीच खूब चर्चा में है। वीडियो में एक ग्रामदेवता बड़े नज़ाकत भरे अंदाज़ में थिरकते नजर आ रहे हैं।अब डांस करना कोई अपराध नहीं है। माहौल खुशी का हो, संगीत बजे, तो कदम अपने आप थिरक उठते हैं। वीडियो में भी बाकी सभी लोग समूह में नाच रहे हैं।लेकिन... चुप की नजर वहां ठहर गई, जहां चर्चा शुरू होती है।वीडियो में यह ग्रामदेवता अपनी निजी सहायिका के साथ पूरे उत्साह से डांस करते दिखाई दे रहे हैं। यहीं तक बात रहती, तो शायद कोई चर्चा भी नहीं होती। मगर कुछ ग्रामदेवताओं की दबी जुबान में एक पुरानी कहानी भी तैर रही है।चर्चा यह है कि इसी सहायिका का कभी इन्हीं ग्रामदेवता ने "कन्यादान" किया था। वह भी गुजरात मॉडल वाले प्रदेश में। खर्च भी खुद ही उठाया था। अब वही सहायिका और वही ग्रामदेवता एक साथ थिरकते दिखे, तो कुछ लोगों को "दाल में कुछ ज्यादा ही काला" नजर आने लगा।संयोग यह भी है कि यह ग्रामदेवता की अभी अभी शहर में वापसी हुई है। अभी तक ग्रामीण इलाके में पदस्थ थे। यह कभी ग्रामदेवता संगठन के मुखिया भी रह चुके हैं और कहा जाता है कि हाइनेस की सिफारिश ने वापसी का रास्ता आसान कर दिया।अब यह सब महज संकुल के गलियारों की फुसफुसाहट है या सचमुच कहानी में कोई नया अध्याय जुड़ रहा है।इसका फैसला तो चर्चा करने वाले ग्रामदेवता ही करें।हम तो बस इतना जानते हैं कि राजनीति में वीडियो से ज्यादा तेजी अफवाहें नाचती हैं।बाकी... हमको अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।
ऑडर हुआ... और साहब उड़कर पहुँच गए!
संकुल के गलियारों में इन दिनों एक ही कहानी सबसे ज्यादा सुनाई जा रही है। कहते हैं, जैसे ही पदस्थापना का आदेश निकला, साहब ने घड़ी नहीं देखी, शुभ मुहूर्त नहीं देखा... सीधे देवास रोड वाले राजस्व सर्किल पर जाकर हाजिरी लगा दी।मजे की बात यह बताई जा रही है कि जिस मैडम की जगह पदस्थापना हुई, उन्हें इसकी खबर बाद में मिली। लेकिन नए साहब को इतनी जल्दी कैसे पता चल गया? यही सवाल संकुल की चाय पर सबसे ज्यादा उबल रहा है।अब चर्चा का दूसरा अध्याय और भी दिलचस्प है। भरोसेमंद सूत्र कान में फुसफुसाकर बताते हैं कि इस फुर्ती के पीछे "चार पेटी" वाली कहानी भी घूम रही है। कहते हैं, भुगतान पहले हुआ, आशीर्वाद बाद में मिला और चार्ज सबसे पहले मिल गया। राजनीतिक गुरु की कृपा ऐसी बरसी कि प्रशासनिक प्रक्रिया भी मानो स्पीड पोस्ट बन गई।सच क्या है, यह जांच का विषय हो सकता है। लेकिन सवाल यह जरूर है कि क्या हर कर्मचारी को आदेश मिलते ही इतनी बिजली जैसी गति से चार्ज मिल जाता है, या फिर कुछ पदों पर "विशेष ऊर्जा" भी काम करती है?बाकी... हम तो कुछ नहीं कहेंगे। बस हम तो अपनी पुरानी आदत के अनुसार चुप रहेंगे।
वादा देकर पलटे माननीय...
हर माननीय से यही उम्मीद की जाती है कि अगर कोई इंसान फोन करके कोई आग्रह करे, तो वह साफगोई से उत्तर दे। झूठा आश्वासन कभी नहीं दे। खासकर तब, जब सामने वाला दूसरे राज्य का निवासी हो और किसी नामचीन अखबार का खबरची हो।आखिर साफ बोलने में जाता ही क्या है? सीधे कह देते।मैं दर्शन नहीं करवा सकता। बात वहीं खत्म हो जाती। लेकिन यहां तो कहानी कुछ और ही निकली।
जब फोन आया। तो माननीय ने पहले अपने निज सचिव का नाम पर बात करके भरोसा दिलाया।यानि बात खुद कर रहे थे।लेकिन निज सचिव का नाम लेकर। फिर खबरची की वाणी से इतने प्रभावित हुए कि बोले। मैं विधायक ही बोल रहा हूं... आप आ जाइए, सीधे मुझसे मिलिए। आपका काम हो जाएगा। अब खबरची भी क्या करता? माननीय के शब्दों पर भरोसा कर बैठा। उम्मीदों की गठरी बांधी और शनिवार की सुबह मिलने पहुंच गया। लेकिन राजनीति में शायद गिरगिट भी प्रशिक्षण लेने आता होगा।
मुलाकात हुई तो माननीय का रंग बदल चुका था। अब जवाब था।
हम क्या कर सकते हैं? मेरी कोई बात नहीं हुई आपसे।
बस... यहीं लोकतंत्र का सबसे छोटा और सबसे बड़ा सवाल छिपा है।
वादा करने में दो मिनट लगे, मुकरने में दो सेकंड। अब सवाल यह नहीं है कि दर्शन हुए या नहीं। सवाल यह है कि जब मदद करनी ही नहीं थी, तो बुलाया क्यों?
राजनीति में लोग कहते हैं कि जनता भूल जाती है। हो सकता है भूल भी जाए। लेकिन शब्दों से टूटा भरोसा अक्सर याद रह जाता है। बाकी... हमको तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है। आखिर माननीय हैं। उनके शब्द भी शायद मौसम की तरह बदलने का विशेषाधिकार रखते हैं।
प्रभारी से 'भारी' हुईं मैडम... अब क्या 8 हजारी के भी रेट बढ़ेंगे?
बदबूदार शहर की अपनी 8 हजारी मैडम को चुप परिवार की ओर से हार्दिक बधाई। आखिरकार मैडम अब प्रभारी से "भारी" हो गई हैं। पदोन्नति मिल गई है। कुर्सी का वजन बढ़ गया है, तो चर्चा का बाजार भी गर्म होना स्वाभाविक है।वैसे मैडम का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं रहा। बदबूदार शहर में आने से पहले संकुल में कामकाज देखती थीं। वहीं ऑपरेटर प्रकरण में कथित "8 हजारी कांड" ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। चुप ने खुलासा किया था। उज्ज्वल जी ने एक्शन लिया, फटाफट जी ने जांच की और नतीजा यह हुआ कि मैडम से शाखा भी छीन ली गई थी।लेकिन कहते हैं, सरकारी गलियारों में कुर्सियां बदलती हैं, किस्मत नहीं। मैडम ने भी तिकड़म की सीढ़ियां चढ़ीं और बदबूदार शहर पहुंच गईं। यहां डॉक्टर साहब की मेहरबानी ऐसी बरसी कि फिर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत ही नहीं पड़ी।अब जब मैडम "भारी" हो गई हैं, तो कमलप्रेमियों के बीच एक नया सवाल हवा में तैर रहा है।क्या अब 8 हजारी के दाम भी बढ़ेंगे?यह सवाल हमारा नहीं है। यह तो वही लोग पूछ रहे हैं।जो सरकारी गलियारों की फुसफुसाहटों को अखबार से पहले पढ़ लेते हैं।वैसे उम्मीद यही है कि पदोन्नति के साथ कार्यशैली भी "अपग्रेड" होगी। पुराने आरोप पीछे छूटेंगे और नई पहचान ईमानदार काम से बनेगी। क्योंकि पद बड़ा होने से जिम्मेदारी भी बड़ी हो जाती है।बाकी... दाम बढ़ेंगे या नहीं, इसका जवाब तो मैडम ही दे सकती हैं।बाक़ी हमको तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
जिज्जी... आपके सर्किल में यह कैसा "रेट रिवीजन"?
संकुल के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है। कहते हैं कि महज 45 दिन पहले पदस्थ हुए एक नायब तहसीलदार ने सरकारी नियमों से ज्यादा तेजी अपने "रेट चार्ट" में दिखाई है। चर्चा यह भी है कि जिन फाइलों पर उनके हस्ताक्षर जरूरी हैं, वहां सुविधा शुल्क का नया गणित लागू हो गया है। पुराने रेट अब इतिहास बताए जा रहे हैं।हालात यह हैं कि सर्किल के ग्रामदेवता भी अब फुसफुसाने के बजाय खुलकर सवाल पूछने लगे हैं। आखिर किसी अधिकारी की पहचान उसके फैसलों से होगी या उसकी "डिमांड" से? इसी उम्मीद में पहली गुहार "जिज्जी" तक पहुंची है। भरोसा है कि वे बताएंगी कि सरकारी कुर्सी सेवा के लिए है या सौदेबाजी के लिए। अगर यहां भी सुनवाई नहीं हुई, तो फिर "उज्ज्वल जी" के दरबार में दस्तक देने की तैयारी बताई जा रही है।
कुछ सवाल, जिनके जवाब जरूरी हैं—
- क्या 45 दिन में ही ऐसी कौन-सी उपलब्धि हो गई कि हर काम का भाव बदल गया?
- क्या राजस्व विभाग में अब फाइलें नियमों से नहीं, रेट से आगे बढ़ेंगी?
- और सबसे बड़ा सवाल... क्या शिकायतें आने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी चुप रहेंगे?
फिलहाल तो गलियारों में यही तंज गूंज रहा है।"साहब की स्पीड काम में कम, रेट बढ़ाने में ज्यादा दिख रही है।कारण 4 पेटी देकर पदस्थ हुए है।क्या पता कब हटाने के आदेश हो जाए। तो जो खर्च किया है। उसकी डबल वसूली तो जल्दी से जल्दी कर लें। इसीलिए रेट रिवीजन कर दिए हैं। ऐसा उन देवताओं का कहना है। जो दुःखी है। अब फैसला जिज्जी को करना है और हमकों आदत के अनुसार चुप रहना है।
पहले सेट पर लेक्चर... फिर आदेश—"मुझे पर्सनल फोन करो"
शिवाजी भवन में कर्मचारियों की सुविधा और त्वरित संवाद के लिए वायरलेस सेट दिए गए हैं। मकसद साफ था—ज़रूरी सूचना तुरंत पहुंचे और काम में तेजी आए। लेकिन इन दिनों सेट का एक नया उपयोग भी सामने आ रहा है।बताते हैं कि डॉग-प्रेमी साहब जब सेट पर आते हैं, तो सूचना कम और भाषण ज्यादा सुनाई देता है। एक बार सेट हाथ में आया नहीं कि समय का भी ध्यान नहीं रहता और यह भी नहीं कि दूसरी तरफ दर्जनों कर्मचारी किसी जरूरी संदेश का इंतजार कर रहे हैं। पूरे विभाग को अनचाहा "प्रेरणादायी व्याख्यान" सुनना पड़ता है।
सबसे रोचक बात यह है कि लंबे भाषण का समापन अक्सर एक ही वाक्य से होता है।मुझे पर्सनल फोन करो।"अब मातहतों का सवाल भी वाजिब है। जब आखिर में पर्सनल फोन ही करवाना है, तो पूरा विभाग पहले भाषण क्यों सुने? उनका सुझाव है कि साहब के लिए सेट पर अलग चैनल या अलग लाइन ही बना दी जाए, ताकि वे इत्मीनान से अपनी भड़ास भी निकाल लें और बाकी कर्मचारी जरूरी संदेश भी सुन सकें।मातहतों की बात में दम है लेकिन चुप रहना हमारा कर्म है।
रोबोट आखिर कहाँ है... या सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए खरीदा गया था?
सीवरेज की सफाई के दौरान एक सफाईकर्मी की मौत हो गई। दो अन्य घायल हुए। प्रशासन ने तत्काल आर्थिक सहायता देकर संवेदना जताई। यह मानवीय कदम था। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अब भी जवाब मांग रहा है।क्या यह हादसा टाला जा सकता था?कुछ साल पहले पूरे उत्साह के साथ करीब 25 लाख रुपये खर्च कर सीवरेज सफाई के लिए आधुनिक रोबोट खरीदा गया था। खरीद से पहले कंपनी का शानदार प्रेजेंटेशन हुआ, लाइव डेमो दिखाया गया, अधिकारियों ने तालियां बजाईं, अखबारों में तस्वीरें छपीं। सबसे ज्यादा खुश वे सफाईकर्मी थे, जिन्हें लगा था कि अब जहरीली गैसों से भरे सीवर में उन्हें अपनी जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ेगी।लेकिन आज सवाल यह है कि वह रोबोट आखिर है कहाँ?क्या वह किसी गोदाम में धूल खा रहा है? किसी कबाड़खाने में सड़ रहा है? या फिर किसी फाइ…
सरकार कमलप्रेमियो की... लेकिन मेहरबानी चरणलाल के क्षेत्र पर!
आमतौर पर माना जाता है कि सरकारी योजनाओं का ज्यादा लाभ सत्ता पक्ष के माननीय के क्षेत्रों को मिलता है। लेकिन विकासपुरुष के जिले मे अन्नदाताओं की ट्रेनिंग का मामला कुछ अलग ही कहानी सुना रहा है।चर्चा है कि अन्नदाताओं की ट्रेनिंग के लिए आई राशि सभी तहसीलों में लगभग बराबर बांटी जानी थी। लेकिन सबसे ज्यादा ट्रेनिग चरणलाल के क्षेत्र में रखी गई। वजह क्या है? गलियारों में चर्चा है कि वहां के एक अधिकारी ने साहब को सबसे बेहतर सहयोग(35%)" देने का भरोसा दिलाया है। उधर बाकी ब्लॉकों के अधिकारी भी पीछे नहीं हैं, लेकिन उनका "सहयोग" थोड़ा कम बताया जा रहा है, इसलिए उनके हिस्से में ट्रेनिंग भी कम आई।अब चर्चा यह भी है कि अगर "सहयोग" ज्यादा होगा तो खर्च की भरपाई भी कहीं न कहीं से करनी पड़ेगी। ऐसे में किसानों को भोजन की जगह नाश्ता मिले और बिल भोजन का बन जाए, तो हैरानी किस बात की?सबसे दिलचस्प बात यह है कि कमलप्रेमी सरकार में पँजाप्रेमी चरणलाल जी का क्षेत्र सबसे ज्यादा "मेहरबानी" पा रहा है, फिर भी स्थानीय कमलप्रेमी नेता खामोश हैं। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
टोल पर नहीं पहचानते…!
वैसे तो अपने चरणलाल जी और उनकी टीम का दावा रहता है कि प्रदेश में उन्हें कौन नहीं पहचानता। खासकर टोल नाकों पर तो पहचान अपने आप हो जाती है।लेकिन रविवार को कहानी कुछ अलग निकली। उनके क्षेत्र के एक टोल प्लाजा पर तैनात कर्मचारी ने कथित तौर पर वाहन को नहीं पहचाना। बस फिर क्या था, साथ चल रहे एक समर्थक का पारा चढ़ गया और उसने उतरकर टोलकर्मी को थप्पड़ जड़ दिया। जवाब में टोलकर्मी ने खिड़की बंद कर ली और इतना जरूर कह दिया।"50 लाख की गाड़ी चला रहा है, माननीय का नाम बता रहा है…"
इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है।अब दिलचस्प सवाल यह है कि जिस मार्ग से माननीय का अक्सर आना-जाना बताया जाता है। उसी टोल पर अगर पहचान का संकट खड़ा हो जाए, तो फिर पहचान का दावा कितना मजबूत है?हाँ, एक बात साफ कर दें—वीडियो से यह स्पष्ट नहीं होता कि वाहन में स्वयं चरणलाल जी सवार थे या नहीं। इसका फैसला दर्शक वीडियो देखकर स्वयं करें।बाकी… पहचान टोल पर मिली या नहीं, लेकिन वीडियो ने सबका ध्यान जरूर खींच लिया है। बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
4000 सवाल… जवाब कितने?
अपने उम्मीद जी, उज्ज्वल जी और एंग्रीमैन आज जिन ऊंचे पदों पर विराजमान हैं, शायद उन्होंने भी अपने विद्यार्थी जीवन में एक साथ 4,000 सवालों वाला प्रश्नपत्र नहीं देखा होगा।लेकिन सिंहस्थ-2028 से जुड़े ICCC (इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर) की निविदा ने यह रिकॉर्ड बना दिया। स्मार्ट के गलियारों से निकली इस लगभग 140 खोखे की योजना की प्री-बिड प्रक्रिया में करीब 4,000 सवाल सामने आ गए।अब सवाल यह नहीं कि इतने प्रश्न क्यों आए… असली सवाल यह है कि क्या निविदा इतनी जटिल थी, या तैयारी इतनी अधूरी?चार हजार सवाल अपने आप में इशारा करते हैं कि कहीं न कहीं तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं थी। अब देखना दिलचस्प होगा कि इन सभी सवालों के जवाब कितनी तेजी और कितनी पारदर्शिता से दिए जाते हैं।क्योंकि सिंहस्थ जैसे महाआयोजन की तैयारी में सवाल जितने कम हों, भरोसा उतना ज्यादा होता है।फिलहाल… 4,000 सवाल हवा में हैं, जवाबों का इंतजार है।
बाकी, फैसला समय करेगा… और हम तब तक अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जय उडेरोलाल… कुछ करो कमाल!
सबसे पहले उडेरोलाल (झूलेलाल) को शत-शत प्रणाम।अब मुद्दे पर आते हैं। शहर में चर्चा है कि एक नामी बिल्डर, जो खुद को विकासपुरुष का कट्टर समर्थक बताते हैं और होर्डिंग-बैनरों में भी यह भावना खुलकर दिखाई देती है।
इन दिनों पर्दे के पीछे से सिंहस्थ क्षेत्र की एक अहम सड़क योजना पर अलग ही राग अलाप रहे हैं।चर्चा यह है कि कोशिश हो रही है कि सड़क नदी और घाट से करीब 200 मीटर दूर बने। जबकि विकासपुरुष पहले ही कह चुके हैं कि जनहित और सिंहस्थ में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए सड़क घाट से लगभग 60-70 मीटर की दूरी पर बनाई जाए। बताया जाता है कि कई किसान भी इसके लिए तैयार हैं।फिर सवाल उठता है कि आखिर 200 मीटर की जिद किसके हित में है? जनहित में... या जमीन के हित में?बिल्डर लॉबी में कानाफूसी है कि यदि सड़क दूर बनी तो आसपास की कुछ निजी जमीनों के भाव कई गुना बढ़ सकते हैं। इसलिए पर्दे के पीछे से माहौल बनाने की कोशिशें भी जारी हैं।अब यह चर्चा कितनी सही है, इसका जवाब संबंधित लोग ही दे सकते हैं। लेकिन समर्थक बनकर एक बात कहना और पर्दे के पीछे दूसरी दिशा में कोशिश करना—यही दोहरी नीति लोगों की जुबान पर है।
ऐसे में डॉ. वसीम बरेलवी का शेर याद आ ही जाता है—
किस पर भरोसा करें, यहाँ कौन किसका होता है।
धोखा वही देता है, जिस पर भरोसा होता है।
बाकी… सच क्या है, यह समय बताएगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद...
जिनकी गर्दन झुक गई थी वो तो कब के मर गए।
मेरी गर्दन कट गई थी और मैं जिंदा रहा
सबको मेरे हौसले की दाद देनी चाहिए
इतनी जालिम जिंदगी थी और मैं जिंदा रहा
शहर बस तब्दील होने को था कब्रिस्तान में
एक मुर्दे की कमी थी और मैं जिंदा रहा।
जुबैर अली ताबिश