13 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

13 जुलाई 2026 (हम चुप रहेंगे)

सरकारी खबर, सच्चे सवाल
जनहित से जुड़े मुद्दों को बेबाकी और निष्पक्षता के साथ आपके सामने लाने का हमारा प्रयास। यहाँ आपको सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक फैसलों, स्थानीय खबरों,  जनसमस्याओं तथा पर्दे के पीछे की घटनाओं की सटीक और भरोसेमंद जानकारी मिलेगी। हमारा उद्देश्य तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता के माध्यम से जनता की आवाज़ को मजबूती देना और जवाबदेही को बढ़ावा देना है। सच, तथ्य और जनहित हमारी प्राथमिकता हैं। जुड़े रहें, जागरूक रहें और हर खबर के पीछे के कारणों को जनहित के सवालों से समझें।हमारी प्राथमिकता हर उस खबर को  जनता के सवालों के साथ प्रमुखता से  उठाना है।ग्रामीण अंचल की जो खबरें कभी सामने नहीं आ पाती हैं। उन खबरों पर सरकारी खबर-सच्चे सवाल की नजर रहेगी। हर नागरिक अपनी समस्या अगर सबूत के साथ भेजेगा। तो उसका परीक्षण करने के बाद प्रशासन से सवाल करने का हम वादा करते हैं।
आपका अपना

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आपका अपना चुप

(बस 24 घंटे ओर)

कुर्सी छोड़ने का इरादा नहीं... या फिर इरादे से बड़ा कोई इशारा
अन्नदाताओं के खुद को माई-बाप समझने वाले 
साहब का तबादला हुए पूरे 28 दिन गुजर गए। न अदालत से राहत मिली, न विभागीय आदेश बदला, ऊपर से कई बार रिलीव करने के मौखिक निर्देश भी बताए जा रहे हैं। लेकिन साहब हैं कि कुर्सी से ऐसे चिपके हैं, मानो तबादला किसी और का हुआ हो। गलियारों में चर्चा तो यहां तक है कि राजधानी की कथित 35 पेटी का भरोसा किसी सरकारी आदेश से भी ज्यादा मजबूत निकला। दूसरी ओर किसानों के नाम पर खरपतवार नाशक दवाओं के लाखों रुपये के बिल, खेतों में दवा पहुंचने से पहले ही पास होकर भुगतान तक होने की चर्चा भी जोरों पर है। सवाल यह नहीं कि आदेश क्यों नहीं मान रहे, सवाल यह है कि आखिर इतनी ताकत आ कहाँ से रही है? कुर्सी भी कायम, वसूली की चर्चाएं भी कायम और सिस्टम भी खामोश।
उस पर साहब ने शुक्रवार को एक तहसील का दौरा किया। तहसील के sdop के माध्यम से दवा विक्रेताओं से बात करी। फरमान जारी कर आए। आज शाम तक 1 पेटी एकत्रित करके जमा कराए।
जब विकासपुरुष के गृह नगर में साहब वसूली से बाज़ नहीं आ रहे है।तो उनके पर किसी शायर का यह शे'र सटीक बैठता है।
ज़िद ऐसी कि आईना भी झुक जाए।
कुर्सी ऐसी कि हुक्म भी रुक जाए।
तभी तो अन्नदाताओं के विभाग से जुड़े मातहत ऐसा बोल रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस विकासपुरुष से  साहब से मुक्ति दिलाओ की गुहार करते हुए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं

मैं परेशान हूँ
पहले ही साफ़ कर दें, कहीं कोई गलतफहमी न पाल ले। मैं तो परेशान हूँ... का दर्द हमारा नहीं है। हम तो बाबा महाकाल और माँ सरस्वती की कृपा से मस्त हैं। परेशानी अगर किसी की बताई जा रही है, तो वह मंदिर के गलियारों में गूंज रहे किस्सों के मुताबिक अपने फटाफट जी की है।
कहते हैं, फटाफट जी ने अपना दर्द उम्मीद जी के सामने रख दिया। उधर से जवाब भी ऐसा मिला, जो सीधे निशाने पर बताया जा रहा है
परेशानी काम की नहीं, टीम की है। टीम होगी तो फोन कम आएँगे, नींद भी पूरी होगी। जब हम थे, सिस्टम चलता था।अब सिस्टम आपको चला रहा है।
अब यह संवाद सच है या गलियारों की गपशप, इसकी गारंटी हम नहीं लेते। लेकिन राजनीति और प्रशासन में एक पुरानी कहावत है।जहाँ बार-बार एक ही कहानी सुनाई देने लगे। वहाँ कहानी से ज़्यादा किरदारों पर नज़र रखनी चाहिए।
वैसे भी कुर्सी का असली इम्तिहान फाइलों से नहीं, टीम से होता है। जो कप्तान हर गेंद खुद फेंकने लगे, समझ लीजिए मैदान में खिलाड़ी कम और दर्शक ज़्यादा हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि फटाफट जी, उम्मीद जी की सलाह को नसीहत मानते हैं या नसीहत देने वाले को ही गलत साबित करने में जुट जाते हैं।
बाकी, हम तो वही करेंगे जो हमेशा करते आए हैं—मंदिर की घंटियों के बीच उठती फुसफुसाहट सुनेंगे, मुस्कुराएँगे ओर मरहूम राहत इन्दौरी के अशआर को लिखकर
सवाल उठे हैं तो कुछ वजह भी रही होगी।
धुऑं वहीं दिखता है जहाँ आग लगी होगी
अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

जब कचौरी के स्वाद ने काफिला रुकवा दिया..
लबों पर स्वाद था, गाड़ियों में ठहराव आ गया।
*कचौरी की महक से  पूरा काफिला रुक गया।
 कहते हैं कि सत्ता का पहिया कभी नहीं रुकता, लेकिन शुक्रवार को एक कचौरी ने इस कहावत को कुछ देर के लिए चुनौती दे दी। विकासपुरुष तो उड़नखटोले से रवाना हो गए। उनके साथ उज्ज्वल जी और कप्तान जी भी उड़ गए।मगर उम्मीद जी, अल्फा जी,दमदमा के 16 वे तीर्थंकर का सड़क वाला काफिला जैसे ही मशहूर चौपाटी के पास पहुंचा। ब्रेक सीधे स्वाद के नाम पर लग गए।
जिस कचौरी की तारीफ मंच से खुद विकासपुरुष कर चुके है।  उसके सामने आखिर सरकारी गाड़ियों का काफिला भी कितना संयम रखता? प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, स्वाद का दौर चला और सड़क पर कुछ देर के लिए रफ्तार भी थम गई। हल्का जाम लगा या नहीं, यह ट्रैफिक वाले बेहतर बताएंगे, लेकिन इतना जरूर है कि चर्चा का मसाला तैयार हो गया।
वैसे जनता भी कमाल है। सड़क पर जाम लगे तो वजह गड्ढे नहीं खोजती, पहले यह देखती है कि कहीं किसी वीआईपी का स्वाद तो नहीं जाग गया! और जब चर्चा होने लगती है तो जनता अपने आप कहने लगती है। लगता है इस शहर में ट्रैफिक नियमों से ज्यादा असर अब कचौरी की खुशबू का है।
बाकी... हम तो वही लिख रहे हैं जो देखने वाले बता रहे हैं। आगे हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

जांच की रफ्तार फटाफट... लेकिन तरीका थोड़ा गड़बड़!
अपने फटाफट जी की एक खासियत है। चुप चाहे जितनी आलोचना कर ले।लेकिन  मंदिर से जुड़ी कोई खबर छपे तो साहब एक्शन लेने में देर नहीं लगाते हैं। इस फुर्ती के लिए उनकी तारीफ बनती है।
ताज़ा मामला शोध संस्थान में कॉशन मनी वसूली के आरोपों का है। खबर सामने आई और फटाफट जी ने बिना समय गंवाए सहायक प्रशासक मैडम को जांच के लिए भेज दिया। यहां तक तो सब बढ़िया था।
मगर... जांच का तरीका देखकर लोग कान खुजाने लगे।
चर्चा है कि जिन वैदिक धोतीधारी पर आरोप हैं, उन्हीं की मौजूदगी में बच्चों से पूछताछ कर ली गई। अब यह भी कोई बात हुई! तालाब में खड़े होकर मगरमच्छ से कोई शिकायत करता है क्या? ऐसे में अगर जवाब 
सब ठीक है ही आए, तो उसमें हैरानी कैसी?
अब तीन सदस्यीय जांच समिति बन गई है। रिपोर्ट क्या आएगी, यह तो समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि अगर जांच का माहौल ही बेखौफ नहीं होगा। तो सच भी शायद जूते पहनकर बाहर निकल जाएगा।
ऐसे में यह लिखना जरूरी है कि
जांच का मतलब सिर्फ फाइल भरना नहीं होता हुजूर। कभी-कभी सच बुलाने के लिए। आरोपी को बाहर भी भेजना पड़ता है।क्योंकि यह सच है कि...
सच पूछना ही था तो अकेले में पूछ लेती मैडम
कटघरे के सामने गवाही अक्सर खामोश रहती है
अब इससे ज्यादा तो हम कुछ लिख नहीं सकते। इसलिए अपने फटाफट जी साधुवाद देकर अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

उड़नखटोले में भी चलता रहा स्तुतिगान...
अपने जिले के प्रभारी बाऊ जी की एक खूबी है। उन्हें बस मौका मिलना चाहिए। फिर चाहे मंच हो, बैठक हो या फिर उड़नखटोले की महज 15 मिनट की यात्रा।विकासपुरुष का गुणगान अपने आप शुरू हो जाता है।
मंच से की गई स्तुति का वीडियो तो सबने देखा ही था। मगर शुक्रवार शाम बदबूदार शहर से बाबा की नगरी के लिए उड़ान भरते समय भी बाऊ जी अपनी आदत से बाज नहीं आए। साथ में दालवाले नेताजी, उज्ज्वल जी और कप्तान जी भी मौजूद थे। उड़ान छोटी थी, लेकिन स्तुतिगान लंबा।
चर्चा है कि पूरे सफर में विकासपुरुष के विकास, नेतृत्व और दूरदृष्टि का ऐसा वर्णन हुआ कि उड़नखटोले की आवाज भी शायद पीछे छूट गई। दिलचस्प यह रहा कि विकासपुरुष सहित बाकी सभी मुस्कुराते रहे और चुपचाप सुनते रहे।
सवाल यही है कि कुछ लोग समय देखकर बोलते हैं, और कुछ लोग मौका देखकर। बाऊ जी दूसरी श्रेणी में आते हैं। उनके लिए हर मंच, हर बैठक और हर सफर—गुणगान का सुनहरा अवसर बन जाता है।ऐसे में अगर यह लिखा जाए कि....
कुछ लोग सफर में भी मंजिल नहीं बस गुणगान करते है
वक्त चाहे पंद्रह मिनिट का हो अवसर का सम्मान करते हैं
यह पढ़कर हमारी सोच से पाठकगण सहमत होंगें! बाकी हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।

रैली में आगे-जिम्मेदारी में पीछे..
एक तस्वीर अपने सरकारी भौपू द्वारा जारी की गई। इस तस्वीर को देखकर हेडिंग में लिखा सवाल खड़ा हो गया। तस्वीर अपने पाटला जी की है। जो कि छपास रोग से पीड़ित है। तभी तो रैली में सबसे आगे चलते हुए तस्वीर खिंचवाई।
अब यह बात अलग है। अपने उज्जवल जी इनको कई दफा फटकार लगा चुके है।15 दिन का वेतन भी काट चुके है। जिम्मेदारी उठाने में पीछे रहते है। बेसुरी आवाज़ में गीत गाने के शौकीन हैं।
एक मातहत को अपनी आवाज की तारीफ के लिए पाल रखा है। जो मुफ्त के सोमरस की  लालच में वाही -वाही करता है। ऐसा हम नही बल्कि स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में बैठने वाले बोल रहे है।
 ऐसे में शायद यह शे'र शायद अपने पाटला जी को आईना  दिखा सके कि 
वो सामने रहे हर तस्वीर में उम्र भर
अफसोस, काम कभी सुर्खियों में न आ सका 
बाकी हमकों कुछ नहीं कहना,आदत के अनुसार है चुप रहना।

जब बाऊजी के लिए रुक गया उटोला!
अपने बाऊजी को भले ही लोकल कमलप्रेमी ज्यादा भाव न देते हों, लेकिन विकासपुरुष का हिसाब कुछ अलग ही दिखाई देता है। शुक्रवार को बदबूदार शहर के हेलीपेड पर दो ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने चर्चा को हवा दे दी।
पहला नजारा तब का है, जब उड़नखटोला उतर चुका था। विकासपुरुष वाहन में बैठ चुके थे। तभी बाऊजी वहां से निकले। बताते हैं कि विकासपुरुष ने उन्हें देखकर तुरंत अपने वाहन में साथ बैठने का इशारा कर दिया। वाहन में पहले से वजनदार जी और 10 नम्बरी वाले नेताजी मौजूद थे, लेकिन बाऊजी के लिए जगह भी बन गई और तवज्जो भी।
दूसरा दृश्य तो और भी दिलचस्प बताया जा रहा है। उड़नखटोले का दरवाजा बंद होने ही वाला था। उज्ज्वल जी, कप्तान जी और दालवाले नेताजी अपनी सीट पर बैठ चुके थे। तभी विकासपुरुष ने सुरक्षाकर्मी को इशारे से बुलाया। फिर उसे कुछ आदेश दिया। सुरक्षाकर्मी दौड़कर बाहर गया और बाऊजी को वापस बुला लाया। इसके बाद सीटों का छोटा-सा गणित बदला और बाऊजी विकासपुरुष के बगल वाली सीट पर दिखाई दिए।
अब इसे सम्मान कहिए। स्नेह कहिए या फिर विशेष तवज्जो। देखने वालों ने अपने-अपने मतलब निकाल लिए। वैसे
राजनीति में सीट बदलने की चर्चा अक्सर दूर तक जाती है।चाहे वह उड़नखटोले की ही क्यों न हो।
यहाँ यह लिखना जरूरी है कि
कुछ लोगों को जगह ढूंढ़नी पड़ती है।और कुछ के लिए जगह बना दी जाती है।तभी तो यह नजारा देखने वाले अपने कमलप्रेमी बोल रहे है।
कुछ रिश्ते परिचय से नहीं तवज्जों से पहचाने जाते हैं
जिनकों बुला लिया जाए वही सबसे खास होते हैं
अपने कालप्रेमियो की बात में दम है। मगर आदत के अनुसार चुप रहना हमारा असली कर्म है।

गोपनीय बैठक... भौपू भी रहा बेखबर!
वैसे तो अपना सरकारी भौपू संकुल में होने वाली छोटी-बड़ी हर बैठक का ढोल पीटने में देर नहीं करता। प्रेस नोट, फोटो और उपलब्धियों का पुलिंदा समय पर पहुंच ही जाता है। लेकिन इस बार मामला कुछ अलग था। जब विकासपुरुष दौरा,मंच पर भाषण और शहर में दो -पहिया वाहन पर घूम रहे थे। उसके पहले संकुल में एक गोपनीय बैठक हो गई। जिसकी भनक तक किसी को नहीं लगी।
चर्चा है कि राजधानी से सड़क विभाग के वही बड़े साहब चुपचाप आए, जिन्हें कभी विकासपुरुष का राइट हैंड माना जाता था और अब विभाग के प्रबंध संचालक हैं। न स्वागत, न प्रेस नोट, न फोटो सेशन। सीधे बैठक... फिर वापसी।
बताया जाता है कि मैराथन बैठक में अपने एंग्रीमैन, इन्दौरीलाल और सड़क परियोजनाओं से जुड़े अधिकारी मौजूद थे। चर्चा का केंद्र रहा 12 खोली और हरिफाटक चौड़ीकरण। सबसे ज्यादा नाराजगी मुआवजे के मामलों में हो रही लेटलतीफी पर जताई गई। 
अब बैठक इतनी गोपनीय थी कि सरकारी भौपू भी शायद रास्ता भूल गया। वरना ऐसी बैठकों की खबर तो चाय ठंडी होने से पहले बाहर आ जाती है।
अब देखना यह है कि नाराजगी का असर जमीन पर दिखता है या फिर अगली बैठक में वही पुरानी फाइलें, वही पुराने बहाने और वही पुराने वादे दोहराए जाएंगे। तब तक हम मरहूम राहत इन्दौरी को याद करते हुए कि... 
सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा
सवाल यह है कि खामोशी किस बात की थी
यह लिखकर अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

वजनदार जी की भड़ास
पिछले दिनों एक बैठक हुई थी। अपने वजनदार जी इसके चेयरपर्सन थे। इस बैठक में खूब हंगामा हुआ था। सुर्खियां बनी थी। मगर अपने उज्ज्वल जी ने बंद कमरें में बैठक करके सुलगती आग पर पानी डाल दिया था। यह तो सबको पता है। लेकिन बैठक में वजनदार ने एक अनोखा तंज कसा था। जो सुर्खियों में नहीं आया। उन्होंने यह तक कह दिया था। आप लोग ही चुनाव लड़ लेना।
उनका इशारा बैठक में मौजूद अधिकारियों की तरफ था। लेकिन इतने साल की राजनीतिक यात्रा में अपने वजनदार जी यह दो लाइन का सबक नहीं सीख पाएं। जबकि उनके गुरु मामा जी इस पर अमल करते है। सबक मरहूम शायर ताहिर फराज के शे'र में छुपा है।  उन्होंने कहाँ है।
जब कभी बोलना वक़्त पर बोलना
मुद्दतों सोचना मुख़्तसर बोलना।
अब फैसला हमारे पाठकगण खुद कर लें। क्योंकि हमकों तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

कमलप्रेमियों का सवाल... आखिर 'विकासपुरुष' कौन है?
पिछले तीन दिनों से अपने चहेते कमलप्रेमियों ने फोन की घंटी बजा-बजाकर एक ही सवाल पूछा विकासपुरुष कौन हैं?
पहले तो लगा कि शायद सबको अचानक याददाश्त की शिकायत हो गई है। हमारा जवाब भी सीधा था।
अरे भैया, पूरे सूबे को पता है विकासपुरुष कौन हैं! लेकिन जब यही सवाल करीब तीन दर्जन कमलप्रेमियों ने दोहराया, तो हमें भी लगा कि दाल में कुछ ज़्यादा ही काला है।
फिर शुरू हुई खोजबीन।
आखिरकार जवाब एक होर्डिंग पर मिला। अपने वजनदार जी के धरती पकड़ दिवस की शुभकामना वाले होर्डिंग में उन्हें ही विकासपुरुष की उपाधि से नवाज़ दिया गया था। बस... तभी कमलप्रेमियों के सवाल का राज खुल गया।
अब चर्चा यह है कि अगर यही रफ्तार रही तो निकट भविष्य में समर्थक उन्हें विकासपुरुष द्वितीय घोषित कर दें। राजनीति में उपाधियां मिलने लगी हैं, तो फिर संस्करण भी आ ही जाएं।
यहाँ यह लिखना हमारा वाजिव है 
खिताब लिखने से पहले थोड़ा इतिहास भी पढ़ लिया कीजिए... कहीं ऐसा न हो कि असली वाले मुस्कुरा दें और नए वाले शर्मा जाएं।
अब कमलप्रेमी,ख़ासकर वजनदार जी के यह दबी जुबान में बोल रहे हैं कि
हर शख्स को आईना दिखाना आसान नहीं होता
कुछ लोग खिताब पहन लेते हैं कमाना नहीं होता
अब हम अपने कमलप्रेमियो की जुबान तो पकड़ नहीं सकते हैं। इसलिए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

उज्ज्वल जी की दो टूक... 'सुपारी' भी बंद, मोबाइल भी बंद!
रविवार को अपने उज्ज्वल जी ने श्रावण मास की दर्शन व्यवस्था और बाबा महाकाल की सवारी को लेकर बड़ी बैठक बुलाई। कप्तान जी, फटाफट जी, एंग्रीमैन सहित व्यवस्था से जुड़े तमाम अधिकारी मौजूद थे। बैठक में कई बातें हुईं, लेकिन दो आदेश सबसे ज्यादा चर्चा में रहे।
पहला—श्रावण मास में कोई भी अधिकारी, कर्मचारी या जिम्मेदार व्यक्ति किसी को दर्शन कराने की "सुपारी" नहीं लेगा।
दूसरा—मंदिर परिसर में मोबाइल पर सख्त नियंत्रण रहेगा। यह नियम वीआईपी पर भी समान रूप से लागू होगा।
दोनों आदेश सुनने में जितने शानदार हैं, जमीन पर उतने ही कठिन। क्योंकि मंदिर का यही वह महीना है, जिसका इंतजार कुछ लोग पूरे साल करते हैं। वजह... सालभर की कमाई का बड़ा हिस्सा इसी एक महीने में निकलता है।
ऐसे में आदेश तभी सफल होंगे, जब फटाफट जी, उनकी टीम और वर्दीधारी अमला बिना किसी दबाव और बिना किसी पहचान के नियम लागू करवाए।
सूत्रों की सलाह भी कम दिलचस्प नहीं है। उनका कहना है कि उज्ज्वल जी को अपनी एक गुप्तचर टीम भी बनानी चाहिए, जो भीड़ में आम श्रद्धालु बनकर घूमे, व्यवस्था पर नजर रखे और जो भी सुपारी सेवा" या नियमों का उल्लंघन करते रंगे हाथों मिले, उस पर तत्काल कार्रवाई कराए।
आखिर "बिना भय के प्रीत नहीं होती", और बिना निगरानी के व्यवस्था भी नहीं।याद रहे कि
नियम वही सफल होते हैं, जिन पर अपनों से शुरुआत होती है, जब वीआईपी भी लाइन में दिखें। तभी व्यवस्था पर जनता को यकीन होता है।
बाकी... सूत्रों की सलाह में दम है, मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप रहना है।

मेरी पसंद...
गलियों में वही लड़के हाथों में वही पत्थर
क्या लोग मोहब्बत को हर दौर में मारेंगे