17 नवम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
हंगामा है क्यो बरपा...
ऊपर लिखी लाइन पढक़र गुलाम अली साहब की फेमस गजल जरूर याद आ गई होगी। जिसकी सबसे फेमस लाइन...थोडी सी जो पी ली है.. डाका तो नहीं डाला..चोरी तो नहीं की है। मगर कमलप्रेमियो में हंगामा पीने के बदले अपलोड पोस्ट हटाने को लेकर है। एफबी के स्टेटस पर मंगलवार की रात को एक पोस्ट अपलोड हुई। मगर 60 मिनिट के बाद भी हटा ली गई। पोस्ट में एक बहुत सुंदर हाथ था। किसी महिला का। जिस पर मेहंदी से बडी सुंदर हस्तलिपि में लिखा था। तुम चाहे कितना भी तडपा लो, प्यार तो तुमसे ही करूँगा...! इतने सर्द मौसम में इतनी रोमांटिक पोस्ट को कई कमलप्रेमियो ने पढा। शायद उसने भी, जिसके लिए अपलोड किया था। उसके बाद पोस्ट हटा दी गई। तभी तो हंगामा बरपा हुआ है। सवाल पूछे जा रहे है। विकासपुरुष के खास नेताजी ने किसके लिए पोस्ट डाली थी? लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है। जिनको पता है, वह हटाकर चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
3 पेटी का झटका...
अभी अभी 1971 से लेकर वर्तमान प्रथम सेवकों, सदन के सभापतियों, नगर सेवको का सम्मेलन संपन्न हुआ है। अच्छी पहल थी। जिसके लिए कमलप्रेमी संगठन को साधुवाद। मगर कार्यक्रम के लिए जेब भी ढीली करनी पडती है। इसके लिए कोई भी तैयार नहीं होता है। ऐसे में कोई न कोई बकरा तलाश किया जाता है। तो इसके लिए भी यही किया गया। बकरे के रुप मे उसका चयन किया गया। जिनको हम सभी स्मार्ट निखट्टू के नाम से जानते है। मगर किसी को यह उम्मीद नही थी। जिनको बकरा समझा जा रहा था, वह शेर निकलेगा। उन्होंने लिखा-पढी और फिर शासन की अनुमति का हवाला देकर यह तीर उल्टा उसी तरफ घुमा दिया। जिधर से आया था। नतीजा अब यह खर्च प्रथम सेवक और उनकी केबिनेट को अपना अपना हिस्सा देकर चुकाना है। प्रति प्लेट 1 हजारी का खर्च आया है। अंदाज से करीब 3 पेटी का बिल तैयार हुआ है। अब इसके लिए किस किस से वसूली होगी। अगर इसका पता हमको चला तो खुलासा करेंगे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
उम्र हर दौर में...
बाल दिवस 70-80-90 दशक की पीढी को तो याद होगा। कैसे मात्र 1 लड्डू मिलने पर बाल दिवस की खुशी 4 गुनी हो जाती थी। मगर जैसे जैसे बडे हुए, नौकरी मिली, पद मिला। बाल दिवस क्या होता है। अपनी आने वाली पीढी को बताना और समझाना हम भूल चुके है। मगर कुछ अधिकारी अपवाद होते है। जिनको अपना बचपन आज भी याद है और वर्तमान पीढी को भी वह बाल दिवस क्या होता है। यह समझा रहे हैं। जैसे अपने कप्तान जी। बाल दिवस के दिन अपने बंगले पर आयोजन रखा। बच्चों के लिए खेल कूद की पूरी व्यवस्था और मनपसंद नाश्ता। इतना ही नही इन सभी बच्चों के साथ वह खुद भी बच्चे बन गए। खूब मस्ती करी और यह साबित कर दिया कि...उम्र हर दौर में बचपन है मचलकर देखो / वक्त तालीम है कुछ और संवरकर देखो / सहमे सहमे से क्यों हो / मौत तो पल भर की है / जिंदगी जश्न है एक बार मना कर देखो...! तो हम भी उनका यह बचपना आजीवन कायम रहे, की दुआ करते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
विकास पुरुष की फटकार...
कमलप्रेमियो में अंदर ही अंदर चर्चा है। अपने विकास पुरुष द्वारा लगाई गई फटकार की। वह भी एक माननीय को। कारण ,माननीय अंदर ही अंदर अन्नदाताओं को भडका रहे थे। उनको लगा किसी को पता नही चलेगा। मगर वह भूल गए। विकास पुरुष का खुद की गोपनीय नेटवर्क है। जो हर खबर उन तक भेजता है। तभी तो रात के अँधेरे में उस माननीय को ऐसी फटकार लगाई कि माननीय की रूह कांप गई। कई अधिकारी भी इस घटना की पुष्टि कर रहे है। मगर माननीय का नाम के मामले में बिल्कुल चुप है। पूछने पर हमको अपने होठों पर एक उंगली रखकर, हमारी भाषा में ही समझा देते है। तो हम भी इशारे को समझते हुए, आदत के अनुसार चुप हो जाते है
जोगी जी धीरे -धीरे...
हम यहाँ फिल्म नदियां के पार के चर्चित गीत की बात नहीं कर रहे है। बल्कि अपने गेरुआ वस्त्रधारी जोगी जी की जल्दबाजी की बात कर रहे है। जो कि कमलप्रेमी संगठन के कारण राजनीतिक जोगी जी हो गए है। वह आजकल बहुत जल्दी में है। तभी तो अकादमी में लगे मेले का श्रीगणेश तत्काल कर दिया। जबकि उनको बोला गया था। थोडा रुक जाए। वजनदार जी आ रहे है। मगर जोगी जी ने बात नही सुनी। फीता काट दिया। नतीजा..वजनदार जी आते ही वापस लौट गए। नाराज होकर। किन्तु जोगी जी की जल्दबाजी ने 15 साल पुरानी यादें ताजा कर दी। जब ऐसा ही हुआ था। तब मेले का फीता तत्कालीन पँजाप्रेमी नेत्री ( अब कमलप्रेमी)ने फीता काट दिया है। ढोल बज गए थे। तत्कालीन सीईओ ने पुलिस को बुलाकर, एक निर्दोष को पकडवा दिया था। जबकि उस मेले का फीता अपने कमलप्रेमी दादा को काटना था। जो कि सांसद थे। उनके लिए वापस फीता बांधा गया था और फिर शुभारंभ हुआ था। अब सवाल यह है कि 15 साल पहले तो विरोधी ने फीता काटा था। दादा के लेट होने पर, मगर इस बार तो कमलप्रेमी जोगी जी ने ही जल्दबाजी दिखाकर फीता काट दिया। अपने ही कमलप्रेमी सांसद को झटका दे दिया। इसके पीछे क्या कारण है? यह खोज का विषय है। जिसका खुलासा खुद कमलप्रेमी ही करेंगे। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
गुहार-किससे करें सरकार...
ऐसा ना तो हम बोल रहे और ना ही आमजनता। यह तो बेचारे अपने कमलप्रेमी बोल रहे है। किससे करें सरकार-गुहार। दरअसल इस स्लोगन के पीछे इशारा मंदिर की तरफ है। दु:खी कमलप्रेमियो की यही गुहार है। हमको केवल दर्शन और सुबह की आरती की अनुमति आसानी से मिल जाए। मगर ऐसा हो नहीं रहा है। आम कार्यकर्ता तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि उसकी गुहार कोई सुनेगा। लेकिन पदाधिकारी तो उम्मीद रखते है। उनकी गुहार सुनाई जाए। एक महामंत्री ने हाइनेस से कहा। मेरी अनुमति बनवा दे। जवाब मिला कि मेरी खुद 25 अनुमति हैं। इसलिए दालवाले नेताजी से गुहार करो। इधर दालवाले नेताजी की अपनी मर्जी होती है। उनका सीधा साफ संदेश है। मुझे ही हर मैसेज भेजा जाए। किन्तु किसकी बनेगी-किसकी नहीं। फैसला अंतिम मेरा होगा। ऐसे में वह महामंत्री सहित कई पदाधिकारी दु:खी है। जो हाइनेस के करीबी है और जिनको आरती की जिम्मेवारी दे रखी है। उनका होटल है और वह टालवाले नेताजी के नाम से चर्चित है। वह गुहार सुनना तो दूर फोन तक नहीं उठाते है। ऐसा कई कमलप्रेमियो का कहना है। मगर हमकों तो बस चुप ही रहना है।
सदमे में कमलप्रेमी...
शहर और जिले के कई कमलप्रेमी बेचारे सदमे में है। ऐसा 24000 बोल्ट करंट का झटका लगा है। जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। सबको इंतजार था। 14 नवम्बर का। जिस दिन ..बिहार में का बा! बिहार में सुशासन बा..का रिजल्ट आने वाला था। अपने विकास पुरुष भी स्टार प्रचारक थे। 26 सीटो की जिम्मेदारी मिली थी उनको। उनके कई विरोधी मानकर चल रहे थे। 26 में से अधिकतम 6 सीट पर विकास पुरुष का जादू चलेगा। जिससे विकास पुरुष की पकड और राजधानी में छवि खराब होगी। मगर उल्टा हो गया। 19 पर जादू चला और विकास पुरुष और ज्यादा सशक्त होकर उभरे। कइयो ने तो पूजा पाठ तक करवाई थी। सब बेकार साबित हुई। ऐसे में विकास पुरुष को कमजोर करने और गलत साबित करने वाले कमलप्रेमियो को सदमा लगना स्वाभाविक है। हालांकि दिखावे के लिए नकली हँसी के साथ अब गुणगान कर रहे है। विकास पुरुष की तारीफ में कसीदे पड रहे है। किन्तु विकास पुरुष को पता है। कौन अपना-कौन पराया है। अब वह भी इंतजार कर रहे है। सही वक्त का। तभी प्रहार होगा। ऐसा विकास पुरुष के खास करीबियों का कहना है। मगर हम तो अपने कमलप्रेमियो को शायर नदीम शाद का अशआर याद दिलाते हैं। ख्वाब जो पूरे करने हो तो जुर्रत करनी पडती है/किस्मत भी होती है लेकिन मेहनत करनी पडती है। तभी जाकर सफलता मिलती है। बाकी सदमे में डूबे कमलप्रेमियो को क्या समझाए, इसलिए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
हिसाब में घालमेल....
हमारे पाठकों की याददाश्त पर हमको गर्व है। तो उनको याद होगा। हमनें 3 विशेष लड्डू सवा -सवा किलो को लेकर खुलासा किया था। जिसमे से 2 लड्डू गायब हो जाते है। उसी यूनिट के हिसाब में घालमेल की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है। मंदिर से लेकर चिंतामन मार्ग तक। जहाँ यह यूनिट स्थापित है। इसमे वित्तीय हिसाब -किताब में गडबडी की बाते सामने आ रही है। तभी तो अपने फटाफट जी ने अपने सहायक प्रशासक को भेजा था। पिछली 6 नवम्बर की शाम 6 बजे बाद। जिन्होंने हिसाब किताब की चेकिंग करी। उसके बाद इस्तीफा दे चुके प्रभारी को भी तलब किया। जो इन दिनों शिक्षा का इंस्टीट्यूट चला रहे है। सम्भवत: तत्कालीन प्रभारी को मंगल-बुध के दिन बुलाया गया था। बात यहीं खत्म नही हुई। उसके बाद सहायक प्रभारी को भी तलब किया गया। अब सवाल यह है कि अगर कोई घालमेल नहीं हुआ है तो फिर इतनी पूछताछ क्यों हो रही है? इसका जवाब किसी के पास नहीं है? पूछने पर सब हमारी तरह हम चुप रहेंगे की तरह इशारा कर रहे है। जिसमें हम आखिर कर क्या सकते है। बस,जो इशारा मिला है, उसकी तरह चुप ही रह सकते हैं।
4 बनाम 13..
पिछले 2 सप्ताह से इस कालम में मंदिर में चल रहे फैक्स कोडवर्ड को उजागर कर रहे है। इसके पीछे मंशा केवल यह है। बगैर अनुमति के सुबह की आरती में अवैध प्रवेश पूरी तरह से बंद हो। मगर जिम्मेदार फटाफट जी और उनके मातहत असहाय नजर आ रहे है। पिछले सोमवार को अवैध इंट्री की संख्या 709 थी। उसके पहले सोमवार को संख्या 172 थी। इसके बाद भी अंकुश नहीं लगा है। ताजा घटना 4 फैक्स पर 13 लोगो की इंट्री जबरदस्ती करवाई गई। इसके अलावा सूत्र का कहना है। पिछले वीक करीब 482 अवैध इंट्री और करवाई गई है। अब सवाल यह है कि एक तरफ आमभक्त तो बेचारा अनुमति के लिए परेशान होता रहता है, या फिर जेब ढीली करके अतिरिक्त राशि देकर अनुमति बनवाता है। जबकि वीआईपी के नाम पर धंधा करने वाले मुफ्त में इंट्री करवा रहे है। जिनके आगे फटाफट जी जैसे पॉवर फुल लाचार नजर आ रहे है। शायद यह पढकर उनका जमीर जाग जाए और वह कोडवर्ड पर अंकुश लगा सके। इसके लिए हम अग्रिम शुभकामनाएं देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मनोकामना पूरी हो...
हमारे देश के एक मंदिर में बाल दान करने की परंपरा के पीछे पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यताएं हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान के सिर पर चोट लगने से बाल गिर गए थे, तो उनकी मां, नीला देवी ने अपने बाल काटकर उनके घाव पर रख दिए, जिससे वह ठीक हो गए। इस त्याग से प्रसन्न होकर, भगवान ने कहा कि जो भी भक्त उनके लिए अपने बालों का त्याग करेगा, उसकी मनोकामना पूरी होगी। हमारे पाठकगण यह पढक़र सोच रहे होंगे! आखिर इस कथा को हमने क्यो लिखा। सबको यह पता है। लेकिन यह पता नहीं होगा कि अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी, एंग्रीमैन और इन्दौरीलाल जी इन दिनों इसी शहर की यात्रा पर गए है। तो दर्शन भी करेंगें। इंसान हैं, कोई न कोई मनोकामना भी होगी। जिसके जल्दी पूरा होने के लिए वहाँ जाने वाला इस परंपरा को निभाता है। बाकी पाठकगण हमसे ज्यादा समझदार है और हमको आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
मेरी पसंद...
कहती है तो कह ले दुनिया मुजरिम हूँ
वो बोले तो मानू जिसका मुजरिम हूँ।
उसके सामने सबने कहा निर्दोष हैं हम
और मैं हाथ उठाकर बोला मुजरिम हूँ।
देख रहे है लोग मुझे यूँ हैरत से
जैसे मैं दुनिया का पहला मुजरिम हूँ।
रोज मुझे पेशी पर जाना पडता है
मैं मुंसिफ का सबसे प्यारा मुजरिम हूँ।
वरुण आनंद