10 नवम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
मैं भी ऊंची आवाज में....
अपने उज्ज्वल जी की जो आदत हमकों पसंद है। वह है कोई भी उनसे मिले। सबकी बात को सुनते हैं और पूरे मनोयोग से। गुस्सा नही दिखाते है। कोशिश करते है कि प्रार्थी खुश होकर जाए। मगर कभी कभी प्रार्थीगण भूल जाते है। अगर कोई शांतचित से आपकी बात सुन रहा है, तो वह कमजोर नही है। लोग इसको कमजोरी समझ लेते है। ऊंची आवाज में बोलने लगते है। जैसा मीडिया दौरे में हुआ। कुछ किसानों ने उज्ज्वल जी से मिलकर किसी बात पर गुहार लगा दी। अपने उज्ज्वल जी अपनी आदत अनुसार सुन रहे थे। जिसे देखकर किसानों ने अपनी आवाज को बुलंद कर लिया। बस फिर क्या था। उज्ज्वल जी ने पलटवार कर दिया। साफ कह दिया.. मैं भी ऊंची आवाज में बोल सकता हूँ। यह सुनते ही किसानों की सकीपकी बंध गई। सब चुप हो गए। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
सबक लेना चाहिए......
शादियों का सीजन शुरू होने वाला है। शादी में आजकल दिखावा बहुत होने लगा है। फिर भले कर्ज लेकर करना पडा। शायद इसीलिए कहावत है। शादी के दौरान तो मेहमानों की भीड होती है। उसके बाद शादी वाले घर पर जो लोग नजर आते है। वह कर्ज वसूलने वाले होते है। ऐसे में आमजनता को अपने विकास पुरुष से सबक लेना चाहिए। जिनके घर पर शहनाई बजने वाली है। मगर बगैर किसी तामझाम के। सम्मेलन में शादी होगी। कोई दिखावा नही होगा। जबकि वह हर तरीके से सक्षम है। वह खुद शादियों में दिखावे और तामझाम के खिलाफ है। एक साक्षात्कार में खुद उन्होंने यह कहा था कि शादी में दिखावा करने के वो सख्त खिलाफ है। अब वह उसे साबित भी करने वाले हैं। ऐसे में आमजनता को भी उनसे सबक लेना चाहिए। विकास पुरुष के इस कदम के लिए हम उनको अग्रिम शुभकामनाएं देते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
प्रशिक्षण दिलवाए शासन...
पिछले कुछ महीनों में अकसर आईएएस अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच विवाद की खबरे लगातार पडने में आती है। ताजा उदाहरण देवी अहिल्या नगरी का है। इसके पहले नवरात्रि पर्व पर मां चामुंडा नगरी में विवाद हुआ था। जनता के चुने गए माननीयो को तो कोई भी प्रशिक्षण नही सुधार सकता है। जबकि पार्टी द्वारा उनको समय समय पर निर्देश/नसीहत दी जाती है। किंतु नए नवेले आईएएस को इन परिस्थितियों से कैसे निपटा जाए। इसकी ट्रेंनिग दी जा सकती है। इसके लिए मास्टर ट्रेनर के रूप में सबसे बेहतर अपने उम्मीद जी हो सकते है। वह जहां भी पदस्थ रहे है। शायद ही ऐसा अवसर आया होगा ,जब माननीय से भिडंत हुई होगी। बेहतर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से समन्वय बनाने के 1000 तरीके वह जानते है। अगर उनसे सिर्फ 2 घण्टे का प्रशिक्षण नए नवेले आईएएस को दिलवाया जाए। ताकि सरकार और माननीयों में समन्वय बना रहे, तो कोई गलत नहीं होगा। विकास पुरुष से ऐसी गुहार है। बाकी करना या नहीं करना, उनकी मर्जी। हमको तो बस चुप रहना है।
फिर एक सौगात...
बाबा की नगरी में उद्योग की कई सौगाते लगातार मिल रही है। इस माह की 14 तारीख को फिर एक भूमि पूजन होने वाला है। सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में। 8000 करोड का यह प्लांट है। जो कि तराना तहसील में स्थापित होगा। हालांकि इस भूमि पूजन का कार्यक्रम मक्सी में होगा। जिसके लिए तैयारी शुरू हो गई है। यह सौगात देने वाले अपने विकास पुरुष है। तो भूमि पूजन भी उनके कर -कमलों से होगा। ऐसी चर्चा एमपीआईडीसी के गलियारों में सुनाई दे रही है। बस, इंतजार विकास पुरूष की सहमति का है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
जुल्म सहने से जालिम की ...
किसी शायर ने खूब लिखा है। कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज सुखन / जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है। यह अशआर इन दिनों मंदिर के गलियारों में सुनाई दे रहा है। इशारा अपने फटाफट जी की तरफ है। जो चुप रहकर जालिम की मदद कर रहे है। अलसुबह की आरती में। जिसका कोडवर्ड फैक्स है। जुल्म करने वाले इंसाफ के मंदिर के एक बाबू और हाजिर हो की आवाज लगाने वाले है। इनके आगे फटाफट जी खुद को असहाय महसूस कर रहे है। तभी तो 80 का कोटा होने के बाद भी फैक्स की आड लेकर मुफ्त में भक्तों को ले जाते है। इसकी वजह यह है कि कोटे वाली अनुमति में हल्के हरे रंग के कागज से अपनी जेब गर्म कर ली जाती है। उसके बाद असली लोगो के लिए फैक्स का खेल शुरू हो जाता है। पिछले सप्ताह सोमवार से लेकर रविवार की सुबह तक फैक्स के माध्यम से 790 लोगों को आरती में प्रवेश दिलाया गया। ऐसी मंदिर में चर्चा आम है। अगर फटाफट जी फैक्स की जांच करवा लें, तो कई गोपनीय राज उजागर हो सकते है। लेकिन इसके लिए पंगा लेने की हिम्मत चाहिए। वह कोई करना नही चाहता है। तभी तो.. जालिम की मदद होती है... सुनाई दे रहा है। बोलने वालों की बात में दम है और हम केवल लिखकर इशारा कर सकते है। बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
फैसला नहीं लेते...
शायर नवाज देवबंदी ने खूब कहा है। आजकल न जाने किस कशमश है मुंसिफ/ बहस रोज सुनते हैं फैसला नहीं देते। मगर जब फैसला लिया। तो सिंहस्थ की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। हर दिन कीमती है। ऐसे में राजधानी के एक एसीएस ने गजब फैसला लिया। अंडर ग्राउंड केबलिंग को लेकर। जिसको लेकर लंबे समय से प्लानिंग हुई, डीपीआर बनी। गुरुवार को अपने इंदौरलाल जी को प्रस्ताव लेकर गए। जहाँ साहब का मूड अचानक फैसला देने का हो गया। उन्होंने तत्काल अंडर ग्राउंड केबलिंग पर निर्णय सुना दिया। मुंसिफ ने साफ कह दिया कि ...ऐसा कुछ नहीं होगा। पोल लगाकर ही लाइट लगेगी। यह निर्णय सभी सडको के निर्माण पर लागू होगा। मतलब शिवाजी भवन द्वारा बनाई जाने वाली सडको पर भी। ताज्जुब की बात यह है कि इससे अपने विकास पुरूष का वह सपना भी प्रभावित हुआ है। सवारी मार्ग पर अंडर ग्राउंड केबलिंग का। शिवाजी भवन ने अपनी सभी सडको पर अंडर ग्राउंड केबलिंग के लिए करीब 200 खोखे की योजना तैयार कर ली थी। राजधानी के मुंसिफ के इस फैसले से असर यह पडा है। सिंहस्थ के काम 2 कदम आगे-4 कदम पीछे की कहावत चरितार्थ कर रहे है। अब यह देखना रोचक होगा कि अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी, इलाहाबादी एंग्रीमैन अपने मुंसिफ जी को मना पाते है या नहीं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
बीमारी बनाम डॉक्टर...
शीर्षक पढकर पाठकगण उस बीमारी का नही सोचे? जो इंसानों को होती है और डॉक्टर इलाज के लिए दवा देता है। यहां आशय राजनीतिक घटना क्रम से है। पिछले दिनों विशेष सम्मलेन बुलाया गया था। अपनी बहनजी द्वारा। जिसमे शिवाजी भवन की बीमारी ने जमकर भडास निकाली। खुलकर शासन और प्रशासन को कोसा। जिसकी पूरी रिकार्डिंग हुई है। जो राजधानी में अपने डॉक्टर साहब (विकास पुरूष) तक पहुँच गई है। जिसके बाद शिवाजी भवन के गलियारों में सवाल उठ रहा है। बीमारी का सही इलाज अपने डॉक्टर साहब कर पाएंगे? अगर करेंगे तो कब तक? इन दोनों सवालों का जवाब केवल डॉक्टर साहब के पास है। जो कि लंबे समय से चुप है। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
माननीय के समर्थक पिटे...
वर्दी वालो के बीच दबी जुबान से चर्चा है। एक माननीय के खास बंदे की पिटाई की। कुटाई भी वर्दीवालों ने ही करी है। मगर मजबूरी में। क्योंकि समर्थक समझने को तैयार ही नहीं थे। वीआईपी वर्दीवालों ने फिर तो डंडे से आवभगत कर दी। केस अलग दर्ज कर लिया। क्योकि समर्थक के खिलाफ एक पीडित महिला आवेदन लेकर आई थी। लिव-रिलेशनशिप में मारपीट करने का। समर्थक के लिए फोन भी आया था। अपने माननीय जी का। किन्तु समर्थक को गर्मी चढी थी। वह अपनी दादागिरी दिखाने लगे थे। इसी का यह परिणाम था। यह माननीय जिले के भले नही है, मगर लोस क्षेत्र के अंदर आते है। ऐसा वर्दीवालों का कहना है। मगर हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
यह कैसी हमदर्दी..
यह स्लोगन तो हमारे पाठको ने पढा होगा और याद भी होगा। वर्दी ही नहीं, हमदर्दी भी। मगर एक अनोखा मामला सामने आया है। जो कि रोंगटे खडे कर देता है। यह कैसी हमदर्दी है? इस पर प्रश्नचिन्ह खडा कर रहा है। घटना छुकछुक गाडी वाली वर्दी से जुडी है। जिनका कार्यक्षेत्र प्लेटफार्म और पटरी होता है। इसी क्षेत्र की वर्दी वाले दबी जुबान से बोल रहे है। एक वृद्ध के साथ लूट हुई। आरोपियों ने लूट तो करी ही, वृद्ध को पटरी पर लेटा दिया। जिससे उसकी एक टांग कट गई। खबर मिलने पर वर्दी पहुँची और फरियादी को अस्पताल में भर्ती करवा दिया। आश्चर्य की बात यह है कि वृद्ध की कटी टांग घटना स्थल पर ही छोड दी थी। जो कि 12 घण्टे बाद अस्पताल पहुचाई। अगर समय पर कटी टांग डॉक्टर को मिल जाती, तो शायद जुड सकती थी। तभी तो वर्दी की यह कैसी हमदर्दी पर सवाल, खुद वर्दीधारी उठा रहे है। सवाल लाख सही है, मगर हमको तो बस चुप ही रहना है।
....दोगे तो छुडा देगी!
रिश्वत को लेकर किसी शायर ने लिखा है, सटीक और जोरदार। रिश्वत के भी दो पहलू हैं....! लोगे तो फसा देगी दोगे तो छुडा देगी। आमजन तो अपने काम के कारण देने पर मजबूर होते है। मगर शायर की यह लाइन..दोगे तो अधिकारी वर्ग के सबसे मुफीद साबित हुई। जिसका फायदा उठाकर अधिकारी वर्ग ने निसंकोच अपनी जेब गर्म करना शुरू कर दिया। यह सोचकर कि अगर कभी पकडे भी गए तो देकर छूट जाएंगे। ऐसा हुआ भी है। कई उदाहरण मिल जाएंगे। इस चक्कर मे कई अधिकारियों ने काम के रेट तक फिक्स कर दिए। इसमे अभी तक जिले में सबसे अव्वल अपने चुगलखोर जी थे। अब एक और उन्ही के बिरादरी के तहसीलदार इस सूची में शामिल हो गए है। ऐसी चर्चा मावा नगरी तहसील में है। जहाँ पदस्थ अधिकारी ने रेट फिक्स कर दिये हैं। रजिस्ट्री और बटवारा 3 और फौती नामांतरण के 5 हजारी। एक काश्तकार से उन्होंने नामांतरण को लेकर 50 हजारी सौदा पिछले दिनों किया था। यह वही अधिकारी है जिनका तबादला जब पिछली तहसील से हुआ था। तो खुशी में फटाके फोडे गए थे। ताज्जुब की बात है कि लेने का काम अधिकारी सीधे करते है। अपनी केबिन में बैठकर। यही रेट उन्होंने अपने मातहतों ग्राम देवता के लिए तय कर रखे है। खबर पक्की है। मगर हमको तो बस चुप ही रहना है।
रोकने पर मिलेगी सजा...
वाइज शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर/या फिर वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं। इस खूबसूरत अशआर को इन दिनों अपने वर्दीधारी अलग अंदाज में सुना रहे है। उनकी बानगी में शेर कुछ इस तरह पेश किया जा रहा है। वाइज शराब बिकने दे हर जगह /रोकने पर मिलेगी तुझको सजा। यह जग जाहिर है। शहरी क्षेत्र में सोमरस बिक्री पर रोक है। मगर शहरी सीमा से बाहर आसानी से मिलती है। इससे वर्दी परेशान है। वह भी आखिर इंसान है। पहले दुकानों से कमीशन और बोतल भी मिल जाती थी। बियर बार पर हुक्म चलता था। मगर अब ऐसा नहीं है। कमीशन और हुक्म तो गए तेल लेने। उल्टे इलाके में जहाँ जहाँ मिलती है। उस तरफ झांक भी नहीं सकते है। तभी तो देवास रोड पर 2 जगहों आराम से बैठकर सोमरस का आनंद लिया जा सकता है। मगर एक शर्त है। कस्टमर को अपना मोबाइल काउंटर पर जमा करना होगा। ऐसा हम नही, बल्कि खुद दु:खी वर्दी कह रही है। मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।
बाऊ जी की सलाह....
जिले के प्रभारी मंत्री अपने बाऊ जी वाकई सहज-सरल-मिलनसार है। उनको देखकर यह गलतफहमी हो सकती है। इनको राजनीति की पकड नहीं होगी। मगर आपकी नजर धोखा खा सकती है। उनकी राजनीतिक सूझ बूझ किसी भी बरगद - पेड की जड तरह गहरी है। इसका प्रमाण विश्राम गृह पर देखने को मिला। जब वह कमलप्रेमियो को एसआईआर(विशेष गहन पुनरीक्षण) का महत्व और बारीकियां समझा रहे थे। उन्होंने इतनी सरल भाषा मे एसआईआर को समझाया कि वहां मौजूद सभी कमलप्रेमियो को 2 मिनिट में समझ आ गया। उनकी सरल सीधी भाषा मे इसका महत्व समझकर, अपुन भी उनके कायल हो गए। वैसे भी बाऊ जी पुराने पत्रकार है। तो तथ्यों को कैसे पेश किया जाए कि आसानी से समझ आ जाए। इसकी परख रखते है। उन्होंने उसी तरीके से समझाया औऱ कमलप्रेमियो को बात गले उतर गई है। अब देखना यह है कि अपने कमलप्रेमी बाऊ जी की सलाह पर कितना अमल करते हैं। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
मेरी पसंद..
तेरे दिन अच्छे हैं सो हमसे किनारा कर ले
हम बुरे लोग, बुरे वक्त में काम आते हैं
या फिर
क्यों न बदलू में तुम वही हो क्या
चलो माना मैं गलत हूँ, तुम सही हो क्या..!