19 मई 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

19 मई 2025 (हम चुप रहेंगे)

आदर्श ... 

जिले के एक माननीय है। अपने बदबू वाले शहर के। जिनको लेकर कमलप्रेमियों में चर्चा आम है। आदर्श और उच्च विचार में हमारे डाक्टर साहब की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। जमीन से जुड़े है-साफगोई से बोलते है। फिर वह भले ही प्रशासनिक बैठक हो या संगठन की। ऐसी एक बैठक लगभग एक-डेढ माह पहले हुई थी। परिवहन व्यवस्था से जुड़ी। जिसमें उन्होंने बस स्टेंड की व्यवस्था पर सवाल उठाये थे। गंभीर आरोप लगाये थे। जिसके बाद बस वालो पर कार्रवाई हुई। 2-3 बसे बंद हुई। इससे बस वालो का संगठन घबराया। मगर व्यवस्था सुधर गई। जनता खुश हुई। कुछ दिनों बाद संगठन का एक दल मिला। अपने डॉ. साहब से। दल ने जाने क्या और कौन सा लालीपाप थमाया। वापस पुरानी व्यवस्था लागू हो गई। अब कमलप्रेमी दबी जुबान से बोल रहे है। शायद हल्के हरे रंग का लालीपाप था। दूसरा मामला सामूहिक विवाह सम्मेलन का है। जिसमें विकासपुरूष शामिल हुए थे। जहां मंच पर आसीन होने के लिए उनके साहबजादे जिद पर अड गये। वर्दीवालो से बहस हो गई। तू-तडाक भी हो गई। अब डॉ. साहब को गुस्सा आ गया। उन्होंने कप्तान तक शिकायत पहुंचा दी। नतीजा ड्यूटी करने वाले वर्दीधारी को जमा करा दिया गया। इन दोनों घटनाओं के बाद आदर्श और उच्च विचार को लेकर कमलप्रेमी बहुत कुछ बोल रहे है। जिसे हम लिख नहीं सकते है। इसलिए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

पेशी ...

आम नागरिक कानून की अवज्ञा करे। तो उसका पेशी पर हाजिर होना आम बात है। किन्तु कोई आईएएस अधिकारी अवज्ञा करे। कानून की जानकारी होने के बाद भी। तो उसकी पेशी खबर बन जाती है। ऐसे ही एक आईएएस अफसर है। जो 70-75 दिनों के बाद सेवानिवृत्त होने वाले है। उनको पिछले सप्ताह पेशी पर हाजिर होना पड गया। वह भी व्यक्तिगत पेशी। कारण ... स्टे होने के बाद भी उन्होंने आरोप पत्र थमा दिया। भूल गये। कानूनन यह गलत है। जिस पर माननीय मीलार्ड ने संज्ञान ले लिया। नोटिस जारी कर दिया। अपने समक्ष तलब कर लिया। पिछले सोमवार को। माननीय मीलार्ड ने उनको क्या नसीहत दी होगी। अंदाजा लगाया जा सकता है। जिस आईएएस को तलब किया गया था। उसकी चर्चा संकुल के तीसरे माले पर, उनके ही मातहत दबी जुबान से कर रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

बिल- 2 ...

डिजीटल युग के इस दौर में इंसान की याददाश्त अब पहले जैसी नहीं रही है। सुबह का पढ़ा या देखा हुआ, शाम को इंसान भूल जाता है। फिर हम तो 3 हफ्ते पहले लिखे गये लाठी जी के बिल का उल्लेख कर रहे है। जिसको लेकर वर्दीवालो में फिर सुगबुगाहट है। एक पुरानी खरीददारी के बिल की। जिसे एक वर्दीधारी को थमाया गया था। एक अष्टधातू की मूर्ति खरीदी गई थी। जिसका बिल भुगतान एटीएम से राशि निकालकर किया था। इस मूर्ति की पूजा एक साहब जी के कार्यालय में हर रोज की जाती है। वर्दीवाले यह तक बोल रहे है कि लाठी जी, 2 हजारी तक के बिल भी थमाने में संकोच नहीं करते है। नतीजा अब वर्दीधारियों में आक्रोश पनप रहा है। तभी तो यह बोला जा रहा है। अब अगर बिल थमाया गया तो वह बिल नहीं भरेंगे। फैसला वक्त करेंगा। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

किस्मत ...

हर आईएएस की किस्मत ऐसी नहीं होती है। जिन पर बाबा और विकासपुरूष दोनों ही मेहरबान हो जाये। वह भी इस कदर कि रिकार्ड टूट जाये। संकुल में नया इतिहास बन जाये। अभी तक यह देखा गया है और यह माना जाता है। किसी भी आईएएस को बाबा की नगरी में सेवा करने का मौका अधिकतम 2 दफा ही मिलता है। किन्तु अपने उम्मीद जी अपवाद हो गये है। सबसे पहले शिवाजी भवन को संभाला। अपने इशारा जी के समय। फिर कोरोना काल में जिले के मुखिया बने। अब एक बार फिर मेला अधिकारी बनकर आ गये है। बाबा और विकासपुरूष की कृपा रही, तो जल्दी ही 7 जिलों के मुखिया बनकर आयेंगे। तभी तो आईएएस लाबी में उनकी किस्मत को लेकर चर्चे सुनाई दे रहे है। कुछ उनकी किस्मत से रश्क भी कर रहे है। मगर अपने उम्मीद जी को कोई फर्क नहीं पडता है। वह तो अपनी मस्ती में मस्त और चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

नंबर-बगैर नंबर ...

संकुल के गलियारों में नंबर और बगैर नंबर को लेकर चर्चा सुनाई दे रही है। नंबर से इशारा एक कक्ष क्रं. की तरफ है। जबकि बगैर नंबर से मतलब वाहन क्रमांक को लेकर है। पहले बात नंबर वाले कक्ष की। जो कि 209 है। जिसमें एक निजी कर्मचारी बैठकर सरकारी कामकाज निपटा रहा है। वजह अधिकारी को अपने सरकारी स्टाफ पर भरोसा नहीं है। इसलिए निर्वाचन के ठेकेदार का निजी कर्मचारी बाले-बाले रख लिया है। जो कि कक्ष में बैठकर आदेश आदि बनाता रहता है। अब बात बगैर नंबर के वाहन की। यह वाहन मार्च माह में खरीदा गया था। बिलकुल नया वाहन। नियमानुसार 30 दिन में वाहन का नंबर आ जाता है। मगर अपर साहब को बगैर नंबर के ही वाहन में बैठना पसंद है। इसलिए उन्होंने इस ओर ध्यान देना ही उचित नहीं समझा है। जबकि वह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी है। जो खुद नियम का पालन नहीं कर रहे है। ऐसा हम नहीं, बल्कि संकुल वाले बोल रहे है। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते है।

रोष ...

कमलप्रेमियों में खतरनाक रोष है। अभी-अभी हुई कमंडल नियुक्तियों को लेकर। बेचारे ... कमलप्रेमी कार्यकर्ताओं ने सोचा भी नहीं था। उनके साथ ऐसा होगा। पहले निर्देश मिले। अपनी-अपनी पसंद से लिस्ट तैयार करके जमा कराये। निर्देश का पालन किया। फिर सूची के नामों पर खोजबीन हुई। जो नाम आये थे सूची में। उनकी सोशल मीडिया एक्टिविटी खंगाली गई। कौन किससे जुड़ा है। कौन किसका    चेला है। इसको गौर से देखा गया। जरा भी शंका होने पर तत्काल सूची से नाम हटा दिया गया। इधर सूची देने वाले खुश थे। किन्तु जब घोषणा हुई तो उनके चेहरे उतर गये। तभी तो कमलप्रेमियों में रोष है। ऐसा हम नहीं, बल्कि पुल पार वाले कमलप्रेमी बोल रहे है। बात उनकी सच है। लेकिन कर कुछ नहीं सकते है। इसलिए चुपचाप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।  

बंद लिफाफा ...

अभी पिछले सप्ताह एक बैठक हुई। प्रथमसेवक और उनके पंचपरमेश्वर की। जिसमें कई प्रस्ताओं पर मोहर लगी। इस बैठक में एक बंद लिफाफा भी रखा गया था। जो कि बैठक खत्म होने के बाद भी बंद ही रहा। यह बयान जरूर आया। बंद लिफाफा सीधे वर्दी को भेजा जायेगा। जिससे संदेश यही दिया गया। लिफाफा खोला ही नहीं गया है। लेकिन यह सच नहीं है। इस बैठक के एक दिन पहले प्री-बैठक हुई थी। जिसमें यह लिफाफा बकायदा खोला गया था। उसके अंदर मौजूद रिपोर्ट को ध्यान पूर्वक पढ़ा गया। बाद में लिफाफे को वापस सीलबंद कर दिया गया। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। मगर जांच रिपोर्ट में क्या लिखा था। इसको लेकर पढऩे वाले सभी चुप है। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

बधाई ...

मंदिर में काम करने वाले बधाई दे रहे है। किसको? अपने नये मुखिया और फटाफट जी को। जिनकी सख्ती से सुबह होने वाली आरती में अंकुश लगा है। संख्या नियंत्रण पर अंकुश। पहले यह होता था। अनुमति 1200 की बनती थी और भीड अंदर 1600 की नजर आती थी। मगर अब इस अवैध घुसपैठ पर प्रतिबंध लग गया है। तभी तो बधाई दी जा रही है। तो हम भी इस अंकुश कार्यप्रणाली पर बधाई देकर, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

सवाल ...

अपने विकासपुरूष के एक सवाल ने सभी अधिकारियों को चुप रहने पर मजबूर कर दिया। सिहंस्थ समीक्षा बैठक का मामला है। हर बैठक की तरह इस बैठक में भी पीपीटी दिखाना शुरू कर दिया था। अपनी चटक मैडम जी ने। जिसे विकासपुरूष ने मुश्किल से 5 मिनिट देखा। फिर यह सब बंद करवा दिया। उन्होंने ऊंगलियों पर फटाफट काम गिनवा दिये। इसके बाद उन्होंने एक सवाल कियाउज्जैन का पहला कलेक्टर आफिस कहां पर स्थित था। इस सवाल ने सबकी बोलती बंद कर दी। हाइनेस ने जरूर बताया। मगर उत्तर गलत था। आखिरकार खुद विकासपुरूष ने अपने ही सवाल का जवाब दिया। गोपाल मंदिर रीगल टॉकीज के पीछे पहला कलेक्टर आफिस था। जिसे सुनकर वहां मौजूद सभी अधिकारी आश्चर्य में पड गये और विकासपुरूष की बात सुनकर चुप हो गये। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

50 बनाम 44 ...

दमदमा के गलियारों में 50 बनाम 44 अंक की चर्चा सुनाई दे रही है। इशारा हेल्पलाइन व गंगा संवर्धन योजना की तरफ है। अभी-अभी रेटिंग हुई है। जिसमें हेल्पलाइन का नंबर 50 और जल संवर्धन का नंबर 44 पर है। जिसके चलते अपनी चटक मैडम जी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैविकासपुरूष का गृह जिला और नंबर इतने कम। उस पर अपनी मैडम जी की इच्छा है। वह शिवाजी भवन की कुर्सी संभाले। इसके लिए उन्होंने राजधानी में बड़े साहब के सामने अपनी मंशा भी जाहिर कर दी है। अब देखना यह है कि 50 और 44 की कार्यप्रणाली के बाद भी उनकी इच्छा पूरी होती है या नहीं? तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।