22 सितम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
अब तो अपनी आंख खोलिए
सिंहस्थ को लेकर उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।2027 के इन्ही महीनों तक निर्माण कार्य पूरे होना जरूरी है।मगर निर्माण कार्य से जुड़े विभाग के मुखियाओं की नींद अभी तक नहीं खुली है।तभी तो प्रमुख सचिव ने बैठक में नाराजगी दिखाई।उन्होंने सभी विभागों से 'पर्ट -चार्ट' मांग लिया।सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे।यह चार्ट वह होता है।जिसमे दर्ज होता है कि कितने दिन में -कितना काम पूरा होगा।यह हकीकत देखकर राजधानी से आए आईएएस अफसर नाराज हुए।बैठक में अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी भी मौजूद थे।वह चुप रहे,मगर हम इस मौके पर मरहूम डॉ सागर आजमी के अशआर में थोड़ा फेरबदल करते हुए.. जाने कब की सुबह हो चुकी/चलिए उठिए खूब सो लिए/सिंहस्थ नजदीक आ गया है/अब तो अपनी आंख खोलिए... लिखकर, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
जिंदगी हर कदम एक नई जंग है
वर्दी के बीच कानाफूसी सुनाई दे रही है।एक जंग की।जो कि अघोषित है।इसको तनातनी भी बोल सकते है।जंग भी कोई आम वर्दीधारी के बीच नही है।बल्कि 2 आईपीएस के बीच है।जिसमे 1 वरिष्ठ है तो एक जूनियर।उदाहरण के रुप मे समझे तो एक आईपीएस रेंज के मुखिया है,तो दूसरे को हम कप्तान समझ सकते हैं।दोनो के बीच यह तनातनी "वर्चस्व" को लेकर है।कोई दूसरा कारण तो हमकों नजर नहीं आ रहा है और न ही कोई वर्दीधारी इस तरफ इशारा कर रहा है।ये जरूर बोला जा रहा है।वर्चस्व की इस जंग में तीसरी पार्टी अपने विकास पुरूष है।जिनकी तवज्जो का ज्यादा हक़दार कौन होगा? इसी कारण से वर्दीधारी किसी फ़िल्म का गीत गुनगुना रहे हैं।जिंदगी हर कदम एक नई जंग है...!जिसमे हम आखिर कर क्या सकते हैं।बस,आदत के अनुसार चुप रह सकते है।
थप्पड़ की गूंज...
हमारे पाठको ने एक फ़िल्म जरूर देखी होगी।जिसका नाम "कर्मा"था।जिसमे मरहूम दिलीप कुमार ने जेलर और अनुपम खेर ने डॉ डेंग की भूमिका निभाई थी।जिसका डायलॉग था।इस थप्पड़ की गूंज हमेशा सुनाई देगी।इस फ़िल्म और डायलॉग की चर्चा इन दिनों शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है।मगर दबी जुबान में।इसमे दिलीप कुमार की भूमिका निभाने वाले युवा तुर्क हैं और थप्पड़ खाने वाले सबसे छोटे कचरा उठाने वाले कर्मचारी।घटना के बाद विवाद हुआ।तब युवा तुर्क को अहसास हुआ।ये क्या कर दिया।तो सदभाव का चित्र डाला गया।जिसमें सड़क पर बैठकर बातचीत करते नजर आए,युवा अधिकारी।घटना 100 प्रतिशत सच है।किन्तु पहली गलती है ।जो जोश जोश में कर बैठे हैं।बाकी काम अच्छा कर रहे हैं।इसलिए फिलहाल इसको नजरअंदाज करके,अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
वित्तीय घोटाला
संकुल के गलियारों में चर्चा है।एक वित्तीय घोटाले की।हालाकि मामला केवल 5 पेटी का है।लेकिन बारीकी से जांच हो तो आंकड़ा बढ़ सकता है।यह उस विभाग का घोटाला है।जिसका उपयोग 5 साल में एक बार होता है।गड़बड़ी सेवा शुल्क देने में हुई है।जिसको पकड़ा आडिट करने वाली टीम ने।जो पिछले दिनों आई थी।टीम ने एक बाकायदा पत्र लिखकर 5 पेटी ज्यादा भुगतान करने का उल्लेख किया है और वसूली की सिफारिश भी।जिस एजेंसी को "अनुबंध" से ज्यादा राशि दी गई है।उसका संचालन राजधानी से होता है।मगर फर्म का नाम देवी अहिल्या नगरी शहर के नाम पर है। इस मामले में एक बाबू की भूमिका पर ऊँगली उठ रही है।यह वही बाबू है,जिसको हटाने का आदेश तत्कालीन अपर कलेक्टर ने लिखित में किया था।मगर बाबू ज्यादा पॉवर फुल है।अपर कलेक्टर का तबादला हो गया, किन्तु बाबू आज भी लेखा शाखा में विराजमान है।इसी बाबू ने आपरेटरों से 20-20 हजारी वसूली का प्लान बनाया था।जिसको चुप रहेंगे ने उजागर कर दिया था।जिस पर अपने उज्ज्वल जी ने एक्शन लिया था।वसूली नहीं हो पाई थी।अब वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है।देखना यह है कि उज्ज्वल जी,अब क्या ठोस कदम उठाते हैं?बाबू का अटैचमेंट खत्म कर पाते है या नहीं?तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
कैमरे की नजर..
अपने फटाफट जी की दूरदर्शिता काम आ गई।उन्होंने जो कैमरे लगवाए थे।उससे चोरी पकड़ में आ गई।नगद चोरी।जो एक छात्र ने महिला कर्मचारी के पर्स से निकाल लिए थे।जब कर्मचारी ने शोर मचाया तो खोजबीन शुरू हुई।ऐसे में फटाफट जी के कैमरे बहुत काम आए। चोरी पकड़ी गई।घटना शोध संस्थान की है।इधर कैमरे की नजर में काम दिखाने का भी उपयोग हो रहा है।वैदिक धोती आजकल बच्चो की कॉपी चेक करते नजर आ रहे हैं।बहरहाल, कुल मिला कर अपने फटाफट जी की जमकर तारीफ हो रही है।तो हम भी उनको "गुड वर्क" और "आल द बेस्ट"लिखकर अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
भूल गया-बहुत कठिन है
हम अपने कमलप्रेमियो और पाठकों को कई दफा बता चुके हैं।अपने दालवाले नेताजी कहीं भी- कभी भी-कुछ भी बोल सकते है।जैसे अभी एक बैठक में बोल गए।युवा कमलप्रेमियो की बैठक बुलाई थी।मुख्यालय पर।जब वह स्पीच देने उठे।तो जोरदार तालियां और आवाज़ निकली। दालवाले नेताजी ने बोलना शुरू किया।परिषद और संघ में किए कामों का उल्लेख किया।फिर अचानक"नमस्ते सदा वत्सले" गीत को सुनाने लगे।शायद पूरा याद नहीं होगा? तो तत्काल बोल दिया।भूल गया-कठिन है।यह उनकी साफ़गोई थी।किन्तु बैठक में कुछ ऐसे युवा कमलप्रेमी मौजूद थे।जो आज भी शाखा जाते है।उनको अपने दालवाले नेताजी की सफाई पसंद नहीं आई।तो उनके मुंह फूल गए है।अब ये नाराज कमलप्रेमी, आराधना में शिकायत करने की बात कर रहे हैं।जिसमें हम क्या कर सकते है।बस,आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं
आदेश की धज्जियां
सरकारी महकमों में आदेश का पालन अनिवार्य होता है।खासकर वर्दी में आदेश और अनुशासन का महत्व ज्यादा होता है।अगर आदेश अपने कप्तान का हो,तो पालन करना जरूरी हो जाता है।5 -10 दिन की देरी चल सकती है।लेकिन 9 महीने तक पालन नहीं हो!ऐसा संभव नहीं है।मगर मंदिर के समीप वाली वर्दी दावा कर रही है।कप्तान ने एक आरक्षक का तबादला किया था।लाइन भेजा था।मगर आरक्षक आज तक मुक्त नहीं हुए हैं।बल्कि कमाऊ चौकी पर अपनी सेवा अनवरत दे रहे है।वर्दी का तो यही दावा है और चर्चा भी दबी जुबान से कर रहे हैं।अब आदेश का वाकई पालन नहीं हुआ है या बाले -बाले काम चल रहा है।हमको नहीं पता है।इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
1 कचोरी की कीमत 5 पेटी
कभी कभी राजनीतिक नादानी की गलती ,सामाजिक स्तर पर भारी पड़ जाती है।जैसे अपने हाइनेस को पड़ गई।नादानी इतनी सी हुई।अपने विकास पुरुष,ढाबा रोड पर थे।जहाँ की फेमस कचोरी खाने रुक गए थे।मौसम भी उस वक्त ऐसा था।गर्म गर्म कचोरी खाने का।उनके साथ हाइनेस,दालवाले नेताजी,आदि मौजूद थे।हाइनेस ने भी कचोरी खा ली।इस मौके का वीडियो तो वायरल होना ही था।आखिर विकास पुरुष का मामला था।उस दिन क्षमा -पर्व का दिन था।मतलब ,महावीर स्वामी के अनुयायी प्याज लहसन और बाजार का कुछ भी सेवन नही करते है।अपने हाइनेस ने तो कचोरी खा ली।सबूत वीडियो था।बस ,फिर क्या था।समाज के गुरुजनों तक मामला पहुँच गया।भयंकर नाराजगी फैली।आखिरकार वात्सल्य भोज देना पड़ा।सकल समाज को।तब कहीं जाकर नाराजगी कम हुई है।जिसका खर्च 5 पेटी आया है।ऐसा अपने कमलप्रेमी और महावीर स्वामी के अनुयायी बोल रहे है।मगर हमको अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है
माताजी की फटकार..
घटना गुरुवार दोपहर की है।जिस वक्त एक संस्था के मुखिया,शायद भोजन के लिए घर जा रहे थे।उसी वक्त एक गाड़ी में माताजी ,अपनी बेटी को लेने पहुँची थी।जो उस संस्था में कार्यरत है।संस्था निदेशक को देखकर, किसी ने माताजी को बता दिया।यही है, जो बिटिया को तकलीफ देते है।बस,फिर क्या था।कोई भी माँ अपनी औलाद के लिए लड़ सकती है।यही माताजी ने किया।उन्होंने अपने अंदाज में मुखिया को बुलाया।फिर सीधे सीधे फटकार लगाते हुए कहा कि.. कितनी भी कोशिश कर ले,मेरी बेटी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।बेचारे ..निदेशक सकपका गए।सिटीपिट्टी गुम।माताजी ने खूब सुनाई।जिसके बाद मुखिया ने अपनी इज्जत बचाने के लिए हाथ जोड़कर कहा।माताजी..मैं घर आऊंगा आपके।चाय पीने और भोजन भी करूँगा।माताजी,सहज सरल है।उन्होंने भी पलटकर कहा। आ जाना। भोजन भी कराउंगी और चाय भी मिलेगी। यह उस संस्थान की घटना है।जिसको लेकर यह किवदंती मशहूर है कि.. वो जिस टहनी पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे।इधर संस्था के गलियारों में माताजी की फटकार की चर्चा जोरों पर है।तो हमने भी सोचा, पाठकगण को भी इससे अवगत करवा दें।बाकी तो आप सभी जानते हैं कि हम अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहते हैं
कुप्रबंधन की शिकार हुई 'दौड़'
तो आखिरकार वही हुआ।जिसकी आशंका थी।रविवार की सुबह हुई दौड़ "कुप्रबंधन" का शिकार हो गई।कोई नियम-कायदा काम नहीं आया।टॉवर से क्षीरसागर तक दौड़ना था।मगर पुरस्कार के चक्कर में कुछ ने पुल के पार से दौड़ लगाई।नतीजा पहले पहुँच गए और' टोकन' हासिल कर लिया।पुरुस्कार भी मिल गया।इधर टॉवर से दौड़े विद्यार्थियों ने नाराजगी जाहिर की।मंच पर चढ़कर शिवाजी भवन के मुखिया से।विरोध जताया।मुखिया जी,सब कुछ छोड़कर इनको समझाते नजर आए।जबकि गलती उस खेल अधिकारी की थी।जिसने सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया था।वर्ना, बच्चे शिकायत नही करते।ऐसा दौड़ में शामिल कमलप्रेमियो का कहना है।मगर हमको तो बस चुप ही रहना है
बंद कमरे में क्या हुआ...
शनिवार की शाम को राजधानी से 'बड़े साहब' का आगमन हुआ था।रविवार की सुबह 9 बजे बाद गए।बड़े साहब,मतलब ' आईएएस' लाबी के टॉप बॉस।बेहद सहज सरल विन्रम बड़े साहब।तभी तो सरकारी विश्राम गृह पर जब ज्यादा अधिकारी दिखे तो बोल दिया।इतने लोगो की जरूरत नही थी।यात्रा निजी थी।पुत्र धर्म निभाने आये थे।अपनी माताजी को दर्शन करवाने।चाहते तो गर्भगृह में भी जा सकते थे।मगर नहीं, नंदी हाल में बैठकर आरती का आनंद उठाया।जब सम्मान किया,तब भी बोले।इसकी जरूरत नहीं थी।कई दफा आ गया हूं।हर बार सम्मान उचित नहीं।फिर वापस विश्रामगृह पहुँच गए।जहाँ कक्ष क्रमांक 1 में बैठकर चर्चा की।अपने उम्मीद जी,उज्ज्वल जी और इन्दौरीलाल जी से।अपने इन्दौरीलाल जी को शायद पता नहीं था।बड़े साहब आए हुए हैं।जब चला,तो कागज पत्री लेकर पहुँचे।बंद कमरे में चारो के बीच किस मुद्दे पर बात हुई होगी?बस कयास लगा सकते हैं।सिंहस्थ और लैंड पुलिंग के अलावा तो कोई बड़ा मुद्दा हो नहीं सकता है।चर्चा के बाद डिनर किया,फिर आराम और सुबह नाश्ता करके निकल गए।किन्तु बंद कमरे में क्या आदेश/निर्देश/नसीहत देकर गए।इसको लेकर सब चुप है।तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
नया अड्डे पर जमावट
अभी तक तो प्रशासनिक और सिहंस्थ की 'रणनीति'का अड्डा संकुल भवन ही था।जिसके दूसरे माले पर गोपनीय नीतियां बनती थी।मगर अब यह अड्डा बदल गया है।जब से तीसरे माले पर अपने उम्मीद जी आए हैं।अंदरखाने की खबर है।अब सिहंस्थ हो या दूसरी कोई भी रणनीत।विकास भवन में तय होती हैं।जहां अपने इन्दौरीलाल का कार्यालय है।अक्सर शाम के बाद, अपने उम्मीद जी और उज्ज्वल जी वहाँ देखे जाते है।सिहंस्थ की यह तिकड़ी अब अपनी सारी गोपनीय रणनीति'विकास भवन' में तय करती है।किसी को भी भनक नही लगती है कि आखिर संकुल के दो प्रमुख कहा पर है।उम्मीद-उज्जवल और इन्दौरीलाल जी,विकास भवन में बैठकर कौन सी,खिचड़ी पका रहे है।यह पता चलना असंभव है।कारण..तिकड़ी गुट का हर सदस्य मौन है।इसलिए हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है
तस्वीर भी बोलती है
इस तस्वीर जरा गौर से देखिए! देखकर क्या लगता है आप पाठकगणों को।तस्वीर इतवार सुबह की है।जिस वक्त मैराथन दौड़ शुरू होने वाली थी।अचानक दौड़ के पहले "होड़"शुरू हो गई।किस लिए...तस्वीर देखकर समझ जाएं।क्योंकि हम तो आदत के अनुसार चुप रहने पर मजबूर हैं।
मेरी पसंद
तू लाख बेवफ़ा है
मगर सर उठा के चल!
दिल रो पड़ेगा तुझको
पशेमान देख कर।
हिमांशी बाबरा