20 अप्रैल 2026 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

20 अप्रैल 2026 (हम चुप रहेंगे)

फक्कड़ अंदाजी कप्तान की
वर्दी वाले कप्तान को एक god gift है। उनका फक्कड़पना। जिसे वह भरपूर जीते हैं। बस मौका मिलना चाहिए। मीडिया को क्या चाहिए? इस कला में पारंगत है। मृदभाषी तो है ही। ताज़ा उदाहरण पंचक्रोशी यात्रा का है। वैसे तो वह अपने घनिष्ठ उज्ज्वल जी के साथ ही दौरा करते है। मगर इस दफ़ा उज्ज्वल जी दिन में किसी और जगह व्यस्त थे। तो अकेले निकल गए। जहाँ पहुँचकर उनके अंदर का फक्कड़पना बाहर आ गया। बस फिर क्या था। श्रद्धालु के साथ बैठकर दाल-बाटी का लुत्फ उठाया। पिछले साल भी उन्होनें यही किया था। मीडिया को यही चाहिए। तो जमकर वीडियो वायरल हुए। ऐसे में अपने फक्कड़ कप्तान को हम एक अशआर समर्पित करते हुए अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
उम्र हर दौर में बचपन है मचलकर देखो
वक्त तालीम है कुछ और संवर के देखो
सहमे सहमे से क्यूँ हो मौत तो पल भर की है
जिंदगी जश्न है एक बार मना कर देखो

शाबास उज्ज्वल जी...
तो अपने उज्ज्वल जी ने वह कर दिखाया। जिसकी उम्मीद किसी को नही थी। जिस जिले से उज्ज्वल जी का आगमन हुआ था। वहां भी उनका शिक्षा पर फोकस था। बाबा की नगरी में भी उन्होंने तमाम काम के बाद भी शिक्षा से नजरें नही हटाई। उसी का परिणाम है। 5 साल में पहली दफा 81% की सफलता मिली है। इसके पीछे उज्ज्वल जी की फटकार और नसीहतो का विशेष योगदान है।बच्चों को पढ़ाना उनके सबसे पसंदीदा कामों में से एक है।तभी तो सरकारी स्कूल का रिजल्ट इतना बेहतर आया है। उनके इस प्रयास ने किसी शायर के उस अशआर को गलत साबित कर दिया है। जिसमें शायर ने तंज कसते हुए लिखा था।
अख्लाक से क्या बू आए 
मां बाप के एतबार की।
दूध तो डिब्बे का और तालीम है सरकार की। जिसके लिए हम उज्ज्वल जी को बधाई देते हुए, आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

विद्यार्थी महाकाल भरोसे..
मंदिर के अधीन एक संस्थान संचालित होता है। जहाँ पढ़ने वालों धर्म-कर्म की शिक्षा दी जाती है।इसके मुखिया अपने वैदिक धोती है।जो इन दिनों अवकाश पर है। जबकि विद्यार्थियों की परीक्षा चल रही है। ऐसे में नियम यही कहता है। किसी अन्य को प्रभार दिया जाए। ताकि व्यवस्था बनी रहे। मगर ऐसा हुआ नहीं है। किसी को इस बात की चिंता नहीं है। जिनकों चिंता करनी चाहिए। वह फटाफट जी है। लेकिन वह खुद ही कभी-कभार मंदिर जाते है। जैसे सोमवार को गए थे। निरीक्षण किया। तो खुलासा हुआ। उनके खास नवग्रहों में से आधे से ज्यादा लापता थे।जबकि इन सभी की जिम्मेदारी है। रोज़ समय पर हाजिर रहे। पिछले दिनों अपने उज्ज्वल जी इन सभी की बैठक ली थी। प्यार से समझाया भी था।लेकिन लातों के भूत....!जैसा इन पर असर हुआ। जिसमें हम क्या कर सकते है। बस आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

आरियों को दोस्तों दावत न दो...
शहर में इन दिनों विकास की गंगा बह रही है। विकास के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। फिर वह आम आदमी के घर हो या गूंगे पेड़। इंसान तो हंगामा कर लेता है। मगर गूंगे पेड़ चुपचाप खुद पर आरी चलने देते है। विकास की इस दौड़ में अनगिनत पेड़ बलि चढ़ गए है। इनकी संख्या का आंकड़ा शायद ही किसी के पास होगा। कटने के बाद इनको नर्सरी में जमा होना था।जमा भी हुए,मगर आधे। आधे चक्रतीर्थ भेजे गए है। किसके निर्देश पर? पता नहीं है। मगर ऐसी चर्चा है।जिसमें हम क्या कर सकते हैं।बस किसी शायर के उस अशआर को लिख कर चुप हो जाते हैं।
आरियों को दोस्तों दावत न दो संभलो जरा।
वरना रास्ते के नीम-इमली-बरगद कट जाएंगे।

मंडी का भाव बताओ...
अपने विकासपुरुष और मामा जी की V C लेने में क्या अंतर है?जब मामा जी पद पर थे। तो उनकी vc में ऐसे सवाल नहीं पूछते थे। जिससे आईएएस लॉबी में हड़कंप मचे। लॉबी भी आंकड़ों के जाल में उलझा कर गोल -मोल जवाब देकर फ्री हो जाती थी। लेकिन विकासपुरुष ,अच्छा है-बढिया है-यह कर लिया-वह कर लिया और आंकड़ों के झांसे में नहीं आते है। धरातल की हकीकत से वाकिफ है। तो ऐसे सवाल करते है।जैसे शुक्रवार की शाम vc में पूछ लिया। जब एक कलेक्टर उपार्जन को लेकर किए कामों के कसीदे पड़ रहे थे। विकासपुरुष ने पूछ लिया। बताओ-आज मंडी का भाव क्या था।सवाल सुनते ही कसीदे पड़ रहे साहब की बोलती बंद। फिर किसी ने उनको बताया। तब तक vc से जुड़े हर अफसर ने तत्काल मंडी का भाव रट लिया। विकासपुरुष यहीं नहीं रुके। उन्होंने उन आईएएस को कटघरे में खड़ा कर दिया। जो बीच उपार्जन में सेटेलाइट मेप का रोड़ा लाए है। जिससे व्यवस्था बिगड़ी है। तभी तो उनको कहना पड़ा। इससे संदेश गलत जाता है। अन्नदाताओं को लगता है। सरकार खरीदना नही चाहती है। विकासपुरुष की इन खरी बातों को सुनकर लॉबी सदमे में है और हमकों किसी शायर का शे'र याद आ रहा है। शायद आईएएस अफसरों को भी पसंद आए।

डिग्रियां  तो तालीम के खर्चो कि रसीदे हैं 
इल्म वो हैं जो किरदार में झलकता हैं...!!
बाकी हमकों अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहना है।

अनपढ़ के लिए पढ़े लिखे सक्रिय...
संकुल के गलियारों में ऊपर लिखी बात इन दिनों चर्चा में है। जिसमें इशारा एक ट्रेवल्स संचालक की तरफ है। जो कि ज्यादा पढ़े-लिखे भले नही है। मगर व्यापार का मूल मंत्र अच्छी तरह से जानते है। सबको खुश रखो। इसीलिए लंबे समय से टिके हुए है। परिवहन कांड के बाद भी। नई निविदा होनी है। जिसमें प्रतिस्पर्धा की संभावना है। जबकि सभी का मन है। पुराने संचालक को ही काम मिल जाए। जिसके लिए साम-दाम-भेद सभी कोशिश जारी है।इसके साथ एक घटना और सुनाई दे रही है। जिसमे अनपढ़ संचालक की मदद के लिए फोन किया गया था। एक होटल मालिक को। होटल संचालक ने इस ट्रैवल्स की गाड़ियां हटा दी थी। तो उसने संकुल से फोन लगवाया था।मगर होटल मालिक ने फोन पर जो नाम लिया। उसके बाद फोन करने वाले चुप्पी साध ली। अब निविदा का लफड़ा फ़सा है। देखते है कि अनपढ़ के लिए कोशिश कर रहे लोगों को कितनी सफलता मिलती है। तब तक हम आदत अनुसार चुप हो जाते हैं।

फिफ्टी-फिफ्टी वेतन
अभी तक तो प्यार का वादा फिफ्टी-फिफ्टी का गीत  सुना था। मगर अब मंदिर के सुरक्षा कर्मी नया राग अलाप रहे है। उनका अलाप वेतन फिफ्टी-फिफ्टी का है। कारण कंपनी ने भर्ती इतनी कर ली है। 200से 300 कर्मचारी एक्स्ट्रा है। जिसके चलते अब एक सुरक्षा कर्मी को अधिकतम दो सप्ताह की ड्यूटी ही मिल रही है। नतीजा वेतन भी 50% ही मिलेगा।ऐसे में सुरक्षा कर्मी खुद को घर का ना घाट का महसूस कर रहे है। 6 हजारी में घर कैसे चलेगा? दूसरी जगह भी काम नहीं कर सकते है? ऐसे में इंसान क्या करेगा? 14 दिन की ड्यूटी में ऐसी कोशिश करेगा। जिससे 50 प्रतिशत की रिकवरी कर सके! ऐसा हम नही कह रहे है। बल्कि खुद सुरक्षा कर्मी बोल रहे है। उनकी बात में कुछ हद तक दम है।मगर हम कर कुछ नहीं सकते हैं। इसलिए आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

बाबू और ताला तोड़ का जलवा...
मंदिर के गलियारों में यह सुगबुगाहट है। एक बाबू के जलवे की। जो कि जब भी आते है।देवीआहिल्या नगरी से। अलसुबह की आरती के बाद गर्भगृह में भी मत्था टेकने जाते हैं। इनको कोई नहीं रोकता है। इसी तरह पाठकों को याद होगा। हिंदू नव वर्ष के दिन ताला तोड़कर भक्तगण अंदर गए थे। उसके बाद से ताला तोड़ने वाले भक्त को बाबा की भक्ति में ज्यादा आंनद आने लगा है। तभी तो पिछले 3-4 दिनों से वह हर रोज हाजिरी लगा रहे है। जल द्वार से इंट्री लेते है और अपने साथ 2 अन्य को भी लेकर आते है। चुपचाप बाबा की आरती का आनंद लेते है। नतीजा मंदिर के गलियारों में बाबू और ताला तोड़ के जलवे की चर्चा जोरों पर है। मगर कोई कुछ नहीं कर सकता है।तो सब चुप है। फिर हमारा तो काम ही आदत के अनुसार चुप रहना।

जमाना सफर के निशान मांगेगा...
अपने प्रथम सेवक के पैर इन दिनों लहूलुहान है। वजह उन्होनें इतिहास बनाया है। 5 दिवसीय पंचकोशी यात्रा में पैदल चलकर। वह पहले शख्स है। जिन्होंने शहर का प्रथम नागरिक रहते हुए 120 किलोमीटर की यात्रा पूरी की है। अब इसके पीछे उनकी क्या मनोती होगी?यह वही जानते है।लेकिन इस चक्कर मे उनके पांवों में छाले जरूर हो गए है। नतीजा छालों से लहूँ निकल रहा है। तभी तो राजेश रेड्डी शायर का यह अशआर उन पर सटीक बैठ रहा है।
ऐ मेरे पाँव के छालों चलो लहूँ उगलो
जमाना मुझसे सफर के निशान मांगेगा।

अब देखना यह रोचक होगा कि जिस मनोती के लिए यह पदयात्रा की गई। उसका लाभ उनको 2028 तक मिलता है या नहीं?तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।

दालवाले नेताजी और पंगा...
शायर मुनीर रियाजी से अपनी गुस्ताखी की माफी मांगते हुए । जिनके अशआर में हम अपने अल्फ़ाज़ घुसेड़ रहे हैं। उनका शे'र है। आदत बना ली है हमनें मुनीर अपनी/जिस शहर में रहना पंगा लेते रहना..! इसमें पंगा शब्द हमने जोड़ा है। यह अशआर अपने दालवाले नेताजी पर सटीक बैठता है। हेलीपेड पर उन्होंने फिर अपना यह अंदाज बरकरार रखा। इस दफा शिकार एक नगर सेवक हुए। जो कि पूर्व प्रदेश संगठन मुखिया गुट का ठप्पा लगाए हुए हैं। विकासपुरुष का उड़नखटोला उतरने के पहले की घटना है। जो कि पहली दफा नहीं हुई है। दालवाले नेताजी को अपनी जुबान पर काबू नहीं है। वह जो चाहे बोल देते है। कई कमलप्रेमी चुप रह जाते है।मगर इस दफा नगर सेवक ने पलटवार कर दिया। जिसके चलते हेलीपेड पर मौजूद माननीय और कमलप्रेमियों को आश्चर्य तो हुआ। मगर सभी को आदत हो गई है। अपने दालवाले नेताजी के शब्दों की।इसलिए किसी ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और चुप रहे। किन्तु पिछले सप्ताह चुप में लिखा अशआर जरूर उनकों याद आया।
कुदरत को ना पसंद है सख्ती बयान में।
पैदा हुई ना इसलिए हड्डी जुबान में।
इसीलिए तो फोन करके चुप को यह कहने में अपने कमलप्रेमी नहीं चूके। दालवाले नेताजी को अपने उज्ज्वल जी कुछ सीखना चाहिए।अपने कमलप्रेमियों की बात में दम है, लेकिन चुप रहना ही हमारा कर्म है।

कमीशन वह भी एडवांस में..
भले ही यह दावा किया जाता है। निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदारों से कोई वसूली नही की जाती है। मगर यह सब कहने/दिखाने के लिए होता है। कम से कम शिवाजी भवन में तो बगैर कमीशन दिए कोई बिल भुगतान नहीं होता है। यह कटु सत्य है। अपने एंग्रीमैन ईमानदार हैं।इस पचड़े से दूर रहते है। मगर उनके एक मातहत तो सबसे अलग है। जिन्होंने एक कंपनी से एडवांस में कमीशन मांग लिया। कंपनी के बॉस ने एंग्रीमैन को खबर कर दी।जिसके बाद क्या हुआ,हमकों पता नहीं है। लेकिन यह पता है। जिसके बाद अधिकारी महोदय को कई जगह सफाई देनी पड़ी थी।ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। जिसमें हम क्या कर सकते हैं। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।

मेरी पसंद
देने को जवाबन उसे दे सकता हूँ गाली
लेकिन मेरी तहजीब इजाजत नहीं देती
डॉ नवाज देवबंदी