15 सितम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)

एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |

15 सितम्बर 2025 (हम चुप रहेंगे)

 

आखिर कौन है वो? ....

अपने कमलप्रेमियों के बीच इन दिनों एक जनप्रतिनिधि की आदतों को लेकर चर्चा चल रही है। मगर बात इतनी गोपनीय है कि कोई खुलकर नाम नहीं लेता। बोलने से पहले सब सोचते हैं कहीं वो सुन न ले! कहते हैं, उनकी आदतें कुछ अलग ही हैं। सुबह और दोपहर में वो विजया (बूटी) लेकर दिन की शुरुआत करते हैं। शाम होते ही चिलम का सुट्टा मारते हैं। रात होते ही चुपचाप किसी अज्ञात जगह जाकर सोमरस का सेवन करते हैं, और तब तक करते हैं, जब तक पूरी तरह टुन्न न हो जाएँ। फिर या तो वहीं रात गुजारते हैं, या देर रात लौटते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो! लेकिन असली सवाल यही है वो कौन है? कमलप्रेमी इस पर चुप हैं। कोई नाम नहीं लेता है। ज्यादा कुरेदने पर कहते हैं जल्द ही फिल्म रिलीज होगी, तब सब पता चल जाएगा। तब तक हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप रहते हैं, और मन ही मन सोचते हैं अरे भाई, आखिर है कौन वो’?

मजबूरी थी ...

पँजाप्रेमियो के आंदोलन में दो-फाड साफ नजर आई। ये बात तो सबको पता है। किसके इशारे पर बिखराव हुआ। ये कोई नहीं जानता। लेकिन यह ज़रूर पता चला है कि ऊपर से ही हवा दी जा रही थी करना है- करना है- करना है-। ये शब्द हम नहीं कह रहे। यह तो अपने होटल वाले भिया के एक खास करीबी का बयान है! बाकी हम तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे। क्योंकि कुछ बातें समझने के लिए शब्दों से ज़्यादा खामोशी चाहिए!

पत्थर मेरी निगाह में है और सबकी निगाह किस पर हैं...!

मैं अपने शहर के लोगों से भली-भाँति वाकिफ हूँ। कौन कब किस तरफ खड़ा है, किसके हाथ में पत्थर है, किसकी जेब में माचिससब मेरी नजऱ में है। और यही वजह है कि इन दिनों पँजाप्रेमी हर जगह यही अशआर दोहरा रहे हैं। मैं अपने शहर के लोगों से खूब वाकिफ हूँ/ हर एक हाथ का पत्थर मेरी निगाह में है...। इशारा साफ है। शुक्रवार को सम्पन्न हुई रैली में जो हुआ वह किसी से छिपा नहीं। मैदान में दो फाड़! खेमे अलग, नारों की दिशा अलग, चेहरे अलग। मगर तमाशा देखिएइन तमाम विभाजनों के बावजूद चरणलाल जी का पलड़ा भारी! मेहनत रंग लाई, समर्थकों ने दम दिखाया, रैली में अपना वजूद दर्ज करवा दिया। अब पँजाप्रेमी सवाल उठा रहे है। जो लाख टके का सवाल हैयह दो फाड़ किसकी करतूत है? और जैसे ही यह सवाल उठा, सबकी जुबान पर एक ही नाम आयाबिरयानी नेताजी! कहते हैं रणनीति ऐसी बनी कि विरोधी खेमे को दिशा देने में महारथ हासिल कर ली। दोपहिया वाहन पर घूम-घूम कर विरोधियों को हौसला दिया, भाषणों में नया जोश भरा। मगर अपने खानदान के चिराग को नहीं रोक पाएजो मंडी कार्यक्रम में  दिखा। वाह रे राजनीति! पँजाप्रेमी दबी हँसी में कहते हैंहकीकत यही है। मगर क्या किया जाए? राजनीति है भाई। यहाँ सच बोलो तो दुश्मन बनो, चुप रहो तो समझदार कहलाओ। तो चलिए। हम चुप ही रहते हैं!

 गुहार सुनेंगे उम्मीद जीशरण में प्रशासन...!

तीसरे माले के दरबार में अपने उम्मीद जी पधार चुके हैं। जैसे ही वे पहुँचे, संकुल से लेकर दफ्तरों तक खुशी की ऐसी लहर दौड़ी, मानो अब तक फाइलें धूल फाँक रही थीं और अब जादू से सब काम बन जाएगा। लोग दबी आवाज़ में गुनगुना रहे हैंमैं कैसे गुफ्तगू से गैर को अपना बनाता हूँ/करीब आओ, इधर बैठो, तुम्हें जादू दिखाता हूँ! अब संकुल के गलियारों में यही सलाह दी जा रही हैक्यों न अपर कलेक्टर अपनी गुहार सीधे उम्मीद जी तक पहुँचा दे! आवास आवंटन का झंझट हैजादूगर हैं, चुटकी में हल कर देंगे। नियम, कागज़, आपत्ति... ये सब तो बस नाटक है! असली खेल तो संपर्क का है। वैसे भी हालात कम रोचक नहींबंगला राजस्व का था, नगर सैनिकों के मुखिया को सौंप दिया गया। आवंटन के बदले हल्के हरे रंग के कागज ले लिए गए हैं। वैसे भी आवंटन का मामला फाइल में नहीं, संबंधों में तय होता है। तो क्यों न गुहार लगाई जाए? क्यों न उम्मीद जी से कहा जाएहुज़ूर, जादू दिखाइए! देखना दिलचस्प होगाप्रोटोकॉल से परेशान अधिकारी नियमों की किताब उलटते रहेंगे या सीधे दरबार में जाकर हाथ जोड़ देंगे। और  हम तो बस फरियादी को यही सलाह देंगे किजादूगर की दहलीज़ पर जाकर गुहार करना! मतलब..काम पक्का। बाकी हमकों आदत के अनुसार चुप ही रहना है

 ये रिश्ता क्या कहलाता है? कमलप्रेमियों में बहस...!

इन दिनों अपने कमलप्रेमी एक सीरियल का नाम गुनगुना रहे हैंये रिश्ता क्या कहलाता है...! और सच पूछिए तो यही इस समय सबसे सही शीर्षक है। इशारा बिल्कुल साफ हैअपने मेट्रो गली वाले नेताजी की तरफ! जिन्होंने अभी-अभी घोषित हुई लिस्ट में अपने खास के लिए राजधानी तक अपनी ताकत का एहसास करा दिया। संगठन के महामंत्री तक सिफारिश पहुँचाई और फिर देखते ही देखते अपने खास को कार्यकारिणी में मंत्री का पद दिलवाकर मानो कह दियालो भाई, अब चैन की सांस लो! योग्यता की बात कौन करे? कई दावेदार बेहतर थे, पर रिश्तों का वजन ज्यादा भारी पड़ा। राजनीति में यही तो असली खेल हैजो अपने हो, वही सबसे योग्य! इसीलिए तो कमलप्रेमी दबी जुबान में कह रहे हैंआखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है? अब हम किसी की जुबान पकड़ें तो कैसे! इसलिए अपनी आदत के मुताबिक चुप ही रह जाते हैं!

 और बोल गए नाशहो-जुबान का खेल...!

अपने दालवाले नेताजी, कब, कहाँ, क्या बोल जाएँकोई नहीं जानता। खुद अपने विकासपुरुष भी उनकी इस आदत से भली-भाँति वाकिफ हैं। यह बात दालवाले नेताजी के खास लोग भी खुलकर मानते हैं। और सच कहें तो कई बार इसकी मिसाल भी सामने आ चुकी है। ताज़ा उदाहरण मंगलवार का हैकमलप्रेमी मुख्यालय पर नई पदाधिकारी टीम का सम्मान रखा गया था। अपने नेताजी अतिरिक्त खुशी से लबरेज़ थेजो स्वाभाविक भी है। ऐसे मौके पर धर्म से जुड़ा एक स्लोगन सुनायाधर्म की जय हो -अधर्म का नाश हो -विश्व का कल्याण हो। लेकिन खुशी में नेताजी स्लोगन भूल गएपहली लाइन में जय होकी जगह नाश होबोल गए! बस फिर क्या थासुनते ही बेचारे कमलप्रेमी चकरा गए। पर फिर सबने एक-दूसरे की तरफ देखा और हल्की मुस्कान के साथ समझ गएयह तो नेताजी की जुबान का खेल है। जल्दबाजी में बोलने की आदत से परिचित सब लोग स्लोगन की जगह भावनाओं को समझ बैठे। शब्दों की गलती पर ध्यान नहीं दिया बस दोहराया और चुप हो गए। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप रह जाते हैं!

वक्त बड़ा बलवान है...

वक्त से बड़ा कोई नहीं होता। एक समय था जब अपनी मामाजी की सरकार में नंबर-1 से बड़ा आईएएस अधिकारी कोई नहीं माना जाता था। उनका आदेश ही कानून की तरह माना जाता था। शायद हमारे पाठक उन्हें भूल गए होंगे। वे कभी बाबा की नगरी के मुखिया रह चुके हैं। फिर पँजाप्रेमी सरकार में बेआबरू होकर हटाए गए थे। लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया। सरकार बदली और वे फिर पॉवर में आए। देवी अहिल्या नगरी के मुखिया बने। मेहनती हैं, दोस्ती निभाते हैं और दुश्मनी भी शिद्दत से निभाते हैं। लेकिन फिलहाल वे लूप लाइन में दिन काट रहे हैं। बुधवार को संकुल में चुपचाप नजर आए। यह देखकर बाकी अधिकारियों ने भी ध्यान दिया। एक अधिकारी ने मजाक में दबी जुबान से  कहाभीलन छीनी गोपियाँ/ वही अर्जुन वही बाण... बात तो सही कही। फिर भी हम यही कहेंगेवक्त अपना भी आएगा नासिर.. गम न कर, जिंदगी पडी है अभी...बाकी हम तो अपनी आदत के अनुसार चुप ही रहेंगे।

सूची से नाम गायब! राजनीति का अपना खेल...!

मंगलवार की रात सूची जारी हुईकमलप्रेमी संगठन की। सबको लगा अब काम पूरा हो गया। लेकिन जैसे ही सूची सामने आई, उठापटक शुरू और देखते ही देखते सूची को होल्ड कर दिया गया। उस समय खाक चौक पर सेवा पखवाड़े का कार्यक्रम चल रहा था। मंच पर दालवाले नेताजी और अपने हाइनेस की मौजूदगी दिख रही थी। मंच से दालवाले नेताजी ने घोषणा कर दीपुरानी सूची की जगह नई सूची जल्दी आएगी। फिर अपने हाइनेस ने दावा कर दियासूची तो यही वाली रहेगी। यानी जो नाम जारी हो गए हैं, वही अंतिम रहेंगे। कोई बदलाव नहीं! लेकिन राजनीति में दावा और हकीकत का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना वक्त। फिर एक नई सूची आ गई और उसमें से तीन नाम गायब! उनमें से दो नाम तो अपने हाइनेस के खास लोगों के थे। अब सवाल यहयह खेल किसके इशारे पर हुआ? किसने दबाव डाला? किसके संकेत पर काटा गया? यह हमें भले न पता हो मगर कमलप्रेमी इस पूरे घटनाक्रम पर चटकारे लेकर चर्चा कर रहे हैं। राजनीति में यही होता हैदावा कुछ, हकीकत कुछ और! अब अपने कमलप्रेमी तरह तरह की बातें कर रहे हैं।  जिसे हम सुन रहे हैं, समझ रहे हैं पर अपनी आदत के मुताबिक चुप ही रहेंगे!

 बाबा ने चोला बदला-और रंग में आ गए...!

अपने बाबा तो वैसे हमेशा कडक़-कलफ वाला सफेद -रंगीन कुर्ता पहनकर ऐसे निकलते हैं जैसे अभी किसी बड़े सरकारी दौरे पर जा रहे हों। लेकिन पिछले बुधवार को तो दृश्य ही बदल गया! भगवा कुर्ता, भगवा धोती, माथे पर तिलक देख कर तो लगा कि बाबा को रोल बदलने का बुखार चढ़ गया हो। फिर पता चला कि वह खास दिन था अपने उम्मीद जी की पूजा करवानी थी। सोचा होगा- रंग भी वही, भावना भी वही, फोटो भी चमकदार! बस फिर क्या, अलमारी से भगवा चोला निकाल लिया गया और बाबा झटपट सज-धज कर मंदिर पहुंच गए। अब मजे की बात यह कि पूजा से कुछ दिन पहले ही मंदिर प्रबंधन से उनकी गरमा-गरमी हो गई थी। मामला इतना बढ़ा कि वर्दी तक पहुँच गया! बाबा बेचारे थोड़े तनाव में थे। ऐसे में उम्मीद जी खुद आ धमके तो बाबा ने सोचा-अरे वाह! मौका भी, मंच भी, और चोला भी! और फिर बिना देर किए पूजा का लाभ ले लिया। अब चर्चा ये है कि उम्मीद जी विवाद पर क्या करेंगे ? हमारे कमलप्रेमी तो कहते हैं -देखते रहिए, कुछ न कुछ मसाला निकलेगा- और हम तो बस अपनी आदत अनुसार चुप रहेंगे.!

खुशी की लहर....

दमदमा के गलियारों में इन दिनों एक अलग ही चमक देखने को मिल रही है। जो लोग कल तक मातमी चेहरों के साथ इधर-उधर घूमते दिखाई देते थे, उनके चेहरे पर अब राहत और हंसी की रेखाएँ साफ झलक रही हैं। तो सवाल उठता है-ये खुशी किस बात की? कोई गहरा राज नहीं है। सबको मालूम है - अपनी चटक मैडम जी की रवानगी हो गई है। बस उसी की वजह से यह चमक बिखरी है। अपनी मैडम की रवानगी भी रहस्यमय रही। रात को ऑर्डर आया। फिर कब कार्यमुक्त हुई,कब निकल गई। यह किसी ने भी नहीं देखा। कोई भी उनको बधाई प्रत्यक्ष नहीं दे पाया। अब अगला सवाल-अगला मुखिया कौन होगा? इधर-उधर कानाफूसी चल रही है। संकेत साफ हैं - कुबरेश्वर धाम जिले में पदस्थ आईएएस मैडम का नाम सबसे ऊपर लिया जा रहा है। शायद वही अगली मुखिया बनें! दमदमा वाले फिलहाल यही मन्नत बाबा से मांग रहे हैं -हे बाबा! आने वाली मैडम को लोक-व्यवहार का ज्ञान देना। आखिर, ये तो तब ही पता चलेगा जब उनका आगमन होगा। तब तक हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं!

रवानगी की चर्चा...?

संकुल से लेकर दाल-बिस्किट वाली तहसील तक एक ही चर्चा छाई हुई है। रवानगी की। रवानगी किसकी? वही, जो तहसील में राजस्व के मुखिया हैं। सहज, सरल और मिलनसार अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले इस अधिकारी की विदाई की वजह एक तालाब बताई जा रही है! बिल्कुल, दबी जुबान से, चाय की प्यालियों और फाइलों के बीच यही चर्चा सुनाई दे रही है। अब अगला सवाल-उनकी जगह कौन लेगा? सुनने में आ रहा है कि संकुल में विराजमान एक अधिकारी का नाम टॉप पर है। अभी उन्हें आए ज्यादा समय नहीं हुआ है। फिलहाल उन्हें उस विभाग की जिम्मेदारी दी गई है, जिसका उपयोग पाँच साल में एक बार होता है! इसमें कितना सच है, कितना झूठ - ये हम नहीं जानते। जिन्हें पता है, वो अपने उज्जवल जी हैं। जो वैसे भी ओरिजिनल में चुप रहने के लिए मशहूर हैं। तो हम भी अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं!

खड़ाऊ-राज -गाथा अब तीसरे माले तक...!

श्रीराम की वनवास कथा तो सबको याद है। जब अनुज भ्राता जंगल में मनाने जाते हैं, और मना करने पर उनकी खड़ाऊँ लेकर राज करते हैं। अब यही कथा देवी अहिल्या नगरी में गली-गली सुनाई जा रही हैबस नाम बदल गया है, कहानी वही है। इशारा बिल्कुल साफ हैअपने उम्मीद जी की तरफ! जो अपनी खड़ाऊँ छोडक़र सीधे बाबा की नगरी में उतर आए और वह भी तीसरे माले के सिंहासन पर! प्रदेश भर में यह चर्चा आम है कि साहब टॉप आईएएस अधिकारियों की गिनती में आते हैं। तभी तो तीन महीने पहले ही पदोन्नति मिल गईवरना किसकी इतनी किस्मत खुलती है! अब लोग दबी ज़ुबान से कहते फिर रहे हैंखड़ाऊ-राज! देवी अहिल्या नगरी में। फिलहाल बाबा की नगरी में तो यह चर्चा जोरो पर  चल रही है। आधे लोग कहें सच है, आधे कहें अरे रहने दो  मगर सब जानते हैं मामला क्या है। कहने वाले तो कह ही रहे हैं— ‘राजनीति में खड़ाऊँ भी ताकत बनती है!लेकिन हमे तो अपनी आदत के मुताबिक बस चुप ही रहना है!

और ठहाका लगा ...  

अभी-अभी राजधानी से एसीएस साहब आये थे। उन्होंने बैठक में एक ऐसी बात कही। जिससे पूरे हॉल में ठहाका लगा। निर्माण को लेकर बात कर रहे थे। तब उन्होंने कहा। लोगों को घर पहुंचने की इतनी जल्दी होती है। हॉर्न बजा-बजा कर पागल कर देते है। भले ही घर पहुंचने पर इनकी इज्जत कुछ भी नहीं रहती है। साहब का यह कहना हुआ और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया। तो हम भी हंसते हुए, अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते है।

मेरी पसंद...

तुम तो लफ्जों से मार देते हो/तुझको हथियार की जरूरत है।

आपकी नफरतें बताती हैं/आपको प्यार की जरूरत है...

जीत ने अंधा कर दिया है तुझे / तुझको एक हार की जरूरत है

इश्क तो एक से ही होता है/ तुझको दो-चार की जरूरत है

वरुण आनंद