02 मार्च 2026 (हम चुप रहेंगे)
एक हुनर है चुप रहने का, एक ऐब है कह देने का |
हम तो अछूत हो गए..
पाठकगण कतई यह अंदाजा नहीं लगाए।हम जाति प्रथा पर कुछ टिप्पणी कर रहे है। हमारा इशारा तो राजनीतिक जीवन मे अछूत की तरफ है। जिसके शिकार अपने बिरयानी नेताजी,होटल वाले भिया,छोटा बटला जी और अपनी भाभी सहित नाना जी हो गए है।ऐसा अपने पंजाप्रेमी बोल रहे है। तभी तो अब किसी पंजाप्रेमी आंदोलन में नजर नहीं आते है।इसके पीछे कारण पिछले साल का एक आंदोलन है। जिसमें इन सभी ने अपना अलग आंदोलन किया था। जिसके बाद सभी को नोटिस जारी करवाने में अपने चरणलाल जी की भूमिका रही थी। उसके बाद से ही पंजाप्रेमियो का कोई आंदोलन हो। इनको कोई सूचना नही दी जाती है। ताज़ा आंदोलन पिछले दिनों हुआ। जब कमलप्रेमियो ने पंजाप्रेमी मुख्यालय को घेरा था। इसमे भी उक्त सभी नदारद थे। तभी तो पंजाप्रेमियो में खुलकर चर्चा है। यह सभी अछूत है। अब हम पंजाप्रेमियो की जुबान तो पकड़ नही सकते है। इसलिए आदत के अनुसार चुप हो जाते है।
मंत्री जी को भी बुके दीजिये
अपने विकासपुरुष इस बात का ध्यान रखते है। अगर कोई मंत्री उनके साथ आया है। तो उसको सम्मान मिले। जैसे मंगलवार को हुआ।हेलीपेड पर उड़नखटोला उतरा था। उनके साथ इंदौरी भिया भी आए थे। बाबा तुलसी। मगर किसी को खबर नहीं थी। इसलिए सभी एक एक बुके लेकर ही पहुँचे। उम्मीद जी अल्फा जी ,डेल्टा जी,उज्ज्वल जी और कप्तान ने विकासपुरुष का स्वागत किया। पीछे जस्ट तुलसी बाबा थे। तो अपने विकासपुरुष ने अफसरों से कहा। मंत्री जी का भी स्वागत कीजिए। लेकिन कैसे करते। बुके तो सीमित थे। इसलिए सब चुप रहे।तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
नियुक्ति पर नियम भारी...
संविदा नियुक्ति को लेकर शासन का नियम ही आड़े आ रहा है। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। इशारा विशाखा समिति की जांच झेल रहे अधिकारी की तरफ है। जिनको अश्वत्थामा का नाम उनके सहयोगियों ने दिया है। उनकी संविदा नियुक्ति 19 तारीख को खत्म हो चुकी है।मगर अभी भी कार्यरत है। कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव पर अभी तक मोहर नही लगी है। इधर शासन का नियम है। संविदा नियुक्ति के लिए अधिकतम उम्र सीमा 64 तक की हो सकती है। जबकि अपने अश्वत्थामा जी अप्रेल माह में 65 के होने वाले हैं। ऐसे में अगर उनका कार्यकाल अगर बढ़ाना है तो नियम को बदलना होगा। राजपत्र में प्रकाशन होगा। उसके बाद ही विधिवत नियुक्ति संभव है। देखना यह है कि नियम बदलता है या फिर नियुक्ति टलती है। फैसला वक्त करेगा। तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
C N D का लंबा खेल...
सीएनडी का सीधी भाषा में मतलब होता है।विध्वंस और निर्माण।इन दिनों विध्वंस का खेल तो खूब चल रहा है। जिससे अच्छा खासा मटेरियल निकल रहा है।जो कि भविष्य में निर्माण के काम आ सकता है।लेकिन इस मटेरियल को पहले सहेजना जरूरी है।लेकिन उल्टा हो रहा है। समेटने के बदले बाले -बाले बेचा जा रहा है।तभी तो गोंदिया ट्रेचिंग ग्राउंड खाली पड़ा है।वरना जिस तादाद में cnd निकला है। अभी तक तो वहाँ पहाड़ खड़ा हो जाना था। अनगिनत पेड़ तक कट गए।जिसकी सैकड़ो टन लकड़ी निकली। वह भी गायब है।इससे शिवाजी भवन को आर्थिक नुकसान हुआ है और साइट अधिकारी की जेब गर्म हुई है।अपने एंग्रीमैन से गुहार है कि वह इस cnd खेल पर रोक लगाए।बाकी हमकों चुप ही रहना है।
हाईकोर्ट चलते है...
मंदिर के गलियारों में चर्चा है। हाईकोर्ट जाने की। यह चर्चा उन वेंडरों के बीच है। जो किसी न किसी सामग्री की सप्लाई करते है। करीब डेढ़ दर्जन वेंडर है। जो कि इन दिनों दुःखी है। भुगतान रोकने के चलते। अपने फटाफट जी की अलग पालिसी है। वह अगर भुगतान करते है। तो राई के समान। उदाहरण अगर 50 पेटी का बिल है तो 5 पेटी का भुगतान वेंडर को होता है। तभी तो सभी वेंडरों ने मिलकर एक ग्रुप सोशल मीडिया पर बना लिया है। जिसमे सभी अपनी अपनी भड़ास निकालते है। अपने फटाफट जी के खिलाफ। यही वजह है कि एक वेंडर ने उसमे लिखा। हाईकोर्ट चलते है। अब देखना यह है कि कितने वेंडर इस कदम को उठाने के लिए राजी होते है। तब तक हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
दागी पर मेहरबान संगठन
टी वी पर एक विज्ञापन की पंच लाइन तो सभी ने सुनी होगी। दाग अच्छे हैं। इन दिनों अपने कमलप्रेमी यह लाइन सुना रहे है।इशारा नीमच कांड की तरफ है। जिसमें एक कालोनी की ओपनिंग के लिए अपने विकासपुरुष के परिजनों के नाम का सहारा लिया गया था। जबकि परिजनों को कोई खबर ही नहीं थी और न कोई लेना-देना था। इसका खुलासा नीमच की मीडिया ने कर दिया। इस कांड में बाबा की नगरी के एक नेताजी का भी नाम सामने आया था। उसी नेता पर संगठन ने मेहरबानी दिखाई है। उनको एक मोर्चे का प्रदेश मंत्री बना दिया। यह नियुक्ति अभी अभी की गई है। तभी तो कमलप्रेमी बोल रहे है। दाग अच्छे हैं। अपने कमलप्रेमियो की बात में दम है, मगर आदत के अनुसार चुप रहना हमारा कर्म है
सफलता की कहानी-चरक की जुबानी...
अपने सरकारी भोंपू ने एक समाचार जारी किया। एक बालिका के हदय उपचार का। जिसे सफलता की कहानी बताया गया।जिसमें स्वास्थ्य के मुखिया अपने पाटला जी का भी गुणगान था। हालांकि सच यह है कि जिस योजना में उपचार हुआ। उसमे पहले भी कई ऑपरेशन हो चुके है।इसमे कोई तीर नही मार लिया।असली सफलता तो तब मानी जाए,जब चरक का संचालन अपने पाटला जी सही तरीके से करें। अव्यवस्था का आलम चरम पर है। गुरुवार को तो अति हो गई।जब 60 मिनिट से ज्यादा बिजली-रानी गायब रही। आकस्मिक सेवा के लिए रखे गए जनरेटर में डीजल नही था। ऑक्सीजन पर जीवित मरीजो से लेकर सभी मरीज परेशान रहे। उनके परिजन भी आक्रोशित होकर व्यवस्था को कोसते रहे। ऐसे में अपने पाटला जी को समझना होगा। असली सफलता अव्यवस्था को दूर करने पर मिलती है, ना कि किसी योजना के तहत उपचार की कहानी छपवाने से। हम अपने उम्मीद जी और उज्ज्वल जी से गुहार करते है कि अपने पाटला जी की लगाम कसे, ताकि विकासपुरुष के गृहनगर में आमनागरिक को परेशानी नही उठानी पड़े।तभी सफलता की कहानी का तमगा सही माना जाएगा।वर्ना उपचार करवाना उनकी डयूटी है,ना कि सफलता।फैसला उम्मीद जी और उज्ज्वल जी को करना है। असली सफलता किसे कहा जाए। तब तक हम आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बैनर से गायब...
अभी अभी अपने प्रथमसेवक का प्रकट उत्सव उत्साह के साथ मनाया गया। हमारी तरफ से भी देरी से सही,मगर शुभकामनाएं स्वीकार करें। अब सीधे मुद्दे पर आते है। इस खुशी के अवसर पर होर्डिंग्स भी लगाए गए। शुभकामनाओं वाले। लगना भी चाहिए। मगर इसमे से प्रथमसेवक मंत्रिमंडल के 4 चेहरे गायब थे। केवल 6 को जगह दी गई। जबकि मंत्रिमंडल में 10 सदस्य है। अब ऐसा भी नही है । राशि एकत्रित करके बैनर लगे होंगे। इसलिए जो राशि नही देगा,उसकी फोटो नही लगेगी। फिर भी 4 सदस्यों को दूर रखा गया। जबकि अपने प्रथमसेवक हमेशा सबको साथ लेकर चलने का दावा करते है। ऐसी चर्चा शिवाजी भवन के गलियारों में सुनाई दे रही है। जिसमे हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
तुम तो खा लेते हो,हम भूखे ....
राजनीति में बड़ा नेता हमेशा अपने साथ 2-4 छर्रों के अपने साथ रखता है। किसी भी कार्यक्रम में जाते वक्त ये हमेशा साथ रहते है।अपने मंगलनाथ बाबा भी बड़े नेता है। हमेशा उनके साथ कुछ लोग रहते है। इन्हीं में से किसी ने ऊपर लिखी बात"तुम तो बड़े नेता के साथ खा लेते हो-हम भूखे मरते है। छर्रे की बात सही है। बाबा तो कार्यक्रम में vip रहते है। उनको भोजन- नाश्ता मिल जाता है।मगर साथ वाले लोग भूखे रह जाते है। यह घटना वन मेला के ओपनिंग की बताई जा रही है।जहाँ उनके एक समर्थक ने खुलकर उनको ऐसा बोल दिया। जिसे सुनकर अपने बाबा चुप हो गए। तो हम भी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं
सावधानी हटी-दुर्घटना घटी...
इस स्लोगन से सभी वाकिफ है। मगर हमारा इशारा यहाँ आर्थिक लाभ की दुर्घटना की तरफ है। हमेशा से यह होता आ रहा है।जब -जब अपने उम्मीद जी -उज्ज्वल जी का मंदिर की तरफ दौरा होता है। तो उसके पहले हरसिद्धि से बड़ा गणपति मंदिर तक लगने वाली दुकानों को तत्काल हटवा दिया जाता है। दौरे के बाद वापस लग जाती है। वजह-इन दुकानों से बाकायदा वसूली होती है। रोजाना की।जिसमे मंदिर,वर्दी,शिवाजी भवन सभी की हिस्सेदारी होती है।मगर शुक्रवार को दुकानें लगी हुई थी। इस बीच उज्ज्वल जी,एंग्रीमैन, फटाफट और इन्दौरीलाल जी भ्रमण पर पहुँच गए। इतनी दुकानों को देखकर अपने उज्जवल जी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने सवाल कर लिया। तब उनको बताया गया। इसी जगह दीवार गिरी थी।2 की मौत हुई थी। वर्दीधारी पर गाज गिरी थी। यह सुनकर उज्ज्वल जी ने नाराजगी जताई। अब देखना यह है कि रोजाना की अवैध कमाई वाली दुकानों को हटाया जाता है या नहीं? वैसे उम्मीद कम है।कारण सोने का अंडा रोज देने वाली मुर्गी को कौन काटेगा? इसलिए हम अपनी आदत के अनुसार चुप हो जाते हैं।
बातों में मगन थे..
कार्तिक मेला प्रांगण की घटना है। जहाँ 2 केंद्र से आए अतिथि और अपने विकासपुरुष मौजूद थे। डाक विभाग का प्रोग्राम था। जिसमें राष्ट्र गीत का भी गायन हुआ था। मंच के पीछे ग्रीन रूम में भी अधिकारी/कर्मचारी/वर्दीधारी अपनी अपनी बातों में लगे थे। अचानक घोषणा हुई। अब राष्ट्रगीत वन्देमातरम होगा। मंच से लेकर वहाँ मौजूद सभी सावधान मुद्रा में आ गए। मगर मंच के पीछे अपने तीनअधिकारी अपनी बातों में मगन थे। उनको पता ही नही चला कि राष्ट्रगीत शुरू हो गया है।फिर किसी वर्दीवाले ने टोका। जिसके बाद सभी सावधान की मुद्रा में आए।अधिकारी कौन थे। इसको लेकर हमारे सूत्र का कहना है कि वह उनको नही जानता। जिसके लिए हम क्या कर सकते है। बस अपनी आदत के अनुसार चुप रह सकते हैं।
बुरा न मानो होली है - शब्दों की ठिठोली है…
विकासपुरुष की किस्मत और मेहनत रंग लाई
दुश्मन करते फिरते हैं अब उनकी खूब बुराई
पिस्तौल कांड नायक नहीं किसी की सुनते।
जलवा दिखाने के लिए मोटा भाई से मिलते
चरणलाल जी के भाग्य बड़े बलवान।
दोनो हाथ में लड्डू फिर भी रोटीराम
एम टेक और बी टेक डिग्रीधारी।
इनसे अच्छे तो अपने अंगूठाधारी
बदबूदार शहर के डॉक्टर की अपनी चाल
कमलप्रेमी यह सोचते किसने चुना बवाल
प्रथमसेवक और हाइनेस अपनी किस्मत से नाराज
जीतने के बाद भी लग नही रहा कुछ भी हाथ
सुबह बूटी ,दोपहर चिलम, रात को टकराते जाम
ऐसे माननीय को जनता का शत शत प्रणाम
दालवाले नेता की वाणी से सब घबराते
फिर भी कमलप्रेमी हँसते और मुस्कुराते
उम्मीद जी के आने से संभाग में छाई खुशहाली
मेले के कामों को निपटाना है असली जिम्मेदारी
पहले कप्तान, फिर डेल्टा,फिर अल्फा का फर्ज निभाया
महाकाल की इस कृपा को कोई समझ नहीं पाया
वजनदार ने तो अपने पहले वजन घटाया
फिर जुबान ललचाई तो अपना वजन बढ़ाया
उज्ज्वल जी के कामों की राजधानी में गूंज
काम ऐसा करना है कि दिल्ली पाए पूज
एंग्रीमैन का ख़ौफ़ इस कदर है छाया
आते ही उन्होंने बांस उठाकर अपना रंग दिखाया
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए
कप्तान की वाणी से मीठा शर्मिंदा होए।
मंदिर वाले फटाफट को कोई समझ नहीं पाया
सेवा का मौका मिला बदकिस्मत कर न पाया।
इन्दौरीलाल के टोटके से कोई बच नहीं पाया
विकासपुरुष पर भी उनका जादू छाया
अट्टू जी को आखिर मिला सरकारी आवास
बदला काया कल्प फिर करने लगे निवास
हिटलर की चुप्पी का अगर समझ लिया राज
चुप रहकर ही बने वो विकासपुरुष के खास
निखट्टू जी का अपना बस एक ही काम
रील बनाकर डालो औऱ करो आराम
विक्रमपूरी उधोग के राजा की बात निराली
जब भी मिलते तो सुनाते विकास की कहानी
दमदमा विकास भवन में गजब शांति छाई
नील नितिन मुकेश की सब करते बढ़ाई
मेरी पसंद
कितनी मस्ती टपक रही है
फागुन के इन रंगों से।
आओ तुम्हारी मांग सजा दू
मैं होली के रंगों से।
आज खेलने दो फागुन को घने रेशमी बालों से
रंगों को मिल जाने दो आज गुलाबी गालों से
आँचल को लहराने दो तुम
मस्ती भरी उमंगों से
..आओ तुम्हारी मांग सजा दूँ
मैं होली के रंगों से।
रंगों के पर्व की रंग -बिरंगी अग्रिम शुभकामनाएं
आपका अपना चुप